अच्छे दिनों का प्रमाण

5 अगस्त 2019 को जब जम्मू कश्मीर से धारा 370 को हटाकर देश की केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया तो सारे देश ने एक स्वर से सरकार के उस निर्णय का स्वागत किया । सारा देश अपने प्रधानमंत्री के साथ खड़ा हो गया । इसके उपरांत भी कुछ मुट्ठी भर तथाकथित बुद्धिजीवी और मानवाधिकारवादी उसी दिन से पाकिस्तान के समर्थन में जाकर कश्मीर में मानवाधिकार की बात कर रहे हैं । देश के गृहमंत्री अमित शाह ने ऐसे बुद्धिवादियों एवं मानवाधिकारवादियों को उचित ही कड़े शब्दों में फटकारते हुए कहा है कि ये मानवाधिकारवादी उस समय कहां गए थे जब पिछले 72 वर्ष से कश्मीर में निरपराध लोगों की हत्याएं हो रही थीं ? केंद्रीय गृहमंत्री श्री शाह ने इन निरपराध मरने वाले लोगों की संख्या 41800 बताई है । सचमुच इतने निरपराध लोग किसी बड़े युद्ध में भी नहीं मारे जा सकते , जितने हमने अपने इस स्वर्ग कहे जाने वाले प्रदेश में पिछले 72 वर्ष में ‘शांत युद्ध ‘ में मार दिए गये ।
लगता है जितने निरपराध लोग अब तक मारे गए उनके खून का कोई मूल्य नहीं था । तभी तो ये मानवाधिकारवादी संगठन उनके खून को खून न समझकर मौन रहे । अब जब हमारी सेना या सुरक्षाबलों के हाथों आतंकवादी या पत्थरबाज या देश के शत्रु मारे जा रहे हैं तो सारे मानवाधिकारवादी गला फाड़ – फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि बहुत बड़ा ‘अपराध ‘ हो रहा है । वास्तव में देश के भीतर बैठे ये तथाकथित बुद्धिवादी देश के ‘ मार्गदर्शक ‘ न होकर पथभ्रष्ट बुद्धिवादी होकर देश के शत्रु बने बैठे हैं।
दानवीय वृत्ति के लोगों के अधिकारों की चिंता करने से पहले हमारे इन बुद्धिवादियों या मानवाधिकारवादियों को यह विचार करना चाहिए कि केंद्रीय गृह मंत्रालय में गृहराज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर द्वारा पांच फरवरी 2019 को लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार जम्मू कश्मीर में 2014 से 2018 के बीच हुए आतंकी हमलों में शहीद हुए जवानों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से 94 प्रतिशत की वृद्धि हुई ।
वर्ष 2014 से 2018 के मध्य कुल 1,708 आतंकवादी हमले हुए जिनमें 339 जवान शहीद हुए । अहीर द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार 2014 में 47 जवान शहीद हुए थे । जबकि 2018 में यह आंकड़ा बढ़कर 91 हो गया । इस प्रकार यदि वर्ष 2014 से तुलना करे तो जम्मू कश्मीर में शहीद हुए जवानों की संख्या में लगभग 94 प्रतिशत की वृद्धि हुई । वहीं, बीते चार वर्षों से अधिक की अवधि में जम्मू कश्मीर में आतंकवादी हमलों की घटनाओं में 177 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है । वर्ष 2014 में राज्य में आतंकवाद की 222 घटनाएं हुई थीं जबकि 2018 में यह संख्या 614 रही ।

जवानों के अतिरिक्त वर्ष 2014 से 2018 के बीच आतंकी घटनाओं में 138 नागरिकों की मृत्यु हुई है । वर्ष 2014 में इस प्रकार की घटनाओं में 28 नागरिक मारे गए थे । वहीं वर्ष 2018 में 38 नागरिकों की हत्या हुई ।
बीते पांच वर्षों में 838 आतंकवादियों को मार गिराया गया है । 2014 में 110 आतंकवादियों को जवानों ने मार गिराया था जबकि 2018 में यह संख्या 257 रही. इस प्रकार इस अवधि में आतंकवादियों को मार गिराए जाने की घटना में 134 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
गृह मंत्रालय द्वारा दिए गए उत्तर के अनुसार बीते पांच वर्षों में आतंकवाद की सर्वाधिक घटनाएं 2018 में हुई हैं । 2017 की तुलना में 2018 में आतंकवाद की घटनाएं 80 प्रतिशत बढ़ी हैं । इंडियास्पेंड की 19 जून 2018 की रिपोर्ट के अनुसार जम्मू कश्मीर में 2017 तक 28 वर्षों में आतंकवाद की 70,000 से अधिक घटनाएं हुई थीं । इस काल में 22,143 आतंकवादियों को ढेर किया गया, 13,976 नागरिकों को जान गंवानी पड़ी और 5,123 जवान शहीद हुए ।
यह दुर्भाग्य का विषय है कि जब देश के इस सीमावर्ती प्रांत में ही आतंकवादी की 70000 घटनाएं हुईं और देश के सभी तथाकथित बुद्धिवादी और या बुद्धिजीवी या यह मानवाधिकारवादी संगठन शांत बैठे हैं । वास्तव में उनको उसी समय शोर मचाना चाहिए था और अपनी आवाज को जन आंदोलन के रूप में परिवर्तित कर तत्कालीन सरकारों को इस बात के लिए बाध्य करना चाहिए था कि इस राज्य में हो रहे निरपराध लोगों के नरसंहार पर प्रतिबंध लगे। उस समय इन बुद्धिजीवियों या मानवाधिकारवादियों का मौन रहना ऐसा आभास देता है कि जैसे इनका भी आशीर्वाद इन आतंकवादियों या देशविरोधी शक्तियों के साथ था और यह भी चाहते थे कि देश के इस सीमावर्ती प्रांत में निरपराध लोगों की हत्याएं होती रहें।
अब इस छद्मवाद से देश को मुक्ति मिल रही है । सावरकरवाद जीवित होकर देश की राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण हो रहा है। आतंकवाद और आतंकवादी चूहों की भांति बिलों से निकल – निकल कर इधर – उधर भाग रहे हैं। ‘ चूहों की घुड़दौड़ ‘ का एक मनोरंजक खेल देश में हो रहा है। दृश्य बड़ा मनोरंजक है । सारी राष्ट्रवादी शक्तियां इस समय पर प्रफुल्लित हैं और राष्ट्र विरोधी संगठन या लोगों के चेहरे समय लटके हुए हैं । वास्तव में शासक वही सफल होता है जिसके रहते हुए देश विरोधी शक्तियों के चेहरे लटक जाएं और राष्ट्रवादी शक्तियां या लोग प्रफुल्लित अवस्था में अपने आपको अनुभव करें । ‘ अच्छे दिनों ‘ का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा ?

डॉ राकेश कुमार आर्य

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