लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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-डॉ. मधुसूदन-
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प्रो. महावीरजी जैन का आलेख पढ़ने पर, उसी आलेख के एक बिंदू पर ही लक्ष्य़ केंद्रित कर, यह अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करता हूं। मात्र तर्क के आधार पर यह प्रस्तुति रहेगी।
(एक) प्रो. जैन कहते हैं।
प्रो. जैन: “स्वाधीनता के बाद हमारे राजनेताओं ने हिन्दी की घोर उपेक्षा की।
पहले यह तर्क दिया गया कि हिन्दी में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली का अभाव है। इसके लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग बना दिया गया।
काम सौंप दिया गया कि शब्द बनाओ।
आयोग ने तकनीकी एवं वैज्ञानिक शब्दों के निर्माण के लिए जिन विशेषज्ञों को काम सौंपा उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े। शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”
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मुझे (मधुसूदन को) जिन शब्दों पर आपत्ति है, वे हैं-
“उन्होंने जन-प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े।शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”
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==प्रो. जैन जो कहते हैं, उसे दो अंशों में बाँट कर सोचते हैं। क और ख।
(क) “उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े।
(ख) शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”
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(क) “जन प्रचलित” – यह जन कोई एक व्यक्ति नहीं है। और अनेक व्यक्ति यदि प्रचलित करते हैं, तो, क्या वे एक ही शब्द जो सर्वमान्य हो, ऐसा शब्द प्रचलित कर सकते हैं?
(क१) और प्रचलित कैसे करेंगे? जब प्रत्येक का अलग शब्द होगा, तो, अराजकता नहीं जन्मेगी? और यदि ऐसा होता है, तो वैचारिक संप्रेषण कैसे किया जाए?
(ख) शब्द बनाए नहीं जाते। गढे नहीं जाते?
अनियंत्रित रीति से शब्द अपनाने वाली भाषाएं दीर्घ काल टिकती नहीं है।
(केल्टिक भाषा का इतिहास यही कहता है)
अंग्रेज़ी भाषा का इतिहास भी ३ अलग अवस्थाओं से आगे बढा है।
(पुरानी अंग्रेज़ी आज कोई भी अंग्रेज़ समझता नहीं है।)–खिचडी भाषा अंग्रेज़ी।

देखिए: “खिचड़ी भाषा अंग्रेज़ी”
“हिन्दी हितैषियों के चिन्तनार्थ”
“हिंदी अंग्रेज़ी की टक्कर” १, २, और ३
शब्द वृक्ष १,२,३,४,५,
शब्द रचना पर ३-४ आलेख
प्रायः ४१ आलेख जुड़े हुए विषयों पर डाले हैं।

(दो) गढ़े गएं शब्दों के उदाहरण
डॉ. मधुसूदन===>(एक) निम्न गढे गये संस्कृत शब्द देखिए। ये सारे गढे गये हैं। स्व. डॉ. रघुवीर जी के नेतृत्व में कार्य करनेवाले संस्कृतज्ञों ने गढ़े हैं; ऐसा मानता हूँ।
शब्दों को आज समझने में विशेष कठिनाई मुझे नहीं लगती। पर कुछ कठिनाई पाठकों को हो सकती है।
ऐसी कठिनाई हमारी हिंदी-संस्कृत की अवहेलना का ही परिणाम है। जितने वर्ष हम अंग्रेज़ी में लगाते हैं, उससे आधे वर्ष भी यदि हम हिंदी/संस्कृत को देंगे, तो ऐसी कठिनाई नहीं होगी। यह प्रबंधित ढंग से होना चाहिए।

हिंदी और संस्कृत गत ६६ वर्षों में उपेक्षित हुयी है, उसी के कारण आज साधारण पाठक भी ऐसी संज्ञाएं समझ ने में कठिनाई अनुभव कर सकता है।
अंग्रेज़ी शब्दों के साथ तुलना करके ही, जाँच कर निर्णय करना होगा। मेरी दृष्टि में, एक ओर, हमारा हिन्दी का शब्द प्रायः अपना अर्थ प्रकट कर देता है, (जो स्थूल रूप से सारी प्रादेशिक भाषाओं में भी चल सकता है) दूसरी ओर अंग्रेज़ी शब्द दिया है। उसकी लम्बाई देख लीजिए।

शुद्ध भाषा ही प्रोत्साहित की जाए। जनता उसे अपनी अपनी शैली में बोलेगी। पर मानक-भाषा अंतर-प्रदेशीय वैचारिक आदान-प्रदान के लिए काम आएगी।
(तीन) मॉनियर विलियम्स
मॉनियर विलियम्स कहता है कि “भारत की सभी भाषाएं संस्कृत के जितनी निकट है, उतनी तो यूरोप की भाषाएं भी लातिनी के निकट नहीं है।”

मैं निम्न प्रत्यक्ष प्रमाण के उदाहरण जिन्हें कुछ संस्कृत समझ में आती है, उनके लिए दे रहा हूँ।

(चार) डॉ. रघुवीर

ये शब्द चयन, डॉ. रघुवीर जी के शब्द कोश से संकलित है। डॉ. रघुवीर ने कांग्रेस में रहकर नेहरू जी को “राष्ट्र भाषा हिन्दी” के पक्ष में समझाने में दिन रात परिश्रम करके सारे प्रमाण प्रस्तुत किए थे। अंत में विफलता और निराश होकर कांग्रेस से त्याग पत्र देकर अलग हो गये थे। दो लाख शब्द उन्हों ने बनाए थे; या उनके नेतृत्व में गढ़े गए थे।
आप द्वारा, कुछ शब्द क्लिष्ट माने जा सकते हैं, पर शब्द रूढ होनेपर अपनी क्लिष्टता खो देंगे।

(पाँच) पू. गुरूजी
पू. गुरूजी ने कहा हुआ पढ़ा है कि “जिस दिन स्वतंत्र हुए उसी दिन राष्ट्र गीत, राष्ट्र ध्वज इत्यादि के साथ साथ राष्ट्र भाषा भी घोषित की जाती तो आज यह राष्ट्र भाषा की समस्या ही खडी ना होती।”

(छः) शब्दों के उदाहरण
क्या निम्न शब्द प्रचलित नहीं हो सकते? कुछ तो आज भी पढ़ने में आते ही हैं। आरंभ में कठिन अवश्य लगेंगे। पर कुछ समय जनता को बार-बार उपयोग करने दीजिए, रूढ़ हो जाएंगे। डॉ. रघुवीर के शब्द कोश से आए हुए है। अनेक शब्द नये होंगे।

(सात) प्रत्यक्ष प्रमाण

(१)President=राष्ट्रपति,
(२)Vice-President=उप-राष्ट्रपति,
(३)Governor=राज्यपाल,
(४)Lieutenant Governor=उप-राज्यपाल
(५)Chief Commissioner= मुख्य आयुक्त
(६)His Excellency=महामहिम
(७)Honourable= माननीय
(८) Prime Minister= प्रधान मन्त्री,
(९) Deputy Prime Minister= उप-प्रधान मन्त्री
(१०) Chief Minister= मुख्य मन्त्री
(११) Deputy Chief Minister= उप मुख्य मन्त्री,
(१२) Minister in charge= प्रभारी मन्त्री
(१३) Minister of State= राज्य-मन्त्री
(१४) Deputy Minister= उप-मन्त्री
(१५)Minister of Parliamentary Affairs= संसद्-कार्य मन्त्री
(१६) Cabinet=मन्त्रिमण्डल
(१७)Ministry=मन्त्रालय
(१८)Parliament=संसद,
(१९)Legislative Council=विधान-परिषद
(२०) Legislative Assembly= विधान सभा
(२१) Foreign Minister=विदेश मन्त्री,
(२२)Home Minister= गृह-मन्त्री
(२३) States Minister= राज्य मन्त्री
(२४) Defense Minister= रक्षा मन्त्री
(२५)Communications Minister= संचार मन्त्री
(२६)Rehabilitation Minister= पुनर्वास मन्त्री
(२७) Agriculture Minister= कृषि मन्त्री
(२८)Finance Minister= वित्त मन्त्री
(२९)Revenue Minister= राजस्व मन्त्री
(३०)Education Minister= शिक्षा मन्त्री
(३१) Law Minister= विधि मन्त्री
(३२) Food Minister=अन्न मन्त्री
(३३)Secretary= सचिव
(३४) Secretary to Government=शासन सचिव
(३५)Chief Secretary=मुख्य सचिव
(३६)Joint Secretary=संयुक्त सचिव
(३७)Assistant Secretary=सहायक सचिव
(३८)Extra Secretary=अतिरिक्त सचिव
(३९)Under Secretary=उप-सचिव
(४०)Secretariat=सचिवालय
(४१)Department=विभाग
(४२)General Administration Department=सामान्य प्रशासन विभाग
(४३)Finance Department=वित्त विभाग
(४४)Political and Military Department=राजनैतिक तथा सैनिक विभाग
(४५)Home Department=गृह विभाग

