सबक सिखाते उपचुनाव के नतीजे

देश की आठ विधानसभा एवं चार लोकसभा सीटों पर हुए उप चुनाव से संदेश स्पष्ट है। यद्यपि भारत जैसे एक विशाल लोकतांत्रिक देश में यह छोटे से उपचुनाव देश की अभिव्यक्ति नहीं है, पर जनादेश के संकेत समझे जा सकते हैं। पहला केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चल रही एनडीए सरकार के प्रति देश का भरोसा कायम है। दूसरा बंगाल हो या तमिलनाडु देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की अपने-अपने क्षेत्रों में जडं़े गहरी हंै।

bjp_runningदेश की आठ विधानसभा एवं चार लोकसभा सीटों पर हुए उप चुनाव से संदेश स्पष्ट है। यद्यपि भारत जैसे एक विशाल लोकतांत्रिक देश में यह छोटे से उपचुनाव देश की अभिव्यक्ति नहीं है, पर जनादेश के संकेत समझे जा सकते हैं। पहला केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चल रही एनडीए सरकार के प्रति देश का भरोसा कायम है। दूसरा बंगाल हो या तमिलनाडु देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की अपने-अपने क्षेत्रों में जडं़े गहरी हंै। तीसरा मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह ने अपनी लोकप्रियता फिर प्रमाणित की है और कांग्रेस के लिए अभी भी कोई खास संभावना नहीं है। वहीं महाराष्ट्र में मतदाताओं ने लगभग सभी प्रमुख दलों को थपथपाया भी है और कान भी  उमेंठे हैं। पूर्चांचल में भाजपा का सूर्योदय और आभा बिखेरता दिखाई दे रहा है, वहीं पांडुचेरी के नतीजे बेहद प्रत्याशित ही हंै।

बात करें मध्यप्रदेश की। कारण यहां का चुनाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। एक विधानसभा सीट और एक लोकसभा। दोनों ही सीटों पर उपचुनाव का कारण बेहद दुखद था। दोनों ही सीटों पर भाजपा काबिज थी। नेपानगर में विधायक राजेन्द्र दादू थे तो शहडोल में सांसद दलपत सिंह परस्ते। दोनों के ही असमय निधन से यह सीटें खाली हुई थीं। भाजपा ने नेपानगर में राजेन्द्र दादू की बेटी सुश्री मंजू दादू को टिकिट देकर सहानुभूति लहर पर अपना भरोसा जताया था। वहीं कांग्रेस का सोच भी कहीं-कहीं यह रहा ही होगा कि सुश्री हिमाद्री सिंह को टिकिट देकर वह पार्टी के कद्दावर नेता रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री  स्व. दलवीर सिंह की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने में सफल होगी।  हिमाद्री कांग्रेस की राजश्री नंदिनी सिंह एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. दलवीर सिंह की बेटी हैं। दोनों ही प्रत्याशी युवा हैं, महिला हैं और अपना पहला चुनाव लड़ रही थीं। और दोनों के ही सामने भाजपा एवं कांग्रेस से अनुभवी एवं परिपक्व राजनेता थे।

परिणाम  बताता है कि नेपानगर में मतदाताओं ने सुश्री मंजू दादू पर भरोसा जताकर युवा शक्ति को अपना आशीर्वाद दिया तो शहडोल में ज्ञानसिंह के ज्ञान एवं अनुभव को वरीयता दी। संदेश अगर नेपानगर की जीत की सहानुभूति लहर का परिणाम माना जाए तो यह शहडोल में क्यों नहीं हुआ? तात्पर्य भारतीय मन नि:संदेह भावुक है पर जनादेश देते समय वह भावनाओं को तर्क की कसौटी पर कसना जानता है। यही उसने किया। नेपानगर एवं शहडोल उपचुनाव में भाजपा की जीत से संदेश स्पष्ट है कि मतदाताओं का भरोसा न केवल प्रदेश की भाजपा सरकार पर कायम है, वह न केवल शिवराज सिंह से आज भी प्रभावित है अपितु वह कांग्रेस को, अपवादों को छोड़ दें तो वह अभी भी खारिज कर रहा है। यद्यपि शहडोल के नतीजे भाजपा के लिए सबक लेकर भी आए हैं।

