लेखक परिचय

अनिल गुप्ता

अनिल गुप्ता

मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

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 रा.स्व.सं. के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री मनमोहन वैद्य जी द्वारा जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में मुस्लिमों को आरक्षण पर एक सवाल के जवाब में देश में आरक्षण के बारे में कुछ बोला और मीडिया तथा भाजपा विरोधी दलों के बयानों की बाढ़ आ गयी! और दोबारा से बिहार चुनावों के दौरान संघ के सरसंघचालक जी द्वारा आरक्षण से अब तक हुए लाभ और उसके लक्ष्यों को अधिक तेजी से किस प्रकार पूरा क्या जा सकता है, के बारे में समीक्षा करने के सुझाव को लेकर जैसा वितंडावाद खड़ा किया था और भाजपा को उससे हुए नुकसान को दुहराने का प्रयास शुरू कर दिया गया है!
संघ के वरिष्ठ अधिकारी कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं होते हैं और वो अनेक बार स्वाभाविक रूप में ऐसी बात बोल देते हैं जो “पॉलिटिकली इनकरेक्ट” बन जाती है! ऐसे ही जैसे डोनाल्ड ट्रम्प अराजनीतिक व्यक्ति होने के कारण ऐसे बयान दे देते हैं जिन्हें राजनितिक रूप से गलत माना जाता है!
इस सारे विवाद में श्री वैद्य के कथन के केंद्रीय बिंदु को नजर अंदाज़ किया जा रहा है जिसमे उन्होंने कहा कि एससी एसटी को आरक्षण संविधान प्रदत्त है और संविधान के प्रारम्भ से ही है क्योंकि सैंकड़ों वर्षों तक “हमने” उन्हें उनके न्यायपूर्ण अधिकारों से वंचित रखा और उन्हें शेष समाज के बराबर लाने के लिए आरक्षण का प्राविधान संविधान में रखा गया!संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में मार्च १९८१ में ही इस आशय का प्रस्ताव पारित किया गया था कि एससी एसटी को आरक्षण इनके प्रति सदियों तक किया अनुचित व्यव्हार का प्रायश्चित ही नहीं है बल्कि सामाजिक समरसता के लिए उन्हें शेष समाज के समक्ष लाने के लिए आवश्यक भी है!
वास्तव में फरवरी १९८१ में गुजरात में कुछ लोगों ने आरक्षण के विरोध में आंदोलन शुरू किया गया था जिस पर एक पत्र उस समय मेरे द्वारा इंडियन एक्सप्रेस के संपादक के नाम भेजा गया था जिसमे मैंने उस आंदोलन को गलत बताते हुए लिखा था कि आरक्षण कोई खैरात नहीं है बल्कि सदियों तक अपने ही समाज के एक बहुत बड़े वर्ग के प्रति हुए अत्याचारपूर्ण व्यव्हार के परिमार्जन हेतु पूना समझौते के अन्तर्गत उस समय लागू किया गया था जब अंग्रेज समाज के इन वंचित बंधुओं को हिन्दू समाज से अलग करके उन्हें ईसाईयत के जाल में लाना चाहते थे! और महात्मा गाँधी ने इस खतरे को समझते हुए एक ओर तो पूना समझौते के द्वारा बाबासाहब आंबेडकर को आरक्षण के लिए सहमत कराया दूसरी ओर हरिजन सेवक संघ की स्थापना की और ठक्कर बापा को उसकी कमान सौंपी!इंडियन एक्सप्रेस ने मेरे पत्र को प्रकाशित नहीं किया! उसके कुछ दिनों के पश्चात् संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक हुई और उपरोक्त प्रस्ताव आरक्षण के समर्थन में और गुजरात आंदोलन के विरोध में पारित किया गया! संघ आज तक उस प्रस्ताव पर डटा हुआ ही नहीं है बल्कि अगले दस वर्षों में सभी प्रकार का भेदभाव समाप्त करके एक समता और समरसतापूर्ण समाज के निर्माण के लिए संकल्पित भी है!श्री मनमोहन वैद्य जी द्वारा जयपुर में दिए बयान को भी इसीपृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए! जब तक समाज में एक वर्ग के साथ भेदभाव रहेगा आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी! आज अनुसूचित वर्ग के छात्र छात्राएं ९०-९५ प्रतिशत अंक ला रहे हैं! उनके स्तर में भारी सुधार हो रहा है और यह आरक्षण के कारण संभव हो पाया है!
