भारत के गणतंत्र की शर्मनाक उपलब्धि

—– राकेश कुमार आर्य

भारत के अरबपतियों की संपत्ति में 2018 में प्रतिदिन 500 करोड़ रुपए की वृद्धि हुई है । इस दौरान देश के शीर्ष 1% धनी लोगों की संपत्ति में 39% की वृद्धि हुई , जबकि 50% निर्धन जनसंख्या की संपत्ति में केवल 3% की वृद्धि हो पाई है । ‘ऑक्सफैम ‘ ने अपने अध्ययन में यह चौंकाने वाले तथ्य भारत के संदर्भ में स्पष्ट किए हैं । जब देश के अमीर और गरीब के बीच की इतनी गहरी खाई बनी हुई हो और जब देश के पास विश्व के कुल 85 करोड भुखमरी के शिकार लोगों में से भारत में 20 करोड लोग रहते हों , तब भारत एक बार फिर अपने एक महंगे आम चुनाव की ओर बढ़ रहा है । जिसमें हजारों करोड रूपया खर्च होना संभावित है। इतनी राशि से आज देश में भुखमरी के शिकार 20 करोड़ लोगों को पूरे 5 वर्ष का भोजन मिल सकता है । लेकिन भारत के पूंजीवादी गणतांत्रिक लोकतंत्र में समाजवाद की बात करना आज चील के घोसले में मास ढूंढने के समान हो कर रह गया है । 
भारत के सारे राजनीतिक दल समाजवाद की बात करते हैं । भुखमरी , गरीबी , फटेहाली , बेरोजगारी को मिटाने का रोना रोते हैं ,परंतु उन सब के रोने के उपरांत भी भारत ने लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में आगे बढ़ते हुए पिछले 72 वर्ष में केवल इतनी ही प्रगति की है कि देश के 9 अमीरों के पास 50% जनसंख्या के बराबर की संपत्ति एकत्र हो गई है । कहने का अभिप्राय है कि देश की 65 करोड़ की आबादी एक ओर तथा देश के 9 अमीर एक ओर खड़े कर दिया जाए , तो पता चलेगा कि देश के 9 अमीरों के पास जितनी संपत्ति है , उतनी 65 करोड़ लोगों के पास में है । इसे भारत के गणराज्य की उपलब्धि कहा जाए य सबसे शर्मनाक हार कहा जाए ? – इसका निर्णय आपके ऊपर छोड़ा जाता है।
ऐसे में भारत की सारी राजनीति से एक प्रश्न किया जा सकता है कि यदि देश में ‘9 लोग बनाम 65 करोड लोग’ – की स्थिति उत्पन्न हो गई है , तो इसका अभिप्राय क्या यह नहीं है कि सारी राजनीति ही असफल सिद्ध हुई है ? देश के राजनीतिक पटल पर जितने भर भी राजनीतिक चेहरे हमें इस समय दिखाई दे रहे हैं , यह चेहरे न होकर थके हारे हुए मोहरे हैं ,और मोहरे केवल चौसर के खेल में प्रयोग किए जा सकते हैं । उनसे खेल खेला जा सकता है , परंतु सच्चाई को जीता नहीं जा सकता । असफल चेहरे बेतरतीब हुए पड़े हैं , जिनसे देश की जनता का मन ऊब चुका है । 
देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की बात करें तो उन्होंने अपने अब तक के राजनीतिक कैरियर में केवल शोर मचाना ही सीखा है । संसद में विधायी कार्यों को सरकार को करने नहीं दिया और जिन चीजों में उन्हें संतोषजनक उत्तर मिल गए , उन चीजों को भी वह बार बार दोहरा – दोहराकर देश के समय ,ऊर्जा और धन का अपव्यय कर रहे हैं । यही स्थिति प्रत्येक राजनीतिक दल के नेता की है । सारी राजनीति कर्तव्यविमुख है , और राष्ट्रनीति के साधना पथ से पीठ फेरे खड़ी है । वह नहीं चाहती कि राष्ट्रनीति की डगर अपनाकर राष्ट्रीय विकास के संकल्प को देश का सामूहिक संकल्प बनाकर उस पर काम किया जाए । 
इस समय वास्तव में देश में राष्ट्रीय सरकार के गठन की आवश्यकता है । एक ऐसी सरकार जो चुनाव जीतने के उपरांत संसद में जाते ही दलीय स्थिति से ऊपर उठ जाए और सारे दल अपनी दलीय पहचान को संसद के बाहर छोड़कर संसद के भीतर राष्ट्रहित में कार्य करने लगें । ये सब बैठकर सोचें कि ‘9 लोग बनाम 65 करोड़ ‘ की स्थिति को क्यों और कैसे मिटाया सकता है ? 
