लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

भोपाल में आयोजित होने वाले दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्य लक्ष्य हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का होना चाहिए। यह वह समय है,जब हिंदी के पक्ष में अनेक अनुकूलताएं हैं। केंद्र की सत्ता में वह भारतीय जनता पार्टी है,जिसके दृष्टि-पत्र में हिंदी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का मुद्दा रहा है। इसी दल के नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। मोदी दक्षेेष नेताओं से हिंदी में द्विपक्षीय वार्ताएं करके और संयुक्त राष्ट्र संघ समेत दुनिया के अनेक देशों में हिंदी में दिए उद्बोधनों में तालियां बटोरकर दुनिया को जता रहे हैं कि विश्व में हिंदी को बोलने और समझने वालों की संख्या करोड़ों में है। मोदी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं,जिन्होंने जिस भाषा में वोट मांगे,उसी भाषा को देश-विदेश में संवाद की भाषा बनाए हुए हैं। इसी समय देश की हिंदी भाषी सुषमा स्वराज विदेश मंत्री हैं। संसद में प्रतिपक्ष के नेता रहते हुए उन्होंने गूढ़ राजनीतिक विषयों एवं सामायिक मुद्दों को हिंदी की सरल शब्दावली किंतु आक्रामक लहजे में बोलकर अपना लोहा मनवाया है। तय है,यह वह महौल है,जब योग दिवस की तरह हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता दिलाई जा सकती है।

अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार संयुक्त राष्ट्र की 4 अक्टूबर 1977 को संपन्न हुई बैठक में हिंदी में भाषण देने का श्रेय जाता है। तब वे विदेशमंत्री थे। इसके बाद वे सितंबर 2002 में संयुक्त राष्ट्र की सभा में हिंदी में बोले थे। लेकिन ये भाषण मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे हुए अनुवाद थे। चंद्रषेखर भी प्रधानमंत्री रहते हुए मालदीव में आयोजित हुए दक्षेस-सम्मेलन में हिंदी में बोले थे। उनका यह भाषण मूलतः हिंदी में होने के साथ मौलिक भी था। पीवी नरसिंह राव कई देशी-विदेशी भाषाओं के ज्ञाता थे,लेकिन विदेशी घरती पर हिंदी में बोलने का दुस्साहस वे नहीं कर पाए। मोदी ही हैं,जो अपनी पूरी ठसक के साथ अलिखित भाषण देकर हिंदी का गौरव बढ़ा रहे हैं। गोया,हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के संकल्प का माद्दा उनमें अन्य नेताओं की तुलना में कहीं ज्यादा है।

भारत एकमात्र ऐसा देश है,जिसकी पांच भाषाएं विश्व की 16 प्रमुख भाषाओं की सूची में शामिल हैं। 160 देशों के लोग भारतीय भाषाएं बालते हैं। विश्व के 93 देश ऐसे हैं,जिनमें हिंदी जीवन के बहुआयामों से जुड़ी होने के साथ,विद्यालय और विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती है। चीनी भाषा मंदारिन बोलने वालों की संख्या,हिंदी बोलने वालों से ज्यादा जरूर है,किंतु अपनी चित्रात्मक जटिलता के कारण,इसे बोलने वालों का क्षेत्र चीन तक ही सीमित है। शास्कों की भाषा रही अंग्रेजी का शास्कीय व तकनीकी क्षेत्रों में प्रयोग तो अधिक है,किंतु उसके बोलने वाले हिंदी भाषियों से कम हैं। 1945 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएं 4 थीं,अंग्रेजी,रूसी,फ्रांसीसी और चीनी। ये भाषाएं अपनी विलक्षण्ता या ज्यादा बोली जाने के वनस्वित, संयुक्त राष्ट्र की भाषाएं इसलिए बन पाईं थीं,क्योंकि ये विजेता महाशक्तियों की भाषाएं थीं। बाद में इनमें अरबी और स्पेनिश शामिल कर लीं गई। विश्व-पटल पर हिंदी बोलने वालों की संख्या दूसरे स्थान पर होने के बावजूद इसे संयुक्त राष्ट्र में शामिल नहीं किया गया है। यही नहीं भारतीय और अनिवासी भारतीयों को जोड़ दिया जाए तो हिंदी पहले स्थान पर आकर खड़ी हो जाती है। भाषाई आंकड़ों की दृष्टि से जो सर्वाधिक प्रमाणित जानकारियां सामने आईं हैं,उनके आधार पर संरा की छह आधिकारिक भाषाओं की तुलना में हिंदी बोलने वालों की स्थिति निम्न है,मंदारिन 80 करोड़, हिंदी 55 करोड, स्पेनिश 40 करोड़, अंग्रेजी 40 करोड,अरबी 20 करोड़, रूसी 17 करोड़ और फ्रेंच 9 करोड़ लोग बालते हैं। जाहिर है,हिंदी संरा की आंग्रिम पांक्ति में खड़ी होने का वैध अधिकार रखती है।

