लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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विगत दो दशकों में जब-जब कांग्रेस सत्ता मे आई, महंगाई एवं भूखमरी का विकराल रूप उपस्थित हुआ। वर्ष 1991 में जब नरसिंहाराव कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए एवं प्रसिध्द अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को देश के वित्त मंत्रालय की बागडोर सौंपी गयी, तो तत्काल महंगाई बढ़ना शुरू हो गयी। जब देश में महंगाई को लेकर शोर मचा, तो दिल्ली से यह लोक लुभावनी घोषणा की गयी थी कि एक सौ दिनों में महंगाई पर नियंत्रण पा लिया जायेगा। वह दिन कभी नहीं आया। कांग्रेस भी आश्वस्त थी कि जनता की याद्दाशत बहुत कमजोर होती है और सौ दिनों के बजाय पूरे पांच साल तक महंगाई कम होने का दिन नहीं आया।

वर्ष 1996 में कांग्रेस शासन का अंत हो गया और लगभग आठ वर्ष तक 1996 से 2004 तक गठबंधन सरकारों का युग रहा। इस अवधि में क्रमश: एच.डी देवगौड़ा इंद्रकुमार गुजराल एवं अटल बिहारी वाजपेयी गठबंधन सरकारों का नेतृत्व करते रहे। श्री वाजपेयी वर्ष 1998-2004 तक, लगभग 6 वर्ष लगातार प्रधानमंत्री रहे। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में खाद्यानों के मूल्य लगभग स्थिर रहे जो निम्न तालिका से स्पष्ट होता है:- अवधि – मार्च 1998 में चावल 10 रुपये प्रति किलो, गेहूं 7.5 रुपये, चीनी 16 रुपये, खाद्य तेल 46 रुपये, दालें 25 रुपये, फल व सब्जी 138.1 रुपये। मई 2004 में चावल 13 रुपये प्रति किलो, गेहूं 8 रुपये, चीनी 17 रुपये, खाद्य तेल 86 रुपये, दालें 31 रुपये, फल व सब्जी 209.2 रुपये। जनवरी 2010 में चावल 23 रुपये प्रति किलो, गेहूं 14.5 रुपये, चीनी 47 रुपये, खाद्य तेल 113 रुपये, दालें 88 रुपये, फल व सब्जी 305.3 रुपये। उपर्युक्त तालिका में प्रमुख खाद्यान्नों का मूल्य प्रति किलो फुटकर में दर्शाया गया है जबकि फल-सब्जी का थोक मूल्य सूचकांक में प्रदर्शित किया गया है। अर्थशास्त्र के मान्य सिध्दान्तों के अनुसार किसी जिंस का मूल्य निर्धारण मांग एवं आपूर्ति के आधार पर तय होता है। मजे की बात यह है कि खाद्यान्न की श्रेणी में आने वाली सभी वस्तुएं पर्याप्त मात्रा में बाजार में उपलब्ध हैं, बस दो गुना से तीन गुना तक उनके मूल्य अदा करने होंगे। यह कल्पना करना बेहद मुश्किल है कि 20/रु. प्रति दिन व्यय करके दोनों समय अपना भोजन जुटाने वाले लोग किस प्रकार जीवित रह रहे हैं। बढ़ती महंगाई ने नरेगा या मनरेगा योजनाओं को भी निष्प्रभावी बना दिया है। इस समय मूल्य निर्धारण अर्थशास्त्र से कम, राजनीति से ज्यादा निर्धारित हो रहा है।

कांग्रेस के नेतृत्व में वर्ष 2004 में संप्रग के सत्तारुढ़ होने के तत्काल बाद से जरूरी खाद्यान्नों के मूल्य में वृध्दि शुरू हो गयी थी। वर्तमान कीमतों की समीक्षा की जाये, तो चावल की कीमतों में 130 प्रतिशत, चीनी की कीमतों में 300 प्रतिशत, और अरहर की दाल की कीमतों में 252 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2004 में संप्रग के सत्ता में आने के बाद एन. सी. पी. नेता शरद पवार ही कृषि, खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री है। यह तर्क निरर्थक है कि देश के 332 जिले सूखे से प्रभावित हैं। इसके बावजूद 23 करोड़ टन का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ। लगभग 4 करोड़ 70 लाख टन से ज्यादा का खाद्यान्न सरकार के स्टॉक में था जबकि बफर स्टॉक दो करोड़ टन पर्याप्त माना जाता है।

