लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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सभी क्षेत्रीय भाषाओं को यथास्थान यथायोग्य सम्मान देते हुए हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित किया जाना अभी शेष है। अगले सप्ताह 10-12 सितम्बर को भोपाल में दशम विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया जा रहा है। इसमें भारत के शीर्ष नेता भाग ले रहे हैं। मैं विदेशमन्त्री श्रीमती सुषमा स्वराज का इसके लिए अभिनन्दन करता हूँ कि उनके निर्देशन में इसकी प्रभावी रुपरेखा तैयार की गई है। गृहमंत्री श्री राजनाथसिंह और मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह प्राणपण से इसके साथ जुड़ रहे हैं। देश विदेश से हिन्दीप्रेमियों को आमन्त्रित किया गया है।

है यह आयोजन अभूतपूर्व सफलता प्राप्त करेगा। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि पहले की तरह यह सम्मेलन भी सिमट कर एक आयोजन मात्र न रह जाए जिसमें हिंदी की विश्व स्तरीय महत्ता की चर्चा तो हो लेकिन भारत इसे वैधानिक दृष्टि से राष्ट्रभाषा का दर्जा देने से अभी भी कतराए। माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी स्वयं हिंदी के प्रबल समर्थक हैं और उन्होंने अपने विदेश प्रवासों में हिंदी का कीर्ति ध्वज गर्व के साथ फहराया है। मेरा उनसे अनुरोध है कि इस हिंदी सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए संविधान में आवश्यक प्रावधान करने के अपने संकल्प की घोषणा करके इस सम्मेलन को सार्थकता प्रदान करें।  स्वतन्त्रता प्राप्ति के 68 वर्ष बाद अब इस विषय पर पुष्ट निर्णय की नितांत आवश्यकता है।

सम्मेलन की सफलता के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं,

नरेश भारतीय

6 Responses to “दशम विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रधानमन्त्री मोदी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के संकल्प की घोषणा करें”

  1. इंसान

    भारत में चल रहे वर्तमान राजनैतिक वातावरण में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व हिंदी रेडियो प्रसारक नरेश अरोरा जी को हिंदी भाषा के संदर्भ में “दशम विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रधानमन्त्री मोदी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के संकल्प की घोषणा करें” जैसे शीर्षक के अंतर्गत अपने विचार लिखने में सतर्कता बरतनी चाहिए। उन्हें मालूम होना चाहिए कि प्रधान मंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र के राष्ट्रीय शासन को “सूट-बूट की सरकार” कह विपक्ष ने पहले से ही सरलमति भारतीय जनता में संशय और भय उत्पन्न करने का क्रूर प्रयास किया है।

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    राष्ट्र भाषा का पद विभूषित करने की क्षमता मुझे केवल हिन्दी में ही दिखती है।
    हिन्दी राष्ट्र भाषा घोषित होते ही, युनो में उसे स्वीकार्य होने की एक अनिवार्य शर्त पूरी होगी। युनो में हिन्दी स्वीकृत होने के बाद आप सभी का मस्तक ऊंचा ही होगा। प्रामाणिकता(ईमानदारी) से बोलिए।
    अंग्रेज़ी तो पर-राष्ट्र-भाषा है। हिन्दी कम से कम अपने देश की भाषा है।
    और अन्य किसी भाषा में मुझे ऐसी राष्ट्र भाषा की संभावना दिखती नहीं है।
    मेरी मातृभाषा भी हिन्दी नहीं है।
    एक बार वायोमिंग शोध पत्र पढने जाना हुआ था। १२-१४ भारतीय प्रोफ़ेसर दुपहर भोजन पर साथ बैठे और अंग्रेज़ी में वार्तालाप कर रहे थे। निकट से जाते एक विदेशी ने हमें अंग्रेज़ी में बोलते सुनकर अचरज व्यक्त किया, कि, आप लोग अंग्रेज़ी में क्यों बोल रहे हो? आप को अपनी भाषा नहीं क्या?
    हमारे लिए कुछ संदेश था।
    बिना राष्ट्रभाषावाला एक राष्ट्र है हम?
    “वन्दे मातरम” या “भारत माता की जय” बोलिए और कैसे भाव मनमे जगते हैं, ये देखिए। फिर बोलिए ॥सेल्यूट टु यु मदर भारत॥ और कैसे भाव जगते हैं? प्रामाणिकता से उत्तर दीजिए। हिन्दी ही ऊपर होगी।
    मधुसूदन

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  3. नरेश भारतीय

    नरेश भारतीय

    हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का अर्थ कदापि यह नहीं है कि देश की क्षेत्रीय भाषाओँ की उपेक्षा की जाए. मैंने इसीलिए अपनी टिप्पणी के प्रारंभ में ही उन्हें यथायोग्य यथास्थान सम्मान दिए जाने की बात कही है. दक्षिण भारत में हिंदी का सार्वजनिक विरोध नहीं है अपितु राजनीतिक स्वार्थ के लिए कुछ लोग विरोध को उभारने की कोशिश करते हैं.