लेकिन एससी एसटी वर्ग के अतिरिक्त ओबीसी को आरक्षण यद्यपि संविधान के अनुच्छेद १६ के अन्तर्गत ही दिया गया है लेकिन देश के अलग अलग भागों में अलग अलग वर्गों द्वारा आरक्षण की मांग के समर्थन में उग्र हो रहे आंदोलनों के सन्दर्भ में श्री मनमोहन वैद्य जी के जयपुर बयान को देखा जाना चाहिए! उन्होंने कहा है की ओबीसी की समस्याओं के समाधान हेतु आरक्षण से इतर व्यवस्था पर और समान अवसरों की उपलब्धता पर विचार किया जाना चाहिए!अन्यथा हर वर्ग यदि आरक्षण की मांग करेगा तो इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित होगा और अलगाववाद बढ़ेगा! पिछले दिनों राजस्थान में गुजर आंदोलन, हरयाणा और उत्तर प्रदेश में जाट आरक्षण आंदोलन और गुजरात का पाटीदार आरक्षण आंदोलन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं!अतः श्री वैद्य जी के बयान को आरक्षण के विरोध में न मानकर विभिन्न आंदोलनों से उभर रही स्थिति पर व्यक्त एक चिंता के अतिरिक्त कुछ और अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए!इसके लिए अमेरिका सहित कुछ देशों में अफरमेटिव एक्शन जैसी व्यवस्था पर विचार होना चाहिए!
एक और पहलु भी है! आरक्षण की मांग मुख्य रूप से नौकरियों के सन्दर्भ में की जाती है!शिक्षा में आरक्षण भी रोजगार से ही जुड़ा है!लेकिन आज सरकारी क्षेत्र में और निजी क्षेत्र में भी नौकरियां घट रही हैं और ऑटोमेशन, रोबोटिकिक्स और ३-डी प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के द्वारा निर्माण की उभरती व्यवस्था को देखते हुए समूचे विश्व में रोजगार के अवसरों में भारी गिरावट की आशंका अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त की जा रही हैं!इस परिस्थिति में जब नौकरियां या रोजगार के अवसर ही खतरे में हैं तो आरक्षण का क्या समुचित लाभ प्रभावित नहीं होगा?
सभी सामाजिक आर्थिक विशेषज्ञों और चिंतकों द्वारा बहुत शीघ्र ही उभरने वाली रोजगारी की इस स्थिति से निबटने के लिए समुचित प्रयास करने की दिशा में गंभीरता से विचार करना आवश्यक है! वर्ना हम आरक्षण और अनारक्षण में ही उलझे रह जायेंगे और यह चुनौती हमारे सिर पर विकराल रू में आकर कड़ी हो जाएगी और हम इससे निबटने की तैयारी के लिए भी समय नहीं पा सकेंगे!

One Response to “आरक्षण का प्रश्न”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    आरक्षण हो क्षमता का। आरक्षण हो परिपूर्णता का। आरक्षण हो गुणवत्ता का। आरक्षण हो उद्यम का। आरक्षण हो कर्मठता का। आरक्षण हो साहस का। ……जापान ऐसे ही आरक्षण से, संसार के अग्रगण्य देशों की अपेक्षा, (फिर से पढिए) ५ गुना कारों का निर्माण करता है। क्योंकि जापान कर्मठता को आरक्षित करता है। हमारा दिया हुआ कर्म योग पढकर आचरण में लाता है।
    प्रश्न: क्या आप आरक्षित पायलट के विमान से प्रवास करोगे?
    या आरक्षण से पास हुए डाक्टर से अपनी शल्य क्रिया करवाना चाहोगे?
    आरक्षण मनुष्य को पंगु बनाता है। उस भिखारी के बेटे जैसा, जो अपने बालक को टांगे काटकर जीवन भर पंगु बना डालता है। हाँ, ठीक पढा आपने।

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