“ईश्वर का वेद वर्णित सत्य स्वरूप और उसके गुण-कर्म-स्वभाव”

मनमोहन कुमार आर्य

संसार के सभी आस्तिक मत ईश्वर की सत्ता को मानते हैं परन्तु सब ईश्वर के स्वरूप और उसके गुण, कर्म व स्वभाव को लेकर एक मत नहीं हैं। यदि एक मत होते तो फिर संसार में भिन्न-2 मत-मतान्तर न होते। आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द सरस्वती ने ईश्वर के सत्यस्वरूप का अनुसंधान किया और ऐसा करते हुए वह वेदों में वर्णित ईश्वर के सत्यस्वरूप व उसके गुण-कर्म-स्वभाव को यथार्थरूप में जान सके। उन्होंने पाया कि वेदों में वर्णित ईश्वर का स्वरूप पूर्णतयः तर्क व युक्तिसंगत है। उन्होंने आर्यसमाज के दूसरे नियम सहित अपने समस्त साहित्य में स्थान-स्थान पर ईश्वर का उल्लेख करते हुए उसके अनेक गुणों पर प्रकाश डाला है। हम भी यहां आर्यसमाज के दूसरे नियम के आधार पर ईश्वर का सत्यस्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे हमारे पाठक मित्र लाभान्वित हो सके। इसका लाभ हमारे उन मित्रों को भी होगा जो आर्यसमाज के साहित्य से निकटता व गहनता से परिचित नहीं है। वेदों में ईश्वर का जो स्वरूप मिलता है वह पूर्णतयः तर्क एवं युक्तिसंगत है जिसकी साक्षी मनुष्य की आत्मा भी देती है व उस स्वरूप को स्वीकार करती है। जिस व्यक्ति ने मनुष्य जीवन में ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानने का प्रयत्न नहीं किया, उस मनुष्य का जन्म लेना वृथा कहा जा सकता है। ऐसे मनुष्य ने मानों मनुष्य जन्म के मुख्य उद्देश्य को भूल कर उसके विपरीत भौतिकवाद व सुखोपभोग में जीवन व्यतीत कर अपने इहलोक व परलोक दोनों को बिगाड़ा है।

                मनुष्य मात्र शरीर नहीं अपितु मनुष्य के शरीर का महत्व उसमें विद्यमान चेतन जीवात्मा के कारण है। मनुष्य का आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म, एकदेशी, ससीम, अल्पज्ञ, अनादि, अनुत्पन्न, अविनाशी, अमर, अभौतिक, अल्प ज्ञान व बल से युक्त, जन्म व मृत्यु के बन्धन में बंधा हुआ, कर्म करने में स्वतन्त्र तथा फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था में परतन्त्र, ईश्वर व आत्मा आदि के स्वरूप व उनके गुण, कर्म व स्वभाव को जानने में समर्थ तथा ईश्वर की उपासना से ईश्वर का साक्षात्कार करने सहित जन्म-मरण से मुक्त होने की सामर्थ्य से युक्त है। ईश्वर ने अपने अधीन भौतिक प्रकृति से जीवों को उनके कर्मानुसार सुख-दुःख प्रदान करने के लिये इस सृष्टि की रचना की है। मनुष्य अपनी आत्मा सहित ईश्वर प्रदत्त एक भौतिक शरीर है जिसमें पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आदि अनेकानेक अवयव हैं। प्रत्येक मनुष्य का आत्मा अपने भौतिक शरीर का स्वामी है। मनुष्य व जीवात्मा का जो शरीर है वह पूर्वजन्मों में किये हुए कर्मों के अनुसार परमात्मा से प्राप्त हुआ है। इस कारण सभी प्राणी परमात्मा के ऋणी हैं क्योंकि हमें शरीर सहित जो सुख प्राप्त हैं वह ईश्वर की कृपा का परिणाम हैं। अपने इस जन्मदाता व पालनकर्ता ईश्वर को जानना व उसकी उपासना करना उसके ऋणों से उऋण होने के लिये आवश्यक है। ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानने के लिये हमारे पास अनेक साधन हैं। इसमें प्रमुख वेद, उपनिषद, योग-वेदान्त दर्शन, सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थ हैं। इन ग्रन्थों के अध्ययन से ईश्वर का सत्यस्वरूप व उसके गुण, कर्म व स्वभावों को जाना जाता है।