यह प्रत्यक्ष प्रमाण देखिए। और अपना निर्णय कीजिए।
कुछ शब्द क्लिष्ट हो सकते हैं, उनपर संवाद कर के ठीक किया जाए।
उसी पर सारा तर्क प्रतिष्ठित करना भी कैसे सही होगा?
प्रो. जैन के आलेख के कारण जिस चर्चा ने जन्म लिया है, वह स्वागत योग्य है। इसलिए भी उनका धन्यवाद करता हूँ।

इस श्रेणी में बहुत कुछ कहने योग्य है। निरूक्त, निघण्टु, संस्कृत की अद्वितीय शब्द रचना विधि, पाणिनि का अद्वितीय व्याकरण, हमारी लघु, मध्य, और पूर्ण वैयाकरण-सिद्धान्त कौमुदियाँ, इत्यादि का अनमोल भण्डार हमारे पास है।
मैंने भी कुछ झाँक कर ही देखा है; उसी से आँखें चकाचौंध हैं। और फिर जाना कि संगणक (कम्प्यूटर) का परिचालन भी पाणिनि व्याकरण के बिना आगे नहीं बढ पाया। नहीं लिखता तो यह गूंगेका गुड कोई हिन्दी में बाँट नहीं रहा था। सोचा,
यह गूंगेका गुड बाँटा जाए।
बाँटने ले लिए, हिन्दी में लिखना ही उचित लगा। गुजराती में मर्यादित हो जाता। ४% भारत ही गुजराती समझता है।
क्या हम अपनी विरासत को देखे बिना ही त्याग दें? पहले ही, बहुत बहुत देरी हो चुकी है; ये प्रामाणिकता से मानता हूँ। न मेरा व्यवसाय, हिन्दी-संस्कृत से जुड़ा है। न मुझे कोई अनुदान देकर लिखवाता है। (कुछ प्रश्न जो पूछे गये हैं)
चर्चा बिन्दुवार होनी चाहिए। बिना बिन्दु संवाद सच्चाई प्राप्त करने में सफल न होकर चर्चा को दिशा-भ्रमित कर देता है। फैला देता है।
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(आँठ) प्राच्यविद (भाषा विज्ञानी) फ्रिट्ज़ स्टाल कहते हैं कि
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“अब यदि हम पीछे मुड के देखें, तो निःसंदेह, दृढ़तापूर्वक कह सकते हैं कि ईसा पूर्व ५वीं के, भारतीय भाषा विज्ञानी १९वीं शती के पश्चिमी भाषा विज्ञानियों की अपेक्षा अधिक जानते और समझते थे।”
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इस युग के युगान्तरकारी भाषा विज्ञानी नओम चॉम्स्की कुछ अलग शब्दों में यही बात कहते हैं।
ध्यान रखें नओम चॉम्स्की इस युग के सर्वोच्च भाषा विज्ञानी माने जाते हैं।

(नौ) मॉनियर विलियम्स
अंग्रेज़ी-संस्कृत की डिक्षनरी संपादित करनेवाले विद्वान हमारी शब्द रचना के विषय में निम्न विधान करते हैं।
==> कहते हैं कि संस्कृत के पास १९०० धातु हैं। और ५ स्तरपर विस्तरित होनेवाली गुणाकार की प्रक्रियाएँ हैं। उसे किसी भी क्रिया के लिए शब्द के लिए विशेष कठिनाई नहीं होगी। उद्धरण जो अंग्रेज़ी में है, नीचे ओअढें।

(Monier=Williams) (A Dictionary-English and Sanskrit)

===>”It might reasonably be imagined that, amongst a collection of 1900 roots, each capable of five fold multiplication, besides innumerable nominals, there would be little difficulty in finding equivalents for any form of English verb that might present itself”.

13 Responses to ““वर्धा हिन्दी शब्दकोश के बहाने से हिन्दी के विकास के संबंध में विचार””

  1. ken

    Here are some article related wiki links.

    These are lists of words in the English language which are known as “loanwords” or “borrowings,” which are derived from other languages.

    http://www.englishleap.com/vocabulary/foreign-language-words
    http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_English_words_of_Indian_origin
    http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_English_words_of_Hindi_or_Urdu_origin
    http://www.zompist.com/indiawords.html

    http://en.wikipedia.org/wiki/Lists_of_English_words_by_country_or_language_of_origin

    Hindi as UN official language would cost over Rs 82 crore per year
    https://groups.google.com/forum/?hl=hi&fromgroups=#!topic/taknikigyan/KbVbQvcXuEw

    http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_languages_by_number_of_native_speakers

    http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_languages_by_number_of_native_speakers_in_India

    http://en.wikipedia.org/wiki/Languages_of_India

    આઓ મિલકર સંકલ્પ કરે,
    જન-જન તક ગુજનાગરી લિપિ પહુચાએંગે,
    સીખ, બોલ, લિખ કર કે,
    હિન્દી કા માન બઢાએંગે.
    ઔર ભાષા કી સરલતા દિખાયેંગે .
    બોલો હિન્દી લેકિન લિખો સર્વ શ્રેષ્ટ નુક્તા/શિરોરેખા મુક્ત ગુજનાગરી લિપિમેં !

    Reply
  2. Rekha Singh

    यहाँ पर जीवन का जिया हुआ अनुभव साझा कर रही हूँ एवं किसी की भावनाओ को ठेस पहुचाने के लिए नही । यह तो सत्य है की हम जिस अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से भारत मे पढ़े है यदि उनमे हमारे माता पिता के , घर के ,सनातन भारतीय संस्कार सम्मिलित नही है तो हमारा व्यक्तित्व मिश्रित होता है और हम अपनी बहुत सी बातों को गहराई से समझ नही पाते और कभी कभी उन विचारों को सुनना भी पसंद नही करते जो हमारे विचारो से विपरीत हो । हम लोगो मे से बहुतो को अपना इतिहास ही सही पता नही है क्योकि इतिहास और सही इतिहास तो हमारे देश की शिक्षा का अंग ही नही था । भारत के आजाद होने पर (१) भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी और हिन्दुस्तान के सात गद्दारी ?
    (२) भारत का राष्ट्र गीत वन्दे मातरम की जगह ?
    (३) भारत का राष्ट्र ध्वज तिरंगा । (सही )
    उपर्युक्त तीनो ही हमारे देश के चरित्र निर्माण को दर्शाता है । नेहरू के चरित्र के कारण, नेहरू की सत्ता लोलुपता के कारण , सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसा व्यक्ति प्रधान मंत्री नही हुआ । भारत पुनः बट गया। फिरंगी ने नेहरू को ढाल बनाकर भारत को दूसरे तरीके से बर्बाद किया यह सब कुछ अब अंतर्जाल पर (internet) सचित्र उपलब्ध है । नेहरू के सम्पूर्ण खानदान मे किसी भी सम्मानित डिग्री का आभाव है ।
    मेरे पिता जी स्वयं संस्कृत , हिन्दी , अंग्रेजी , उर्दू, गणित, भूगोल , के प्रकांड विद्वान थे और अपने क्षेत्र उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश मे काफी जाने माने थे, ऐसा अब मुझे पता चलता है लोगो से, लेकिन मेरे बड़े पिता जी ( मेरे पिता जी के बड़े भ्राता ) खाली उर्दू जानते थे क्योकि अंग्रेजो के पहले उर्दू थोपी गई थी उत्तर प्रदेश मे । हिन्दी को वह सम्मान नही मिला जो मिलना चाहिए था । मेरे पिता जी बचपन से ही धार्मिक प्रवृति के होने के कारण और साथ ही साथ बौद्धिक क्षमता के कारण हिन्दी और संस्कृत ग्रंथो के प्रति आकर्षण , लगाव , और बाद मे गणित , अंग्रेजी और भूगोल मे प्रयाग विश्वविद्यालय (इलाहाबाद विश्वविद्यालय )से शिक्षा प्राप्त की । मुंशी प्रेमचंद के सुपुत्र आलोक राय एवं मेरे पिता जी सहपाठी थे एवं दोनों ही Topper थे अपने समय के ……।
    मैने इस तरह से अपने जीवन मे अनुभव किया है हमारी राष्ट्र भाषा , मातृ भाषा को विलुप्त होते हुए अपने देश के चरित्र से । फिरंगियो ने अंग्रेजी थोपी हमपर , मैकाले शिक्षा पद्धति के माध्यम से जिसकी शुरुआत नेहरू को लेकर फिरंगियो ने की.……………

    Reply
  3. Himwant

    अंगरेजी की बजाय हमें तमिल के १०० सबसे प्रचलित शब्द हिन्दी में लाने चाहिए. भारतीय भाषाओं में द्वंद के नाम पर हम कब तक अंगरेजी को ढोते रहेगे. हम जितनी कोशीस कर ले, आने वाले १००० वर्ष में भी सारे भारतीय अंगरेजी नहीं सीख सकते.

