कश्मीर पर आई तथाकथित यूएन की रिपोर्ट एक साजिश है

डॉ मनीष कुमार

कश्मीर पर UN की ‘रिपोर्ट’ आई तो वामपंथी गैंग के चेहरे पर मुस्कान आ गई क्योंकि इनकी हिंदुस्तान को बदनाम करने की साजिश सफल हो गई. लेकिन इनकी खुशियां ज्यादा दिन तक टिकने वाली नहीं है. इस रिपोर्ट की सच्चाई समझने से पहले मोदी सरकार और बीजेपी को ये बताना जरूरी है कि सिर्फ चुनाव जीतने और इतने सारे राज्यों में सरकार बनाने से कुछ नहीं होता. देश विरोधी क्रियाकलापों में लिप्त लोगों को खुली छूट और राष्ट्रवादी विचारधारा को संस्थागत न करने का खामियाजा बाजपेयी सरकार भुगत चुकी है. अब मोदी सरकार को इसका नतीजा भुगतने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. विरोधियों की साजिशी ताकत को कम आंकने की गलती खतरनाक साबित हो सकती है. ये गैंग न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में हिंदुस्तान को बदनाम करने की काबिलियत रखते हैं. यूएन की तथाकथित रिपोर्ट उसी का महज ट्रेलर है.

जिस यूएन की रिपोर्ट को लेकर इतना बवाल मचा हुआ है उसकी हकीकत चौंकाने वाली है. दरअसल, ये रिपोर्ट का यूएन से कुछ लेना देना नहीं है. ये यूएन की रिपोर्ट ही नहीं है. यूएन का मानवाधिकार संगठन का नाम है – UNHRC (यूनाइटेड नेशन ह्यूमन राइट्स कॉसिल). इसके 47 सदस्य हैं. जो रिपोर्ट आई है वो UNHRC की तरफ से नहीं जारी किया गया है. न ही ये रिपोर्ट UNCHR की बेवसाइट पर है. ये रिपोर्ट ऑफिस ऑफ ह्यूमन राइट कमिश्नर (OHCHR) की तरफ से जारी किया गया है. OHCHR यूएन के सेक्रेटरी जनरल के सचिवालय का हिस्सा है. हैरानी की बात ये है कि OHCHR को न तो कॉंसिल ने और न ही सिक्रेटरी जनरल की तरफ से कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया. मतलब ये कि OHCHR की रिपोर्ट किसी भी तरह से यूएन की आधिकारिक रिपोर्ट नहीं है.

इस रिपोर्ट को OHCHR के उच्चायुक्त जैद राद अल हुसैन ने तैयार की है. ये जॉर्डन के शाही परिवार से हैं. इनकी इमेज ऐसी है कि ये आंतकवादियों के मानवाधिकार के लिए लड़ते रहे हैं. इस्लामिक आंतकवाद जैसे चीज को सिरे से खारिज करते हैं. मूल रूप से ये वामपंथी मुसलमान हैं – नीम के उपर करैला जैसी स्थिति है. लेकिन सवाल ये है कि इनको कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार करने की क्यों जरूरत पड़ी? इस पहलू को समझना जरूरी है. 2015 की आखिर और 2016 से कश्मीर में पैलेट गन से जब पत्थरबाजों की धुनाई होने लगी तो लेफ्ट-लिबरल गैंग में हाहाकार मच गया. हिंदुस्तान के अंदर तो ये लोग विरोध कर ही रहे थे.. लेकिन इस गैंग की दूसरा हिस्सा विदेश में साजिश रचने शुरु कर दिया. नक्सलवाद और जिहाद के समर्थक इंटेलेक्चुअल्स ने जैद राद अल हुसैन को चिट्ठी लिखी. ये चिट्टी – कश्मीर स्कॉलर्स एक्शन ग्रुप के नाम से लिखी गई. इस चिट्टी पर दिब्येश आनंद, मोना भान, अंगना चटर्जी, सुवीर कौल, हफ्सा कंजवाल, शुभ माथुर, इद्रीसा पंडित और अथर ज़िया जैसे जिहादी-वामपंथी स्कॉलर्स के दस्तखत थे. इनके लेखों और भाषणों को इंटरनेट पर ढूंढा जा सकता है. जिससे ये पता चलता है कि ये वो जमात है जो कश्मीर को भारत से अलग करना चाहता है. ये हिंदुस्तान के ऐसे जयचंद हैं जिन्हें कश्मीर चल रहा जिहाद स्वतंत्रता संग्राम दिखता है. दरअसल ये लोग नक्सली समर्थक वामपंथी हैं जो ISI एजेंट गुलाम नबी फाई से जुड़े हैं. भारत विरोध और हिंदू विरोध इनकी पहचान है.