यह सही है कि सरकार द्वारा गेहूं, चावल आदि का सरकारी समर्थन मूल्य लगभग दो गुना कर दिया गया। इससे किसानों को कितना लाभ हुआ, इसका आकलन होना अभी शेष है। वैसे विदर्भ और बुंदेलखंड के किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ’ का नारा एक मखौल साबित हो रहा है। कांग्रेस के युवराज कभी-कभी गरीब दलितों की झोपड़ में पहुंचकर मीडिया की सुर्खियां भले बटोर रहे हो, किन्तु उनकी दुर्दशा का अंत नहीं हो पा रहा है।

बढ़ती महंगाई और भुखमरी कांग्रेस शासन की मुख्य पहचान बन चुकी है। विपक्ष इतना विखरा हुआ है कि सत्ताधीशों को उनकी परवाह नहीं रह गयी है। डॉ. राम मनोहर लोहिया, बाबू जय प्रकाश नारायण और पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे दूरदर्शी नेतृत्व के अभाव में विपक्ष को एकजुट करने वाला कोई नेता नहीं रह गया है। बस पंथनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के तोता रटंत नारे के बल पर कांग्रेस को अपदस्थ करना चाहते हैं जो संभव प्रतीत नहीं होता। कांग्रेस सबसे उत्कृष्ट पंथनिरपेक्ष पार्टी है। पुरानी बातें यदि छोड़ दी जायें, तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का यह वक्तव्य स्मरणीय है कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। महंगाई, गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी आजकल इस देश की पहचान बन रही है। मीडिया में जो खबरें और आंकड़ें प्रकाशित हो रहे हैं उनके अनुसार देश की करीब चालीस करोड़ जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने के लिए अभिशप्त है। इस महंगाई में उन्हें दो जून की रोटी चाहिए। सत्तारूढ़ संप्रग अपनी दोषपूर्ण नीतियों के बचाव में राज्य सरकारों को महंगाई बढ़ाने के लिए उत्तरदायी ठहरा रहा है। प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस या संप्रग शासित राज्यों में महंगाई पर लगाम लगा हुआ है? यह कुछ हद तक सही है कि जमाखोरों एवं मुनाफाखोरों पर अंकुश लगाने का कार्य राज्यों के माध्यम से ही संपन्न होगा। किसान और उपभोक्ता के बीच के बिचौलियों पर लगाम लगाने की आवश्यकता है। राजनीतिकों के लिए बिचौलिए महत्वपूर्ण हैं। कृषि उत्पादन बढ़ाने की भी नितांत आवश्यकता है। उत्पादकता बढ़ाकर ही ज्यादा आमदनी बढ़ सकती है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेश पंजाब के बाद अपनी उर्वरा शक्ति के लिए प्रसिध्द हैं किन्तु सूखे और बाढ़ की समस्याओं से वे त्रस्त रहते हैं। इन आपदाओं से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजनाओं का क्रियान्वयन आवश्यक है। आपदा आने पर तात्कालिक योजनाओं के द्वारा ‘प्यास लगाने पर कुएं खोदने’ जैसा हास्यास्पद प्रयास होता है। चीन आजकल 6,336 किलो प्रति हेक्टेयर धान पैदा कर रहा है जबकि इस देश में पंजाब 2,203 किलो प्रति हेक्टेयर और बिहार तथा उत्तर प्रदेश क्रमश: 1,400 किलो और 1,800 किलो धान प्रति हेक्टेयर पैदा करते हैं। चीन के कृषि वैज्ञानिक ऐसी शंकर नस्ल पर काम कर रहे हैं जिससे प्रति हेक्टेयर पैदावार 13,500 किलो तक पहुंच जायेगी।

