ऋषि दयानन्द के कारण हम सृष्टि के आदिकालीन ज्ञान वेद व अपने सभी पूर्वजों द्वारा सृष्ट व अधीत व ग्रन्थों के अध्येता हैं

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

                महाभारत काल के बाद वेदों का अध्ययन-अध्यापन बाधित हो गया था। कालान्तर में वेद लगभग लुप्त से हो गये थे। वेदों की महत्ता भी लोग भूल चुके थे। वेद के अप्रचलन से वेदों में निहित ईश्वर व जीवात्मा विषयक ज्ञान से भी लोग अनभिज्ञ थे। ईश्वर व आत्मा के नाम पर मिथ्याचार व सत्यासत्य युक्त मान्तयताओं का प्रचलन समाज में हो रहा था। वेदों में यज्ञ का विधान है। सृष्टि के आरम्भ काल से ही महाभारत काल तक आर्यावर्त्त वा विश्व में वैदिक मान्यतानुसार पूर्ण अहिंसक यज्ञ किये जाते थे जिससे देश का वातावरण शुद्ध व प्रदुषण से मुक्त रहता था। वेदों के अध्ययन-अध्यापन के अप्रचलित होने से यज्ञों में अवैदिक मान्यताओं व क्रियाओं का प्रचलन आरम्भ हो गया। कालान्तर में धार्मिक कर्मकाण्डों वा यज्ञ में वेदविरुद्ध क्रियायें बढ़ती गयीं और यज्ञों में पशुओं के मांस से आहुतियों तक दी जाने लगी। महात्मा बुद्ध जी ने यज्ञों की इस हिंसा का विरोध किया और ऐसा माना जाता है कि उनके शिष्यों द्वारा प्रवर्तित बौद्ध मत की स्थापना का कारण मुख्यतः यज्ञों में की जाने वाली हिंसा का विरोध रहा। महात्मा बुद्ध ने जिस अहिंसा का प्रचार किया वह लोगों के व्यक्तिगत जीवन में अवश्य होनी चाहिये परन्तु जहां तक देश व सज्जनों पुरुषों की रक्षा व दुष्टों से देश व समाज को बचाने का प्रश्न है, वहां उसके प्रतिकार न करने वा अहिंस व्यवहार का समर्थन नहीं किया जा सकता। भारत ने आजादी के बाद से ही देश की सीमाओं पर अनेक अतिक्रमणों को देखा व झेला है। इसका अपनी सामर्थ्यानुसार यथायोग्य उत्तर भी दिया है और अब तो भारत विश्व की एक महाशक्ति बन चुका है व बनने वाला है, अतः दुष्टों से देश की रक्षा के क्षेत्र में अहिंसा का प्रयोग कुछ सीमित ही अर्थों में करना सम्भव होता है। भारत ने पुलवामा व उड़ी की आतंकवादी घटनाओं का भी प्रतिकार सर्जिकल स्टाइक एवं एयर स्टाइक करके कर दिया है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि सज्जनों के प्रति अहिंसा एवं दुष्टों के प्रति हिंसा अत्यावश्यक है। एक सिद्धान्त यह भी है हिंसा को हिंसा से ही रोका जा सकता है। इसके कुछ सटीक उदाहरण भी दिये जा सकते हैं। इस पर आर्यकवि सारस्वत मोहन मनीषी जी की एक महत्वपूर्ण कविता है जिसमें कहा गया है कि ‘दुष्ट यदि नहीं माने तो हिंसा बहुत जरुरी है।’

                सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न स्त्री पुरुषों में से चार पवित्रात्मा वाले ऋषियों को एक-एक वेद का ज्ञान दिया था। वेद चार हैं जिन्हें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के नाम से जाना जाता है। महाभारत युद्ध के बाद यह विलुप्त होना आरम्भ हो गये थे और बौद्ध काल से पूर्व इनका अस्तित्व होते हुए भी इनका अध्ययन-अध्यापन न होने से यह ज्ञान अव्यवहारिक सा हो गया था। इसके बाद से महर्षि दयानन्द के समय तक देश में वेदों का ऐसा एक भी विद्वान नहीं रहा जो वेदों के सत्य अर्थों को जानता हो व उसका प्रवचन तथा लेखन आदि के द्वारा प्रचार करता हो। ऋषि दयानन्द जी ने मथुरा में विरजानन्द जी के सान्निध्य से आर्ष व्याकरण का ज्ञान प्राप्त किया था। उनका ब्रह्मचर्य व्रत से युक्त जीवन एवं योग में सफलता भी वेदों के सत्य रहस्य व अर्थों को जानने में सहायक बने। उन्होंने अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी की प्रेरणा से आर्ष ग्रन्थों का प्रचार कर अविद्या को दूर करने का प्रयत्न किया। उनके इस कार्य से वेद सहित दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति एवं अन्यान्य संस्कृत ग्रन्थों के सत्यार्थ हमें व देशवासियों को उपलब्ध हुए। इन ग्रन्थों की एक विशेष बात यह सामने आयी कि इन आर्ष ग्रन्थों में मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष एवं हिन्दू समाज में प्रचलित अन्धविश्वास, पाखण्डों सहित कुरीतियों का कहीं उल्लेख नहीं पाया जाता और न ही वर्तमान में प्रचलित 18 पुराणों का कहीं किसी आर्ष ग्रन्थ में उल्लेख ही मिलता है। इससे वर्तमान में प्रचलित 18 पुराण, वेद के समान प्राचीन व पुराने न होकर, विगत 500 से लेकर 2000 वर्षों में उत्पन्न माने जा सकते हैं। पुराणों में एक बात यह भी दृष्टिगोचर होती है कि इन पुराणों की रचना के समय महाभारत व बाल्मीकी रामायण का कुछ प्रचार था। बाल्मीकि रामायण त्रेता युग की रचना है। द्वापर के अन्त में महाभारतकार ऋषि वेदव्यास जी हुए थे। उनके बाद कोई प्रसिद्ध ऋषि नहीं हुआ। अतः पुराणकारो ने अपने अपने अन्यान्य पुराणों पर अपने नाम न देकर सब को वेद व्यास जी के नाम से प्रसिद्ध किया। इसका प्रमाण महर्षि दयानन्द के वचन है। वह इन पुस्तकों व ग्रन्थों को पुराण न मान कर नवीन ग्रन्थ मानते हैं एवं वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों को पुराणों का स्थान देते हैं। महर्षि दयानन्द जी द्वारा इन पुराणों की परीक्षा की गई थी। उन्हें उनमें वेद विरुद्ध मान्यताओं सहित अश्लील वर्णन एवं बुद्धि विरुद्ध बातों का संग्रह व उल्लेख मिला था। उन्होंने इन्हें विषसम्पृक्त अन्न के समान त्याज्य बताया है। उनके बाद आर्य विद्वानों मुख्यतः पं0 मनसाराम जी वैदिकतोप ने भी पौराणिक पोल प्रकाश और पौराणिक पोप पर वैदिक तोप ग्रन्थ लिखकर इन ग्रन्थों की अप्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। इससे यह ज्ञात हुआ कि 18 पुराण ग्रन्थ वैदिक मान्यताओं के विरुद्ध होने से वैदिक साहित्य का अंग नहीं हैं। इन्हीं से वेदों के प्रचार प्रसार की हानि हुई और देश में अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियां फैलीं। देश का पतन हुआ और वह गुलाम हुआ जिससे वैदिक धर्म व आर्य संस्कृति सहित मानवता को भारी हानि हुई।

                महर्षि दयानन्द के हम कृतज्ञ हैं जिन्होंने हमें सृष्टि के आदिकालीन  ज्ञान वेद व हमारे पूर्वज ऋषियों आदि द्वारा सृष्ट व अधीत ग्रन्थों का हमसे हिन्दी में अर्थ सहित परिचय कराया और उन्हीं की कृपा व प्रेरणा से हम उन्हें प्राप्त कर उनका अध्ययन करने में समर्थ हो सकें हैं। यदि ऋषि दयानन्द न आते तो कुछ काल बाद वेद एवं अन्य दर्शन एवं उपनिषद आदि ग्रन्थ विलुप्त हो सकते थे। ऋषि के समय व उनसे पूर्व, गुरु विरजानन्द सरस्वती जी से इतर, कोई विद्वान आर्ष व अनार्ष ज्ञान के भेद को नहीं जानता था। यदि ऋषि न होते तो उपनिषद एवं दर्शन आदि ग्रन्थों के हिन्दी भाषा में सत्यार्थ भी हमें प्राप्त न होते। हमें ऋषि दयानन्द जी द्वारा आर्ष व अनार्ष ज्ञान का भेद ही ज्ञात नहीं हुआ अपितु यह भी ज्ञात हुआ है कि आर्ष ज्ञान ही उपयोगी एवं अध्ययन योग्य है तथा अनार्ष ज्ञान त्याज्य एवं अनुपयोगी होने सहित हानिकारक भी है। यही कारण है कि हम ऋषि दयानंद और उनके अनुयायी विद्वानों के मार्गदर्शन से असत्य का त्याग कर सत्य का ग्रहण करने में प्रवृत्त हुए और वर्तमान में हम मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध एवं फलित ज्योतिष आदि विषयक बातों को अनार्ष व अवैदिक होने के कारण उनसे दूर हैं।

                सृष्टि के आरम्भ से वर्तमान समय तक के हमारे पूर्वज वेदों व ऋषियों द्वारा सृजित वैदिक साहित्य से जुड़े रहे हैं। उन्होंने वेद व वैदिक साहित्य की शिक्षाओं का अध्ययन व आचरण किया था। उसी परम्परा का पालन करते हुए हम उन्हें बढ़ा रहे हैं। इस बात को जानकर हमें सन्तोष होता है। वैदिक साहित्य विश्व के धार्मिक एवं सामाजिक साहित्य में सर्वश्रेष्ठ है। इसका कारण वैदिक विद्वान किसी भी मत-मतान्तर के विद्वान से चर्चा व शास्त्रार्थ करने के लिये उत्सुक रहते रहे हैं जबकि अन्य मतों के आचार्य हमारे आर्य विद्वानों से चर्चा व शास्त्रार्थ करने से दूर रहते हैं। इसी से सत्यासत्य मतों व अविद्यायुक्त सिद्धान्तों का ज्ञान हो जाता है। सत्यार्थप्रकाश ऐसा ग्रन्थ है जिसे पढ़कर वेद व वैदिक सिद्धान्तों का ज्ञान पाठक व अध्येता को हो जाता है। वह अन्य मतों की सत्यासत्य मान्यताओं से भी परिचित हो जाता है। वैदिक धर्मी मनुष्य अन्त्येष्टि संस्कार के महत्व को जानता है। अन्य अनेक मत व सम्प्रदाय इसके महत्व को नहीं जानते। वैदिक मतानुयायी पुनर्जन्म की सत्यता को भी जानता व समझता है परन्तु अन्य मत के आचार्य तो शायद समझते होंगे परन्तु वह इसे स्वीकार करने में आगे नहीं आते। ईश्वर की उपासना व पूजा करनी हो तो वह स्तुति व प्रार्थना सम्बन्धी वेद मन्त्रों व उनके अर्थों को पढ़कर व उनका चिन्तन करके जितनी अच्छी हो सकती है, उतनी किसी अन्य प्रकार से नहीं होती है। हमारे विद्वानों ने चुने हुए वेद मन्त्रों के स्तुति, प्रार्थना व उपासनापरक सारगर्भित एवं भावपूर्ण अर्थ किये हैं। आर्याभिविनय, वेदमंजरी, श्रुति सौरभ, वैदिक विनय आदि ग्रन्थों को पढ़कर भी ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना जितनी अच्छी होती है उतनी किसी एक ही प्रार्थना को जीवन भर पढ़ने व बोलने से शायद नहीं होती होगी। इन सब कार्यों के लिये देश व समाज ऋषि दयानन्द व उनके अनुयायी विद्वानों का आभारी है। इसके लिये हम स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं।

                संसार में अनेक मतों के लोग रहते हैं। किसी मत की भी परम्परायें वैदिक मत की 1.96 अरब वर्ष जितनी पुरानी नहीं है। उनके पास जो मत की पुस्तक एवं अन्य साहित्य है, वह दो से तीन हजार वर्षों से अधिक पुराना नहीं है। इस काल में उपलब्ध ज्ञान उन्नत व समृद्ध नहीं था। इस कारण मत-मतान्तरों में अविद्या की अनेक बातें हैं जिन्हें वह मानते हैं। इस दृष्टि से हम वैदिक सनातनी आर्य अत्यन्त भाग्यशाली है कि हमारे पास 1.96 अरब वर्ष पुराने वेदों का ईश्वरीय ज्ञान है जिस पर वेदों के महान ऋषि दयानन्द जी का सत्यार्थ व संस्कृत व हिन्दी भाष्य है। हम प्रायः वेदों को व इतर प्राचीन वैदिक साहित्य को पढ़ते रहते हैं। हम उस साहित्य पर सत्यासत्य की दृष्टि से बुद्धिपूर्वक विचार भी करते हैं। यही कारण है कि वैदिक धर्म का प्रायः सभी साहित्य अकाट्य तर्कों से युक्त है। विरोधियों को भी हम चर्चा व शास्त्रार्थ की चुनौती देते हैं जबकि कोई अपने मत की समीक्षा व शास्त्रार्थ की आर्यसमाज की चुनौती को स्वीकार नहीं करता। इसका श्रेय ईश्वर सहित ऋषि दयानन्द और अब तक के सभी वैदिक व आर्य विद्वानों को है। हम इसके लिये ईश्वर का धन्यवाद करते हैं और अपने सभी दिवंगत ऋषियों, पूर्वजों व विद्वानों को भी सादर स्मरण कर उन्हें कृतज्ञतापूर्वक नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

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