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    अनकही बात

    शिबन कृष्ण रैणा

    जाड़े की रात और समय लगभग बारह बजे। फोन की घंटी बजी। जाने क्यों एक क्षण के लिए मुझे लगा कि फोन अस्पताल से आया होगा। जब तक कि मैं फोन उठाऊँ, घंटी का बजना बंद हो गया। मैंने दिमाग पर जोर डाला- क्या बात हो सकती है ? किस का फोन हो सकता है? हो सकता है अस्पताल से ही हो। मगर, अभी दो घंटे पहले ही तो मैं अस्पताल से आया हूँ। सब ठीक था तब। स्वयं भारद्वाज साहब ने मुझसे कहा था-

    ‘बहुत देर हो गई है। अब आप घर जाएँ। भगवान ने चाहा तो कल मुझे छुट्टी मिल जाएगी, फिर ढेर-सारी बातें करेंगे।’

    फोन की घंटी फिर बज उठी। मैंने चोंगा उठाया। उधर से आवाज आई-

    ‘अंकल, मैं सुरेश बोल रहा हूँ।’

    ‘हां-हां बेटे, बोलो, क्या बात है? सब ठीक है ना ? भारद्वाज साहब कैसे है?’

    ‘अंकल, पापाजी नहीं रहे। वे हम सब को छोडक़र चले गए आप तुरन्त आएं अंकल। मैं एकदम अकेला पड़ गया हूँ। प्लीज अंकल, प्लीज।’

    जाने मेरे अन्दर छिपे आत्मबल ने कैसे जोर मारा। मैंने कहा-

    ‘तुम किसी बात की चिंता मत करो सुरेश। मैं अभी पन्द्रह-बीस मिनट के अन्दर-अन्दर अस्पताल पहुँच रहा हूँ। तब तक तुम घर वालों को सूचित कर दो।’

    जल्दी-जल्दी कपड़े बदल कर मैंने अपना स्कूटर स्टार्ट किया। बाहर सर्द हवाएँ चल रही थीं। अस्पताल मेरे घर से आठ किलोमीटर दूर था। रास्ते भर भारद्वाज साहब की बातें मेरे जेहन में घूमती रही। दो-ढाई घंटे पहले जब मैं उनके पास बैठा था तो कौन जानता था कि वह मेरी उनसे आखिरी मुलाकात होगी। शरीर से कमज़ोर तो वे बहुत हो गए थे, मन भी उनका टूट-सा चला था। दमे की बीमारी ने उनको भीतर-ही-भीतर खोखला करके रख दिया था और फिर एक बड़ी बीमारी के नीचे दूसरे छोटे-मोटे रोग भी बेसाख्ता पल रहे थे। यह सब अचानक नहीं हुआ था। दस वर्ष पूर्व यदि कोई भारद्वाज साहब से मिलता तो अवश्य कहता कि वह किसी विनयशील प्रोफेसर से नहीं अपितु किसी पहलवान से मिल रहा है। जाड़े के दिनों में जब तक भारद्वाज साहब कोट नहीं पहनते तब तक कॉलेज का सारा स्टाफ यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि सर्दियाँ आ गई हैं।

    स्कूटर मेरा अंधेरे को चीरता हुआ शहर की सुनसान सडक़ों पर दौड़ लगा रहा था और मन मेरा भारद्वाज साहब के साथ बिताए पिछले बीस वर्षों की यादों को पुनर्जीवित करने में लगा हुआ था। एक के बाद एक घटना उभरती चलती गई और मुझे लगा जैसे भारद्वाज साहब मेरे साथ मेरे पीछे स्कूटर पर बैठे हुए हैं। अभी तीन दिन पहले की ही तो बात है। भारद्वाज साहब के पैरों में सूजन आ गई थी। दमा भी बढ़ गया था। कई दिनों से वे अच्छी तरह से सो भी नहीं पाए थे। मैं उन्हें स्कूटर पर बिठाकर डॉक्टर को दिखाने के लिए अस्पताल ले गया था। कई तरह के टेस्ट हो जाने के बाद डॉक्टर ने सुझाव दिया था कि भारद्वाज साहब को कुछेक दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती करा दिया जाए। पुराने दमे की बीमारी ने इनके हार्ट को प्रभावित किया है और लिवर भी कुछ खराब हो चुका है। भारद्वाज साहब इससे पूर्व कई बार बीमार पड़ चुके थे, कई बार उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, कई बार रोग की पीड़ा को मन में दबाए उन्होंने गहरी तकलीफ में कई-कई दिन गुज़ारे थे। डॉक्टर ने जैसे ही भर्ती होने की बात कही, भारद्वाज साहब ने मेरी ओर कातर नजरों से देखा। उनकी आँखों में मैंने एक अजीब तरह की रिक्तता पाई। मुझे लगा कि वे भीतर-ही-भीतर हिल-से गए हैं। अज्ञात भय उनकी आँखों में तिर आया था। मैंने दिलासा देते हुए कहा-