hindiहिंदी यदि संरा( संयुक्त राष्ट्र) की भाषा बन जाती है तो हमें सुरक्षा परिषद् में भी जगह मिल जाएगी। इसके अलावा जो अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं,उनमें भी हिंदी के माध्यम से संवाद व हस्तक्षेप करने का आधिकार भारत को मिल जाएगा। ये संगठन हैं, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी,अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी,अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ,संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक,वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन,विश्व स्वास्थ्य संगठन,संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन और संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल-आपात निधि ;यूनिसेफ । इन विश्व मंचों पर हमारे प्रतिनिधि यदि देश की भाषा में बातचीत करेंगे तो देश का आत्मगौरव तो बढ़ेगा ही,भारत के लोगों का यह भ्रम भी टूटेगा कि अंतरराष्ट्रीय संवाद कायम करनी की साम्यर्थ हिंदी शब्द भंडार में नहीं है।

संरा( संयुक्त राष्ट्र) भी दुनिया के प्रमुख देशों के मातृभाषियों के आंकड़े जुटाने का काम आधिकारिक रूप से कर चुका है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय,दिल्ली द्वारा इस संबंध में विशेष प्रमाणिक रिपोर्ट तैयार कराई गई थी,जो 25 मई 1999 को संरा भेजी गई थी। 1991 की जनगणना के आधार पर भारतीय भाषाओं के विश्लेशण का ग्रंथ 1997 में प्रकाशित हुआ था। संरा की वैश्विक भाषाओं की तकनीकि समिति द्वारा भारत सरकार को भेजे पत्र के साथ एक प्रश्नावली संलग्न करके हिंदी की स्थिति के नवीनतम आंकड़े मांगे गए थे। निदेशालय द्वारा अनेक स्तर पर तथ्यात्मक आंकड़े इकट्ठा करने की पहल की गई। इन अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर चीनी भाषा मंदारिन के बाद हिंदी का प्रयोग करने वाले लोगों की संख्या दूसरे स्थान पर है। यदि 2011 की जनगणना के मातृभाषा संबंधी आंकड़े सार्वजनिक हो जाते हैं तो निश्चित है,हिंदी बालने वालों की संख्या और बढ़ जाएगी।

केंद्रीय हिंदी निदेशलय द्वारा संरा को भेजी गई रिपोर्ट में विश्व-ग्रंथों को आंकड़ों का आधार बनाया गया था। इस परिप्रेक्ष्य में एनकार्टा एनसाइक्लोपीडिया के मुताबिक मातृभाषा बोलने वाले लोगों की संख्या है,मंदारिन 83.60 करोड़,हिंदी 33.30 करोड़,स्पेनिश 33.20 करोड़,अंगे्रजी 32.20 करोड़,अरबी 18.60 करोड़,रूसी 17 करोड़ और फ्रेंच 7.20 करोड़। वल्र्ड अल्मानेक एंड बुक आॅफ फैक्ट्स के अनुसार मंदारिन 87.40 करोड़,हिंदी 36.60 करोड़,स्पेनिश 32.20 करोड़, अंग्रेजी 34.10 करोड़,रूसी 16.70 करोड़ और फ्रेंच 7.20 करोड़ है। गिनिज बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड के अनुसार अंग्रेजी भाषियों की संख्या 33.70 करोड़ है,जबकि हिंदी भाषियों की संख्या 33.72 करोड़ है। हालांकि गिनिज बुक ने हिंदी भाषियों की संख्या 1991 की जनगणना के आधार पर ही बताई है। विश्व भाषाई पत्रक स्रोत ग्रंथ ‘लैंग्वेज एंड स्पीक कम्युनीटीज‘ के अनुसार तो दुनिया में 96.60 करोड़ लोग हिंदी बालते व समझते हैं। यानी हिंदी का स्थान मंदारिन से भी ऊपर है। इन तथ्यपरक आंकड़ों से प्रमाणित होता है कि संख्याबल की दृष्टि से मंदारिन को छोड़ अन्य भाषाओं की तुलना में हिंदी की स्थिति मजबूत है।

