आगम व निगम में त्याग ग्रहण का अंतर है

—विनय कुमार विनायक
हिन्दुओं के धर्मग्रंथ
आगम और निगम
सनातन धर्म की दो धाराएं
चल रही है आरंभ से!

आगम परंपरागत ज्ञान है,
निगम वेदों का विधान है,
आगम मानव जातियों के लिए
प्रयास समता और एकीकरण का!

निगम के तीन वेद तीन द्विज वर्णों के
अध्ययन हेतु,बांकी के लिए वर्जित,
चौथा वेद अथर्व कमतर जादू टोना!

एक जैन तीर्थंकरों का आगम,
दूसरा वैदिक ऋषियों का निगम!

जैन परम्परा चली स्वायंभुव मनु के
प्रपौत्र आदि तीर्थंकर श्रषभदेव से!
निगम वैदिक ग्रंथों के मंत्रद्रष्टा थे
सातवें वैवस्वत मनु कालीन ब्रह्मापुत्र!

आगम के द्रष्टा क्षत्रिय जैन मुनि थे!
निगम के वेदज्ञ ऋषि ब्राह्मण कहलाते!

आगम के जैनमुनि अहिंसक संन्यासी होते,
जबकि निगम के ऋषिगण गृहस्थ,
मांसभक्षी, शस्त्र-शास्त्रधारी योद्धा होते थे!

जैन-बौद्ध श्रमण कहलाते हैं,
वेद मंत्र द्रष्टा मांत्रिक ब्राह्मण कहलाते!,
पुराण ऋषि-मुनि और जनश्रुति का
मिश्रित आख्यान, आगम निगम का संकलन है!
आगम के निकट बौद्ध त्रिपिटक,
निगम के अंग ब्राह्मण आरण्यक!

मगर निगम के अंग उपनिषद,गीता
जैन बौद्ध दर्शन के पोषक मार्ग दर्शक है,
जैन तीर्थंकर व बुद्ध ज्ञान में उपनिषद है!

आगम में बौद्धिक ज्ञान उपनिषद जैसा,
किन्तु निगम में ज्ञान से अधिक कर्मकांड है,
एक निवृत्ति मार्ग, दूजा प्रवृत्ति मार्ग,
त्याग और ग्रहण ही अंतर है आगम व निगम में!
—विनय कुमार विनायक

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