माया का राजनीतिक स्टंट

-विनायक शर्मा

राज्यसभा की सदस्या और
जातिवादी दल बसपा की सुप्रीमो
मायावती को सदन में कौन बोलने नहीं देता है ?
किस पर इतना आक्रोश कि बोलने न देने के आरोप के
साथ ही सदस्यता से ही त्यागपत्र ?
राज्यसभा के सभापति और उपसभापति, दोनों ही न केवल विपक्ष से हैं, बल्कि उस दल विशेष के सदस्य रहे हैं
जिनके साथ मिलकर मायावती भाजपा के विरुद्ध तथाकथित सेकुलरिज्म का झंडा उठाये फिरती है। यही नहीं समय-समय पर माया ने यूपीऐ 1 और 2 के शासन के दौरान मुश्किल समय में कांग्रेस का साथ भी दिया।
परंतु अब सदन की कार्यवाई तो नियमानुसार ही चलेगी न ! क्योंकि सदन में जाति के नाम पर किसी प्रकार का कोई विशेष स्थान किसी भी सदस्य को नहीं मिलता। बोलने के लिये मिले समय के बाद भी यदि कोई सदस्य बोलने से हटेगा नहीं तो नियमानुसार घंटी तो बजेगी ही !
यह दीगर बात है कि त्यागपत्र की इस नौटंकी के पीछे सदन की घंटी से नहीं वरन मतदाताओं द्वारा निरंतर हाशिये पर धकेले जाने के घंटे से अवश्य ही मायावती चिंतित हैं।
लोकसभा की परीक्षा में शून्य बटा सन्नाटा, गृहक्षेत्र के विधानसभा चुनावों में तीसरे नम्बर पर और अब 2018 में राज्यसभा की सदस्यता समाप्त होने पर भविष्य अंधकारमय दिखने लगा था। जाति के वोट टैंक को मोदी की लहर ने छलनी कर दिया है। एक और जहां राजनितिक भविष्य अन्धकारमय दिख रहा है वहीं दूसरी और भ्रष्टाचार और आय से अधिक धन सम्पति के मुकद्दमों में स्वयं और परिवार के सदस्यों के फंसने का भय भी सता रहा है।
गरीबों द्वारा करोड़ों के नोटों के हार पहनने वाली बसपा की इस सुप्रीमो को अब चहुँ ओर से हार ही दिखाई दे रही है। ऐसी विषम परिस्थिति में मरता क्या न करता। एक बहुत ही केल्कुलेटेड प्लान के तहत माया ने राज्यसभा की अपनी शेष रही कुछ माह की सदस्यता से, सदन में न बोलने देने का आरोप जड़ते हुए त्यागपत्र दिया है। मजे की बात यह है कि अपने 4 पेज के त्यागपत्र में सारा आक्रोश भाजपा की केंद्र और उत्तरप्रदेश की सरकार पर डालने का प्रयास किया है। यहां उत्तर भारत के गावँ देहात की कहावत पूर्णरूप से चरितार्थ होती है कि : डिग्गी खोते तों, गुस्सा कुम्हार ते।
अब अंदर की बात यह है कि मायावती अपने राजनीतिक भविष्य को जिन्दा रखने के लिये लोकसभा की सदस्यता चाहती हैं। वह भी उत्तरप्रदेश से क्यूंकि एक तो उत्तरप्रदेश बसपा सुप्रीमो का गृहक्षेत्र है जहां वह तीन बार मुख्यमंत्री के पद पर रह चुकी है, दूसरा कारण यह कि अन्य किसी पड़ोसी राज्य में न तो निकट भविष्य में लोकसभा का कोई उपचुनाव होने जा रहा है। वैसे भी माया की एहसान फरामोश और एकला चलो रे की राजनीति से सभी दल भली भांति परिचित हैं। ऐसे में राज्यों के क्षेत्रीय क्षत्रप उसे अपने राज्य की कोई भी सुरक्षित सीट मुहैया करवाने का झंझट क्यों मोल लेंगे ? हाँ, लालू जैसे नेता जो स्वयं सपरिवार भ्रष्टाचार में लिप्त हो भविष्य की लड़ाई लड़ रहा है, तथाकथित सेकुलरिज्म के नाम पर अवश्य ही राज्यसभा की सुरक्षित सीट देने को कह रहा है।
उत्तर प्रदेश में योगी और मौर्य के क्रमशः मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद ग्रहण करने से इन दोनों नेताओं की लोकसभा की दो सीटें अवश्य ही रिक्त हो जाएंगी और ऐसी सम्भावना है कि मायावती मौर्य द्वारा छोड़ी जानेवाली फूलपुर (इलाहाबाद) की लोकसभा की सीट से अपना भाग्य आजमाना चाहती है।
इसके साथ ही सदन में न बोलने दिए जाने के आरोप को लेकर वह अपने बिखरे हुए वोट बैंक को भी समेटने का प्रयास करेगी।
सम्भावना यह भी है कि समाजवादी पार्टी के अतिरिक्त कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष माया को सहयोग करेगा।
जो भी हो, भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है यह कोई नहीं जानता।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में माया का राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र को यदि नेल पॉलिश लगा शहीद होने का दिव्यस्वपन कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

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