                ईश्वर कैसा है? इस पर विचार करते हैं तो ज्ञात होता है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप है। सच्चिदानन्दस्वरूप का अर्थ है कि ईश्वर सत्य है, असत्य नहीं है, वह चेतन है, जड़ यौ भौतिक अचेतन व ज्ञानहीन सत्ता नहीं है तथा वह दुःखों व कष्टों से सर्वथा रहित आनन्द से पूर्ण एक सत्ता है। यदि ईश्वर सत्य न होता अर्थात् उसकी सत्ता न होती तो इस संसार और हमारा अस्तित्व सम्भव नहीं था। अतः ईश्वर की सत्ता का होना युक्ति व तर्क संगत है। जड़ पदार्थ ज्ञानहीन होते हैं, वह किसी बुद्धियुक्त व आवश्यकता के अनुरुप कारण प्रकृति से किसी नये पदार्थ की रचना नहीं कर सकते। पांच भूत अग्नि, पृथिवि, जल, वायु और आकाश जड़ व भौतिक सत्तायें हैं जिन्हें परमात्मा ने सूक्ष्म प्रकृति से बनाया है। इन पांच महाभूतों व सृष्टि में स्वज्ञान व स्वशक्ति से कोई नया पदार्थ बनाने की सामर्थ्य नहीं है। जड़ होने से प्रकृति सर्वथा ज्ञानहीन सत्ता है। ईश्वर चेतन होने के कारण ही विचार करता है, उसमें ज्ञान व शक्ति है जिससे वह इस सृष्टि व इसके असंख्य पदार्थों सहित प्राणी जगत को बनाता है। ईश्वर आनन्द से युक्त है। इसका प्रमाण भी हमें इस बात से मिलता है कि आनन्द से रहित चेतन सत्ता को आनन्द की प्राप्ति की इच्छा होती है। उसे प्राप्त कर ही वह कोई परहित का कार्य कर सकती है। ईश्वर ने सृष्टि रचना व इसके पालन सहित सभी कार्य परहित के ही किये हैं। यदि उसमें आनन्द न होता, दुःख व कष्ट होते तो इस सृष्टि की रचना, इसका पालन और जीवों के कर्म-फल आदि की व्यवस्था ठीक-ठीक न हो पाती। अतः ईश्वर का आनन्दस्वरूप होना सिद्ध है यह निष्कर्ष निकलता है। योगीजन भी ध्यान व समाधि अवस्था में ईश्वर का आनन्द अनुभव करते हैं। ध्यान की स्थिति में भी ध्याता को ईश्वर के आनन्द की अनुभूति होती है जिसे वह अनुभव करता है और अपने उपदेशों में अपने शिष्यों को इसका उपदेश भी करता है। अतः ईश्वर का सच्चिदानन्दस्वरूप होना सिद्ध होता है। अन्य मत-मतान्तरों में सच्चिदानन्दस्वरूप शब्द का ठीक-ठीक पर्यायवाची शब्द नही है। इसी से उन मतों व उनकी भाषा की अपूर्णता ज्ञात होती है।

                ईश्वर का स्वरूप निराकार है। ईश्वर साकार नहीं है। साकार वस्तु की कोई न कोई आकृति व शक्ल होती है। ईश्वर का आकार नहीं है। निराकार होने से ही वह आंखों से दिखाई नहीं देता। साकार वस्तु परिमित होती है। वह सर्वव्यापक व सर्वदेशी नहीं हो सकती। अतः ईश्वर आकार व आकृति रहित सत्ता है। वह आकार से नहीं अपितु अपने अन्य गुणों से जाना जाता है। साकार वस्तु का ज्ञान भी उसके गुणों के द्वारा होता है। हम फूलों की सुगन्ध से व फलों की आकृति व स्वाद आदि गुणों से उनके नाम व गुणी का ज्ञान प्राप्त करते हैं। ईश्वर के गुण भी इस सृष्टि की रचना में प्रत्यक्ष हो रहे हैं। इस सृष्टि रचना व इसके विविध गुणों से ईश्वर का प्रत्यक्ष होता है। अतः निराकार होने का यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, अपितु वह आकारवान् सत्ता नहीं है, निराकार का इतना ही तात्पर्य है।

