वृक्षों में जीव विषयक ऋषि दयानन्द के विचार

                स्वामी दयानन्द जी इस प्रसंग में आगे लिखते हैं कि वृक्ष आदि के बीजों को जब पृथिवी में बोते हैं तब अंकुर ऊपर आता है और मूल नीचे जाता (रहता) है। जो उन (वृक्षों) को नेत्रेन्द्रिय न होता तो (वह) ऊपर-नीचे को कैसे देखता? इस काम से निश्चित जाना जाता है कि नेत्रेन्द्रिय जड़ वृक्षादिकों में भी हैं। बहुत (प्रकार की) लता होती हैं, जो वृक्ष और भित्ती के ऊपर चढ़ जाती हैं, जो (उनमें) नेत्रेन्द्रिय न होता तो उसको (वृक्ष और भित्ति को) कैसे देखता तथा स्पर्शेन्द्रिय तो वे (जैन) भी मानते हैं। जीभ इन्द्रिय भी वृक्षादिकों में हैं क्योंकि मधुर जल से बाग आदि में जितने वृक्ष होते हैं, उनमें खारा जल देने से सूख जाते हैं। जीभ इन्द्रिय न होता तो खारे वा मीठे का स्वाद (वह वृक्ष) कैसे जानते? श्रोत्रेन्द्रिय भी वृक्षादिकों में हैं, क्योंकि जैसे कोई मनुष्य सोता हो, उसको अत्यन्त शब्द (तेज आवाज, शोर वा धमाका आदि) करने से सुन लेता है तथा तोफ आदिक शब्द से भी वृक्षों में कम्प होता है, जो श्रोत्रेन्द्रिय न होता, तो कम्प क्यों होता क्योंकि अकस्मात् भयंकर शब्द के सुनने से मनुष्य, पशु, पक्षी अधिक कम्प जाते हैं, वैसे वृक्षादिक भी कम्प जाते हैं। जो वह कहें कि वायु के कम्प से वृक्ष में चेष्टा हो जाती है, अच्छा तो मनुष्यादिकों को भी वायु की चेष्टा से शब्द सुन पड़ता है, इससे वृक्षादिकों में भी क्षोत्रेन्द्रिय है।

मनमोहन कुमार आर्य

वृक्षों में जीव है या नहीं, है तो वह जाग्रत, स्वप्न व सुषुप्ति किस अवस्था में है, इस पर विद्वानों के अपने अपने विचार हैं। इस विषय पर एक बार आर्यजगत के सुप्रसिद्ध विद्वान व गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर के संस्थापक स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती जी का आर्यसमाज के ही विद्वान पं. गणपति शर्मा से शास्त्रार्थ भी हुआ था। यह शासर्थ लिखित रूप में उपलब्घ है जिसे पढ़कर दोनों पक्षों की युक्तियों को जाना जा सकता है। आज से 20-25 वर्ष पूर्व हम आर्य पत्र-पत्रिकाओं में आर्यसमाज के पुराने विद्वानों के लेख आदि पढ़ते रहते थे। आदिम सत्यार्थप्रकाश के बारहवें समुल्लास में ऋषि दयानन्द ने जैन मत के एक से पांच कोषीय जीव की चर्चा में वृक्षों में पांच इन्द्रियों से युक्त जीव न होने की उनकी मान्यता का खण्डन करते हुए वृक्षों में जीवात्मा की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए उसका विस्तार से प्रतिपादन किया है। जीवों के विषय मे जैन मतानुयायियों का उल्लेख कर स्वामी जी लिखते हैं कि वह ऐसा कहते हैं कि जीव जितने शरीरधारी हैं उनके पांच भेद हैं। एक इन्द्रिय, द्वी-इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय। जैन मतानुयायी वृक्षादि जड़ में एक इन्द्रिय मानते हैं। इसका उत्तर देते हुए स्वामी दयानन्द जी कहते हैं कि जैनों की यह बात विचार शून्य है क्योंकि इन्द्रिय सूक्ष्म होने से कभी नहीं दिखाई पड़ती। परन्तु इन्द्रिय का काम देखने से अनुमान होता है कि इनि् इद्रय अवश्य हैं।

स्वामी दयानन्द जी इस प्रसंग में आगे लिखते हैं कि वृक्ष आदि के बीजों को जब पृथिवी में बोते हैं तब अंकुर ऊपर आता है और मूल नीचे जाता (रहता) है। जो उन (वृक्षों) को नेत्रेन्द्रिय न होता तो (वह) ऊपर-नीचे को कैसे देखता? इस काम से निश्चित जाना जाता है कि नेत्रेन्द्रिय जड़ वृक्षादिकों में भी हैं। बहुत (प्रकार की) लता होती हैं, जो वृक्ष और भित्ती के ऊपर चढ़ जाती हैं, जो (उनमें) नेत्रेन्द्रिय न होता तो उसको (वृक्ष और भित्ति को) कैसे देखता तथा स्पर्शेन्द्रिय तो वे (जैन) भी मानते हैं। जीभ इन्द्रिय भी वृक्षादिकों में हैं क्योंकि मधुर जल से बाग आदि में जितने वृक्ष होते हैं, उनमें खारा जल देने से सूख जाते हैं। जीभ इन्द्रिय न होता तो खारे वा मीठे का स्वाद (वह वृक्ष) कैसे जानते? श्रोत्रेन्द्रिय भी वृक्षादिकों में हैं, क्योंकि जैसे कोई मनुष्य सोता हो, उसको अत्यन्त शब्द (तेज आवाज, शोर वा धमाका आदि) करने से सुन लेता है तथा तोफ आदिक शब्द से भी वृक्षों में कम्प होता है, जो श्रोत्रेन्द्रिय न होता, तो कम्प क्यों होता क्योंकि अकस्मात् भयंकर शब्द के सुनने से मनुष्य, पशु, पक्षी अधिक कम्प जाते हैं, वैसे वृक्षादिक भी कम्प जाते हैं। जो वह कहें कि वायु के कम्प से वृक्ष में चेष्टा हो जाती है, अच्छा तो मनुष्यादिकों को भी वायु की चेष्टा से शब्द सुन पड़ता है, इससे वृक्षादिकों में भी क्षोत्रेन्द्रिय है।

नासिका इन्द्रिय भी (वृक्षों में) है क्योंकि वृक्षों का रोग धूप के देने से छूट जाता है, जो नासिकेन्द्रिय न होता तो गन्ध का ग्रहण कैसे करता। इससे नासिका इन्द्रिय भी वृक्षादिकों में है। त्वचा इन्द्रिय भी वृक्षों आदि में है, क्योंकि कुमोदिनी कमल, लज्जावती अर्थात् छुई-मुई ओषधि और सूर्यमुखी आदिक पुष्पों में और शीत तथा उष्ण वृक्षादिकों में भी जान पड़ते हैं क्योंकि शीत तथा अत्यन्त उष्णता से वृक्षादिक कुमला जाते हैं और सूख भी जाते हैं।

इससे तत्तत् इन्द्रियों का कर्म देखने से तत्तत् इन्द्रिय वृक्ष आदि में अवश्य मानना चाहिये। यह भ्रम जैन सम्प्रदाय वालों को इन्द्रियों के स्थूल गोलक नहीं देखने से हुआ है। सो इससे जैन लोग इन्द्रियों को नहीं जान सकते। परन्तु कार्य द्वारा सब बुद्धिमान् लोग वृक्षादिकों में भी इन्द्रिय जानते हैं, इसमें कुछ संदेह नहीं। और जहां जीव होगा, वहां इन्द्रिय अवश्य होगा, क्योंकि इन सब शक्तियों का जो संघात् वुक्षों में है, इसी को जीव कहते हैं। जहां जीव होगा वहां इन्द्रियां क्यों न होंगी?

ऋषि दयानन्द के इन विचारों से स्पष्ट है कि उनके विवेचन के अनुसार वह वृक्षों में अभिमानी जीव होना मानते थे। वृक्षों में इन जीवों मे मनुष्यों की भांति पांचों इन्द्रियां भी होती है, ऐसा उनके विचारों से स्पष्ट है। पाठकों के विचारार्थ यह लेख प्रस्तुत है। ओ३म् शम्।

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