इन्होंने अपने पत्र में भारत और भारतीय सेना की जम कर बुराई की. एक से बढ़ एक झूठ लिखा. मनगढ़ंत कहानियां बनाई. और फिर एक जांच की मांग की. हालांकि यूएन द्वारा जब भी किसी देश में मानवाधिकार के हनन की जांच होती है तो UNHRC की तरफ से कोर्ट ऑफ इंक्वाइरी बनाई जाती है. क्या जांच के दायरे में होगा और क्या नहीं ये सब कॉसिंल में तय होता. लेकिन, कश्मीर के मामले में जैद राद अल हुसैन ने खुद ब खुद जांच शुरु कर दी. रिपोर्ट आने के बाद, UNHRC ने भी साफ कर दिया है कि ये रिपोर्ट कॉसिल द्वारा तैयार नहीं की गई है इसलिए इसमें जो बातें कही गई है वो जैद राद अल हुसैन के निजी विचार है. ये UNHRC की रिपोर्ट नहीं है. हकीकत ये है कि जैद ने आफिस छोड़ने से पहले एक ऐजेंडा के तहत गैरकानूनी तरीके से ये रिपोर्ट तैयार की है और OHCHR को जाते जाते बदनाम करने की कोशिश की है. दरअसल, वो 31 अगस्त को इनकी विदाई हो रही है. इनके रवैये की वजह से इन्हें दूसरा टर्म नहीं दिया जा रहा है.

जब जांच शुरु हुई तो जैद ने भारत सरकार से कश्मीर में जाने की अनुमति मांगी. भारत सरकार ने फौरन इनकी विनती को ठुकरा दिया. मोदी सरकार का ये फैसला सही था क्योंकि न तो इनके पास यूएन सिक्रेटरी जनरल और न ही UNHRC का मैनडेट था. तो बिना कश्मीर गए जैद राद अल हुसैन ने पूरी रिपोर्ट तैयार कर दी. सवाल ये है कि इनको कश्मीर से जुड़ी जानकारियां किसने मुहैया कराई. इंटरनेट पर बैठ कर इस तरह की रिपोर्ट तो तैयार नहीं की जा सकती. रिपोर्ट में जैद ने लिखा कि चुंकि भारत ने उन्हें कश्मीर जाने की अनुमति नहीं दी तो इन्होंने कश्मीर की रिमोट मॉनेटरिंग की. उसी आधार पर ये रिपोर्ट तैयार किया गया. इस रिपोर्ट पारा नंबर 28 में जैद खुद ये मान रहे हैं कि रिपोर्ट में ज्यादातर बातें वो बातें हैं जो पहले से सार्वजनिक है. रिपोर्ट में आगे लिखा गया कि कुछ एनजीओ के रिपोर्ट और आरटीआई से हासिल की गई जानकारियों को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया. रिपोर्ट के फुटनोट्स से पता चलता है कि इन्होंने कश्मीरी-एक्टिविस्ट्स और वामपंथियों के लिखे को सत्य मान लिया और तथ्यों की बिना जांच किए उसे अपनी रिपोर्ट का हिस्सा बना दिया. आरटीआई का अधिकार तो सिर्फ हिंदुस्तान के नागरिकों को है.. तो वो लोग कौन हैं जिन्होंने इन जानकारियों को OHCHR को दिया?

