उपेक्षाओं के मध्य ‘दलित उड़ान’

दलित समाज को जागृत करने के नाम पर मायावती तथा रामविलास पासवान जैसे और भी कई नेताओं को राजनैतिक रूप से काफी अवसर भी मिले। परंतु इन लोगों ने भी सिवाय अपनी कुर्सी व सत्ता सुरक्षित रखने,धन-संपत्ति संग्रह करने, अपने वारिसों को अपना उत्तराधिकारी बनाने के, और कुछ नहीं किया। हां इतना ज़रूर किया कि यह नेता भी महज़ अपनी राजनैतिक रोटी सेेंकने के लिए दलित समाज को उनके उपेक्षित होने का हमेशा एहसास कराते रहे जबकि इनके अपने रहन-सहन शाही अंदाज़ व शान-ो-शौकत से भरपूर हैं।

निर्मल रानी
हमारे देश के अधिकांश राजनैतिक दल,राजनेता तथा यहां का मीडिया आमतौर पर ‘इस्लामी आतंकवाद’,कश्मीरी अलगाववाद,सीमापार से होने वाली आतंकी घुसपैठ,घर वापसी,लव जिहाद,गाय,गंगा तथा हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना जैसे विषयों पर अपना ज्य़ादातर ध्यान केंद्रित रखता है। दरअसल आजकल मीडिया का लगभग व्यवसायीकरण सा हो गया है इसलिए प्रचारित व प्रसारित करने वाले विषय ज्वलंत हों,लोगों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं की तरफ से हट सके, समाज में धर्म व जाति आधारित ध्रुवीकरण हो सके तथा ऐसे गर्मागर्म प्रसारणों के साथ उनकी टीआरपी भी बढ़ती रहे, यही मीडिया का असली मक़सद रह गया लगता है? अन्यथा हमारे देश की सबसे प्राचीन,सबसे जटिल तथा देश व भारतीय समाज को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाली समस्या का नाम तो दलित उत्पीडऩ अथवा दलित उपेक्षा ही है। परंतु इस विषय पर न ही कोई राजनैतिक दल,कोई राजनेता समग्र आन्दोलन चलाता दिखाई देता है न ही किसी के पास इसका कोई समाधान नज़र आता है। तीन तलाक़ जैसे विषयों में उलझने तथा इनपर टीवी पर सीधी बहस कराने वाला मीडिया कभी दलित उत्पीडऩ की जड़ों पर चर्चा कराते नहीं देखा गया। आख़िर क्यों? इसीलिए कि इस दुर्भावना,दलित उपेक्षा तथा इस समाज के अपमान की जड़ें हमारे धर्मशास्त्रों से जुड़ी हुई हैं। और धर्मशास्त्रों पर उंगली उठाने या इनमें किसी प्रकार का संशोधन करने की बात कहने का साहस न तो किसी नेता में है न ही किसी राजनैतिक दल में।
दलित समाज को जागृत करने के नाम पर मायावती तथा रामविलास पासवान जैसे और भी कई नेताओं को राजनैतिक रूप से काफी अवसर भी मिले। परंतु इन लोगों ने भी सिवाय अपनी कुर्सी व सत्ता सुरक्षित रखने,धन-संपत्ति संग्रह करने, अपने वारिसों को अपना उत्तराधिकारी बनाने के, और कुछ नहीं किया। हां इतना ज़रूर किया कि यह नेता भी महज़ अपनी राजनैतिक रोटी सेेंकने के लिए दलित समाज को उनके उपेक्षित होने का हमेशा एहसास कराते रहे जबकि इनके अपने रहन-सहन शाही अंदाज़ व शान-ो-शौकत से भरपूर हैं। परंतु बाबा साहब भीमराव अंबेडकर द्वारा न केवल दलित समाज बल्कि समस्त भारतवासियों को उनकी प्रगति तथा विकास के लिए दिखाया गया सपना शायद अब साकार रूप लेने लगा है। राजनीति में सक्रिय पाखंडी स्वयंभू दलित नेताओं के बजाए शिक्षा जगत में दलित समुदाय के लोगों ने अपनी क़ाबिलियत का परचम लहराना शुरु कर दिया है। डा० अंबेडकर ने कहा था कि-‘जिस दिन मंदिर में जाने वाले लोगों की लंबी क़तारें पुस्तकालय की ओर बढ़ेंगी उस दिन भारत को महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता’। इतना कड़वा सच बर्दाश्त करने की ताक़त उन नेताओं में कहां जो मंदिर में लगने वाली लाईन को ही अपने पक्ष में मतदान करने वाली क़तार समझते आ रहे हों। डा० अंबेडकर शिक्षित समाज को देश के विकास के लिए सबसे ज़रूरी समझते थे।
