सार्थक पत्रकारिता का परिणाम

संmangalamदर्भः मंगलम चुनाव पर विशेष –

प्रमोद भार्गव
किसी अंचल में सार्थक पत्रकारिता के आश्चर्यजनक परिणाम क्या निकल सकते हैं, यह पत्रकार-संपादक अशोक कोचेटा की मंगलम चुनाव में अभूतपूर्व जीत से पता चलता है। 447 मत लेकर उन्होंने उन सब पेनल निर्माताओं को पीछे छोड़ दिया, जो जीत के सर्वोच्च शिखर को अपनी मुट्ठी में बंद मानकर चल रहे थे। मतदाताओं ने पेनल की सीमाओं से ऊपर उठकर अशोक और डाॅ शैलेन्द्र गुप्ता ;राकेश गुप्ता के बाद, को अधिकतम मत इसलिए दिए, क्योंकि दोनों के सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता, निष्पक्षता, ईमानदारी और व्यावहारिकता का कहीं अधिक अनुभव किया। साथ ही सार्वजनिक जीवन के उपरोक्त पर्यायों में मतदाताओं की यह चिंता भी अंतर्निहित है कि जिले की प्रमुख समाजसेवी संस्था ‘मंगलम‘ ऐसे ही लोगों के नैतिक दबाव में सुरक्षित रहते हुए दीर्घकालिक सेवाओं के लिए अस्तित्व बचाए रख सकती है ? अन्यथा निदेशक मंडल के सदस्य के चुनाव में इससे पहले एक पत्रकार प्रत्याशी को मात्र दो वोट मिले थे।
पत्रकारिता स्वतंत्र अभिव्यक्ति की एक लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण कला है। जन कल्याण के कार्यक्रमों से लेकर जन समस्याओं से जुड़े सभी विषय व मुद्दे इसके दायरे में हैं। राजनीतिक जागरूकता के जरिए व्यवस्था व सत्ता में बदलाव में प्रेस की अहम् भूमिका है। प्रशासन में पारदर्शिता व भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की पैरवी पत्रकारिता के ही दायित्व हैं। इन सब विशयों के क्रम में हम अशोक कोचेटा की दीर्घकालिक पत्रकारिता को मूल्याकंन की कसौटी पर परखें तो वह खरी उतरती है। इस सार्थक पत्रकारिता की तस्दीक मैं नहीं कर रहा, बल्कि इस चुनाव में मतदाताओं ने वोट के जरिए की है। वैसे तो लोकतंत्र में वातावरण निर्माण का प्रथम वाहक समाचार-पत्र को माना जाता है, क्योंकि वह जनमत को दिशा देने का काम करता है। बावजूद हकीकत यह है कि अंततः जनता ही है, जो हरेक संस्थागत लोकतांत्रिक ढांचे का मजबूत सुरक्षा कवच बनकर पेश आती रही है।
दैनिक भास्कर से पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले अशोक ने जब भास्कर छोड़ा, तो एक सद्य प्रकाशित अनजाने से समाचार-पत्र ‘हिंदुस्तान एक्सप्रेस‘ के मार्फत अपने पत्रकारीय दायित्व का निर्वहन किया। कम प्रसार संख्या वाला हिंदुस्तान एक्सप्रेस छोटा अखबार जरूर था, लेकिन इसमें लिखने की स्वतंत्रता थी। मसलन आकाश उड़ान भरने के लिए खुला था। वर्तमान में कार्पोरेट घरानों के बड़े अखबारों में यह छूट कतई नहीं है। वहां पूंजीगत हित सर्वोपरि हैं। समाचार कैसे हों, किनके हेतु सरंक्षण करने वाले हों, इसकी भी लगभग सीमाएं सुनिश्चित हैं। साफ है, बड़े समाचार माध्यम, फिर चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक, एक ऐसे खूंटे की रस्सी से बंधे हैं, जिसे खींचने पर स्वयं पत्रकार की सांसे अटकने लग जाती हैं। इस लिहाज से अशोक जैसे प्रतिभाषाली पत्रकार की खूंटे से मुक्ति इस क्षेत्र की स्वच्छ पत्रकारिता के लिए जरूरी थी। इसीलिए अशोक ने एक साल काम करने के बाद ‘नईदुनिया‘ को भी सलाम कह दिया था।
हिंदुस्तान एक्सप्रेस के साथ-साथ सोने में सुहागा यह हुआ कि जब शिवपुरी से ‘तरुण सत्ता‘ के प्रकाशन का शुभारंभ हुआ तो वे उसके संपादकीय दायित्व से जुड़ गए। यहां भी उन्हें शिवहरे-बंधुओं ने पूरी स्वतंत्रता दी। यही वजह रही कि अशोक ने इन पत्रों के माध्यम से जिले को ऐसी पत्रकारिता दी, जिसमें समाज और राजनीति के व्यापक हित जुड़े थे। सामाजिक सरोकरों से जुड़ी यह कलम पिछले तीन दशकों से निर्विकार, निर्लिप्त भाव से शब्द सृजन में लगी हुई है। आज राजनीतिक समाचारों के सृजन व विश्लेशण में अशोक इतनी परिपक्व दूरदार्षिता दिखाते हैं कि चाहे भाजपा हो या कांग्रेस जिस नेता की उम्मीदवारी अशोक अपने अखबार में तय करते हैं, लगभग विधानसभा और नगरपालिका का वही प्रत्याशी होता है। बावजूद अशोक कभी घमंड में चूर नहीं दिखते हैं। पत्रकारिता को सबक सिखाने का माध्यम नहीं बनाते हैं। निशाने पर आए लाचार को अर्थ-दोहन का जरिया नहीं बनाते हैं। उनके सार्थक पत्रकारिता के इन्हीं गुणों और सरोकारों को मंगलम के मतदाताओं ने समझा और अधिकतम वोट देकर अपना फर्ज निभाया। सार्वजनिक सेवा में लगे व्यक्ति को लोक का यही सर्वोत्तम प्रतिफल है।
हालांकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मंगलम कुछ नया करने से कहीं ज्यादा निदेशक मंडल के चुने गए 23 सदस्यों और सचिव पदनाम सहित मनोनीत बने रहने राजेन्द्र मजेजी का पहला कत्र्तव्य यही है कि यह संस्था अपने जन्म से लेकर अब तक जिस तरह से दिव्यांगों की सेवा समेत अन्य सेवाओं के लिए प्रतिबद्ध है, उसकी वह प्रतिबद्धता बनी रहे। साथ ही पदेन जिलाधीश के अध्यक्षीय दायित्व से मुक्त होने के बाद इसकी सुरक्षा का दायित्व संभालना भी इन्हीं सदस्यों का फर्ज है। क्योंकि प्रशासनिक नियंत्रण से मुक्ति के बाद कुछ निगाहें ऐसी हैं, जो सुगम साख की तरह इस पर गिद्ध दृष्टि गढ़ाए बैठी हैं। हालांकि अभी मजेजी मगंलम में एक ऐसी चरखी के रुप में गतिशील हैं, जहां आकर सभी मत-भिन्नताएं विलोपित हो जाती हैं। इस अनूठे नेतृत्व के संस्कार अशोक, राकेश गुप्ता, अजय खेमरिया और जिनेश जैन में भी विकसित हों, जिससे पूर्वजों के खून-पसीने से सींची गई यह संस्था चिरंजीवी बनी रहकर दिव्यांगों की सेवा में तत्पर बनी रहे।

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