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शिक्षा का उद्देश्य

सुनील कुमार ठाकुर

जब भी लोगों के बीच महाभारत कालीन एकलव्य का नाम लिया जाता है तब अनेकों लोगों द्वारा उसका गुणगान किया जाता है। उसकी एकाग्रता, लगन और त्याग का उदाहरण दिया जाता है और बच्चों को उसका अनुसरण करने की सलाह भी दी जाती है। साथ ही साथ लोग द्रोणाचार्य को उनकी कठोर गुरुदक्षिणा के लिए कोशने से भी नही चूकते है।  प्रायः एकलव्य और अर्जुन की तुलना कर लोग एकलव्य को अर्जुन से अधिक महान घोषित भी कर देते है।

किन्तु इन सारे वक्तव्यों और उनसे जुड़ी भावनाओं का विश्लेषण करने पर यह ज्ञात होता है कि इनका कोई प्रासंगिग आधार नही है। महाभारत में ऐसी अनेक घटनाएं है जिन्हें विवादास्पद माना जाता है, उनमे से एक कहानी एकलव्य की भी है। किंतु यह विवाद केवल सामान्य जन के दृश्टिकोण में है। शास्त्र का संपूर्ण अध्ययन और महान ऋषियों द्वारा उनपर दिया गया दर्शन हमारे विवादास्पद दृष्टिकोण से पर्दा उठाता है।

वैदिक काल के शिक्षा तंत्र का अध्ययन करें तब ज्ञात होता है कि वैदिक काल मे विद्या प्राप्त करने से पहले विद्यार्थी की योग्यता का परीक्षण किया जाता था। विद्यार्थी की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी उस मापदंड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। विद्यार्जन किस कार्य के लिए किया जाना है यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण था।

वर्णाश्रम व्यवश्था के अनुसार क्षत्रियों को ही शस्त्र विद्या प्राप्त करने का अधिकार था किंतु इस सिद्धांत के अपवाद भी देखने मिलते हैं। ऐसे कुछ उदाहरण हुए है जिसमे निम्न वर्णों को भी शिक्षा दी गयी है । महाभारत में प्रारम्भ में कर्ण की पहचान एक निम्न वर्ण के व्यक्ति के रूप में थी किन्तु द्रोणाचार्य ने उसे शिक्षा प्रदान की थी। किन्तु एकलव्य द्वारा धनुर्विद्या सिखाने काआग्रह करने पर उन्होंने उसे स्पष्ट रूप से मना कर दिया। यहां अनेक लोगों द्वारा तर्क दिया जाता है कि वह शुद्र वर्ण का था इसलिए उसे शश्त्र शिक्षा नही दी गयी और कुछ लोग यह तर्क देते है कि द्रोणाचार्य की स्वार्थपरकता के कारण उन्होंने उसे शिक्षा देने से मना कर दिया। क्योंकि वे कुरु राजाओं से धन प्राप्त कर रहे थे और एकलव्य से उन्हें धन की आशा नही थी किन्तु यह तथ्य भी गलत प्रमाणित हो जाता है क्योंकि द्रोणाचार्य ने स्पस्ट रूप से जानते हुए भी कि धृष्टद्युम्न का जन्म उनका वध करने के लिए ही हुआ है, उसे शिक्षा प्रदान की।

अतः शास्त्र अध्ययन से जो तथ्य सामने आते है वे एकलव्य की वास्तविक स्थिति को प्रदर्शित करते है। एकलव्य निषाद राज का पुत्र था। निषाद वंश का उद्गम महाराज वेण से हुआ था। श्रीमद भागवतम में महाराज वेण के चरित्र का वर्णन मिलता है । ध्रुव वंश में राजा अंग का वर्णन आता है जिनका एक पुत्र वेण हुआ था। राजा वेण बाद में कुमार्गी हो गया,  स्वयं को भगवान घोषित कर अनेक अधार्मिक कार्य करने लग गया था। उसकी इस अधार्मिक प्रवृत्ति के संस्कार उसकी आगे की पीढ़ियों में पड़े और वे पीढ़ियाँ बाद में निषाद तथा मलेछ के नाम से जानी गयी। निषाद समुदाय लूट, शिकार इत्यादि से जीवकोपार्जन कर निम्न स्तर का जीवन जीने वाला समुदाय था। उनका शस्त्र विद्या अर्जन का उद्देश्य भी इन्ही कार्यों को संपादित करने के लिए ही होता था। एकलव्य का जन्म भी उसी निषाद समुदाय में ही हुआ था। द्रोणाचार्य का उसे शिक्षा न दिए जाने का यह एक बड़ा कारण था।