    विश्व में हर उस देश की एक राष्ट्रभाषा होती है जो उसकी एकता और एकात्मकता की प्रतीक होती है. संस्कृत के पश्चात भारत में सर्वाधिक जनसँख्या को हिंदी भाषा का व्यावहारिक ज्ञान है और समूचे देश में यह बोलचाल, लेखन अध्ययन और परस्पर संपर्क की भाषा है. किसी विदेशी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाए रखने का आग्रह बनाए रखने वालों को चाहिए कि स्वत्व की पहचान बनाने के प्रति ध्यान दें. जिस भाषा का मूल भारत में नहीं बल्कि विदेश में है उसके साथ इतना भी अनुराग अच्छा नहीं कि अपने देश की सर्वाधिक मान्य भाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मानित न होने दे. मैं विदेश में रहते हुए भी अपनी मूल संस्कृति, परम्पराओं और भारत की सर्वाधिक मान्य राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा हिंदी के प्रति समर्पित हूँ. मेरी मातृभाषा हिंदी नहीं है लेकिन मैं अपने सांस्कृतिक भारत की एकात्मता की प्रतीक एक राष्ट्रभाषा हिंदी को ही मानता आया हूँ. प्रान्तीयवाद की तंग सीमारेखाओं से परे भारत के विराट स्वरूप दर्शन के लिए एक साथ खड़े हों. हिंदी ही आज इसका श्रेष्ठ माध्यम बनने को सक्षम है इस तथ्य को बेझिझक स्वीकार करें.

    यही वक्त है कि हम भारतवंशी एकात्मता की ओर कदम बढाएं. टुकड़ों में बने रहने और टुकड़े करते रहने की प्रवृति को छोड़ें. भारत की अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को ही घोषित करने करवाने के लिए साहसपूर्ण एकजुटता दिखाएं. मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ इससे भारत का विश्व में सम्मान निश्चय ही बढ़ेगा.

    नरेश भारतीय

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  4. shrinivas Joshi

    नरेश भारतीय जी के इस लेख में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने का जो सुझाव दिया गया है उससे मैं सहमत नहीं हूँ. माननीय लेखक महोदय जानते ही होंगे की दक्षिण भारत में, और विशेष कर तामिलनाडु में, हिंदी को काफी विरोध है. आनंद की बात यह है की पिछले पाँच दस वर्षों से इस विरोध की तीव्रता थोड़ी कम हो रही है. परन्तु जब कभी कोई केन्द्रीय मंत्री या वरिष्ठ अधिकारी हिंदी का उपयोग या महत्त्व बढाने की बात करता है तब वहाँ का हिंदी विरोध फिर से उभर आता है. इस लिए हिंदी के बारे में हमारे नेता जितना कम बोलेंगे उतना अच्छा! बिना बोले हिंदी के लिए काम करना यह सबसे उत्तम मार्ग है. हमारे आदरणीय प्रधान मंत्री इसका एक उत्तम उदाहरण दे रहे हैं.
    हमारे देश की सच्चाई यह है की हिंदी भाषी प्रदेशों में ही हिंदी की हालत बुरी है. जो प्रेम, प्रतिष्ठा, और मान का स्थान अन्य राज्यों में वहाँ की राज्य भाषा को है, उसका एक अंश भी हिंदी प्रदेशो में हिंदी को नहीं है. (इसके बारे में विस्तार से फिर कभी मैं लिखूंगा). इस लिए हमारा पहिला काम, हिंदी को अपने खुद के घर में, याने की हिंदी भाषिक राज्योंमे , मान सम्मान और प्रतिष्ठा का स्थान दिलवाना, यह होना चाहिए. साफ है की जिसको घर में ही कोई नहीं पूछता उसको बाहर कौन पूछेगा.
    अंत में इतना ही कहूँगा की हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने से हिंदी का कुछ भला तो होगा ही , हानि मात्र बहुत होगी.
    श्रीनिवास जोशी

    प्रवक्ता के पाठकों से नम्र निवेदन: हिंदी मेरी मातृभाषा नहीं है, इस लिए कुछ गलतियां हुई होगी तो पाठक क्षमा करेंगे ऐसी आशा करता हूँ. धन्यवाद.

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    • इंसान

      श्रीनिवास जोशी जी, मैं आपके विचारों से सौ प्रति शत सहमत हूँ। स्वयं मेरी मातृ भाषा पंजाबी होते हुए मेरी हिंदी भाषा में रुचि अधेड़ आयु में हुई है क्योंकि आज मेरा विश्वास है कि न केवल राष्ट्रवाद (सभी भारतीयों को एक भाषाई डोर में बांधते संगठित करना) बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी हिंदी भाषा का बहुत महत्व है। आज के सूक्ष्म राजनैतिक वातावरण में प्रस्तुत लेख के शीर्षक के अनुसार हिंदी भाषा को समस्त भारतवासियों पर “थोपना” विभाजनात्मक क्रिया हो सकती है। “बिना बोले” यदि हम दसवीं विश्व हिंदी सम्मेलन के मुख्य उद्देश्य, “हिंदी जगत : प्रसार और संभावनाएं” के अंतर्गत बनाई नीतियों, विशेषकर नियोजन सम्बन्धी नीतियों द्वारा हिंदी भाषा का प्रसार और उससे जुड़ी सभी संभावनाओं को कार्यान्वित कर सामान्य भारतीय जनता के जीवन को सुखद और समृद्ध बना पाएं तो हिंदी भाषा को लंबे समय से वांछित राष्ट्रभाषा का स्थान स्वतः मिल सकता है। शनैः शनैः संध्या वेला के समान हिंदी भाषा हमारे मन मस्तिष्क पर छा जाए और थके मांदे हम ख़ुशी ख़ुशी मीठी नींद सो जाएं।

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  5. Laxmirangam

    नरेश जी,

    मैं आपके साथ हूँ…

    लेकिन यह गलत है कि हिंदी आज हमारी राष्ट्रभाषा है,…
    यह स्टिकर आपके लेख पर लगा है…
    मैं इससे सहमत नहीं हूँ.

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