हिंदी के साथ एक और विलक्षणता जुड़ी हुई है। हिंदी जितने राश्ट्रों की जनता द्वारा बोली व समझी जाती है,संयुक्त राष्ट्र की पहली चार भाषाएं उतनी नहीं बोली जाती हैं। हिंदी भारत के अलावा नेपाल,माॅरिषस,फिजी,सूरीनाम,गयाना,त्रिनिनाद,टुबैगो,सिंगापुर,भूटान,इंडोनेषिया,बाली,सुमात्रा,बांग्लादेश और पाकिस्तान में खूब बोली व समझी जाती है। भारत की राजभाषा हिंदी है तथा पाकिस्तान की उर्दु,इन दोनों भाषाओं के बोलने में एकरूपता है। दोनों देशों के लोग लगभग 60 देशों में आजीविका के लिए निवासरत हैं। इनकी संपर्क भाषा हिंदी मिश्रित उर्दु अथवा उर्दु मिश्रित हिंदी है। हिंदी फिल्मों और दूरदर्षन कार्यक्रमों के जरिए भी हिंदी का प्रचार-प्रसार निरंतर हो रहा है। विदेशों में रहने वाले दो करोड़ हिंदी भाषी हिंदी फिल्मो, टीवी सीरियलों और समाचारों से जुड़े रहने की निरंतरता बनाए हुए हैं। ये कार्यक्रम अमेरिका,ब्रिटेन,जर्मन,जापान,आस्ट्रेलिया,कनाडा,हांलैड,दक्षिण अफीका,फ्रांस,थाइलैंड आदि देशों में रहने वाले भारतीय खूब देखते हैं।

भाषा से जुड़े वैश्विक ग्रंथों में दर्ज आंकड़ों के अनुसार तो हिंदी को तुरंत संरा की भाषा बन जाना चाहिए। लेकिन विश्व-पटल पर भी भाषा  राजनीति की शिकार हैं। जो देश अपनी बात मानवाने के लिए लड़ाई को तत्पर रहे हैं,उन सभी देशों ने अपनी-अपनी मातृभाषाओं को संरा में बिठाने का गौरव हासिल कर लिया है। लेकिन अब वैश्वीकरण के दौर में हिंदी विश्व-पटल पर व्यापार व विज्ञापन की सशक्त भाषा के रूप में उभर आई है। भारत समेत अन्य एशियाई देश हिंदी को अंग्रेजी के विकल्प के रूप में अपनाने लगे हैं। कई योरोपीय देशों में एशियाई लोगों के लिए हिंदी संपर्क भाषा के रूप में भी प्रयोग होने लग गई है। प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने विदेशों में हिंदी में उद्बोधन देकर यह प्रमाणित कर दिया है कि हिंदी बोलने और समझने वाले दुनिया के ज्यादातर देशों में हैं। गोया कि,लोहा गरम है,चोट मारने की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या 191 है। संरा में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए योग-दिवस की तरह एक प्रस्ताव लाना होगा,जिस पर 129 देशों की सहमति अनिवार्य होगी। यह सहमति बन जरती है तो संरा के विधान की धारा-51 में संशोधन होगा और उसमें संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में हिंदी जुड़ जाएगी। भोपाल में हो रहे विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी प्रेमियों का यह दायित्व बनता है कि वे इस दिषा में उचित पहल करें,जिससे हिंदी पहले तो देश के राजनीतिक अजेंडे में शामिल हो और फिर इसकी अगली कड़ी में  इसे संरा की भाषा बनाने की मुहिम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चलाएं। हिंदी संरा की भाषा बन जाती है तो इसे देश की राष्ट्रभाषा बनने में भी ज्यादा समय नहीं लगेगा। ऐसा होता है तो भारतवासियों के लिए भाषाई दासता से मुक्ति का द्वार भी खुलने लग जाएगा।

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