कभी देश के एक प्रधानमंत्री कहते थे कि देश के आर्थिक संसाधनों पर सबसे पहला हक अल्पसंख्यक लोगों का है , कोई दूसरा कहता है कि देश के बहुसंख्यक वर्ग का अधिकार देश के आर्थिक संसाधनों पर है । हम कहते हैं कि अब यह अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का रोना छोड़िए । राष्ट्रहित में राष्ट्रीय सरकार के एक साझीदार के रूप में संसद के भीतर बैठकर के ये कहें कि देश के आर्थिक संसाधनों पर सबसे पहला अधिकार देश के गरीबों का है । यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के राजनीतिज्ञ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का रोना रोते रहे और कहते रहे कि अमुक का देश के आर्थिक संसाधनों पर पहला अधिकार है और अब हमको जाकर पता चल रहा है कि देश के आर्थिक संसाधनों पर तो केवल 9 लोगों का अधिकार था । आज व्यवस्था को अपने आप अपने ही विरुद्ध अपना ही शपथ पत्र अपने ही अंतःकरण के न्यायालय में प्रस्तुत कर पूछना चाहिए कि यह इतना बड़ा अंतर कैसे आ गया ? व्यवस्था स्वयं से ही पूछे कि क्या व्यवस्था लुप्त हो गई या असफल हो गई या पंगु हो गई या नपुंसक हो गई ? 
संविधान की शपथ लेकर संविधान के अनुसार देश को चलाने वाले राजनीतिज्ञ आज देश को यह बताएं कि जब वह पहले दिन से देश में समतामूलक समाज की संरचना का संकल्प और सपना लोगों को दिखा रहे थे और बार बार यह शपथ उठा रहे थे कि वह लोकतांत्रिक गणराज्य के माध्यम से देश में ऊंच-नीच , भेद-भाव , छूत – अछूत , गरीब – अमीर की सारी खाई को पाटने में लगे हुए हैं और इस पंचवर्षीय योजना में इस प्रकार की सारी विसंगतियों को दूर कर देंगे ? – तब देश को 72 वर्ष पश्चात जाकर यह कैसे पता चल रहा है कि यह सारे के सारे राजनीतिज्ञ , सारी की सारी राजनीति और सारी की सारी व्यवस्था तो केवल ढोंग कर रही थी , पाखंड कर रही थी, झूठ बोल रही थी , सच्चाई तो कुछ और थी । अंततः इस सारी बीमारी के लिए दोषी कौन है ? – उन दोषियों को देश के सामने अब लाना ही होगा।
आज देश के प्रत्येक राजनीतिक दल और प्रत्येक राजनीतिक व्यक्ति से भी यह पूछा जा सकता है कि क्या भ्रष्टाचार के मामले में कोई भी दल इस समय अछूता है ? 
क्या चुनाव उतने ही पैसे में लड़े जाते हैं जितने चुनाव आयोग द्वारा स्वीकृत हैं या उससे कई गुना अधिक व्यय करके चुनाव लड़ा जाता है और जीता जाता है ? क्या जातिवाद और सांप्रदायिकता के मामले में कोई भी दल अपने को पाक साफ कह सकता है ? – क्या यह सही नहीं है कि चुनाव में प्रत्याशियों को टिकटों का बंटवारा जाति और संप्रदाय के मतों के अनुसार किया जाता है ? – क्या यह भी सही नहीं है कि वोट पाने के लिए सार्वजनिक धन को लुटाने या कर्ज माफ करने में कोई भी दल पीछे नहीं रहता ? क्या यह सच नहीं कि इस प्रकार की खैरात वाली राजनीति से देश की अर्थव्यवस्था और बैंकिंग व्यवस्था चरमरा गई है ? – क्या यह सही नहीं कि विकास के मॉडल में किसी भी राजनीतिक दल का दूसरे दलों से कोई बुनियादी अंतर नहीं है ? – क्या यह सही नहीं है कि चुनाव जीतने के बाद मंत्री पदों का बंटवारा योग्यता के आधार पर नहीं अपितु दल के नेता की इच्छा के अनुसार होता है ? क्या यह सही नहीं है कि केंद्र सरकार में भी सारे योग्य सांसदों की उपेक्षा कर अयोग्य और चाटुकार उम्मीदवारों को प्रायः महत्वपूर्ण पद दे दिए जाते हैं ? – जब यह सब सही है तो फिर इससे क्या प्राप्त होगा ? – और जब यह सही है तो क्या यह भी सही नहीं है कि ऐसी मानसिकता के कारण और ऐसी राजनीतिक सोच के कारण ही हमारे देश की वर्तमान स्थिति में ‘ 9 लोग बनाम 65 करोड़ ‘ की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
