लेखक परिचय

अनिल गुप्ता

अनिल गुप्ता

मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

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modi-gorakshaकल के कुछ समाचार पत्रों में विश्व हिन्दू परिषद् के प्रमुख डॉ. प्रवीण भाई तोगड़िया जी की प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा छद्म ‘गौरक्षकों’ के सम्बन्ध में दिए वक्तव्य पर तीखी प्रतिक्रिया प्रकाशित की है! एक समाचार पत्र ने तो यहाँ तक लिख दिया है कि श्री तोगड़िया जी ने कहा है कि “मन करता है कि आत्महत्या कर लूँ!”.मेरे विचार में इस प्रकार के समाचार प्रधान मंत्री के वक्तव्य की भावना को न समझने के कारण आ रहे हैं! प्रधान मंत्री जी ने अपने उस कार्यक्रम के अंत में एक बालिका द्वारा स्वयंसेवी कार्यों के सम्बन्ध में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में कहा था कि पूर्व में जब बादशाहों और राजाओं में युद्ध होते थे तो राजा लोग उनसे बहादुरी से लड़कर उन्हें हरा देते थे! बाद में बादशाहों को राजाओं की गाय के प्रति श्रद्धा के बारे में पता चल गया तो उन्होंने युद्ध के मैदान में अपनी फौजों के आगे गायों को खड़ा करके युद्ध करने शुरू कर दिए! राजाओं की सेना गाय के प्रति श्रद्धा होने के कारण बादशाहों की फौजों पर हमला नहीं कर पाती थी क्योंकि ऐसा करने में गौहत्या का डर था!लेकिन बादशाह की फौजों के मन में ऐसी कोई श्रद्धा न होने के कारण वो राजाओं की फौज पर हमले जारी रखते हुए उन्हें हरा देते थे!इतना कहने के बाद प्रधान मंत्री जी ने गौसेवकों के बारे में कड़ी टिप्पणियां कीं!
अब सारी बात को अगर समझने का प्रयास किया जाये तो उनके शब्दों पर ध्यान देना होगा! उन्होंने दो अलग समूहों के सन्दर्भ में “राजा” और “बादशाह” शब्दों का प्रयोग किया!यह बताने की आवश्यकता नहीं है की इन शब्दों के द्वारा वो किनके बारे में बात कर रहे थे! हाँ. इतिहास में ऐसा अवश्य पढ़ा है कि पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के मध्य हुए सोलह युद्धों में “राजा” पृथ्वीराज चौहान ने “बादशाह” मुहम्मद गौरी की फौज को बार बार हरा दिया था और तब पृथ्वीराज चौहान के विरोधी राजा जयचन्द ने ‘बादशाह’ मुहम्मद गौरी को कहा कि ‘अगर पृथ्वीराज चौहान को हराना है तो अपनी फौज के आगे गायों को खड़ा करदो जिससे पृथ्वीराज चौहान की सेना गायों पर हमला नहीं करेंगी और तुम्हारी फौज जीत जाएगी!’ कहा जाता है कि ‘बादशाह’ मुहम्मद गौरी ने ऐसा ही किया और परिणाम भी वैसा ही हुआ जैसा कि घर के भेदी जयचन्द ने बताया था! ‘राजा’ पृथ्वीराज चौहान की सेना ने गायों पर हमला नहीं किया और ‘बादशाह’ मुहम्मद गौरी की फौजों ने गायों की ओट से हमले करते हुए ‘राजा’ पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा दिया और पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना कर दी!
निश्चय ही प्रधान मंत्री जी द्वारा अपनी कड़े तेवरों की टिपण्णी से यह समझाने की कोशिश की थी कि “अरे दीवानों, अपनी नासमझी में एक हज़ार साल पुराने इतिहास की गलती को न दोहराओ!विपक्षी और हिंदुत्व के दुश्मन फिर से गाय के मुद्दे को आधार बनाकर उदार हिंदुओं को अपने पक्ष में कर लेंगे और कट्टर हिन्दू ‘राजा’ पृथ्वीराज चौहान के सैनिकों की भांति गाय की ओट से किये गए इन हमलों से हार जायेंगे!जिस प्रकार यह एक ऐतिहासिक भूल थी की यदि उस समय ‘राजा’ पृथ्वीराज चौहान की सेना ने कुछ सौ गायों की परवाह किये बिना पूरी ताकत से ‘बादशाह’ मोहम्मद गौरी की फौज पर हमला बोला होता तो भारत को अगले सात सौ साल तक इस्लामी राज के दौरान हज़ारों मंदिरों का ध्वंस, लाखों/करोड़ों गायों की हत्या और करोड़ों हिंदुओं का इस्लाम में जबरन धर्मान्तरण न देखना पड़ता!उसी प्रकार अगर आज भी हिंदुत्व समर्थक यदि विपक्षियों के जाल में फंसकर गाय के मुद्दे पर उलझ गए तो कहीं ‘राजा’ की सेना सब प्रकार से श्रेष्ठ होते हुए भी चुनावी समरांगण में हार न जाये क्योंकि ‘उदारपंथी’ हिन्दू विपक्षियों के ही पाले में खड़ा हो जायेगा! अतः समग्र परिवेश को ध्यान में रखकर ही हिंदुत्व प्रेमियों. गौभक्तों को व्यव्हार करना होगा!युद्ध के स्वरुप को समझना होगा! अब तीरों और तलवारों का युद्ध नहीं है बल्कि मतदान का युद्ध ही है जिसमे विपक्षियों के वारों को कुन्द करने के लिए रणनीति के रूप में अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए व्यव्हार करना होगा! क्या शिवाजी महाराज ने रणनीति के तहत अनेकों मोर्चों पर पीछे हटकर बादशाह की फौजों को पराजित नहीं किया था?
प्रधान मंत्री जी पर भरोसा रखें!और उनके दिखाए रास्ते पर चलने की आदत डालें! कट्टरपंथी ‘पोस्चरिंग’ से हानि अधिक होगी और अनेकता का गलत सन्देश जायेगा!
रही बात गौरक्षा की, तो इस वर्ष नवम्बर में प्रसिद्द गौरक्षा आंदोलन की पचासवीं वर्षगाँठ है! तो इस अवसर पर गौरक्षा के लिए वातावरण बनायें! सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में अनुच्छेद ४८ के आधार पर याचिकाएं डालें! संभव है अदालतों से कुछ रास्ता निकल आये या फिर अदालती नोटिस के उत्तर में सरकार लॉ कमीशन को इस बारे में कानून बनाने की सम्भावना तलाशने के लिए कह सकती है जैसा कि उसने सामान नागरिक संहिता के मामले में किया है!