अगर हम चीन से अपनी तुलना नहीं कर सकते, तो कथित रूप से सांप्रदायिकता का दंश झेल रहे नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल को अपना सकते हैं जहां गत वर्ष 9.6 प्रतिशत वृध्दि कृषि उत्पादन में दर्ज की गयी है। देश के प्रसिध्द कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन ने नरेंद्र मोदी के गुजरात की सराहना की है। उनका कहना है कि मोदी के कार्यकाल में कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिक और समेकित सोच को अपनाया गया है। गुजरात में लाखों की संख्या में चेक डैम बनाये गये हैं जिसके कारण भूमिगत जल स्तर नीचे जाना बिलकुल रुक गया है। गुजरात कृषि विश्वविद्यालय एक फसल को समर्पित है। गत नौ वर्षों में गुजरात में कपास की पैदावार 6 गुनी बढ़ गयी। कच्छ में केसर आम का बड़े पैमाने पर उत्पादन और निर्यात हो रहा है। केंद्र और राज्यों के कथित पंथनिरपेक्षतावादी गुजरात में हुए 2002 के साम्प्रदायिक दंगों को याद रखे हुए हैं। वे भूलकर भी 27 फरवरी, 2002 को गोधरा स्टेशन पर 59 हिन्दू राम कार सेवकों को साबरमती एक्सप्रेस में जीवित जला दिये जाने की घटना को याद नहीं करना चाहते। यही घटना तो गुजरात व्यापी दंगों के लिए उत्तरदायी है। कोई कांग्रेसी अगर गुजरात की प्रशंसा कर दे, तो वह पार्टी से निकाल दिया जायेगा।

केंद्र एवं राज्य सरकारों को अपनी भंडारण क्षमता बढ़ानी चाहिए। सिंचाई के साधनों में वृध्दि उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यक है। चावल का उत्पादन बढ़ाने के लिए चीन की तर्ज ऐसे शंकर बीजों का विकास एवं प्रसंस्करण करने की जरूरत है जिससे चावल उत्पादक बिहार करीब तीन करोड़ टन पैदा कर सकता है जो पूरे देश का एक तिहाई होगा।

भ्रष्टाचारयुक्त सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाना भी कीमतों को स्थिर रखने के लिए एक कारगर उपाय हो सकता है। योजना आयोग के अध्ययन में यह तथ्य प्रकाश में आया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का केवल 11 प्रतिशत अनाज ही गरीब वर्गों तक पहुंच पाता है जिसके स्पष्ट निहितार्थ यह हुआ कि अवशेष 89 प्रतिशत काले बाजार में पहुंच जाता है। इसकी रोक-थाम अत्यंत कठिन प्रतीत होती है। इसका पूरा नेटवर्क बन चुका है एवं उसे तोड़ना आसान नहीं है।

केन्द्रीय कृषि, खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री शरद पवार विरोधाभाषी भूमिकाओं में हैं। कृषि उत्पादन बढ़ाना है और किसानों को उसका वाजिब मूल्य दिलाना है। देशभर की खाद्य की जरूरत पूरी करनी है और उपभोक्ता मामलों के मंत्री के रूप में भारत के नागरिकों को महंगाई की मार से बचाते हुए उचित मूल्य पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। यह कार्य थोड़ा कठिन अवश्य है किंतु नामुमकिन बिल्कुल नहीं है। अब देखना यह है कि इस कार्य को कितनी शीघ्रता एवं कितनी कुशलता से वे संपन्न कर पाते हैं। केंद्र की संप्रग सरकार को महंगाई पर अंकुश लगाकर खाद्यान्नों की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है।

-लेखक, पूर्व सहायक विक्री कर अधिकारी तथा स्वतंत्र टिप्पणीकार है।

One Response to “उत्तर प्रदेश: कांग्रेस शासन मायने अभूतपूर्व महंगाई एवं भूखमरी- धाराराम यादव”

  1. Rajesh Kumar

    काग्रेस सर्कार में मह्गायाई न हो, लेकिन विपछ भी अपना दैएताओ नही निभा रहा है,

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