    Reply
  4. Mohan Gupta

    हीब्रू भाषा एक मृतप्राया भाषा थी। जब इजराइल बना था तब कई लोग मानते थे के इजराइल की राष्ट्र भाषा अंग्रेजी फ्रेंच या जर्मन होगी परन्तु कई लोग चाहते थे के इजराइल की अपनी राष्र्ट्र भाषा हो। तब एक परिवार ने अपने ऊपर यह उत्तरदायितब लिया के बह हिब्रू भाषा का पुनरुथान करेंगे। उस परिवार ने जो हिब्रू शब्द गड़े या बनाए , बह सरकार और प्रसार माध्यम के लिए प्रयोग करना अनिवार्या था। उन घड़े हुए शब्दों का प्रयोग के साथ सुधर भी होता रहता था। इस तरह इजराइल के एक परिवार के परिश्रम से एक मृत प्राया भाषा का पुनर उथान हो गया। ऐसा माना जाता है के डॉ रघवीर जी ने लगभग १.५ लाख हिंदी के शव्द बनाये थे जिसे जवाहर लाल नेहरू ने स्वीकार नहीं किया और वह शब्द प्रचालित नहीं हो पाए यदि जवाहर लाल नेहरू ने डॉ रघुवीर जी द्वारा बनाये शव्द अपना लिए होते तो हिंदी में शब्दो का एक बहुत बड़ा भण्डार वन गया होता। जिससे भारत की अन्या भाषाओ को भी लाभ होता। संस्कृत की सहायता से हिंदी के लिए कोई भी शव्द गड़ा जा सकता हैं और प्रचलन के द्वारा शुद भी किया जा सकता हैं। श्री मधुसूदन जी ने अपने इस लेख में सिद्ध कर दिया हैं के सुचारू और नियमत रूप से संस्कृत की सहायता से सार्थक और उपयुक्त शव्द बनाना कितना आसान हैं।

    Reply
  5. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    आ. प्रो. जैन साहब, नमस्कार।
    (१)आपने पूरा आलेख टिप्पणी में डाला है। कुछ समय लूँगा।
    (२) साम्प्रत—इतना कहता हूँ।मुझे “Sanskrit is a dead language,” और “अंग्रेज़ी के बिना भारत प्रगति, कभी नहीं कर सकता-क्या हिन्दी हिन्दी लेकर बैठे हो” ऐसा कहनेवाले १० में से ९ भारतीयों से साक्षात होना पडता है। इस लिए मेरा यही कुछ “आक्रामक” पैंतरा रहता है।
    (३)यहाँ अमरिका में हमारे भारतीयों को, हिंदी-संस्कृत के प्रति जो हीन-ग्रंथिका अनुभव होता है, (जो विशेष आशादायी नहीं है।) उसी को उद्देश्यित, पैंतरे से प्रस्तुति करता हूँ।वही मैं प्रवक्ता को भेज देता हूँ– शायद भारत के लिए भी आवश्यक(?) हो।
    (४)विशेष: आप ने या और किसी ने लिखी हुयी कोई “शब्द रचना” पर पुस्तक जानना चाहता हूँ।( अन्य पुस्तकें मेरे पास पर्याप्त हैं।) हिन्दी हो,या संस्कृत।
    (५)आप की टिप्पणी ठीक पढने के लिए, कुछ समय लूंगा।
    (६) अगली बार अमरिका पधारे, तो, भेंट करना चाहूंगा।
    आदरसहित नमन
    मधुसूदन

    Reply
    • प्रोफेसर महावीर सरन जैन

      Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

      प्रिय
      आपकी बेलाग टिप्पणी पढ़ी। आपको मेरा हिन्दी से सम्बंधित लेख पढ़कर मुझे अमेरिका में आपसे मिलने वाले 10 में से 09 उन भारतीयों की कोटि में रखकर नहीं देखना चाहिए था जो आपके कथन के अनुसार “Sanskrit is a dead language,” और “अंग्रेज़ी के बिना भारत प्रगति, कभी नहीं कर सकता-क्या हिन्दी हिन्दी लेकर बैठे हो” – ऐसा कहते हैं। मैंने हिन्दी के महत्व का हमेशा प्रतिपादन किया है। कुछ तथ्य रखता हूँ। इसे आत्म-प्रचार मत समझ लीजिएगा।”मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोलीजाने वाली भाषाओं के जो आंकड़े मिलते थे, उनमें सन् 1998 के पूर्व, हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् 1991 के सेन्सॅस ऑफ इण्डिया का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ जुलाई, 1997 में प्रकाशित हुआ। यूनेस्को की टेक्नीकल कमेटी फॉर द वॅःल्ड लैंग्वेजिज रिपोर्ट ने अपने दिनांक 13 जुलाई, 1998 के पत्र के द्वारा ‘यूनेस्को प्रश्नावली’ के आधार पर हिन्दी की रिपोर्ट भेजने के लिए भारत सरकार से निवेदन किया। भारत सरकार ने उक्त दायित्व के निर्वाह के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन को पत्र लिखा।
      प्रोफेसर महावीर सरन जैन ने सन् 1999 में यूनेस्को को विस्तृत रिपोर्ट भेजी।
      प्रोफेसर जैन ने विभिन्न भाषाओं के प्रामाणिक आँकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रयोक्ताओं की दृष्टि से विश्व में चीनी भाषा के बाद दूसरा स्थान हिन्दी भाषा का है। रिपोर्ट तैयार करते समय ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया से अंग्रेजी मातृभाषियों की पूरे विश्व की जनसंख्या के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजने के लिए निवेदन किया गया। ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया ने इसके उत्तर में गिनीज बुक आफ नॉलेज (1997 संस्करण) का पृष्ठ-57 फैक्स द्वारा भेजा। ब्रिटिश काउन्सिल ने अपनी सूचना में पूरे विश्व में अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्या 33,70,00,000 (33 करोड़, 70 लाख) प्रतिपादित की। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 83,85,83,988 है। मातृभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने वालों की संख्या 33,72,72,114 है तथा उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करनेवालों की संख्या 04,34,06,932 है। हिन्दी एवं उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करनेवालों की संख्या का योग 38,06,79,046 है जो भारत की पूरी आबादी का 44.98 प्रतिशत है। प्रोफेसर जैन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिद्ध किया कि भाषिक दृष्टि से हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है।
      जो विद्वान हिन्दीउर्दू की एकता के सम्बंध में मेरे विचारों से अवगत होना चाहते हैं, वे निम्न लिंक पर जाकर अध्ययन कर सकते हैं –
      http://www.scribd.com/doc/22142436/Hindi-Urdu)
      इस प्रकार ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि सभी देशों के अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्या के योग से अधिक जनसंख्या केवल भारत में हिन्दी एवं उर्दू भाषियों की है। रिपोर्ट में यह भी प्रतिपादित किया गया कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारणों से सम्पूर्ण भारत में मानक हिन्दी के व्यावहारिक रूप का प्रसार बहुत अधिक है। हिन्दीतर भाषी राज्यों में बहुसंख्यक द्विभाषिक समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्दी का अधिक प्रयोग करता है।
      हिंदी की अन्तर-क्षेत्रीय, अन्तर्देशीय एवं अंतरराष्ट्रीय भूमिका को स्पष्ट करने के लिए मैंने सन् 2002 में विस्तृत लेख लिखा। उक्त लेख सातवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन समारिका में प्रकाशित हुआ (पृष्ठ 13-23) उसको इंटरनेट पर भी देखा जा सकता है। लिंक्स हैं –

      1. http://www.rachanakar.org/2010/07/blog-post_8861.html#ixzz2WNsOK2lT

      2. http://www.scribd.com/doc/22573933/Hindi-kee-antarraashtreeya-bhoomikaa“.

      आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि सन् 2003 में, मैंने केलिफोर्निया के फ्रीमाण्ट में आयोजित विश्व हिन्दी न्यास के तीसरे वार्षिक अधिवेशन के अपने मुख्य व्याख्यान में हिन्दी की अंग्रेजी से तुलना करते हुए हिन्दी का महत्व प्रतिपादित किया था तथा उसके एक सत्र में यह प्रस्तावित किया था कि संयुक्त राष्ट्र संघ की 06 आधिकारिक भाषाओं की सूची में हिन्दी को भी जोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए, मैंने उन 06 भाषाओं के प्रयोक्ताओं की संख्या के साथ हिन्दी के आँकड़े भी प्रस्तुत किए थे। आपके अवलोकन के लिए वे इस प्रकार हैं –
      गया। भाषिक आंकड़ों की दृष्टि से सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर संयुक्त राष्ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाओं की तुलना में हिंदी के मातृभाषा वक्ताओं की संख्या निम्न तालिका में प्रस्तुत की जा रही है। यह संख्या मिलियन (दस लाख) में है।)
      भाषा का नाम स्रोत – 1 स्रोत – 2 स्रोत – 3 स्रोत – 4
      चीनी 836 800 874 874
      हिन्दी 333 550 366 366
      स्पेनिश 322 400 322-358 322-358
      अंग्रेजी 322 400 341 341
      अरबी 186 200 —- —
      रूसी 170 170 167 167
      फ्रांसीसी 072 090 077 077

      स्रोत ग्रंथों के नाम
      स्रोत – 1
      (1) Encarta Encyclopedia— article of Dr. Bernard Comrie (1998)
      स्रोत – 2
      (2) D. Dolby: The Linguasphere Register of the World’s Languages and Speech Communities, Cardiff, Linguasphere Press (1999)
      स्रोत – 3
      (3) Ethnologue, Volume 1. Languages of the World: Edited by Barbara F. Grimes, 14th.Edition, SIL International (2000)
      स्रोत – 4
      (4) The World Almanac and Book of Facts, World Almanac Education Group (2003)

      विवरण
      (1) एनकार्टा एन्साइक्लोपीडिया (Encarta Encyclopedia— article of Dr. Bernard Comrie (1998) में भाषा के बोलने वालो की संख्या की दृष्टि से जो संख्या है वह इस प्रकार है:
      1. चीनी 836 मिलियन (83 करोड़ 60 लाख)
      2. हिन्दी 333 मिलियन (33 करोड़ 30 लाख)
      3. स्पेनिश 332 मिलियन (33 करोड़ 20 लाख)
      4. अंग्रेजी 322 मिलियन (32 करोड़ 20 लाख)
      5. अररबी 186 मिलियन (18 करोड़ 60 लाख)
      6. रूसी 170 मिलियन (17 करोड़)
      7. फ्रांसीसी 72 मिलियन (7 करोड़ 20 लाख)

      (2) दूसरे स्रोत के ग्रन्थ (D. Dolby: The Linguasphere Register of the World’s Languages and Speech Communities, Cardiff, Linguasphere Press (1999)
      में संख्या इस प्रकार है –
      1. चीनी 800 मिलियन (80 करोड़)
      2. हिन्दी 550 मिलियन (55 करोड़)
      3. स्पेनिश 400 मिलियन (40 करोड़)
      4. अंग्रेजी 400 मिलियन(40 करोड़ )
      5. अरबी 200 मिलियन (20 करोड़)
      6. रूसी 170 मिलियन (17 करोड़)
      7. फ्रैंच 90 मिलियन (9 करोड़)।
      (3)तीन एवं चार स्रोतों के ग्रन्थों के आंकड़े एक जैसे हैं। इसका कारण यह है कि द वःल्ड अल्मानेक एण्ड बुक ऑफ फैक्ट्स (The World Almanac and Book of Facts, World Almanac Education Group(2003) तथा ऍथनॉलॉग (Ethnologue, Volume 1. Languages of the World: Edited by Barbara F. Grimes, 14th.Edition, SIL International (2000)) के आँकड़ें समान हैं। द वःल्ड अल्मानेक एण्ड बुक ऑफ फैक्ट्स (The World Almanac and Book of Facts, World Almanac Education Group(2003) ) के आँकड़ों का आधार ऍथनॉलॉग (Ethnologue, Volume 1. Languages of the World: Edited by Barbara F. Grimes, 14th.Edition, SIL International (2000) के आँकड़ें ही है। इनके अनुसार भाषा के बोलने वालो की संख्या की दृष्टि से जो संख्या है वह इस प्रकार है:
      1. चीनी 874 मिलियन (87 करोड़ 40 लाख)
      2.हिन्दी 366 मिलियन (36 करोड़ 60 लाख)
      3. स्पेनिश 322-358 मिलियन (32 करोड़ 20 लाख से 35 करोड़ 80 लाख)
      4. अंग्रेजी 341 मिलियन (34 करोड़ 10 लाख)।
      5.अरबी – इन ग्रन्थों में अरबी को रिक्त दिखाया गया है। इसका कारण इन ग्रन्थों में यह प्रतिपादित है कि अरबी एक क्लासिकल लैंग्वेज है तथा इन्होंने भाषाओं के जो आँकड़े दिए हैं, वे मातृभाषियों के हैं, द्वितीयभाषा वक्ताओं (सैकेन्ड लैंग्वेज स्पीकर्स) के नहीं। इस कारण इन्होंने अपनी टेबिल में अरबी लैंग्वेज को स्थान नहीं दिया है।
      6.रूसी भाषियों की संख्या 167 मिलियन (16 करोड़ 70 लाख) है।
      7. फ्रेंच भाषियों की संख्या 77 मिलियन (7 करोड़ 70 लाख) है।

      शब्द रचना पर अनेक पुस्तकें मौजूद हैं। मेरी एक पुस्तक सन् 1978 में, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित हुई थी। उसका शीर्षक था – परिनिष्ठित हिन्दी का रूपग्रामिक अध्ययन। (Morphological Study of Standard Hindi) । अब उसे संशोधित करना है। लगभग 40 वर्षों के चिन्तन और मनन के बाद “भारत की भाषाएँ एवं भाषिक एकता तथा हिन्दी”। संघ के एक मित्र को जब मैंने अपनी इस योजना से करीब 8 वर्ष पूर्व अवगत कराया तो उनका कथन था कि इससे हमारे गुरु जी का स्वप्न मूर्तिमान होगा। भारत के चार भिन्न भाषा-परिवारों की 116 भाषाओं के बीच भाषिक एकता की अवधारणा के सूत्र तलाशे गए हैं। अमेरिका तीन साल में औसतन एक बार आता हूँ। अगली बार आने पर आपको सूचित करूँगा।
      सस्नेह
      महावीर सरन जैन

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      • डॉ. मधुसूदन

        डॉ. मधुशुदन

        प्रो. जैन साहब—
        निम्न गलत अर्थ किया आपने।
        “मेरा पैतरा अमरिका के भारतीय पाठकों के प्रति होता है।”
        और मेरे सारे ४९ आलेख उनके, संस्कृत और हिन्दी के प्रति गौरव जगाने के उद्देश्य से प्रेरित होते हैं।”–यह अर्थ अभिप्रेत है।

        ===>”आपको मेरा हिन्दी से सम्बंधित लेख पढ़कर मुझे अमेरिका में आपसे मिलने वाले 10 में से 09 उन भारतीयों की कोटि में रखकर नहीं देखना चाहिए था जो आपके कथन के अनुसार “Sanskrit is a dead language,” और “अंग्रेज़ी के बिना भारत प्रगति, कभी नहीं कर सकता-क्या हिन्दी हिन्दी लेकर बैठे हो” – ऐसा कहते हैं।”

        ऐसा वें मुझे कहा करते हैं।चाहते हैं, कि, अंग्रेज़ी में लिखूं।

        Reply
  6. Vishwa Mohan Tiwari

    अब प्रों जैन ने अपनी बात बहुत स्पष्ट कर दी है,
    अब उसमें मतभेद की गुंजाइश बहुत कम हो गई है
    विश्वमोहन तिवारी