                ईश्वर का एक प्रमुख गुण उसकी सर्वज्ञता है। सर्वज्ञ का अर्थ सर्व गुण सम्पन्न होना है। ईश्वर की महान सत्ता के अनुसार सभी प्रकार का ज्ञान व गुण उसमें हैं। वह इस पूरे ब्रह्माण्ड व इसके कण-कण, परमाणु व परमाणु के भीतर के सभी प्रकार के कणो का भी पूरा ज्ञान रखता है। सभी परमाणुओ व उसके भीतर के कणों को भी उसी ने सृष्टि के आरम्म में अस्तित्व प्रदान किया है। आज विज्ञान ने जितने भी प्राकृतिक नियमों की खोज कर नाना प्रकार के ज्ञान-विज्ञानयुक्त उपकरण आदि बनाये हैं उन सब ज्ञान व विज्ञान के नियमों का सृजनहार व बनाने वाला परमेश्वर ही है। सृष्टि प्रकृति का विकार है। प्रकृति सत्व, रज व तम गुणों की साम्यावस्था को कहते हैं। यह प्रकृति ज्ञानयुक्त सत्ता न होने के कारण स्वतः वर्तमान सृष्टि के समान नहीं बन सकती। इसको बनाने वाला व इसमें ज्ञान विज्ञान के नियमों को स्थापित करने वाला परमात्मा ही है। वेदों के आधार पर महर्षि दयानन्द जी ने एक नियम भी बनाया है जो यह बताता है कि सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है। परमेश्वर ज्ञान-विज्ञान के सभी नियमों व विद्या का मूल है। यह हमें जानना व मानना चाहिये।

                ईश्वर सर्वशक्तिमान है। जीवात्मा व मनुष्य का आत्मा एकदेशी व ससीम होने से अल्पज्ञ एवं अल्प-शक्तिमान हैं वहीं ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वातिसूक्ष्म होने के कारण सर्वशक्तिमान है। समस्त ब्रह्माण्ड ईश्वर की रचना है। सृष्टि का अन्य कोई कर्ता नहीं है। इस अनन्त परिमाणयुक्त ब्रह्माण्ड का निर्माण करने से ईश्वर सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है। यह ब्रह्माण्ड ईश्वर ने अपने सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान स्वरूप सहित अपने सर्वान्तर्यामी स्वरूप से प्रकृति आदि के भीतर व बाहर विद्यमान होकर बनाया है। यदि वह भीतर न होता तो भी सृष्टि की रचना सम्भव नहीं थी और वह जीवों के मानसिक, वाचिक व कायिक कर्मों का साक्षी भी नहीं हो सकता था। ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना का होना व उसका सभी जीवों का साक्षी होना उसके सर्वान्तर्यामी स्वरूप के कारण ही सम्भव है।                 ईश्वर में असंख्य गुण कर्म व स्वभाव हैं। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में ईश्वर के गुण, कर्म स्वभाव व सम्बन्धों पर आधारित एक सौ से कुछ अधिक नामों की व्याख्या की है। ऋषि दयानन्द यह भी बतातें हैं कि ईश्वर में अनन्त गुण हैं। वेदों में ईश्वर के सर्वाधिक व अधिकांश प्रमुख गुणों का उल्लेख है। इस कारण भी वेदों की महत्ता सर्वाधिक है। आर्यसमाज के दूसरे नियम मे जिन अन्य गुणों का उल्लेख किया गया है वह हैं न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता। ईश्वर सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को वेदज्ञान का दाता भी है। वेदज्ञान में संसार की सर्वोत्कृष्ट भाषा वैदिक संस्कृत भी सम्मिलित है। वह जीवों के पाप पुण्यों का फल प्रदाता भी है। किसी भी जीव का ऐसा कोई कर्म नहीं होता जिसका ज्ञान परमात्मा को न हो और उसका फल ईश्वर न दे। यह ईश्वर की न्यूनता व त्रुटि रहित व्यवस्था होने का प्रमाण है। हम आशा करते हैं कि आने वाले समय में लोग अवश्य वेदों, वैदिक साहित्य सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ऋषि दयानन्दकृत वेदभाष्य के महत्व को जानेंगे और ईश्वर को जानकर वेदानुकूल जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वर की उपासना, यज्ञ-अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ, अतिथियज्ञ, परोपकार, देश-समाज हित के कार्य व ईश्वर साक्षात्कार करने में प्रयत्नशील होकर अपने जीवन को सफल करेंगे।

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