लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

Posted On by &filed under राजनीति.


प्रमोद भार्गव

कालेधन के खिलाफ नोटबंदी से शुरू की गई मुहिम की सफलता के लिए जरूरी है कि राजनीतिक दल चुनाव आयोग के सलाह का पालन करते हुए चुनावी चंदे में पारदर्शिता के कानूनी उपाय अमल में लाए। हालांकि कानपुर की परिवर्तन रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयोग के सुझाव का समर्थन किया है। लेकिन उन्होंने इस दोष के लिए पूरी तरह कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए उस जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 को दोषी ठहरा दिया जिसके तहत 20000 रुपए से नीचे के चंदे के स्रोत बताने की छूट मिली हुई है। जबकि मोदी सरकार पूर्व बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में है, ऐसे में उसे जरूरत है कि नोटबंदी की तरह दृढ़ता दिखाते हुए वह कानून में संशोधन का प्रस्ताव संसद में लाए ? दरअसल निर्वाचन आयोग ने नकद चंदे की सीमा 20,000 से घटाकर 2000 रुपए करने की सिफारिश की है। आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन का सुझाव दिया है। फिलहाल दलों को मिलने वाला चंदा आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13 (ए) के अंतर्गत आता है। इसके तहत दलों को 20000 रुपए से कम के नकद चंदे का स्रोत बताने की जरूरत नहीं है। इसी झोल का लाभ उठाकर दल बड़ी धनराशि को 20000 रुपए से कम की राशियों में सच्चे-झूठे नामों से बही खातांे में दर्ज कर कानून को ठेंगा दिखाते रहते है। इसके साथ ही दलों को अवासीय संपत्ति से आय, बैंकों में जमा-पूंजी के ब्याज और स्वैछिक योगदान से आमदनी तथा अन्य कई स्रोतों से होने वाली आय पर भी कर छूट मिली हुई है।

हाल ही में चुनाव आयोग ने भारत में 1900 पंजीकृत राजनीतिक दल होने की बात कही थी। इनमें से 400 से भी ज्यादा ऐसे दल हैं, जिन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है। इस नाते आयोग ने आशंका जताई है कि ये दल संभव है कालेधन को सफेद में बदलने का मध्ययम बनते हों ? आयोग ने अब ऐसे दलों की पहचान कर उनको अपनी सूची से हटाने व उनका चुनाव चिन्ह जब्त करने की कवायत शुरू कर दी है। आयोग ने आयकर विभाग को भी ऐसे कथित दलों की आयकर छूट समाप्त करने को कहा है। असल में ये दल और आयकर कानून 1961 की धारा 13 (ए) भ्रष्टाचार और काली कमाई को छिपाने तथा सफेद करने में बेइंतहा मदद करते है। इसीलिए आयोग ने वास्तविक दलों को ही कर-छूट देने का परामर्श दिया है। यदि ऐसा हो जाता है तो इससे भी चुनाव में गुप्त धन का महत्व कम होगा और पारदार्शिता की दिशा में एक सार्थक पहल होगी।

विमुद्रीकरण के बाद से केंद्र सरकार आॅनलाइन भुगतान व्यवस्था पर जोर दे रही है, वहीं भाजपा समेत देश के सभी राजनीतिक दल आॅनलाइन चंदा लेने से कतरा रहे है। साल 2004 से 2015 के बीच हुए विधानसभा चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों को 2100 करोड़ रुपए का चंदा मिला हैं। इसका 63 प्रतिशत नकदी के रूप में लिया गया है। इसके अलावा पिछले 3 लोकसभा चुनावों में भी 44 फीसदी चंदे की धनराशि नकदी के रूप में ली गई है। राजनैतिक दल उस 75 फीसदी चंदे का हिसाब देने को तैयार नहीं है, जिसे वे अपने खातों में अज्ञात स्रोतों से आया दर्शा रहे है। एडीआर के रिपोर्ट के अनुसार 2014-15 में व्यापारिक घरानों के चुनावी न्यासों से दलों को 177.40 करोड़ रुपए चंदे के रूप में मिले हैं। इनमें सबसे ज्यादा चंदा 111.35 करोड़ भाजपा, 31.6 करोड़ कांग्रेस, एनसीपी 5 करोड़ बीजू जनता दल 6.78 करोड़, आम आदमी पार्टी 3 करोड़, आईएनएलडी 5 करोड़ और अन्य दलों को 14.34 करोड़ रुपए मिले हैं। दरअसल राजनीतिक दलों और औद्योगिक घरानों के बीच लेनदेन में पारदार्शिता के नजरिए से 2013 में संप्रग सरकार ने कंपनियों को चुनावी ट्रस्ट बनाने की अनुमति दी थी। ये आंकड़े उसी के परिणाम हैं।

