पिछले पांच हजार वर्षों में दयानन्द के समान ऋषि नहीं हुआ”


-मनमोहन कुमार आर्य

               महाभारत का युद्ध पांच हजार वर्ष से कुछ वर्ष पहले हुआ था। महाभारत युद्ध के बाद भारत ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र सहित देश की अखण्डता व स्थिरताकी दृष्टि से पतन को प्राप्त होता रहा। महाभारत काल के कुछ ही समय बाद देश से ऋषि परम्परा समाप्त हो गई। ऋषि परम्परा का आरम्भ सृष्टि के आरम्भ से ही हुआ था। सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने जिन चार पवित्र आत्माओं को वेदों का ज्ञान दिया था वह चारों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ऋषि थे। इन चार ऋषियों ने एक-एक वेद का ज्ञान ईश्वर से सीधे प्राप्त कर जिन ब्रह्मा जी को दिया था वह भी ऋषि थे। ब्रह्मा व अग्नि ऋषि से आरम्भ ऋषि परम्परा महाभारत काल के बाद जैमिनी ऋषि पर समाप्त हो गई। जैमिनी जी के भी कुछ शिष्य अवश्य रहे होंगे परन्तु इतिहास में इनका नाम नहीं मिलता। जैमिनी ऋषि के पांच हजार वर्षों बाद ऋषि दयानन्द का आविर्भाव हुआ। ऋषि दयानन्द ने किसी एक गुरु का शिष्यत्व प्राप्त कर ऋषित्व को प्राप्त नहीं किया अपितु आयु के 22वें वर्ष में गृहत्याग करने से लेकर सन् 1863 में गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से अध्ययन समाप्त करने तक उन्होंने 17 वर्षों तक निरन्तर ज्ञान की खोज व विद्या की प्राप्ति के कार्य में एक सच्चे जिज्ञासु के रूप में संलग्न रहे। वह देश के हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थानों पर गये और वहां विद्वानों से जितना ज्ञान प्राप्त हो सकता था, उसे प्राप्त किया। उन्होंने योग के गुरुओं से योग भी सीखा था और इससे उन्हें 18 घंटो तक समाधि अवस्था में ईश्वर का ध्यान करते हुए आनन्द का भोग करने की दक्षता प्राप्त हुई थी। इस पर भी उनमें और अधिक विद्या प्राप्ति की इच्छा थी जो मथुरा में ढाई वर्ष तक गुरु व आचार्य स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से विद्या प्राप्त कर सन् 1863 में पूरी हुई। स्वामी विरजानन्द जी ने अपने शिष्य दयानन्द जी को देश वा संसार से अविद्या दूर करने की प्रेरणा की थी जिसका उन्होंने आदर्श रूप में पालन किया। ऋषि दयानन्द आदर्श ब्रह्मचारी थे। ब्रह्मचर्य विषयक सभी शास्त्रीय नियमों का उन्होंने पालन किया था। यही कारण था कि वह वेद ज्ञान व योग समाधि के द्वारा ऋषित्व को प्राप्त हो सके।