एकलव्य को एक महान गुरुभक्त के रूप में प्रदर्शित किया जाता है किंतु क्या वह वास्तविकता में गुरु भक्त था ? इसका विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि अगर वह वास्तविक गुरु भक्त होता तो गुरु के द्वारा उसे शस्त्र शिक्षा न दिए जाने की बात सुनकर ही वह धनुर्विद्या प्राप्त करने का विचार त्याग सकता था। एकलव्य कौशल का धनी था और अपने कौशल के बल पर वह किसी भी गुरु से विद्यार्जन कर सकता था, किंतु उसने बिना आज्ञा के द्रोणाचार्य को ही गुरु स्वीकार किया और शस्त्र विद्या सीखी । यह उसके हठी व्यवहार को प्रदर्शित करता है। ऐसा कतई नही है कि उस समय द्रोणाचार्य के समकक्ष अन्य कोई  शस्त्र विद्या के शिक्षक नही थे। किन्तु द्रोणाचार्य की ख्याति एकलव्य को उनकी ओर खींच लाई । उनका शिष्य कहलाने का गौरव प्राप्त करने की महत्वाकांछा भी एकलव्य के व्यवहार में झलकती है। आधुनिक समाज मे में यह प्रवृत्ति बहुतायत से पायी जाती है। लोग किसी भी तरह विख्यात शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पाकर अपने नाम के आगे उस संस्थान का नाम विशेष रूप से लगाते है।

विद्या, विनम्रता से शोभायमान होती है नाकि श्रेष्ठता प्रदर्शित करने से। आधुनिक संस्कृति हमे विद्या प्राप्त करने के दो मुख्य उद्देश्य बताती है- स्वयम को दूसरों से श्रेष्ठ प्रमाणित करना और उस श्रेष्ठता के बल पर अधिक से अधिक धनार्जन करना। किन्तु हम अर्जुन के जीवन चरित्र पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि अर्जुन ने अपनी विद्या का उपयोग प्रजा रक्षा और भगवान श्रीकृष्ण के परमोपदेश (श्रीमद भगवत गीता) से आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर युद्ध लड़ने के लिए किया अर्थात धर्म की स्थापना में  एक महान भूमिका अदा की।

इस तथ्य में कोई संदेह नहीं कि एकलव्य एक महान प्रतिभा का धनी था, इसलिए अंगूठा कट जाने के बाद भी उसके द्वारा धनुर्विद्या से प्राप्त महारत में कुछ कमी नही आयी। वह एक अति प्रतिभाशाली धनुर्धर बना किन्तु उसके बाद का जीवन काल उसके संस्कारों  से प्राप्त आसुरी प्रव्रत्ति को व्यक्त करता है। एक आसुरी प्रव्रत्ति का व्यक्ति ही एक असुर का साथ दे सकता है। एकलव्य ने बाद में जरासंध की सेना में सेनानायक का कार्य किया और उसके विजय अभियान में अनेक युद्ध लड़े। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयम एकलव्य का वध किया जिसे बाद में वे अर्जुन के सामने वर्णन भी करते है।

प्रतिभा का विश्लेषण करें तो अर्जुन और एकलव्य की प्रतिभा में कोई अंतर नही किन्तु उस प्रतिभा के बल पर प्राप्त विद्या का उद्देश्य देखें तो महान अंतर दृष्टिगत होता है। अतः केवल प्रतिभा होना ही पर्याप्त नहीं है, उस प्रतिभा का उपयोग किस कार्य के लिए किया जाना है यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

आधुनिक भौतिकवादी समाज का यह सबसे बड़ा दोष है कि प्रत्येक व्यक्ति नाम, पद और धन संपत्ति इत्यादि प्राप्त करना चाहता है और शिक्षा इसे प्राप्त करने का माध्यम मात्र बनकर रह गयी है ।  शिक्षा का उपयोग सर्वोत्तम कार्य – आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर मानव कल्याण के लिए करना है नाकि स्वयम की स्वार्थ पूर्ति के लिए। एकलव्य भी ऐसे ही एक व्यक्ति का उदाहरण है। हम एकलव्य से कार्य के प्रति लगन एवं उद्देश्य के प्रति समर्पण सिख सकते है किंतु उस से अर्जुन जैसे एक महान चरित्र की शिक्षा नहीं ले सकते। चैतन्य चरितामृत में वर्णन आता है कि इस महान भारत भूमि पर जिसने भी मनुष्य जन्म लिया है तो उसे आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर अपना जन्म सार्थक करना चाहिए और परोपकार करना चाहिये। अगर शिक्षा से विनम्रता, आत्म साक्षात्कार और परोपकार का गुण प्राप्त नही हुआ तो ऐसी शिक्षा व्यर्थ है। केवल जीवकोपार्जन के लिए किया गया एक श्रम मात्र है।

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