इस समय देश जब अपना 70 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है और 2019 के लोकसभा के आम चुनाव हमारे सिर पर दस्तक दे रहे हैं , तब हमें यह भी सोचना चाहिए कि आगामी चुनावों में भी क्या हम देश में भ्रष्टाचार , जातिवाद ,सांप्रदायिकता ,क्षेत्रवाद ,गरीबी ,असमानता आदि को दूर करने के लिए अपना कोई राष्ट्रीय संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं या सब खंडित संकल्प के साथ और इस उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि यदि अगले 5 वर्ष देश को लूटने का ‘चांस ‘ लग जाए तो देख लिया जाए ? – तकदीर आजमाने में तो कोई बुराई नहीं । तकदीर आजमाने की यह स्थिति ही हमारे राजनीतिज्ञों और राजनीति कि वह सबसे दुर्बल कड़ी है ,जिसने इस देश को आगे नहीं बढ़ने दिया ,और यहां पर 9 लोग बनाम 65 करोड़ की स्थिति आयी । यह लोग तकदीर आजमाते रहे और फिर मौका मिले या ना मिले – यह सोचकर ‘ तकदीर से मिले मौके’ को भुनाने की युक्ति सोचते रहे – परिणाम यह आया कि इनकी तिजौरियां भर्ती चली गई और देश का निर्धन वर्ग और भी अधिक निर्धन होता चला गया। 
देश की स्वतंत्रता से पूर्व देश में 563 राजा थे । इसका अभिप्राय है कि तब 563 राजपरिवारों के बीच ही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रहती थी । तब भी बहुत कम राजनीतिक परिवार ऐसे थे , जिनमें राजा पद पाने के लिए संघर्ष होता था। विशेषकर हिंदू रियासतों में तो ऐसा बहुत ही कम था । देश को स्वतंत्रता मिली तो देश के वर्तमान समाजवादी लोकतांत्रिक गणराज्य ने देश में जिस प्रकार की राजनीति प्रतिस्पर्धा को खड़ा किया – वह भी बड़ी भयानक रूप ग्रहण कर चुकी है । इस समय देश की लाखों ग्राम पंचायतें हैं । हजारों विधायक और सांसद हैं । इसी प्रकार जिला पंचायतों के सदस्य और जिला पंचायत के अध्यक्षों के पद आदि मिलाकर देश में लाखों ‘ राजा ‘ इस समय हैं । जैसे ही देश के वर्तमान राजनीतिक स्वरूप ने अपने इस पिटारे को खोल कर लाखों राजनीतिज्ञों को ‘राजा’ बनने की प्रतिस्पर्धा में मैदान में उतारा तो जहां स्वतंत्रता पूर्व 563 राजपरिवारों में राजा पद पाने की प्रतिस्पर्धा रहती थी ,वह लाखों परिवारों के मध्य होने वाली प्रतिस्पर्धा में बदल गई । यदि उस समय 563 राजपरिवारों में दशकों में जाकर 10 – 5 राजनीतिक हत्याएं होती थीं तो स्वतंत्रता के पश्चात देश में वर्तमान में लगभग प्रतिदिन राजनीतिक हत्याएं होती हैं । ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक के चुनाव में नित्य प्रति राजनीतिक हत्याएं होती ही रहती हैं । इसे ही हम सभ्य समाज की खुली प्रतिस्पर्धा कह रहे हैं और निहित स्वार्थ में इसे लोकतंत्र कहकर इस का गुणगान कर रहे हैं । परंतु वास्तव में यह हमारे गणतंत्र की हताशा और पराजय का प्रतीक है । फिर भी जिन लोगों ने लाखों लोगों के बीच होने वाली इस प्रतिस्पर्धा को लोकतांत्रिक गणराज्य की उपलब्धि कहा है ,उन्हें हम उनकी इस उपलब्धि की बधाई व शुभकामनाएं कैसे दे सकते हैं ? 
वर्तमान में हमें अपने आगामी लोकसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर और देश के 70 वें गणतंत्र के पावन अवसर पर अपना अंतरावलोकन कर देखना होगा कि 9 लोग बनाम 65 करोड़ की स्थिति इस गणराज्य की उपलब्धि है या फिर शर्मनाक पराजय है ? – साथ ही लोगों के बीच होने वाली राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चलते नित्य प्रति होने वाली राजनीतिक हत्याएं भी इस लोकतंत्रात्मक गणराज्य की उपलब्धि मानी जाए या इसके भविष्य पर उभरता हुआ गहरा प्रश्न चिन्ह माना जाए ? अब इन दोनों यक्ष प्रश्नों का उत्तर देने का समय आ चुका है । देखते हैं देश की राजनीति का कौन सा ‘ शेर ‘ इन प्रश्नों का उत्तर देगा या फिर ये लोग 2019 के चुनाव में भी हमें मूर्ख बनाकर किसी चोर गली से निकल जाएंगे ?

1 thought on “भारत के गणतंत्र की शर्मनाक उपलब्धि

  1. कल संसद में प्रस्तुत बजट के पश्चात प्रधानमंत्री मोदी जी ने यही कहा था कि देश के आर्थिक संसाधनों पर सबसे पहला अधिकार देश के गरीबों का है।

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