    Reply
    • प्रोफेसर महावीर सरन जैन

      Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

      सम्मान्य विश्व मोहन तिवारी जी
      आपकी टिप्पणी के लिए आपका आभारी हूँ।

      Reply
  7. प्रोफेसर महावीर सरन जैन

    Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

    प्रिय सत्यार्थी जी
    आपने प्रिय मधुसूदन की टिप्पणी के प्रति अपनी सहमति व्यक्त की है। इसका अर्थ यह है कि आपको भी दो बिन्दुओं पर आपत्ति है। आपको भी आपत्ति दो बिन्दुओं पर है और आप बिन्दुवार उत्तर चाहते हैं। जिन दो बिन्दुओं पर मधुसूदन जी को आपत्ति हैं, वे निम्न हैं –
    “मुझे (मधुसूदन को) जिन शब्दों पर आपत्ति है, वे हैं-
    “उन्होंने जन-प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े।शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”
    =====================
    ==प्रो. जैन जो कहते हैं, उसे दो अंशों में बाँट कर सोचते हैं। क और ख।
    (क) “उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े।
    (ख) शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”
    मुझे लगता है कि आपको भी शायद यह प्रतीति हुई है कि मैं संस्कृत का विरोधी हूँ। मैं आपको भी यह परामर्श देना अपना धर्म समझता हूँ कि मैंने अपने लेख में, जिस वाक्य का प्रयोग किया है उसको उसके पूरे संदर्भ में ग्रहण करने की अनुकम्पा करें। वाक्य है – ‘आयोग ने तकनीकी एवं वैज्ञानिक शब्दों के निर्माण के लिए जिन विशेषज्ञों को काम सौंपा उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े´। इस वाक्य के ‘जन प्रचलित शब्दों के स्थान पर´ तथा ‘शब्द गढ़े´ – इन दो पद-बंधों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
    मैं दोनों बिन्दुओं पर उत्तर देने की कोशिश करूँगा। कोशिश होगी कि विवेचन से आपकी भी दोनों आपत्तियों का निराकरण हो जाए।
    किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु का ‘नाम रखने´ अथवा ´नामकरण करने’ तथा जन प्रचलित शब्द के स्थान पर नया शब्द ‘बनाने´ अथवा ‘गढ़ने´ में अन्तर है। ये भिन्न ´विचारों’ के वाचक हैं; भिन्न ‘संकल्पनाओं´ के बोधक हैं। आप सम्भवतः भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ नहीं हैं, इस कारण आपकी सुविधा के लिए मैं दोनों के अन्तर एवं भेद को उदाहरणों से स्पष्ट करने की कोशिश करूँगा।
    नामकरण करना अथवा नाम रखना –
    (क) व्यक्ति का नामकरण – घर में जब किसी शिशु का जन्म होता है, वह भगवान के घर से कोई नाम लेकर पैदा नहीं होता। उसका ´नामकरण’ होता है। उसका हम नाम रखते हैं। उसके लिए नाम बनाते नहीं हैं। उसके लिए नाम गढ़ते नहीं हैं। जो नाम रखते हैं, वह समाज में उस शिशु के लिए प्रचलित हो जाता है। लोक उसे उसके रखे नाम से पहचानता है। नाम व्यक्तित्व का अंग हो जाता है। नाम व्यक्ति से जुड़ जाता है।
    (ख) नई व्यवस्था, नई वस्तु, नए आविष्कार के लिए नामकरण – भारत ने गुलामी की जंजीरों को काटकर स्वतंत्रता प्राप्त की। स्वाधीन होने के पहले से ही हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए ‘संविधान सभा´ का गठन कर दिया था। हमारे देश की संविधान सभा ने राजतंत्र के स्थान पर लोकतंत्र को ध्यान में रखकर संविधान बनाया। राजतंत्र में सर्वोच्च पद राजा का होता है। लोकतंत्र के लिए उन्होंने ´राष्ट्रपति’ का पद बनाया। राष्ट्रपति शब्द इस कारण प्रचलित हो गया। उसके लिए कोई दूसरा शब्द जनता में प्रचलित नहीं था। पद ही नहीं था तो उसका वाचक कैसे होता। लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में इसी कारण बहुत से नए शब्दों का नामकरण किया। उनके लिए लोक में कोई अन्य नाम प्रचलित नहीं थे। आपने अपने टिप्पण में जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, उनमें से अधिकतर इसी कोटि के अन्तर्गत आते हैं। कुछ अन्य उदाहरण देखें- (1) भारत की सरकार ने जब पद्म पुरस्कारों की नई योजना बनाई तो पुरस्कारों की तीन श्रेणियाँ बनाई तथा उनके नाम रखे – (अ) पद्म विभूषण (आ) पद्म भूषण (इ) पद्म श्री । इसके लिए कोई अन्य नाम प्रचलित नहीं थे। प्रचलित नहीं थे, क्योंकि ये पुरस्कार ही नहीं थे। इस कारण रखे गए नाम चले। इनका प्रचलन हो गया। (2) भारत की सरकार ने जब पूर्वोत्तर भारत में नए राज्यों का गठन किया तो उनके लिए नाम रखे। (अ) अरुणाचल प्रदेश (आ) मणिपुर (इ) मेघालय (ई) मिज़ोरम (उ) नगालैण्ड आदि। इन नए गठित राज्यों के लिए पहले से कोई शब्द नहीं थे। शब्द इस कारण नहीं थे क्योंकि राज्य ही नहीं थे। इन नए राज्यों का नामकरण किया गया। इन राज्यों को सब इनके नाम से पुकारते हैं। (3) अभी हाल में ‘आन्ध्र प्रदेश´ को दो भागों में बाँटा गया है। एक राज्य का नामकरण किया गया – तेलंगाना । दूसरे राज्य का नामकरण किया गया – सीमान्ध्र। ये नाम चलेंगे। लोक प्रचलित हो जाएँगे। (4) भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने चन्द्रमा पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष प्रेक्षण उपग्रह का नाम ‘चन्द्रयान´ तथा मंगल पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष प्रेक्षण उपग्रह का नाम ‘मंगलयान´ रखा। इनका नामकरण ´चन्द्रयान’ एवं ‘मंगलयान’ किया। ये नाम चल रहे हैं। संसार की किसी भी देश का वैज्ञानिक जब किसी भी भाषा में इनका उल्लेख करेगा तो उसे ‘चन्द्रयान´ एवं ‘मंगलयान´ शब्दों का प्रयोग करना पड़ेगा।
    शब्द बनाना अथवा शब्द गढ़ना –
    अब मैं शब्द बनाने अथवा शब्द गढ़ने को एक उदाहरण से स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ।
    अंग्रेजों ने भारत में ‘रेलवे नेटकर्क´ शुरु किया। रेल की पटरियों का जाल बिछाने का काम किया। रेल से जुड़े अंग्रेजी के सैकड़ों शब्द जन प्रचलित हो गए। उदाहरण देखें- (1) इंजन (2) रेलवे (3) एक्सप्रेस (4) केबिन (5) गॉर्ड (6) स्टेशन (7) जंक्शन (8) टाइम टेबिल (9) टिकट (10) टिकट कलेक्टर (11) डीजल इंजन (12) प्लेटफॉर्म (13) बोगी (14) बुकिंग (15) सिग्नल (16) स्टेशन (17) स्टेशन मास्टर ।
    इन जैसे जन प्रचलित शब्दों के स्थान पर इनके लिए नए शब्द बनाने अथवा गढ़ने वालों से मैं उससे सहमत नहीं हो सकता। भारतीय भाषाविज्ञान की महान परम्परा के अध्ययन के बाद मुझे जो ज्ञान प्राप्त हुआ है उसके आधार पर मैं यह बात कह रहा हूँ। आचार्य रघुवीर जी ने जो कार्य किया है वह स्तुत्य है मगर उन्होंने भी अंग्रेजी के जन प्रचलित शब्दों के स्थान पर जिन शब्दों को गढ़ा है उनसे सहमत नहीं हूँ। उदाहरण के लिए रेलगाड़ी के स्थान पर उन्होंने संस्कृत की धातुओं एवं परसर्गों एवं विभक्तियों की सहायता से शब्द बनाया जो उपहास का कारक बना। ऐसे ही उदाहरणों के कारण ´रघुवीरी हिन्दी’ हास्यास्पद हो गई। लोक में रेल ही चलता है और चलेगा। गढ़ा शब्द नहीं चलेगा। इसी संदर्भ में, मेरा मत है कि जो शब्द जन-प्रचलित हैं उनके स्थान पर शब्द गढ़े नहीं। इस विषय पर इलाहाबाद में रज्जू भैया से बहुत लम्बे संवाद हुए हैं। आप नया आविष्कार करें और उसका नामकरण करें, यह ठीक है। जो शब्द जन-प्रचलित हो गए हैं उनके स्थान पर नए शब्द बनाना अथवा गढ़ना श्रम का अपव्यय है।
    आपके टिप्पण को पढ़कर मुझे लगा है जैसे आप मुझे संस्कृत की व्याकरण परम्परा से परिचित कराना चाहते हैं। मैं केवल यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं संस्कृत के महान वैयाकरणों एवं निरुक्तकारों के योगदान से परिचित हूँ। यही नहीं प्रातिशाख्यों तथा शिक्षा-ग्रंथों में भाषाविज्ञान और विशेष रूप से ध्वनि विज्ञान से सम्बंधित कितना सूक्ष्मदर्शी और गहन विचार सन्निहित है, इससे भी अवगत हूँ। भारतीय भाषाविज्ञान की परम्परा बड़ी समृद्ध है और उसमें न केवल वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के भाषाविद् समाहित हैं अपितु प्राकृतों एवं अपभ्रंशों के भाषाविद् भी समाहित है। पाणिनी ने अपने काल के पूर्व के 10 आचार्यों का उल्लेख किया है। उन आचार्यों ने वेदों के काल की छान्दस् भाषा पर कार्य किया था। पाणिनी ने वैदिक काल की छान्दस भाषा को आधार बनाकर अष्टाध्यायी की रचना नहीं की। उन्होंने अपने काल की जन-सामान्य भाषा संस्कृत को आधार बनाकर व्याकरण के नियमों का निर्धारण किया। वाल्मीकीय रामायण में इस भाषा के लिए ‘मानुषी´ विशेषण का प्रयोग हुआ है। पाणिनी के समय संस्कृत का व्यवहार एवं प्रयोग बहुत बड़े भूभाग में होता था। उसके अनेक क्षेत्रीय भेद-प्रभेद रहे होंगे। पाणिनी ने भारत के उदीच्य भाग के गुरुकुलों में बोली जानेवाली भाषा को आधार बनाया। पाणिनी के व्याकरण का महत्व सर्वविदित है। उस सम्बंध में लिखना अनावश्यक है। पाणिनी के व्याकरण की विशिष्टता को अनेक विद्वानों ने रेखांकित किया है। मैं प्रसंग को ध्यान में रखकर, अमेरिका के प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक बेंजामिन ली व्होर्फ के अभिमत को उद्धृत कर रहा हूँ – ‘यद्यपि भाषाविज्ञान बहुत प्राचीन है तथापि इसका आधुनिक प्रयोगात्मक रूप, जो अलिखित बोलचाल की भाषा के विश्लेषण पर जोर देता है, सर्वथा आधुनिक है। जहाँ तक हमें ज्ञात है, ईसा से कई शताब्दी पूर्व, पाणिनी ने इस विज्ञान का शिलान्यास किया था। पाणिनी ने उस युग में, वह ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जो हमें आज उपलब्ध है। संस्कृत भाषा को नियमबद्ध करने के लिए पाणिनी के सूत्र बीजगणित के जटिल सूत्रों की भाँति हैं´।
    मैं अवगत हूँ कि प्रत्याहार, गणपाठ, विकरण, अनुबंध आदि की विपुल तकनीक से अलंकृत पाणिनीय सूत्र उनकी अद्वितीय प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। मुझे संस्कृत भाषा के व्यवहार एवं प्रसार की थोड़ी बहुत जानकारी भी है। उत्तर-वैदिक काल में संस्कृत भारत की सभी दिशाओं में चारों ओर फैलती गई। संस्कृत का यह प्रसार केवल भौगोलिक दिशाओं में ही नहीं हो रहा था; सामाजिक स्तर पर मानक संस्कृत से भिन्न अनेक आर्य एवं अनार्य भाषाओं के बोलने वाले समुदायों में भी हो रहा था।
    (Burrow. T.: The Sanskrit Language, P. 63, Faber & Faber, London).