               ऋषि वेद मन्त्रों के यथार्थ अर्थों के द्रष्टा को कहते हैं। ऋषि दयानन्द ने केवल वेदमन्त्रों के यथार्थ अर्थ ही किये हैं अपितु पूर्व के वेदभाष्यकारों सायण एवं महीधर आदि के वेद भाष्यों की समालोचना कर उनमें त्रुटियों उनके मिथ्यार्थों पर प्रकाश भी डाला है सयुक्तिक समालोचना की है। ऋषि दयानन्द के वेदों के अर्थ सही हैं इसके लिये उन्होंने अनेक प्रमाणों से युक्त वेदभाष्य किया है जो निरुक्त के प्रणेता महर्षि यास्क के निर्वचनों, नियम व सिद्धान्तों सहित मन्त्रों के भाष्य के अनुकूल है। वेद मन्त्रों के जो अर्थ ऋषि दयानन्द ने किये हैं वह बुद्धि एवं तर्क संगत हैं तथा ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर भी सत्य हैं। ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में हमारे ऋषियों व उसके बाद के लोगों के विचार, मान्यतायें व सिद्धान्त क्या थे व क्या रहे होंगे? वह समय वस्तुतः मानव जाति के इतिहास का स्वर्णिम काल था जब आज की तरह का प्रदुषित एवं सुविधायुक्त जीवन नहीं था। लोग कृषि से प्राप्त अन्न, वनस्पति, फल व गोदुग्धादि से जीवन का निर्वाह करते थे। ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि के विषय में चर्चा करने के साथ ईश्वर के गुणों का चिन्तन, ध्यान व यज्ञ अग्निहोत्रादि करके अपने जीवन को व्यतीत करते थे। वेद का ज्ञान तो सर्वोत्कृष्ट है ही, इसकी भाषा भी सबसे उत्तम है। कहा जाता है कि संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त करने पर अनन्त आनन्द की अनुभूति होती है। वस्तुतः यह बात सत्य है। ऋषि दयानन्द जी के जीवन को देखकर इस तथ्य की पृष्टि होती है।

ऋषि दयानन्द सच्चे ब्रह्मचारी, योगी तथा वेदों के सर्वोत्कृष्ट ऋषि विद्वान थे। उन्होंने मनुस्मृति में कथित धर्म के दस लक्षणों को धारण किया हुआ था। योग के पांच यम एवं पांच नियमों को भी उन्होंने धारण किया हुआ था। उनके जैसा महापुरुष योगी इतिहास में दूसरा नहीं हुआ है। उनसे पूर्व अविद्या को नष्ट करने का संकल्प लेकर किसी ने अध्ययन, कार्य प्रचार नहीं किया जैसा कि ऋषि दयानन्द ने किया है। ऋषि दयानन्द ने ही आर्यों वा हिन्दुओं के आलस्य प्रमाद तथा विधर्मियों के छल प्रलोभन एवं अन्य अशुभ इरादों से विलुप्त नष्ट हो रही सनातन वैदिक धर्म संस्कृति की रक्षा की। यदि वह न आते और वेदों का प्रचार न करते तो हम अनुमान से कह सकते हैं कि आज वैदिक धर्म व संस्कृति के दर्शन होने भी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होते। ऋषि दयानन्द ने न केवल वैदिक धर्म और संस्कृति की रक्षा ही की है अपितु इसे विश्व का सबसे श्रेष्ठ धर्म और संस्कृति भी सिद्ध किया है। सभी मत-पन्थ वा धर्मों का आधार ऐतिहासिक पुरुष महापुरुष हैं जबकि वैदिक धर्म का प्रादुर्भाव ईश्वर इसके यथार्थ रूप के ज्ञाता समाधि अवस्था में उसका साक्षात्कार करने वाल ऋषि हैं। ऋषि दयानन्द ने एक महत्वपूर्ण कार्य यह भी किया है कि उन्होंने वेद एवं सभी शास्त्रों के प्रमाणों से युक्त वैदिक धर्म के व्यापक स्वरूप पर सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, व्यवहारभानु, गोकरुणानिधि, पंचमहायज्ञविधि जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं जो लोकभाषा हिन्दी में है तथा जिसे देवनागरी अक्षरों हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाला मनुष्य भी जान समझ सकता है। वेदों के मन्त्रों के यथार्थ अर्थ करने की योग्यता रखने जीवन के अन्तिम समय तक वेद प्रचार वेदभाष्य आदि का कार्य करने के कारण वह सच्चे ऋषि योगी थे।

               ऋषि दयानन्द संस्कृत व हिन्दी में वेदभाष्य करने सहित सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना करने से ही ऋषि सिद्ध हो जाते हैं। उन्होंने यह कार्य तो किया ही साथ ही समाज सुधार, देश की एकता व अखण्डता सहित देश की पराधीनता को दूर कर इसे आर्यों का स्वतन्त्र देश बनाने का स्वप्न भी लिया था। पराधीन देश में वेदों का साहस एवं निर्भीकतापूर्वक प्रचार करने सहित शुद्धि देश की स्वतन्त्रता की बात करना और स्वराज्य का मन्त्र देना उनकी विशेष देनें हैं। उनके यह कार्य इतिहास में अपूर्व दुर्लभ हैं। ऋषि दयानन्द जी की हमें यह भी विशेषता प्रतीत होती है कि उन्होंने अपने व्यक्तित्व से स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती आदि अनेक उच्च कोटि के ईश्वर, वेद और देशभक्त दिये हैं। इन ऋषि दयानन्द के शिष्यों ने धर्म प्रचार सहित शिक्षा जगत, समाज सुधार एवं देश की स्वतन्त्रता सहित विधर्मियों के षडयन्त्रों को निर्मूल करने में भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हम यह भी अनुभव करते हैं कि ऋषि दयानन्द ने शास्त्र वचनों के आधार पर सत्यार्थप्रकाश के नवम् समुल्लास में जिस मोक्ष वा मुक्ति का वर्णन किया है, उन्हें वह मोक्ष भी प्राप्त हुआ है। यदि उन्हें प्राप्त हुआ न मानें तो हमें लगता है कि फिर मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी महाभारत काल के बाद कोई भी व्यक्ति व महापुरुष नहीं हुआ और सम्भवतः भविष्य में भी नहीं होगा क्योंकि जिस वैदिक धर्म का पालन करने से मोक्ष प्राप्त होता है उसका ऋषि दयानन्द से अच्छा पालन वा आचरण कोई मनुष्य नहीं कर सकतां। ऋषि दयानन्द को यह श्रेय भी प्राप्त है कि उन्होंने देश व विश्व की जनता को सृष्टिकर्ता तथा जीवों के जन्म-मरण के आधार ईश्वर के सच्चे स्वरूप, गुण-कर्म-स्वभाव व उपासना की विधि प्रदान की व वायु को शुद्ध करने सहित रोग रहित दीर्घायु जीवन के आधार अग्निहोत्र यज्ञ को उसकी विधि देकर सर्वत्र प्रचलित किया। 

               ऋषि दयानन्द ने आर्य साहित्य का निर्माण करने सहित वेदभाष्य का कार्य भी किया और वेद वचन ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ से हमें परिचित कराया। हमें गायत्री मन्त्र इसका यथार्थ अर्थ भी उन्होंने बताया। कृण्वन्तो विश्वमार्यम् का अर्थ पूरे विश्व वा संसार को श्रेष्ठ गुणों से युक्त करना है जिसमें कोई नास्तिक न हो, कोई अन्धविश्वासी न हो, कोई वेद विरुद्ध आचरण करने वाला न हो तथा कोई ऐसा न हो जो मातृ-पितृ-आचार्यों का आदर व सम्मान न करता हो। ऐसा भी कोई मनुष्य न हो जो मूक पशु-पक्षियों की हत्या कर व करवा कर उनके मांस का भक्षण करता हो, मद्यपान, धूम्रपान, अण्डों का सेवन करता हो तथा ब्रह्चर्यरहित जीवन व्यतीत करने वाला हो। ऋषि दयानन्द जी का जितना भी गुणगान करें उतना ही कम है। हम समझते हैं कि महाभारतकाल के बाद के पांच हजार वर्षों में ऋषि दयानन्द के समान वेदों के ज्ञान से प्रकाशमान ऋषि व महापुरुषों के दिव्य गुणों से युक्त ऋषि व महर्षि उत्पन्न नहीं हुआ। उस महर्षि देव दयानन्द को हम कोटिशः सादर नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

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