दरअसल, ये पूरा खेल पाकिस्तान परस्त वामपंथियों का है. OHCHR की रिपोर्ट का सार और कश्मीर स्कॉलर्स एक्शन ग्रुप द्वारा लिखी गई चिट्ठी में कोई फर्क नहीं है. हैरान करने वाली बात ये है कि OHCHR की रिपोर्ट हूबहू वही है जो 2016 में ‘जम्मू कश्मीर कोअलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी’ ने रिपोर्ट तैयार की थी. फर्क बस इतना है कि OHCHR की रिपोर्ट में फुटनोट्स हैं और जबकि JKCSS की रिपोर्ट किसी सोर्स को उद्धृत नहीं किया गया है. लेकिन, जब हमने इस कोअलिशन के बारे में खंगालना शुरु किया तो पता चला कि इसमें भी वही लोग हैं जो सीधे और परोक्ष रूप से चिट्टी लिखने वालों की लिस्ट में शामिल है. ये लोग कश्मीर के नाम पर कई एंनजीओ चलाते हैं. इस कोअलिशन में एशोसिएशन ऑफ पेरेंट्स ऑफ डिसएपियर्ड पर्सन्स, पब्लिक कमिशन ऑन ह्यूमन राइट्स, इंटरनेशनल पीपुल्स ट्राइबुनल ऑन ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस इन इंडियन-एडमिनिस्टर्ड कश्मीर जैसे कई एनजीओ शामिल हैं. इंटरनेट पर इनके बारे जानकारियां उपलब्ध है. जिससे पता चलता है कि ये एक गैंग है जो कश्मीर के बहाने भारत को दुनिया भर में बदनाम करने पर तुला है. OHCHR की रिपोर्ट के फुटनोट्स की जांच करने से साफ साफ पता चल जाता है कि ये रिपोर्ट कहने को सिर्फ OHCHR की रिपोर्ट है जबकि सच्चाई ये है कि इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले लोग वही हैं जिन्होंने 2016 में OHCHR के उच्चायुक्त को चिट्ठी लिखी. फिर इन्हीं लोगों ने कश्मीर स्कॉलर्स एक्शन ग्रुप के नाम पर कश्मीर पर रिपोर्ट तैयार की और फिर जांच रिपोर्ट के नाम पर कटपेस्ट कर दिया.

हालाकि चिट्ठी लिखने वाले जिहाद-समर्थक वामपंथियों के बारे में कई जानकारियां हमारे पास है जिसे दूसरे पोस्ट में शेयर करूगा लेकिन मेरा मानना यही है कि इस गैंग ने भारत को बदनाम करने के लिए साजिश रची और OHCHR के बाहर जा रहे उच्चायुक्त को रिपोर्ट लिखने पर तैयार किया. इतना ही नहीं, पुराने रिपोर्ट्स और जानकारियों को मुहैय्या कराया. ऐसा मानने की वजह ये है कि जिस तरह से ये लोग कश्मीर में चल रहे जिहाद को स्वंतत्रता संग्राम बताते है.. आंतकियों को लीडर बताते हैं.. आतंकवादी संगठनों को सेल्फ-डिटरमिनेशन के लिए लड़ने वाले आर्म्ड क्रांतिकारी बताते हैं.. यही इस रिपोर्ट में नजर आया है. दरअसल ये रिपोर्ट भारत के टुकड़े टुकड़े गैंग की रिपोर्ट है. इस रिपोर्ट में यूएन द्वारा घोषित आतंकवादी संगठनों को 38 बार आर्म्ड ग्रुप कहा गया है और आतंकवादियों को लीडर बताया गया है. इस रिपोर्ट में PoK को 26 बार आजाद जम्मू कश्मीर लिखा गया है. जबकि यूएन में पीओके को पाकिस्तान एडमिनिस्टर्ड कश्मीर कहा जाता है. कश्मीर में चल रहे जिहाद की वजह से जिस तरह 14000 लोगों की मौत हुई. हिंदुओं को कश्मीर से भगाया गया. जिस तरह 5000 से ज्यादा सैनिक शहीद हुए इस पर रिपोर्ट में कुछ भी कहा नहीं गया है. ये ऐसी बातें हैं जिसे हर निष्पक्ष रिपोर्ट में शामिल किया जाना चाहिए लेकिन जिस तरह टुकड़े टुकड़े गैग इन मुद्दों पर चुप रहता है उसी तरह इस रिपोर्ट से ये मुद्दे गायब हैं.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि इस रिपोर्ट को जुलाई 2016 से अप्रैल 2018 की अवधि में ही क्यों सीमित किया गया? इससे पहले जो कश्मीर में हिंदुओं के साथ जो अत्याचार हुआ उस पर इसमें बातचीत क्यों नहीं हुई? ऐसा लगता है कि देश के टुकड़े टुकड़े गैंग ने 2019 के चुनाव को ध्यान में रखकर इस रिपोर्ट की साजिश रची ताकि मोदी सरकार पर ये आरोप लग सके कि इनकी नीतियों की वजह से भारत पुरी दुनिया में बदनाम हुआ है. सरकार ने तो इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया लेकिन जिहादी-वामपंथी गैंग का काम तो पूरा हो गया. कांग्रेस भले ही इस रिपोर्ट को फिलहाल खारिज कर चुकी है लेकिन चुनाव के दौरान इसी रिपोर्ट का हवाला देकर राहुल गांधी बवाला मचाएंगे. इसलिए, ये जरूरी है कि ऐसे लोगों से पूछताछ हो, सजा मिले जिन्होंने भारत को बदनाम करने की साजिश में सक्रिय भूमिका निभाई है.

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