4 Responses to “गौरक्षकों को प्रधान मंत्री जी की नसीहत के मायने”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    ऐसे राष्ट्र द्रोह एक शब्द है,जिसका उपयोग हर भारतीय अपने विचार से भिन्न दृष्टि से सोचने वाले के लिए इस्तेमाल करता है,पर क्या किसी ने अपने गरेबान में झाँक कर देखा हैं कि वह स्वयं राष्ट्र द्रोही है या नहीं?मेरे विचार से हमलोगों में से अगर सब नहीं ,तो अधिकतर राष्ट्र द्रोही हैं.किसी को जाति या धर्म के नाम से पहचानना सबसे बड़ा राष्ट्र द्रोह है.मुझे कोई बताये कि कितने भारतीय इससे ऊपर हैं?हमारी गिनती संसार के सबसे ज्यादा भ्रष्ट देशों में होती है,इसका मतलब हम में से अधिकतर भ्रष्ट हैं. क्या भ्रष्टाचार में लिप्त कोई व्यक्ति राष्ट्र भक्त हो सकता है?हम जब भी सड़क पर थूकते हैं या गलत जगह कूड़ा डालते हैं,हम राष्ट्र द्रोही हो जाते हैं.हम अगर मिलावट करते हैं,तो हम राष्ट्र द्रोही हैं.हम अगर कर चोरी करते हैं,तो हम राष्ट्र द्रोही हैं.हमारे इतिहास के अनुसार जयचंद राष्ट्र द्रोही थे,पर क्या पृथ्वीराज ने उनका ऐसा अपमान नहीं किया था,जिसको पचा पाना उनके लिए कदापि मुमकिन नहीं था?खैर इतिहास की बात जाने दीजिये,पर आज के सन्दर्भ में मैं जो लिखा है ,वह गलत है क्या?