क्षेत्रीय दल भी चंदे में पीछे नहीं रहे हैं। 2004 से 2015 के बीच हुए 71 विधानसभा चुनावों के दौरान क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने कुल 3368.06 करोड़ रुपए चंदा लिया है। इसमें 63 फीसदी हिस्सा नकदी के रूप में आया। वहीं, 2004, 2009 और 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को 1300 करोड़ रुपए चंदे में मिले। इसमें 55 प्रतिशत राशि के स्रोत ज्ञात रहे जबकि 45 फीसदी राशि नकदी में थीं, जिसके स्रोत अज्ञात रहे। 2004 और 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त को जमा किए चुनावी खर्च विवरण में बताया गया है कि समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस को सबसे ज्यादा चंदा मिला है। चंदे के इन आंकड़ों से पता चलता है कि बहती गंगा में सभी दल हाथ धोने में लगे हैं। इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि औधोगिक घराने चंदा देने में चतुराई बरतते हैं। उनका दलीय विचारधारा में भरोसा हाने की बजाए, सत्ताधारी दलों की ताकत में भरोसा होता है। लिहाजा कांगे्रस और भाजपा को लगभग समान रूप से चंदा मिलता है। जिस राज्य में जिस क्षेत्रीय दल की सत्ता है अथवा नुकसान पहुंचाने लायक वर्चस्व है, उन्हें भी खूब चंदा मिलता है।

 

राजनीति को पारदर्शी बनाने की दृष्टि से केन्द्रीय सूचना आयोग राज्यसभा सचिवालय के माघ्ययम से सभी संसादो से आग्रह कर चुका है कि वे अपने निजी व अन्य कारोबारी हितों को सार्वजानिक करें और अपनी चल- अचल संपति का खुलासा करें ? लेकिन आयोग का आग्रह संसद में नक्कारखाने की तूती साबित हुई। ज्यादातर संसादों ने पारदर्शिता के आग्रह को ठुकरा दिया। जिस ब्रिटेन से हमने संसदीय सरंचना उधार ली है,उस बिट्रेन में परिपाटी है कि संसद का नया कार्यकाल शुरू होने पर सरकार मंत्री और संासदो की संपति की जानकारी और उनके व्यावसायिक हितों को सार्वजानिक करती है। अमेरिका में तो राजनेता हरेक तरह के प्रलोभन से दूर रहें, इस दृष्टि से और मजबूत कानून है। वहां सीनेटर बनने के बाद व्यक्ति को अपना व्यावसायिक हित छोड़ना बाघ्यकारी होता है। जबकि भारत में यह पारिपाटी उलटबांसी के रूप में देखने में आती है। यहां सांसद और विधायाक बनने के बाद राजनीति धंधे में तब्दील होने लगती है। ये धंधे भी प्रकृतिक संपदा के दोहन, भवन निर्माण, सरकारी ठेके, टोल टैक्स, शराब ठेके और सार्वजानिक वितरण प्रणाली के राशन का गोलमाल कर देने जैसे गोरखधंधो से जुड़े होते है। अब तो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी राजनेताओं का कब्जा बढ़ता जा रहा है। यहि कारण है कि अब तक जितने भी बड़े धोटाले सामने आए हैं, वे सब ऐसे ही काले कारोबार में लिप्त पाए गए हैं। इस लिहाज से जरूरी हो जाता है कि देश की अवाम को यह जानने का अधिकार मिले कि जिन पर विकास, लोक कल्याण और प्रजातंत्र का दायित्व है, उन्हें एकाएक मिल जाने वाले धन के स्त्रोत कहां हैं ? राजनीति में सुरसामुख बनता भ्रष्टाचार जन विरोधी होती सरकारी नीतियां, औधोगिक घरानों के पक्ष में जाते फैसले और कानून की अवहेलना की घटनाएं जिस तरह से बढ़ रही हैं, उस तारतम्य में जरूरी हो जाता है कि राजनीति दल पारदर्शिता की खातिर आरटीआई के दायरे में आएं, जिससे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का आचरण मर्यादित रहे।

 

निर्वाचन आयोग के इस सुझाव से शायद ही कोई असहमत हो कि भारत में चुनावी चंदा बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार का एक प्रमुख स्रोत है। लिहाजा नोटबंदी से शुरू की गई मुहिम के बाद अवैध चुनावी चंदे पर अंकुश पर नरेंद्र मोदी अहम् फैसला लें। क्योंकि राजनेता अकसर जन-साधारण को तो ईमानदारी और पारदार्शिता की नसीहत देते रहते हैं, लेकिन राजनीति में स्वयं उदाहरण कम ही बनते है। बल्कि इसके उलट राजनीति में ऐसे विशेषधिकार प्राप्त करने की कोशिश बनी रहती है, जिससे काली कमाई के अज्ञात स्रोतों पर पर्दा पड़ा रहे। इस लिहाज से यह जरूरी हो जाता है कि प्रधानमंत्री दलों के इस गोरखधंधे पर अंकुश लगाने की प्रभावी व परिणाममूलक पहल करें। ऐसा करते वक्त जो दल चंदे में पारदर्शिता का विरोध करेंगे उनकी नीयत का भी पता आम जनता को चल जाएगा

 

One Response to “चुनावी चंदे में पारदर्शिता का सवाल”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    आपके आलेख के अनुसार प्रधान मंत्री और उनकी पार्टी को इसमे पहल करनी चाहिए. यह न्याय संगत भी लगता है. पर क्या मोदी जी और उनकी पार्टी यह पहल करेगी?

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *