लेखक परिचय

अनुज अग्रवाल

अनुज अग्रवाल

लेखक वर्तमान में अध्ययन रत है और समाचार पत्रों में पत्र लेखन का शौक रखते हैं |

Posted On by &filed under विविधा, समाज.


 

ambedkarआज 14 अप्रैल है | आम्बेडकर साहब का जन्मदिन | वो पुष्प जो जमीन पर उगा और फकत आसमान पर खिला | जिसने लाख कठिनाइयाँ झेली पग पग पर अपमान झेला पर अपना विश्वास नहीं खोया | अपनी मंजिल जिसने खुद तय की | मुश्किलों के पहाड़ो का सीना चीर कर जिसने अपना रास्ता बनाया | राह के कांटे जिसके सिर का ताज बने | जी हाँ आज उस आम्बेडकर का जन्मदिन है | जो मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुआ राजपुत्र नहीं था | जो अर्जुन नहीं था पर अपनी मेहनत, अपनी लगन, और अपनी साधना से वो एकलव्य बना | किन्तु वही आम्बेडकर आज आपके सम्मान का मोहताज है | ये बहुत ग्लानि की बात है सोशल मीडिया के नेटवीर आज के दिन उस महापुरुष को कोस रहे हैं जिसकी पगधूलि का वो एक अंश मात्र भी नहीं हैं |

आम्बेडकर साहब को कोसना बहुत आसन है | उन्हें आप आरक्षण के नाम पर कोसिये या उनके धर्म परिवर्तन करने पर | पर आम्बेडकर बनना उतना ही दुष्कर है | कल्पना मात्र कीजिये कि आपको सिर्फ इसीलिए नहीं पढने दिया जाता क्योंकि आप दलित हैं | मारे प्यास के आपका गला सूख रहा है | सामने तालाब है और आप इसीलिए पानी नहीं ले सकते क्योंकि आप अछूत हैं | आप पानी छू भर लेंगे तो शायद गंगाजली भी उसे शुद्ध न कर पाए | आपके छाया भर पड़ने से ब्राह्मण तो छोडिये बनिए तक अशुद्ध हो जाये | जिस उम्र में स्नेह और आशीर्वाद मिलना चाहिए उस उम्र में आपको गालियाँ मिले | पग पग पर पल पल पर जातिसूचक शब्दों से आपका ह्रदय बींध दिया जाए | सोचिये आम्बेडकर किन किन परिस्थियों से गुजरे | क्या हश्र होता होगा उस नन्हें बालक का ? सोचिये जरा ? पर उन विषम हालात में भी उन्होंने आशा न छोड़ी | अपने पूर्वजों की तरह उन्होंने हथियार नहीं डाले | वो लडे अपने अधिकारों के लिए | वो उन करोडो लोगो की आवाज़ बने जो उठने से पहले कुचल दी जाती थी |

किसी भी देश का इतिहास उसकी सबसे बड़ी धरोहर होती है | कहते हैं कि इतिहास वो आइना होता है जिसमे भूत को निरख कर वर्तमान संवारा जाता है ताकि सुखद भविष्य की आधारशिला रखी जा सके | लेकिन अपना भारत दुनिया का इकलौता ऐसा मुल्क है जिसमे इतिहास सिर्फ किताबों तक सीमित है | यहाँ इतिहास सिर्फ पढ़ा जाता है कभी गुना नहीं जाता | कभी इससे सीख नहीं ली जाती है | क्योंकि अगर हमने इतिहास में झाँका होता तो आज दलितों को उनका सम्मान कब का मिल चुका होता | आज भी उनके प्रति हमारी दुर्भावना जस की तस है | आप उप्र, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, और बिहार में छपने वाला कोई भी अखवार उठा लीजिये उसमे एक खबर जरूर होगी | “दबंगों ने नहीं चढने दी दलित की बारात |” आज भी पांडे जी का दलित दोस्त अगर गलती से उनके घर आ जाये तो उनकी बुआ कहती हैं “ ह रे चमरवा ! तोहरी हिम्मत कईसे हुई गईल हमरी द्वारी पे आपन गोड रख्खे क |” कभी दलित बस्तियों में बिजली की सप्लाई रोक दी जाती है | कभी पानी के पाइप काट दिए जाते हैं | क्यों भाई क्यों नहीं चढ़ा सकता दलित अपनी बारात ? क्यों नहीं आ सकता पांडे जी का दलित दोस्त उनके घर पर ? ये लोग इन्सान नहीं है क्या ? क्या ये किसी दूसरी दुनिया से आये हुए लोग है ? क्या ये मानसिकता बदलनी नहीं चाहिए ? क्यों भाई कब सीख लोगे अपने इतिहास से जब खुद इतिहास हो जाओगे तब ?

