आज गोरक्षा सिर्फ संघ परिवार नहीं गांधीवादी व अहिन्दुओं के लिए भी है

—विनय कुमार विनायक
सृष्टि के आरंभ में अभाव था कृषि अन्न का,
तभी जीव ही जीव का भोजन था,
सृष्टि के आरंभ में परिवार बहुत ही कम था
रिश्ते में बहन और भाई में विवाह का प्रचलन था!

पर आज ऐसी परम्परा हिन्दुओं में नाजायज है एकदम हीं,
आज पवित्र है मां, मातृसम नारियां बहन बेटी और गाय भी!

आरंभ से आए दिन तक गाय की बढ़ती गई महत्ता,
गाय देती है दूध, दही, मक्खन, घी, राबड़ी, मिष्टान्न,
जैविक गोबर खाद और खेती के लिए बैल पशुधन!

आज लाख प्रमाण के साथ द्विजेंद्रनारायण झा ने लिख डाला
‘होली काऊ बीफ ट्रेडिशन इन इंडियन डायट्री सिस्टम’
फिर भी यह मान्यता स्वीकार्य नहीं हिन्दू धर्म संस्कृति में!

महात्मा गांधी ने तो यहां तक कह दिया
‘गोमाता कई प्रकार से हमें जन्म देने वाली माता से बढ़कर,
हमारी माता हमें साल दो साल दूध पिलाती
और हमसे आशा करती है कि बड़े होकर उसकी सेवा करेंगे,
गोमाता हमसे चार दाना के सिवा कुछ नहीं चाहती,
हमारी माता अकसर बीमार पड़ जाती,
और हमसे तिमारदारी की आशा करती,
गोमाता शायद ही कभी बीमार पड़ती हो,
हमारी माता की मृत्यु होती है तो हमें उसे दफनाने
या दाह संस्कार करने में भारी खर्च उठाना पड़ता,
गोमाता मरकर भी
उतनी ही उपयोगी होती जितनी जीते जी!’
वस्तुत: वैष्णव गांधी की अर्थवादी नजरिया ने झुठला दिया
कि कभी यज्ञ यजन भोजन हेतु गो वध की जाती होगी!

वैदिक कालीन आर्य देवताओं को पशु बलि पसंद थी,
हिंद-ईरान के सम्मिलित देवता इंद्र,अग्नि,अश्विन आदि थे
इंद्र को सांड बहुत प्रिय था,अग्नि को घोड़े सांड गाय चाहिए
सोम,मरुत, अश्विन को गौ बलि दी जाती थी!

लेकिन आज के हिन्दू इन इंडो-ईरानी देवों को नहीं पूजते,
आज ये आर्य देवता वैदिक कथा कहानी तक सीमित हैं!

आर्यों के बौद्ध, जैन, हिन्दू होने तक पशुबलि घटते गई,
ब्राह्मणी यज्ञ बलि पर, क्षत्रिय की अहिंसा नीति भारी पड़ते गई!

वस्तुत:आज के हिन्दू सीधे तौर पर आर्य नहीं हैं,
आज के हिन्दू आर्य द्रविड़ मंगोल आस्ट्रिक से मिले जुले हैं,
आज के हिन्दू वैदिक आर्यों से अधिक सात्त्विक व सहिष्णु हैं!
आज के हिन्दू गोरक्षी अधिक याज्ञिक कर्मकांडी कम है,
आज के हिन्दू इंद्र वरुण नहीं, विष्णु शिवोपासक हैं,
आज भगवान परशुराम नहीं, राम कृष्ण बुद्ध जिन हैं

सात सौवीं सदी के संस्कृत नाटककार भवभूति ने
अपने ग्रंथ महावीर चरितम में उल्लेख किया
कि वशिष्ठ ने क्रुद्ध परशुराम से अनुरोध किया
वे बछिया मांसयुक्त जनक के आतिथ्य को स्वीकार करे!

उनके उत्तररामचरितम के अनुसार बाल्मीकि आश्रम में
श्रोत्रिय ब्राह्मण वशिष्ठ ने बछड़ा मांस रसास्वादन किया!

वास्तव में ब्राह्मण में गोमांसयुक्त मधुपर्क खाने की प्रथा थी
जबकि क्षत्रिय आदि वर्ण में निरामिष मधुपर्क का प्रचलन था!
बाल्मीकि का एक शिष्य कहता है
‘अपने श्रोत्रिय अतिथि को बछिया या सांड
अथवा बकरा परोसना गृहस्थ का धर्म है’
‘समांसो मधुपर्क इत्यमनायं बहुमान्यमान: श्रोत्रियायाभ्यगताय
वत्सतरीम् महोक्षं वा महाजं वा निर्वपन्ति गृहमेदिन:’
बाल्मीकि का शिष्य सौधातकि कहता है
महर्षि वशिष्ठ के आने पर तो बछिया मारी गई
परन्तु आज ही आए राजर्षि जनक को बाल्मीकि ने
केवल दही और मधु का मधुपर्क दिया बछिया नहीं दी गई!

वस्तुत: खाद्य अखाद्य वस्तुओं का निर्धारण
तत्कालीन ऋषि-मुनि ब्राह्मणों द्वारा की गई थी,
ब्राह्मण व अन्य वर्णों हेतु अलग-अलग भक्ष्य सामग्री थी,
जितनी भी अच्छी बुराइयां हिन्दू धर्म में चल पड़ी,
सब ब्राह्मण पुरोहितों से ही उद्भूत होकर निकल पड़ी!

मनुस्मृति में भृगु ने ऊंट छोड़ सभी दंतधारी पशु को कहा खाद्य भक्षण,
बलि-श्राद्ध के अवसर पर विभिन्न पशु मांस भक्षण करते थे ब्राह्मण!

हिन्दुओं के पूर्वज आरम्भिक आर्यों का जमावड़ा ठंडे स्थानों में था,
जहां वर्फ के कारण कृषि फसलों की खाद्य उत्पादकता नहीं होती थी,
आर्यों का जीवन पालतू गाय भैंस अजा अश्व सूकर मछली पर निर्भर था!

परन्तु आज हिन्दू जातियों का जीवन कृषि व्यवसाय पर आधारित है,
आज गोधन के बहुआयामी उपयोगिता के मद्देनजर गोवंश रक्षणीय धन है,
आज गोरक्षा सिर्फ संघ परिवार नहीं, गांधीवादी व अहिन्दुओं के लिए भी है!
—विनय कुमार विनायक

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