आज तक भटकती ये जाति

अनिल अनूप

हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी के बीच एक तबक़ा ऐसा भी है, जिसे आज़ादी के अरसे बाद भी मुजरिमों की तरह पुलिस थानों में हाज़िरी लगानी पड़ती थी. आ़खिरकार 31 अगस्त, 1952 को उसे इससे निजात तो मिल गई, लेकिन उसे कोई खास तवज्जो नहीं दी गई. नतीजतन, उसकी हालत बद से बदतर होती चली गई. इस समाज के लोगों को मलाल है कि जहां देश की अन्य जातियों ने तऱक्क़ी की, वहीं वे लगातार पिछड़ते चले गए, उनके पुश्तैनी धंधे खत्म होते चले गए और उन्हें सरकारी सुविधाओं का भी समुचित लाभ नहीं मिल पाया. क़ाबिले ग़ौर है कि देश भर में 15 अगस्त को जश्ने-आज़ादी के तौर पर मनाया जाता है, लेकिन उन्हीं खुशनुमा लम्हों के बीच आदिम समाज एक ऐसा तबक़ा है, जो इस दिन को कोई विशेष महत्व नहीं देता. घुमंतू जातियों के ये लोग 31 अगस्त को आज़ादी का जश्न मनाते हैं.

राजस्थान की अनुसूचित जातियों में सांसी जाति उपयुक्त आवास स्थलों के अभाव में यहां-वहां भटकती रही, कौटुबिक परंपरागत प्रवृत्तियों के कारण निर्जन स्थानों और बीहड़ वनों की घनी छांव में नयी धूप के टुकड़े बटोरती रही और विवश, निराश्रित जीवन की कांवरिया ढोते हुए शताब्दियों तक घुमक्कड़  जाति के रूप में संज्ञाति रही. न तो वह पाठशाला में पढ़ी, न ही उसने ज्ञान की कोई सांस ली और न ही किसी सुसंस्कार के साथ उसका कोई इनसानी रिश्ता रहा. दूसरी जातियों द्वारा घुमक्कड़ कही जाने वाली इस जाति के लिए अस्पृश्यता सामाजिक अभिशाप की तरह एक लंबे अंतराल तक परछाई बनी रही. निकृष्टï जाति घोषित किये जाने के कारण उसे कुलीन परिवारों द्वारा असह्य यातनाएं दी गयीं और जीवन के मूलभूत अवयवों के अभाव में इस जाति के लोग शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूपों में निर्बल और कालग्रस्त रहे. विडंबना भी ऐसी कि जलते अधरों की ढरती प्यास लिये पनघट तक पहुंचना भी एक सामाजिक अपराध रहा और दुखी मन के बीच ईश्वरोपासना निषिद्ध रही.

सांसी जाति की कामकाजी महिलाओं के मन के अंधेरे कोने की कोई जगह खुरच दी गयी तो उनमें से अनेक ने एक ही बात दोहरायी, मां, बहन, बहू-बेटी के रूप तो मिले, किन्तु समाज में औरत का दर्जा दूसरे  समाजों की औरतों जैसा नहीं मिला.

मन की फांस निकलते-निकलते वह शाख जलने लगी, जिस पर कभी पवित्र रिश्ते की सौगंध खाकर बसेरा किया था, पुरुष अपने अज्ञान में झुलसते रहे और स्त्रियों के पांवों में रूढिय़ां लिपटी हीं, दकियानूसीपन बोलचाल के लहजे से कामकाज तक कायम रहा और गलत परंपराएं दुश्मन की तरह पीछा करती रहीं.

कोई सौ परिवारों के सर्वेक्षण के दौरान एक सहसी महिला ने बताया कि वर्षों तक इस जाति का मुख्य व्यवसाय चोरी करना ही रहा और व्यवसाय को छोडऩा भी चाहा तो किसी ने इस जाति के इंनसानी चेहरों को नेक और ईमानदार नहीं समझा, हर घड़ी ऐसा समाज इर्द-गिर्द रहा, जिसमें मानसिक दुर्बलताएं व्याप्त थीं और उसके सिवा जीने का कोई चारा भी नहीं था.  फूलों जैसे खिलते हुए बाल कभी जन्म के साथ उदासी लिये हुए पैदा हुए और वे जब भी किसी अपरिचित व्यक्ति को देखते तो डर के मारे आसपास की झुग्गी-झोंपडियों तथा झाडिय़ों में या वृक्षों के झुरमट में लुके-छिपे से रह जाते. वे अपनी ही बोली में कभी शब्दों से और कभी संकेतों से एक-दूसरे को आगंतुक की सूचना देते किन्तु भय से किसी के सामने नहीं आते. तब उनके पास सांकेतिक बोली ही थी, किसी भाषा ने संस्कार धारण नहीं किये थे.  मन तो मन जैसा नहीं, शरीर भी ऐसा कि किसी भी सूचना से कंपकंपी छूट जातये.

वृद्धाएं झुर्रीदार चेहरे वाली सूखी अकालग्रस्त धरती सी एक महिला ने जो उम्र के काफी पड़ाव देख चुकी थी, इतना भर बताया कि भारतीय इतिहास के राजपूतकाल में सिंध के शूद्र वंश से सांसी जाति की उत्पत्ति हुई? सातवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध में सिंध पर शूद्र वंश का बौद्ध शासक राज्य किया करता था और उस वंश के राजाओं को ‘राय’ की उपाधि प्राप्त थी. एक शिक्षित राज्य कर्मचारी मास्टर रामगोपाल ने यह तथ्य भी उजागर किया कि सिंध पर अरबों के आक्रमण से पहले ‘राय’ वंश के पांच राजाओं में अंतिम राजा का नाम साहसी था, जिसे उसके चव नामक ब्राह्मण मंत्री ने मारकर राज्य पर अधिकार कर लिया था. अनुमान है कि साहसी का अपभ्रंश ही सांसी है, वस्तुत: सांसी इस मृत राजा के वंशज हैं.

राजस्थान विश्वविद्यालय से साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त एवं सूचना और जन-संपर्क सेवा अधिकारी सवाई सिंह ने सांसी जाति की उत्पति के संबंध में जानकारी दी कि कंजर, सांसी और बारडात एक  ही प्रजाति है और पंजाब सरकार की प्रशासनिक रिपोर्ट 1914 में सर डेजिल इनेत्सन को ऐसा कहते हुए उद्धृत किया गया है, किंतु पूर्वी पंजाब के कंजर बारडात है और अपने को राजपूत कहते हैं. उन्हें संसमल राजपूत का वशंज बतलाया गया है. इस तथ्य की सत्यता इस बात से भी प्रमाणित होती है कि अंग्रेजों और सामंतो के समय इस जाति का कोई अस्तित्व जरूर था और यह एक-दूसरे राजा तथा विरोधियों पर हमले करने में अग्रणी थी. इस जाति के लूटमार में पारंगत होने से भी ऐसी संभावना पैदा होती है. सातवीं शताब्दी में बाणभट्ट चरित्र के संदर्भ  निऊनिया अर्थात निपूणिका की पात्रता इस जाति के होने की स्थिति प्रकट करती है. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘बाणभट्ट’ की आत्मकथा’ में ऐसे पात्रों को कालगत संदर्भ में उद्घाटित किया है, जिनसे प्रतीत होता है कि इस जाति की पहुंच अंत:पुरी तक थी.

नवलगढ़ उपखंड अधिकारी कार्यालय में कार्यरत भगवती प्रसाद ने बताया कि देश की स्वाधीनता से पूर्व सांसी जाति जरायमपेशा और खानाबदोश जाति समझी जाती थी. कोई आधी शताब्दी पूर्व इस जाति के लोग यायावर थे और गांव-गांव भ्रमण करके अपने लिए कोई एक निश्चित स्थान नहीं खोज पाये थे. महिलाएं  भोजनादि की व्यवस्था किया करती थी. उदरपूर्ति का कोई सुनिश्चित साधन न होने से सांसी जाति के लोगों का जीवन पूर्णतया अंधकारमय था. यह तथ्य तत्कालीन दस्तावेजों में अंकित है.

उद्गम के समय यह जाति तीन उप-जातियों में विभक्त रही ‘बीडू’, ‘मालू’ और ‘छाड़ी’. पहले इन जातियों में ही पारस्परिक संबंध हुआ करते थे, लेकिन कालांतर में मतांतर होने के कारण यह संबंध ‘बीडू’ और ‘मालू उपजातियों तक ही सीमित रह गये.

झुंझुनूं जिले के सांसियों का जीवन राजस्थान के अन्य जिलों में निवासित इस जाति के व्यक्तियों से अपेक्षाकृत अधिक विकसित है. राज्य में सांसी जाति के व्यक्ति अजमेर, जयपुर, सीकर, चुरू, नागौर, बीकानेर और झुंझुनूं आदि जिलों में बसे हैं, किन्तु झुंझनू जिले में इस जाति के व्यक्ति कई-कई ग्रामों में आबाद हैं.  सभ्यता-संस्कृति के विकास के साथ सांसी जाति के व्यक्तियों के जीवन में बदलाव आने लगा है.

इस व़क्त देश भर में विमुक्त जातियों के 192 क़बीलों के क़रीब 20 करोड़ लोग हैं. हरियाणा की क़रीब साढ़े सात फ़ीसदी आबादी इन्हीं जातियों की है. इन विमुक्त जातियों में सांसी, बावरिया, भाट, नट, भेड़कट और किकर आदि शामिल हैं. भाट जाति से संबंध रखने वाले प्रभु बताते हैं कि 31 अगस्त के दिन क़बीले के रस्मो-रिवाज के मुताबिक़ सामूहिक नृत्य का आयोजन किया जाता है. महिलाएं इकट्ठी होकर पकवान बनाती हैं और उसके बाद सामूहिक भोज होता है. बच्चे भी अपने-अपने तरीक़ों से खुशी ज़ाहिर करते हैं. कई क़बीलों में पतंगबाज़ी का आयोजन किया जाता है. जीतने वाले व्यक्ति को समारोह की शोभा माना जाता है. लोग उसे बधाइयों के साथ उपहार देते हैं. इन जातियों के लोगों के संस्थानों में भी 31 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है. इन कार्यक्रमों में केंद्रीय मंत्रियों से लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी भी शिरकत करते हैं. इनकी तैयारियों के लिए संगठन के पदाधिकारी गांव-गांव का दौरा करके लोगों को समारोह के लिए आमंत्रित करते हैं.

हरियाणा के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी आदिवासी समाज की अनेक जातियां रहती हैं, जिनमें आंध्र प्रदेश में भील, चेंचु, गोंड, कांडा, लम्बाडी, सुंगली एवं नायक, असम में बोषे, कचारी मिकिर यानी कार्बी, लंलुग, राथा, दिमासा, हमर एवं हजोंग, बिहार और झारखंड में झमुर, बंजारा, बिरहोर, कोर्वा, मुंडा, ओरांव, संथाल, गोंड एवं खंडिया, गुजरात में भील, ढोडिया, गोंड, सिद्दी, बोर्डिया एवं भीलाला, हिमाचल प्रदेश में गद्दी, लाहुआला एवं स्वांगला, कर्नाटक में भील, चेंचु, गाउड, कुरूबा, कम्मारा, कोली, कोथा, मयाका एवं टोडा, केरल में आदियम, कोंडकप्पू, मलैस एवं पल्लियार, मध्य प्रदेश में भील, बिरहोर, उमर, गोंड, खरिआ, माझी, मुंडा और ओरांव, छत्तीसगढ़ में परही, भीलाला, भीलाइत, प्रधान, राजगोंड, सहरिया, कंवर, भींजवार, बैगा, कोल एवं कोरकू, महाराष्ट्र में भील, भुंजिआ, ढोडिया, गोंड, खरिया, नायक, ओरांव, पर्धी एवं पथना, मेघालय में गारो, खासी एवं जयंतिया, उड़ीसा में जुआंग, खांड, करूआ, मुंडारी, ओरांव, संथाल, धारूआ एवं नायक, राजस्थान में भील, दमोर, गरस्ता, मीना एवं सलरिया, तमिलनाडु में इरूलर, कम्मरार, कोंडकप्पू, कोटा, महमलासर, पल्लेयन एवं टोडा, त्रिपुरा में चकमा, गारो, खासी, कुकी, लुसाई, लियांग एवं संथाल, पश्चिम बंगाल में असुर, बिरहोर, कोर्वा, लेपचा, मुंडा, संथाल एवं गोंड, मिजोरम में लुसई, कुकी, गारो, खासी, जयंतिया एवं मिकिट, गोवा में टोडी एवं नायक, दमन एवं द्वीप में ढोडी, मिक्कड़ एवं वर्ती, अंडमान में जारवा, निकोबारी, ओंजे, सेंटीनेलीज, शौम्पेंस एवं ग्रेट अंडमानी, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाटी, बुक्सा, जौनसारी एवं थारू, नागालैंड में नागा, कुकी, मिकिट एवं गारो, सिक्किम में भुटिया एवं लेपचा, जम्मू- कश्मीर में चिद्दंपा, गर्रा, गुर एवं गड्डी आदि शामिल हैं. इनमें से अनेक जातियां अपने अधिकारों को लेकर संघर्षरत हैं.