वर्ष 2014 में भाजपा ने शहडोल लोकसभा में 55.47 फीसदी वोट प्राप्त कर 2 लाख 41 हजार 301 वोट से जीत हासिल की थी। 2016 में मत प्रतिशत 11.12 प्रतिशत से घटा है और जीत का अंतर 60383 पर सिमट गया है। भाजपा की जीत में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का बड़ा योगदान है, जिसने 55306 वोट प्राप्त किए। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को कांग्रेस के बड़े नेता रहे अजित जोगी का परोक्ष समर्थन था। कहने की आवश्यकता नहीं कि अगर गोंगपा के हीरा सिंह मैदान में नहीं होते तो लड़ाई कांटे की बन चुकी थी।भाजपा को यह जमीनी हकीकत समझनी होगी। मध्यप्रदेश में भाजपा रिकॉर्ड समय से सत्ता में है। शिवराज सिंह ने प्रदेश को यशस्वी  नेतृत्व दिया है। पर चुनाव में जीत एक कसौटी हो सकती है, पर यह सम्पूर्ण नहीं।प्रदेश में कांग्रेस आज भी कहीं नहीं है। शहडोल में यह फिर दिखाई दिया। कमलनाथ को छोड़ दें तो शेष ने रस्म अदायगी की। भाजपा के पास संगठन है, शिवराज सिंह का चेहरा है। दोनों का अपना एक महत्व है। पर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता इस बीच हताश हुआ है।

भ्रष्टाचार ने शासन की उजली छवि को फीका किया है। लगातार चुनाव एवं मैराथन सरकारी आयोजनों के बीच प्रदेश नेतृत्व को अब जमीनी सच्चाई परखनी होगी। कार्यकर्ताओं से संवाद मंच से नहीं घर-घर जाकर करना होगा, सामूहिक नेतृत्व की बात को अमली जामा पहनाना होगा। अन्यथा 2018 अब ज्यादा दूर नहीं है। जहां तक पश्चिम बंगाल एवं तमिलनाडु का प्रश्न है, तो तृणमूल कांग्रेस और एआईडीएमके का जादू बरकरार है। राष्ट्रीय दलों को यह समझना होगा कि आखिर वे क्या सूत्र हैं जो इन दलों ने अपनाए हुए हैं।कारण क्षेत्रीय दलों की सामूहिक शक्ति राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर रही है। असम भाजपा के लिए एक नई संभावना बनकर उभरा है यह शुभ संकेत है, भाजपा के लिए तो है ही देश के लिए भी है, कारण यह सीमावर्ती राज्य है। इसी तरह पूर्वांचल के अरुणाचल में जीत एवं त्रिपुरा में भाजपा का वोट प्रतिशत जो पहले कभी 2 से 10 प्रतिशत के बीच रहता था आज 40 फीसदी होना एक निर्णायक बदलाव का संकेत है। महाराष्ट्र के नतीजे कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना सभी से कुछ कहते हैं और  ये सुन भी रहे हैं, ऐसा लगता है।

और अंत में-कल्पना करें भाजपा मध्य प्रदेश में दोनों सीटें हार जाती असम में वह पराजित हो जाती या फिर महाराष्ट्र में वह सम्मानजनक जीत हासिल नहीं कर पाती विपक्ष खासकर कांग्रेस क्या कहती? नोटबंदी के खिलाफ पूरे देश ने मुहर लगा दी है। मोदी इस्तीफा दें।

अब जब कांग्रेस 12 में से सिर्फ एक सीट और वह भी मुख्यमंत्री जब स्वयं चुनाव लड़ रहे हों पांडुचेरी में जीती है,

“क्या इस बेहतरीन (?) प्रदर्शन पर राहुल बाबा एवं उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी इस्तीफा देंगी? “

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