    संस्कृत भाषा के भारत के विभिन्न भागों एवं विभिन्न सामाजिक समुदायों में व्यवहार एवं प्रसार के कारण दो बातें घटित हुईं –
    1. संस्कृत ने अपने प्रसार के कारण भारत के प्रत्येक क्षेत्र की भाषा को प्रभावित किया।
    2. संस्कृत भाषा स्वयं भी भारत में अन्य भाषा-परिवारों की भाषाओं से तथा संस्कृत युग में भारतीय आर्य परिवार की संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं से प्रभावित हुई। हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि संस्कृत काल में अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं का व्वहार होता था।
    (प्रोफेसर महावीर सरन जैन का आलेख- संस्कृत भाषा काल में विभिन्न समसामयिक अन्य लोकभाषाओं/ जनभाषाओं का व्यवहार http://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_5218.html)
    संस्कृत के प्रभाव से तो संस्कृत के विद्वान परिचित हैं मगर संस्कृत पर संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं के प्रभाव से शायद परिचित नहीं हैं अथवा इस पक्ष को अनदेखा कर जाते हैं। मैंने इन दोनों पक्षों पर अपनी पुस्तक में विस्तार से लिखा है। यह भी विवेचित किया है कि पाणिनी के बाद के संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त किन धातुओं का (शब्दों का नहीं) प्रयोग हुआ है जिनका उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में नहीं हुआ है। मेरी पुस्तक का शीर्षक है – ‘भारत की भाषाएँ एवं भाषिक एकता तथा हिन्दी´ जो प्रकाशनाधीन है।
    संस्कृत के प्रभाव से हम सभी सुपरिचित हैं। इस दिशा में प्रचुर कार्य सम्पन्न हुए हैं। शब्दावली के स्तर पर संस्कृत की शब्दावली ने सभी भारतीय भाषाओं को प्रभावित किया है जिसे तत्सम शब्दावली के नाम के पुकारा जाता है। मध्यकालीन साहित्यिक तमिल की ‘मणिप्रवालम शैली’ से भारतीय भाषाओं पर संस्कृत के व्यापक प्रभाव की बात सिद्ध होती है।
    मैं संस्कृत के महत्व के बारे में थोड़ा सा ज्ञान रखता हूँ मगर जो शब्द लोक में प्रचलित हो गए हैं, उनके लिए संस्कृत की शब्द रचना का सहारा लेकर नए शब्द गढ़ने के खिलाफ हूँ। मेरा भाषाविज्ञान का ज्ञान तथा लोक-व्यवहार का विवेक मुझे ऐसा करने वालों का समर्थन करने से रोकता है। फिर भले ही वे आचार्य रघुवीर जैसे महान विद्वान ही क्यों न हों। हमें किसी विचार शाखा से अपने को जकड़ना नहीं चाहिए। भाषा की प्रवाहशील प्रकृति को आत्मसात करना चाहिए। संस्कृत और आधुनिक भारतीय भाषाएँ भिन्न कालों की भाषाएँ हैं। एक काल की भाषा पर दूसरे काल की भाषा के नियमों को नहीं थोपा जा सकता। संस्कृत और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं के अन्तर को भी मैंने अपनी पुस्तक में व्याख्यायित एवं विवेचित किया है। किसी भाषा के व्याकरण के नियमों को दूसरी किसी अन्य भाषा पर थोपना गलत है।भाषाविज्ञान का यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक नियम है। विश्वास है, यह पढ़ने के बाद आप भी मेरे विचारों से यह निष्कर्ष नहीं निकालेंगे कि मैं संस्कृत भाषा और उसकी भाषिक परम्परा के महत्व की अवहेलना करता हूँ।
    सस्नेह
    महावीर सरन जैन

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  8. प्रोफेसर महावीर सरन जैन