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  2. इंसान

    दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में आयोजित पहले टाउन हाल कार्यक्रम में जनता से सीधे संवाद कर सहज स्वभाव उनके प्रश्नों का सरल ढंग से उत्तर दे रहे प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी के वक्तव्य को देशद्रोही तत्वों ने मीडिया में तो बहुत उछाला है लेकिन प्रवीण तोगड़िया जी को अवश्य धैर्य से काम लेना चाहिए था| जब तक कोई एक स्वदेशी भाषा पूर्णतया भारतीय राष्ट्रभाषा नहीं बन पाती मैं स्वयं प्रत्येक प्रांतीय अथवा मातृभाषा को राष्ट्रवाद की भावना से जोड़ता हूँ| जैसे पूजा स्थल पर परमात्मा में विलीन बैठे भक्त आत्म-विभोर हो उठता है उसी प्रकार व्यक्तिगत मत भेद से ऊपर उठ मातृभाषा बोलते सभी भारतीयों के मन में केवल राष्ट्र के अनुकूल विचार उठने चाहियें| अंग्रेजी भाषा में सोचते और लिखते लोग प्रायः भारतीय परिस्थितियों को पच्छिम सभ्यता के दृष्टिकोण से देखते भारतीय सामाजिक कुरीतियों को सुलझा नहीं पाते उस पर विडंबना तो यह है कि ऐसे लोगों से प्रभावित हिंदी भाषी भी अनजाने में राष्ट्र के हितों को क्षति पहुँचाने में कोई संकोच नहीं करते हैं| यहाँ अनिल गुप्ता जी द्वारा प्रस्तुत “गौरक्षकों को प्रधान मंत्री जी की नसीहत के मायने” में प्रधान मंत्री जी के वक्तव्य को भारतीय संदर्भ अथवा परिस्थितियों में समझ पाने के विपरीत प्रभाकर चौबे जी ने देशबंधु में छपे अपने लेख, “लोकतंत्र-गोलीतंत्र” में उसका परिहास कर उस पर प्रश्न-चिन्ह लगाया है जिससे केवल राष्ट्रविरोधी तत्वों को लाभ पहुँचता है|

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  3. आर. सिंह

    R.Singh

    यह तर्क है या कुतर्क पता नहीं पर अच्छा है.ऐसे मैंने इतिहास में पढ़ा था कि मुहम्मद गोरी ने नौ बार चढ़ाई की थी.सत्रह बार तो मुहमद गजनवी आया था.

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    • Anil Gupta

      नौ बार आया हो या सत्रह बार! महत्वपुर्ण यह है कि हम हारे अपनी फुट के कारण ! अपने निजी अभिमान में अपने प्रतिद्वंदी को नीचा दिखाने या हराने के लिए देश के शत्रु से भी हाथ मिलाने में हमने गुरेज नहीं किया! जयचन्द का यह कृत्य इतिहास में सदा सदा के लिए जयचन्द शब्द को एक गाली बना गया! और हम हारे कैसे? अपने अंध गौभक्ति भाव के कारण! तर्क और बुद्धि को छोड़कर गौभक्ति की भावुकता ने हमें हराया! आपके द्वारा इतिहास का उल्लेख करके हमें भूल सुधार का अवसर दिया उसके लिए आभार!

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