    ‘डॉक्टर साहब ठीक कह रहे हैं। चार-पाँच दिन की ही तो बात है। यहाँ अच्छी तरह से इलाज होगा और कुछ अन्य टेस्ट भी हो जाएंगे। घबराने की कोई बात नहीं है।’

    मेरी बात सुनकर भारद्वाज साहब के होंठों पर हल्की-सी चिर-परिचित मुस्कान बिखर गई जिसका मतलब था कि वे अपने स्वभाव के अनुकूल हर स्थिति से समझौता करने के लिए तैयार हैं।

    अस्पताल अभी दो किलोमीटर दूर था। सामने से आती हुई सर्द हवाओं के झोंकों से टकराता मेरा स्कूटर सडक़ पर भागे जा रहा था। भारद्वाज साहब की एक-एक बात मुझे इस वक्त बड़ी ही मूल्यवान, सारगर्भित और जीवन-दर्शन से आपूरित लग रही थी। आज शाम अस्पताल में मैं उनके पास लगभग दो घण्टे तक बैठा रहा। अपनी श्रीमती जी और पुत्री को उन्होंने शाम को ही यह कहकर घर भिजवा दिया था कि पड़ोस में हो रही शादी में वे सम्मिलित हों और कन्यादान देना न भूलें। बेटे सुरेश को तार देकर बुलाया गया था और अस्पताल में वही उनकी सेवा-सुश्रूषा कर रहा था। मेरे साथ भारद्वाज साहब ने खूब बातें की। ऐसी बातें जो शायद उन्होंने किसी से न की हों। घर-गृहस्थी की बातें, जीवन-संघर्ष की बातें, दोस्तों की बातें आदि-आदि। बातें करते-करते वे बीच में खाँस देते जिससे उनकी बेचैनी बढ़ जाती। मुझे लगा कि उन्हें ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिए। मेरे मना करने पर भी वे बोलते गए। बातें करते समय वे अतीत में ऐसे खो गए मानो किसी अनन्त-मार्ग पर चल दिए हों। दम संभालकर वे बोले-

    ‘मेरे शरीर के यों दुर्बल हो जाने का कारण आप जानते हैं?’

    ‘नहीं’, मैंने तत्काल उत्तर दिया।

    ‘’मैं ऐसा नहीं था। आपसे भी अच्छी सेहत थी मेरी। मगर, अब तो। कहकर उन्होंने एक लम्बा नि:श्वास छोड़ा। मुझे लगा कि वे कुछ कहना चाहते हैं। पहले भी कई बार ऐसे मौके आए थे जब वे इसी मुद्रा में होते और मुझे अपने जीवन की कोई अनकही बात सुनाने वाले होते। मगर जाने क्यों अगले ही पल वे प्रसंग बदल देते। आज मुझे लग रहा था कि वे अपनी वह बात कह डालेंगे जिसको सुनने के लिए मैं वर्षों से बचैन था।

    अब तक मेरा स्कूटर अस्पताल के अहाते के अन्दर पहुँच चुका था। भारद्वाज साहब चिर-निद्रा में लेटे हुए थे। चेहरे पर परम शान्ति के भाव अंकित थे। आँखों को विश्वास नहीं हो रहा था कि वे सचमुच अब इस संसार में नहीं रहे। उनकी पत्नी और पुत्री दोनों उनके सिरहाने बैठी थीं। मुझे देखकर वे दोनों फफक-फफक कर रो पड़ीं। मैंने धैर्य बँधाते हुए कहा-

    ‘यह वक्त हिम्मत हारने का नहीं है। प्रभु की यही इच्छा थी। उसकी इच्छा के सामने किस की चल सकी है?’

    मेरी बात सुनकर वे दोनों कुछेक पलों के लिए सहज हो गई किंतु अगले ही पल दोनों एक-दूसरे को देखकर पुन: रोने लगीं। अभी तक मैं अपने को संयत किए बैठा था मगर उनके रोने की आवाज़ में जो दर्द था, उसने मुझे भी अभिभूत कर डाला। मैं भी अपने आँसुओं को दबा न सका। रोने की आवाज ने अस्पताल के परिवेश को चीरकर रख दिया। एक अजीब तरह के सन्नाटे ने जैसे पूरे वातावरण का जकड़ दिया हो। प्राइवेट अस्पतालों की व्यवस्था ऐसे मामलों में बड़ी चुस्त हो जाती है। अस्पताल वालों ने तुरन्त-फुरत मृत्यु-प्रमाण-पत्र बना दिया और इस फिराक में रहे कि जल्दी से जल्दी हम लोग भारद्वाज साहब के शव को घर ले जाएं।