    Prof. MAHAVIR SARAN JAIN

    प्रिय मधुसूदन जी
    आपकी टिप्पणी पढ़ी। आप गुजराती भाषी है। यह होते हुए भी आपने अभियांत्रिकी के क्षेत्र में हिन्दी में जो कुछ लिखा है उसके कारण मेरे मन में आपके प्रति सम्मान का भाव है। आपने मेरे प्रति आदर एवं सम्मान का भाव प्रगट किया है तथा मेरे लेख में व्यक्त विचारों के प्रति आंशिक सहमति व्यक्त की है उसके लिए आपका आभारी हूँ। आपको आपत्ति दो बिन्दुओं पर है और आप बिन्दुवार उत्तर चाहते हैं। जिन दो बिन्दुओं पर आपको आपत्ति हैं, वे निम्न हैं –
    “मुझे (मधुसूदन को) जिन शब्दों पर आपत्ति है, वे हैं-
    “उन्होंने जन-प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े।शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”
    =====================
    ==प्रो. जैन जो कहते हैं, उसे दो अंशों में बाँट कर सोचते हैं। क और ख।
    (क) “उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े।
    (ख) शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”
    मुझे लगता है कि आपको शायद यह प्रतीति हुई है कि मैं संस्कृत का विरोधी हूँ। मैं आपको यह परामर्श देना अपना धर्म समझता हूँ कि मैंने अपने लेख में, जिस वाक्य का प्रयोग किया है उसको उसके पूरे संदर्भ में ग्रहण करने की अनुकम्पा करें। वाक्य है – ‘आयोग ने तकनीकी एवं वैज्ञानिक शब्दों के निर्माण के लिए जिन विशेषज्ञों को काम सौंपा उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े´। इस वाक्य के ‘जन प्रचलित शब्दों के स्थान पर´ तथा ‘शब्द गढ़े´ – इन दो पद-बंधों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
    मैं दोनों बिन्दुओं पर उत्तर देने की कोशिश करूँगा। कोशिश होगी कि विवेचन से आपकी दोनों आपत्तियों का निराकरण हो जाए।
    किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु का ‘नाम रखने´ अथवा ´नामकरण करने’ तथा जन प्रचलित शब्द के स्थान पर नया शब्द ‘बनाने´ अथवा ‘गढ़ने´ में अन्तर है। ये भिन्न ´विचारों’ के वाचक हैं; भिन्न ‘संकल्पनाओं´ के बोधक हैं। आप सम्भवतः भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ नहीं हैं, इस कारण आपकी सुविधा के लिए मैं दोनों के अन्तर एवं भेद को उदाहरणों से स्पष्ट करने की कोशिश करूँगा।
    नामकरण करना अथवा नाम रखना –
    (क) व्यक्ति का नामकरण – घर में जब किसी शिशु का जन्म होता है, वह भगवान के घर से कोई नाम लेकर पैदा नहीं होता। उसका ´नामकरण’ होता है। उसका हम नाम रखते हैं। उसके लिए नाम बनाते नहीं हैं। उसके लिए नाम गढ़ते नहीं हैं। जो नाम रखते हैं, वह समाज में उस शिशु के लिए प्रचलित हो जाता है। लोक उसे उसके रखे नाम से पहचानता है। नाम व्यक्तित्व का अंग हो जाता है। नाम व्यक्ति से जुड़ जाता है।
    (ख) नई व्यवस्था, नई वस्तु, नए आविष्कार के लिए नामकरण – भारत ने गुलामी की जंजीरों को काटकर स्वतंत्रता प्राप्त की। स्वाधीन होने के पहले से ही हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए ‘संविधान सभा´ का गठन कर दिया था। हमारे देश की संविधान सभा ने राजतंत्र के स्थान पर लोकतंत्र को ध्यान में रखकर संविधान बनाया। राजतंत्र में सर्वोच्च पद राजा का होता है। लोकतंत्र के लिए उन्होंने ´राष्ट्रपति’ का पद बनाया। राष्ट्रपति शब्द इस कारण प्रचलित हो गया। उसके लिए कोई दूसरा शब्द जनता में प्रचलित नहीं था। पद ही नहीं था तो उसका वाचक कैसे होता। लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में इसी कारण बहुत से नए शब्दों का नामकरण किया। उनके लिए लोक में कोई अन्य नाम प्रचलित नहीं थे। आपने अपने टिप्पण में जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, उनमें से अधिकतर इसी कोटि के अन्तर्गत आते हैं। कुछ अन्य उदाहरण देखें- (1) भारत की सरकार ने जब पद्म पुरस्कारों की नई योजना बनाई तो पुरस्कारों की तीन श्रेणियाँ बनाई तथा उनके नाम रखे – (अ) पद्म विभूषण (आ) पद्म भूषण (इ) पद्म श्री । इसके लिए कोई अन्य नाम प्रचलित नहीं थे। प्रचलित नहीं थे, क्योंकि ये पुरस्कार ही नहीं थे। इस कारण रखे गए नाम चले। इनका प्रचलन हो गया। (2) भारत की सरकार ने जब पूर्वोत्तर भारत में नए राज्यों का गठन किया तो उनके लिए नाम रखे। (अ) अरुणाचल प्रदेश (आ) मणिपुर (इ) मेघालय (ई) मिज़ोरम (उ) नगालैण्ड आदि। इन नए गठित राज्यों के लिए पहले से कोई शब्द नहीं थे। शब्द इस कारण नहीं थे क्योंकि राज्य ही नहीं थे। इन नए राज्यों का नामकरण किया गया। इन राज्यों को सब इनके नाम से पुकारते हैं। (3) अभी हाल में ‘आन्ध्र प्रदेश´ को दो भागों में बाँटा गया है। एक राज्य का नामकरण किया गया – तेलंगाना । दूसरे राज्य का नामकरण किया गया – सीमान्ध्र। ये नाम चलेंगे। लोक प्रचलित हो जाएँगे। (4) भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने चन्द्रमा पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष प्रेक्षण उपग्रह का नाम ‘चन्द्रयान´ तथा मंगल पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष प्रेक्षण उपग्रह का नाम ‘मंगलयान´ रखा। इनका नामकरण ´चन्द्रयान’ एवं ‘मंगलयान’ किया। ये नाम चल रहे हैं। संसार की किसी भी देश का वैज्ञानिक जब किसी भी भाषा में इनका उल्लेख करेगा तो उसे ‘चन्द्रयान´ एवं ‘मंगलयान´ शब्दों का प्रयोग करना पड़ेगा।
    शब्द बनाना अथवा शब्द गढ़ना –
    अब मैं शब्द बनाने अथवा शब्द गढ़ने को एक उदाहरण से स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ।
    अंग्रेजों ने भारत में ‘रेलवे नेटकर्क´ शुरु किया। रेल की पटरियों का जाल बिछाने का काम किया। रेल से जुड़े अंग्रेजी के सैकड़ों शब्द जन प्रचलित हो गए। उदाहरण देखें- (1) इंजन (2) रेलवे (3) एक्सप्रेस (4) केबिन (5) गॉर्ड (6) स्टेशन (7) जंक्शन (8) टाइम टेबिल (9) टिकट (10) टिकट कलेक्टर (11) डीजल इंजन (12) प्लेटफॉर्म (13) बोगी (14) बुकिंग (15) सिग्नल (16) स्टेशन (17) स्टेशन मास्टर ।
    इन जैसे जन प्रचलित शब्दों के स्थान पर इनके लिए नए शब्द बनाने अथवा गढ़ने वालों से मैं उससे सहमत नहीं हो सकता। भारतीय भाषाविज्ञान की महान परम्परा के अध्ययन के बाद मुझे जो ज्ञान प्राप्त हुआ है उसके आधार पर मैं यह बात कह रहा हूँ। आचार्य रघुवीर जी ने जो कार्य किया है वह स्तुत्य है मगर उन्होंने भी अंग्रेजी के जन प्रचलित शब्दों के स्थान पर जिन शब्दों को गढ़ा है उनसे सहमत नहीं हूँ। उदाहरण के लिए रेलगाड़ी के स्थान पर उन्होंने संस्कृत की धातुओं एवं परसर्गों एवं विभक्तियों की सहायता से शब्द बनाया जो उपहास का कारक बना। ऐसे ही उदाहरणों के कारण ´रघुवीरी हिन्दी’ हास्यास्पद हो गई। लोक में रेल ही चलता है और चलेगा। गढ़ा शब्द नहीं चलेगा। इसी संदर्भ में, मेरा मत है कि जो शब्द जन-प्रचलित हैं उनके स्थान पर शब्द गढ़े नहीं। इस विषय पर इलाहाबाद में रज्जू भैया से बहुत लम्बे संवाद हुए हैं। आप नया आविष्कार करें और उसका नामकरण करें, यह ठीक है। जो शब्द जन-प्रचलित हो गए हैं उनके स्थान पर नए शब्द बनाना अथवा गढ़ना श्रम का अपव्यय है।
    आपके टिप्पण को पढ़कर मुझे लगा है जैसे आप मुझे संस्कृत की व्याकरण परम्परा से परिचित कराना चाहते हैं। मैं केवल यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं संस्कृत के महान वैयाकरणों एवं निरुक्तकारों के योगदान से परिचित हूँ। यही नहीं प्रातिशाख्यों तथा शिक्षा-ग्रंथों में भाषाविज्ञान और विशेष रूप से ध्वनि विज्ञान से सम्बंधित कितना सूक्ष्मदर्शी और गहन विचार सन्निहित है, इससे भी अवगत हूँ। भारतीय भाषाविज्ञान की परम्परा बड़ी समृद्ध है और उसमें न केवल वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के भाषाविद् समाहित हैं अपितु प्राकृतों एवं अपभ्रंशों के भाषाविद् भी समाहित है। पाणिनी ने अपने काल के पूर्व के 10 आचार्यों का उल्लेख किया है। उन आचार्यों ने वेदों के काल की छान्दस् भाषा पर कार्य किया था। पाणिनी ने वैदिक काल की छान्दस भाषा को आधार बनाकर अष्टाध्यायी की रचना नहीं की। उन्होंने अपने काल की जन-सामान्य भाषा संस्कृत को आधार बनाकर व्याकरण के नियमों का निर्धारण किया। वाल्मीकीय रामायण में इस भाषा के लिए ‘मानुषी´ विशेषण का प्रयोग हुआ है। पाणिनी के समय संस्कृत का व्यवहार एवं प्रयोग बहुत बड़े भूभाग में होता था। उसके अनेक क्षेत्रीय भेद-प्रभेद रहे होंगे। पाणिनी ने भारत के उदीच्य भाग के गुरुकुलों में बोली जानेवाली भाषा को आधार बनाया। पाणिनी के व्याकरण का महत्व सर्वविदित है। उस सम्बंध में लिखना अनावश्यक है। पाणिनी के व्याकरण की विशिष्टता को अनेक विद्वानों ने रेखांकित किया है। मैं प्रसंग को ध्यान में रखकर, अमेरिका के प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक बेंजामिन ली व्होर्फ के अभिमत को उद्धृत कर रहा हूँ – ‘यद्यपि भाषाविज्ञान बहुत प्राचीन है तथापि इसका आधुनिक प्रयोगात्मक रूप, जो अलिखित बोलचाल की भाषा के विश्लेषण पर जोर देता है, सर्वथा आधुनिक है। जहाँ तक हमें ज्ञात है, ईसा से कई शताब्दी पूर्व, पाणिनी ने इस विज्ञान का शिलान्यास किया था। पाणिनी ने उस युग में, वह ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जो हमें आज उपलब्ध है। संस्कृत भाषा को नियमबद्ध करने के लिए पाणिनी के सूत्र बीजगणित के जटिल सूत्रों की भाँति हैं´।
    मैं अवगत हूँ कि प्रत्याहार, गणपाठ, विकरण, अनुबंध आदि की विपुल तकनीक से अलंकृत पाणिनीय सूत्र उनकी अद्वितीय प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। मुझे संस्कृत भाषा के व्यवहार एवं प्रसार की थोड़ी बहुत जानकारी भी है। उत्तर-वैदिक काल में संस्कृत भारत की सभी दिशाओं में चारों ओर फैलती गई। संस्कृत का यह प्रसार केवल भौगोलिक दिशाओं में ही नहीं हो रहा था; सामाजिक स्तर पर मानक संस्कृत से भिन्न अनेक आर्य एवं अनार्य भाषाओं के बोलने वाले समुदायों में भी हो रहा था।
    (Burrow. T.: The Sanskrit Language, P. 63, Faber & Faber, London).

    संस्कृत भाषा के भारत के विभिन्न भागों एवं विभिन्न सामाजिक समुदायों में व्यवहार एवं प्रसार के कारण दो बातें घटित हुईं –
    1. संस्कृत ने अपने प्रसार के कारण भारत के प्रत्येक क्षेत्र की भाषा को प्रभावित किया।
    2. संस्कृत भाषा स्वयं भी भारत में अन्य भाषा-परिवारों की भाषाओं से तथा संस्कृत युग में भारतीय आर्य परिवार की संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं से प्रभावित हुई। हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि संस्कृत काल में अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं का व्वहार होता था।
    (प्रोफेसर महावीर सरन जैन का आलेख- संस्कृत भाषा काल में विभिन्न समसामयिक अन्य लोकभाषाओं/ जनभाषाओं का व्यवहार http://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_5218.html)
    संस्कृत के प्रभाव से तो संस्कृत के विद्वान परिचित हैं मगर संस्कृत पर संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं के प्रभाव से शायद परिचित नहीं हैं अथवा इस पक्ष को अनदेखा कर जाते हैं। मैंने इन दोनों पक्षों पर अपनी पुस्तक में विस्तार से लिखा है। यह भी विवेचित किया है कि पाणिनी के बाद के संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त किन धातुओं का (शब्दों का नहीं) प्रयोग हुआ है जिनका उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में नहीं हुआ है। मेरी पुस्तक का शीर्षक है – ‘भारत की भाषाएँ एवं भाषिक एकता तथा हिन्दी´ जो प्रकाशनाधीन है।
    संस्कृत के प्रभाव से हम सभी सुपरिचित हैं। इस दिशा में प्रचुर कार्य सम्पन्न हुए हैं। शब्दावली के स्तर पर संस्कृत की शब्दावली ने सभी भारतीय भाषाओं को प्रभावित किया है जिसे तत्सम शब्दावली के नाम के पुकारा जाता है। मध्यकालीन साहित्यिक तमिल की ‘मणिप्रवालम शैली’ से भारतीय भाषाओं पर संस्कृत के व्यापक प्रभाव की बात सिद्ध होती है।
    आपने अपने टिप्पण में चॉम्स्की का नाम लिया है। मैं इस पर टिप्पण नहीं करूँगा क्योंकि आपका निर्देश है कि मैं केवल बिन्दुवार ही उत्तर दूँ। मगर मैं यह कहने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहा हूँ कि आधुनिक भाषाविज्ञान चॉम्स्की के प्रजनक व्याकरण से बहुत आगे निकल चुका है।
    मैं संस्कृत के महत्व के बारे में थोड़ा सा ज्ञान रखता हूँ मगर जो शब्द लोक में प्रचलित हो गए हैं, उनके लिए संस्कृत की शब्द रचना का सहारा लेकर नए शब्द गढ़ने के खिलाफ हूँ। मेरा भाषाविज्ञान का ज्ञान तथा लोक-व्यवहार का विवेक मुझे ऐसा करने वालों का समर्थन करने से रोकता है। फिर भले ही वे आचार्य रघुवीर जैसे महान विद्वान ही क्यों न हों। हमें किसी विचार शाखा से अपने को जकड़ना नहीं चाहिए। भाषा की प्रवाहशील प्रकृति को आत्मसात करना चाहिए। संस्कृत और आधुनिक भारतीय भाषाएँ भिन्न कालों की भाषाएँ हैं। एक काल की भाषा पर दूसरे काल की भाषा के नियमों को नहीं थोपा जा सकता। संस्कृत और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं के अन्तर को भी मैंने अपनी पुस्तक में व्याख्यायित एवं विवेचित किया है। किसी भाषा के व्याकरण के नियमों को दूसरी किसी अन्य भाषा पर थोपना गलत है।भाषाविज्ञान का यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक नियम है। विश्वास है, आप मेरे विचारों से यह निष्कर्ष नहीं निकालेंगे कि मैं संस्कृत भाषा और उसकी भाषिक परम्परा के महत्व की अवहेलना करता हूँ।
    सस्नेह
    महावीर सरन जैन

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आ. प्रो. जैन साहब, नमस्कार।
      (१)आपने पूरा आलेख टिप्पणी में डाला है। कुछ समय लूँगा।
      (२) साम्प्रत—इतना कहता हूँ।मुझे “Sanskrit is a dead language,” और “अंग्रेज़ी के बिना भारत प्रगति, कभी नहीं कर सकता-क्या हिन्दी हिन्दी लेकर बैठे हो” ऐसा कहनेवाले १० में से ९ भारतीयों से साक्षात होना पडता है। इस लिए मेरा यही कुछ “आक्रामक” पैंतरा रहता है।
      (३)यहाँ अमरिका में हमारे भारतीयों को, हिंदी-संस्कृत के प्रति जो हीन-ग्रंथिका अनुभव होता है, (जो विशेष आशादायी नहीं है।) उसी को उद्देश्यित, पैंतरे से प्रस्तुति करता हूँ।वही मैं प्रवक्ता को भेज देता हूँ– शायद भारत के लिए भी आवश्यक(?) हो।
      (४)विशेष: आप ने या और किसी ने लिखी हुयी कोई “शब्द रचना” पर पुस्तक जानना चाहता हूँ।( अन्य पुस्तकें मेरे पास पर्याप्त हैं।) हिन्दी हो,या संस्कृत।
      (५)आप की टिप्पणी ठीक पढने के लिए, कुछ समय लूंगा।
      (६) अगली बार अमरिका पधारे, तो, भेंट करना चाहूंगा।
      आदरसहित नमन
      मधुसूदन

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  9. सत्यार्थी

    main Prof madhusudan ji ke vicharon se poornataya sahmat hoon. kisi bhi vishay men naye shabdon ke gathan ke liye sanskrit ka adhar lena hee sarvottam upay hai.Naveen shabdon ki arth prakat karne ki kshamta jaisee sanskrit mool ke shabdon men hoti hai vaisi kahin aur nahin ho sakti.is sambandh men main japan ha udaharan de sakta hoon. japaniyon ne apni bhasha ke shbdon ka pryog kar anek takniki tatha vaigyanik shabdon ka gathan kiya jo ab sarv prachlit hain..

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