इंडियन नेशनल लोकदल के टपरीवास विमुक्त जाति मोर्चा के जिलाध्यक्ष बहादुर सिंह का कहना है कि आज़ादी के छह दशकों बाद भी आदिवासी समाज की घुमंतू जातियां विकास से कोसों दूर हैं. वह कहते हैं कि इन जातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए सरकार को चाहिए कि वह इन्हें स्थायी रूप से आबाद करे, इनके लिए बस्तियां बनाई जाएं और आवास मुहैया कराए जाएं, बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाए और एसटी का दर्जा दिया जाए, ताकि इन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल सके. आदिवासी समाज की अधिकतर जातियां आज भी बदहाली की ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं. ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़, इन जातियों का आधे से ज़्यादा हिस्सा ग़रीबी की रेखा से नीचे पाया गया है. इनकी प्रति व्यक्तिआय देश में सबसे नीचे रहती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जनजातियों की 9,17,590 एकड़ जनजातीय भूमि हस्तांतरित की गई और महज़ 5,37,610 एकड़ भूमि ही इन्हें वापस दिलाई गई.

घुमंतू जातियों की बदहाली के अनेक कारण हैं, जिनमें वनों का विनाश मुख्य रूप से शामिल है. वन इनके जीवनयापन का एकमात्र साधन है, लेकिन खत्म हो रहे वन संसाधन इनके एक बड़े हिस्से के अस्तित्व को जोखिम में डाल रहे हैं. जागरूकता की कमी भी इन जातियों के विकास में रुकावट बनी है. केंद्र और प्रदेश सरकारों द्वारा शुरू किए गए विभिन्न विकास संबंधी कार्यक्रमों-योजनाओं के बारे में घुमंतू जातियों के लोगों को जानकारी नहीं है, जिससे उन्हें इनका समुचित लाभ नहीं मिल पाता. पांचवीं पंचवर्षीय योजना के तहत देश भर में जनजातियों के विकास के लिए जनजातीय उपयोजना कार्यनीति (टीएसपी) भी अपनाई गई. इसके अंतर्गत अमूमन जनजातियों से बसे संपूर्ण क्षेत्र को उनकी आबादी के हिसाब से कई वर्गों में शामिल किया गया है. इन वर्गों में समेकित क्षेत्र विकास परियोजना (टीडीपी), संशोधित क्षेत्र विकास दृष्टिकोण (माडा), क्लस्टर और आदिम जनजातीय समूह शामिल हैं. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और विकास पर लक्षित विभिन्न योजनाओं को कार्यान्वित करना जारी रखा है, लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि अज्ञानता, भ्रष्टाचार और लाल़फीताशाही के चलते उक्त जातियां सरकारी योजनाओं के लाभ से महरूम हैं. इसके लिए ज़रूरी है कि जागरूकता अभियान चलाकर इन जातियों के विकास के लिए कारगर क़दम उठाए जाएं, वरना सरकार की कल्याणकारी योजनाएं काग़ज़ों तक ही सिमट कर रह जाएंगी.

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