    अर्थी उठने तक भारद्वाज साहब के घर-परिवार व दूर-पास के सभी परिजन, मित्र-पड़ोसी आदि  सभी एकत्र हो चुके थे। सभी भारद्वाज साहब की मिलनसारिता, सज्जनता और सहज स्वभाव की प्रशंसा कर रहे थे। सभी का मानना था कि भारद्वाज साहब जैसे नेक आदमी को अपने पास बुलाकर परमात्मा ने ठीक नहीं किया। कोई-कोई यह भी कह रह था कि जाना तो एक दिन सबको है, पर भारद्वाज साहब अपनी सारी जि़म्मेदारियों को पूरा करके गए, यह उनके अच्छे कर्मों का फल है। शवयात्रा चल दी। ‘राम नाम सत्य है’, ‘सत्य बोलो, गत्य है’ की आवाज से वातावरण गूँजने लगा। रास्ते-भर मैं भारद्वाज साहब से कल रात हुई उस बात पर विचार करने लगा जो उन्होंने केवल मुझसे कही थी। अपनी गिरती हुई सेहत के बारे में उन्होंने मुझसे कहा था-

    ‘देखो, एक बात आज तुम्हें बताता हूँ। यह बात आज तक मैंने किसी से नहीं कही, अपनी पत्नी से भी नहीं। तुम मेरे अनुज समान हो, तुम्हें यह बात कहता हूँ, तुम सुनोगे तो मेरे दिल का बोझ हल्का होगा।’

    ‘हॉ-हॉ, ज़रूर कहो भारद्वाज साहब, जरूर कहो’, मैंने जिज्ञासा-भरे लहजे में कहा था।

    ‘मेरी बड़ी बेटी सुनीता को तो तुम जानते हो ना?’

    ‘सुनीता, हाँ – जानता हूँ। वही ना जिसका रिश्ता चंडीगढ़ में हुआ है।’

    ‘हाँ-हाँ, वही’ कहकर भारद्वाज साहब कुछ क्षणों के लिए रुके और फिर गहरी साँस ली और बोले-

    ‘यह बिटिया मुझे बहुत प्यारी थी। पहली संतान थी, शायद इसलिए। मैं उसे अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था। म-मगर उसको मन-माफिक ससुराल नहीं मिली। भीतर-ही भीतर घुलती गई बेचारी।दोष उसका नहीं हमारा था जो जल्दबाजी में रिश्ता तय कर दिया।’ कहते-कहते भारद्वाज साहब की आँखें भर आई थीं।

    मैंने बात का रुख मोडऩे के अंजाद में कहा था-‘सब कर्मों का फल है भारद्वाज साहब, इसमें भला आप-हम क्या कर सकते है?’

    ‘नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है। रिश्ते खूब सोच-विचार करके ही तय किए जाने चाहिए। खात-तौर पर बेटी का रिश्ता। देखो, अपनी बेटियों के लिए जब रिश्ते ढूंढ़ों तो खूब सावधानी बरतना।’

    शवयात्रा श्मशान पहुँच गई। चिता को अग्नि दे दी गई। कुछ ही देर में चिता को लाल-लाल लपटों ने घेर लिया और चिता धूँ-धूँ करके जलने लगी। चिता के जलने की सांय-सांय की आवाज में मुझे भारद्वाज साहब की वह बात गूँजती हुई सुनाई दी: ‘अपनी बेटियों के लिए जब रिश्ते ढूंढों तो खूब सावधानी बरतना,खूब सावधानी बरतना, खूब सावधानी बरतना-खूब सावधानी ।।।’

    डॉ० शिबन कृष्ण रैणा
    डॉ० शिबन कृष्ण रैणा
    जन्म 22 अप्रैल,१९४२ को श्रीनगर. डॉ० रैणा संस्कृति मंत्रालय,भारत सरकार के सीनियर फेलो (हिंदी) रहे हैं। हिंदी के प्रति इनके योगदान को देखकर इन्हें भारत सरकार ने २०१५ में विधि और न्याय मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति का गैर-सरकारी सदस्य मनोनीत किया है। कश्मीरी रामायण “रामावतारचरित” का सानुवाद देवनागरी में लिप्यंतर करने का श्रेय डॉ० रैणा को है।इस श्रमसाध्य कार्य के लिए बिहार राजभाषा विभाग ने इन्हें ताम्रपत्र से विभूषित किया है।

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