शिकायत मुझे आम नागरिको से नहीं हैं | शिकायत है मुझे उन तथाकथित धर्म ध्वजा रक्षको से जो आज भी दलितों को उनका हक़ देने के लिए तैयार नहीं है | जो हिन्दुत्व के पुरोधा हैं जो आद्य शंकराचार्य की परम्परा से हैं | वो कैसे किसी दलित से घृणा कर सकते हैं ? हमारे यहाँ तो महर्षि वाल्मीकि को भगवान् का दर्जा दिया गया है | स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम शबरी के झूठे बेर खाते हैं और उन्हें अपनी माँ कहते हैं | उन्हीं भगवन श्रीराम का एक परम मित्र भील समुदाय से होता है | फिर उन भगवान् श्रीराम के वंशज दलितों का तिरस्कार भला कैसे कर सकते हैं ? विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम” का पाठ पढाने वाली उदारमना हिन्दू संस्कृति क्या इतनी निष्ठुर हो सकती है जो अपने ही एक अंग को अपृश्य घोषित कर दे ? आम्बेडकर साहब ने भी तो बस इसी के खिलाफ आवाज उठाई थी | उन्होंने समानता का अधिकार ही तो माँगा था | हमारे पूजनीय धर्मगुरु क्या उन्हें सम्मान से जीने का हक़ भी नहीं दे सकते ? अगर ये संभव नहीं तो मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं है कि मेरे मन में आम्बेडकर साहब का स्थान किसी भी शंकराचार्य की गद्दी से ऊँचा है |

कल्पना मात्र कीजिये कि क्या हाल हुआ होता आपके हिंदुत्व का यदि आम्बेडकर साहब ने मुस्लिम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया होता ? वो तो शुक्र मनाइए वीर सावरकर और प.पू. गुरूजी का जिनके परामर्श से उन्होंने बौद्ध बनना स्वीकार किया और हिंदुत्व को शर्मशार होने से बचा लिया | इसीलिए हे सुबह शाम अनर्गल प्रलाप करने वाले हिन्दू महारथियों कृपया वीर सावरकर और प.पू. डॉ. साहब के अथाह परिश्रम पर पानी मत फेरो | इससे अच्छा है कि अपनी 10% उर्जा दलित उत्थान पर खर्च कर दो | अगर आप अपना थोडा समय भी दलित बस्तियों में बिता दोगे तो शायद आप हिंदुत्व का ज्यादा भला कर पाओगे | तभी शायद उनके सपनों के भारत के निर्माण में अपना योगदान दे पाओगे |

बाबा साहब माफ़ करना हमें शायद अभी तक हम उस समाज का निर्माण नहीं कर सके हैं जिसकी कल्पना आपने दशको पहले की थी | एक जातिमुक्त समाज जिसमे कोई छोटा या बड़ा न हो | जिसमे कोई अपृश्य न हो, अछूत न हो | जिसमे सभी को सामान अधिकार और सम्मान मिले | आज हम आपके 125 वीं जन्मजयंती पर ये संकल्प लेते हैं कि अपने प्रिय भारतवर्ष को जाति मुक्त देश बनायेंगे | भेदभाव मिटायेंगे | आपके अनथक परिश्रम को सफल करेंगे | आपकी जन्मजयन्ती पर आपको शत बार नमन _/\_ |

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *