वेद व्यास से कहना है


—विनय कुमार विनायक
हे वेद व्यासदेव कृष्णद्वैपायन!
आप वेदवेत्ता!
अठारह पुराणों के ज्ञाता,
महाभारत महाकाव्य के रचयिता!

आपके परपितामह ब्रह्मर्षि वशिष्ठ
वैदिक श्रुति-सुक्त के मंत्रवेत्ता!
पितामह शक्ति/पिता पराशर
और स्वयं आप जन्मत: क्या थे?

‘गणिका-गर्भ संभूतो, वशिष्ठश्च महामुनि:।
तपसा ब्राह्मण: जातो संस्कारस्तत्र कारणम्।।
जातो व्यासस्तु कैवर्त्या: श्वपाक्यास्तु पराशर:।
वहवोअन्येअपि विप्रत्यं प्राप्ताये पूर्वमद्विजा।।‘

आपने हीं तो महाभारत में कहा था-
गणिका के गर्भ से उत्पन्न महामुनि
वशिष्ठ तप से ब्राह्मण हो गए,
स्वयं आप व्यासदेव मल्लाही से और
श्वपाकी चाण्डाली से पिता पराशर हुए!

और दूसरे भी जो पूर्व में अद्विज थे,
किन्तु संस्कार से विप्र ब्राह्मण हो गए!

फिर क्यों प्रोन्नति के महापट को वेद-भेद के ताले
और स्मृति-विस्मृति के कीलों से झटपट बंद किए?

उन सर्वहारा जन के लिए जहां से आप उठ आए थे!
वाणी और सत्ता पर छाए थे,ब्राह्मणत्व को पाए थे!

आपने जब देखा सत्तासीन स्वजननी सत्यवती
मत्स्यगंधा को वंशहीनता के कगार पर हूक उठी
दिल में तोड़ दिया धर्म बंधन नियोग के बहाने!

अनुज विधवाओं को भोगकर
धृतराष्ट्र-पाण्डु सा संतति सृजनकर
घोषित किया अभिजात कुलीन क्षत्रिय!

उद्देश्य क्या था?
पुश्त-दर-पुश्त राज सत्ता को पाना!

किन्तु जहां स्वार्थ का लेश नहीं था
उत्तराधिकार का तनिक क्लेश नहीं था
वहां धर्मधुरीन आत्मज विदुर को
नियतिवश छोड़ा शूद्रत्व पर आंसू बहाने!

जब जीवन के चौथेपन में ब्राह्मणी परम्परा से
प्राप्त स्वज्ञानगंगा को विरासत में देने की सोची
आपने शुकी अनार्य बाला से ब्याहकर/जनकर
शुकदेव मुनि को उतराधिकार दिया ब्राह्मणत्व का!

उद्देश्य क्या था?
ऋषि परंपरा के पितृगण को लुप्त पिण्डक
होने से बचाना या अति ख्यात
वेद विस्तारक छवि को जातिवाद में ढालना!

किन्तु क्या यह नई बात थी?
नहीं-नहीं एक परम्परा पूर्व से चली आ रही थी
ब्राह्मणत्व को जाति में ढालने की
क्षत्रियत्व को आस्तीन में पालने की!

जिसने प्रथमतः ब्राह्मण भृगु बनकर
ब्राह्मणत्व अहं के महादंभ का बीज वपन
किया सृष्टि पालक विष्णु की छाती पर
मूंग दलकर/भृगुलता उगाकर!

मनु के बहाने मनुस्मृति लिखकर कैद किया
ब्राह्मणत्व को वर्ण-जाति विरासत की झोली में!

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ बनकर
क्षत्रिय से ब्राह्मण बने राजर्षि विश्वामित्र के
ब्राह्मणत्व को दुत्कारा
शूद्र शम्बूक के ब्राह्मणत्व को नकारा!

उसी परम्परा ने परशुराम बनकर
ब्राह्मणवाद विरोधी क्षत्रियों को ललकारा!

हैहय यदुवंशी क्षत्रिय सहस्त्रार्जुन के
सहस्त्र भुजदंडों को मरोड़ कर बनाया शौण्डिकेरा;
कलचुरी राजपूत से वर्णाधम वणिक; कलसुरी-कलवारा
वृष्णि-वार्ष्णेय,माधव-मधुवंशी, शौरि,सुरी, सुरसेनी
ब्रह्मास्त्र जिज्ञासु सूरि कर्ण को सूतपुत्र कहकर फटकारा!

हे वेदवेत्ता!
आपके सम्मुख वही परंपरा गुरु द्रोण बनकर उभरा
जिसे नहीं कर्ण/नहीं एकलव्य सिर्फ राजभवन था प्यारा!

जिसने वनवासी का अंगूठा कटाकर ब्राह्मणत्व को मारा
बोटी-बोटी कर ब्रह्मणत्व का किया जाति में बंटवारा!
—विनय कुमार विनायक

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