बहरहाल, एक ओर जहां उत्तर प्रदेश सहित देश के और भी कई राज्यों में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा व दमन के समाचार प्राप्त हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर दलित समाज के राजस्थान के रहने वाले होनहार छात्र कल्पित वीरवाल ने 17 वर्ष की आयु में आईआईटी जेईई में टॉप कर देश के पहले दलित आईआईटी टॉपर होने का ताज अपने  सिर पर धारण किया है। कल्पित ने 360 में 360 अंक अर्जित कर यह मुक़ाम हासिल किया। कल्पित ने केवल दलित वर्ग में ही नहीं बल्कि सामान्य श्रेणी में भी सर्वोच्च स्थान हासिल किया है। इस छात्र ने कोटा के जिस कोचिंग संस्थान रेजोनेंस से कोचिंग हासिल की थी इस संस्थान के प्रबंध निदेशक भी स्वयं दलित समुदाय के हैं। रामकिशन जोकि एक सरकारी इंजीनियर थे,अपनी नौकरी छोडक़र कोटा में कोचिंग चलाने लगे और उन्होंने संकल्प किया कि वे अपने ज्ञान के माध्यम से देश के लाखों युवाओं के जीवन में ज्ञान व शिक्षा का दीपक जलाकर ही दम लेंगे। आज उन्हें आईआईटी जेईई को ‘क्रेक’ कराने के पर्याय के रूप में देखा जा रहा है। अभी दो वर्ष पूर्व की ही बात है जब 2015 की संघ लोक सेवा आयोग की देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा में टीना डाबी नाम की दलित समाज की एक बेटी ने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। इन्हीं दिनों महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग की परीक्षा में भी भूषण अहीरे नाम के एक दलित युवक ने परीक्षा में टॉप किया था।
ज़ाहिर है दलित समाज के होनहार युवक-युवतियों की ओर से इस प्रकार की खबरें आने के बाद इस समाज के लोगों में काफ़ी उत्साह दिखाई दे रहा है। दलित समाज के एक प्रमुख लेखक व चिंतक कांचा इल्लैया ने तो दलितों में शिक्षा के बढ़ते स्तर से उत्साहित होकर यहां तक कहा है कि-‘दलित और ओबीसी छात्रों में समझ का स्तर स्वर्णों से कहीं ज़्यादा है। उनका दृष्टिकोण ज़्यादा गहरा होता है। इन्हें मौक़ा मिले तो वे स्वर्णों की बराबरी ही नहीं बल्कि उन्हें पीछे छोड़ देंगे। वह वक्त दूर नहीं जब किसी दलित को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा’। यहां यह बात काबिलेगौर भी है कि भारत में दलित समाज,अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग तथा आदिवासी व पिछड़े ग्रामीण इलाकों के दबे-कुचले लोग जोकि स्वर्ण जातियों की उपेक्षा का शिकार रहते आए हैं और आज भी देश के अनेक क्षेत्रों से यहां तक कि विश्वविद्यालयों,महाविद्यालयों, स्कूल, पंचायत तथा ग्रामीण स्तर पर उनके अपमान,तिरस्कार तथा उनपर ज़ुल्म व अत्याचार के तमाम क़िस्से सुनाई देते हैं। यह त्रासदी किसी एक राज्य विशेष की नहीं बल्कि पूरे भारत की है और निश्चित रूप से इस ग़ैर बराबरी के लिए हमारे धर्मशास्त्र तथा हमारी वह धार्मिक शिक्षाएं व संस्कार ज़िम्मेदार हैं जिनके बारे में हम उस स्तर पर व उस अंदाज़ से चर्चा करना ही नहीं चाहते जैसेकि तीन तलाक़ तथा गौ हत्या जैसे विषयों पर अथवा मंदिर-मस्जिद निर्माण जैसे विषय पर करते आ रहे हैं।
गत् वर्ष उज्जैन(मध्यप्रदेश)में आयोजित सिंहस्थ महाकुंभ के अवसर पर सरकार व पार्टी द्वारा समरसता स्नान के नाम का एक आयोजन भी किया गया जिसमें प्रतीकस्वरूप सभी जातियों के लोग बिना किसी भेदभाव के एक ही घाट पर स्नान करने का प्रदर्शन करते देखे गए।  समरसता की इन्हीं उम्मीदों के साथ अनेक उपेक्षाओं के बावजूद दलित युवाओं में ऊंची उड़ान भरने का सिलसिला जारी है।
निर्मल रानी

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