लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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amar_singh_mulayamअमर सिंह एक ऐसे नेता हैं जिनमें मुलायम सिंह यादव के प्राण बसते हैं। मायावती ने इसीलिए दर्द तो मुलायम को दिया है पर हमला अमर सिंह पर किया है। कानपुर के एक थाने में वित्तीय धोखाधड़ी का एक मामला दर्ज कराया गया है। 500 करोड़ के इस कथित घपले के आरोपियों में अमर सिंह, उनकी पत्नी पंकजा कुमारी सिहं के नाम शामिल हैं। इतना ही नहीं काले धन को सफेद धन में बदलने की इस 14 पन्ने की शिकायत में कंपनी के निदेशक के तौर पर सुपर स्टार अमिताभ बच्चन का भी नाम

शामिल हैं। जाहिर तौर पर निशाना मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी ही है।

मामला दर्ज होने के बाद मुलायम सिंह ने बिना एक पल गंवाए मुख्यमंत्री मायावती को यह चुनौती दी कि अगर उनमें हिम्मत हो तो वे अमर सिहं को गिरफ्तार करके दिखाएं। जाहिर तौर पर मायावती अपना काम कर चुकी थीं। वे सपा के तेज होते हमलों से इनदिनों हलाकान हैं और राज्य में हो रहे उपचुनावों में ऐसी बहसों से कहीं न कहीं सपा के वे हथियार भोथरे साबित होते हैं जो वह बसपा पर लगा रही है। हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर दोनों दलों का ट्रेक रिकार्ड बहुत बेहतर नहीं है किंतु जब जंग कठिन हो तो सारे हथियार आजमाए जाते हैं। अमर सिंह का भी साफ कहना है कि उनपर लगाए गए आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। उन्होंने यह भी कह डाला कि अमिताभ और मेरे खिलाफ आरोप लगाना बहुत आसान है क्योंकि दोनो के खिलाफ मामले उठाने से टीवी चैनलों को टीआरपी मिलती है। यानि मायावती ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक तो भ्रष्टाचार के मुद्दे में सपा दिग्गज को फंसाकर वे खुद पर लगाए जा रहे भ्रष्टाचार के आरोपों पर यह कहना चाहती हैं कि तुम भी दूध के धुले नहीं हो भाई।दूसरा वे यह भी संदेश देना चाहती हैं कि उन्हें चुनौती देने वाले खुद को सुरक्षित न समझें। मायावती और मुलायम सिहं यादव के रिश्ते वैसे भी किसी से छिपे नहीं हैं। गेस्ट हाउस कांड से शुरू हुई अदावत आजतक जारी है। हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा ने मायावती पर हमले बढ़ा दिए हैं। राज्य में एक लोकसभा और 11 विधानसभा उपचुनावों ने इस संघर्ष को और तेज किया है। सपा का कहना है मुलायम सिंह यादव ने ही 10 हजार गांवों में आंबेडकर ग्राम योजना लागू की थी औऱ बसपा आज उसी पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रही है। सपा का आरोप है कि बसपा के राज में कब्जा, वसूली और लूट ही दलित एजेंड़ा बन गया है। इसी के साथ गन्ना किसानों की समस्याओं को लेकर भी सपा लगातार मुख्यमंत्री पर हमले कर रही है। गन्ना किसानों की बकाया वसूली के सवाल पर राज्य सरकार संकट में है। फिर सरकारी खजाने से अपनी और अपने नेता की मूर्तियां और पार्क बनवाने के मुद्दे पर तो मायावती कोर्ट से लेकर जनता सबकी आलोचना के केंद्र में हैं। ऐसे में मायावती के सामने यही विकल्प है कि वे विपक्ष के नेताओं को भी निशाने पर लें। राहुल गांधी की यात्राओं से वे वैसे ही हलाकान हैं किंतु कांग्रेस संगठन के कमजोर होने के नाते मायावती का असली और मैदानी संधर्ष दरअसल समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह से ही है। ऐसे में मायावती,मुलायम सिंह को कमजोर करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। उन्हें पता है उत्तर प्रदेश में असली सत्ता संधर्ष आज भी समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच ही है। ऐसे में मायावती का असल एजेंडा सपा से निपटना ही है।हालांकि अमर सिंह के खिलाफ मामला दर्ज करने के मुद्दे पर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने सपा का पक्ष लेते हुए राज्य सरकार की आलोचना की है किंतु कांग्रेस के अंदरखाने भी दोनों दलों की जंग से प्रसन्नता है।

कांग्रेस की राजनीति दोनों दलों के आपसी जंग के बीच से अपना रास्ता आसान बनाने की है। बुंदेलखंड के मामले पर मायावती और कांग्रेस के बीच जिस तरह की बयानबाजी हुयी उससे साफ है कि कांग्रेस आने वाले दिनों में अपनी लड़ाई को और तेज करेगी और मायावती पर हमले बढ़ते जाएंगें। चार अक्टूबर को अमेठी में एक दलित की मौत भी इसी तरह बसपा और कांग्रेस के बीच एक राजनीतिक जंग का मुद्दा बन गयी थी। ऐसे में मायावती के सामने अपने परंपरागत प्रतिद्वंदी मुलायम के साथ-साथ कांग्रेस और राहुल गांधी की भी चुनौती है। इधर महाराष्ट्र चुनावों में सपा के तीन विधायकों की जीत से भी सपा बम-बम है तो बसपा का वहां 281 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद खाता भी नहीं खुल सका। हरियाणा से भी बसपा को खुश करने वाली खबरें नहीं है। महाराष्ट्र जैसी दलित आंदोलन की भूमि पर बसपा के हाथ कुछ न लगना और मुलायम को तीन सीटें मिलना एक बड़ा झटका है। जाहिर तौर पर बसपा का दुख अपनी हार से ज्यादा मुलायम की जीत से बढ गया है। उप्र में हो रहे उपचुनावों के परिणामों के बाद यह संधर्ष और गहरा होने की संभावना है क्योंकि सबको पता है कि दिल्ली का रास्ता उप्र से होकर जाता है। यह भी एक संयोग ही है कि मायावती,मुलायम और राहुल गांधी तीनों खुद में प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं भी देखते हैं, तीनों की प्रयोगशाला उत्तरप्रदेश ही है।

( लेखक राजनीतिक विश्वेषक हैं)

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