वेदों का पुनरुद्धार ऋषि दयानन्द की विश्व को अनोखी महत्वपूर्ण देन


-मनमोहन कुमार आर्य

               ऋषि दयानन्द के नाम से विश्व का समस्त धार्मिक एवं सामाजिक जगत परिचित है। ऋषि दयानन्द ने सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान जो महाभारत के बाद विलुप्त हो गया था, उसका पुनरुद्वार किया है। पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत के बाद के इतिहास पर दृष्टि डालें तो विदित होता है कि ऋषि दयानन्द ने वेदों के रहस्यों व तथ्यों का जो अनावरण किया है, वह महाभारत के बाद और उनसे पूर्व अन्य किसी महापुरुष, आचार्य वा विद्वान ने नहीं किया। वस्तु स्थिति यह है कि वेद ज्ञान से ही मनुष्य को ईश्वर के अस्तित्व एवं सृष्टि की उत्पत्ति सहित इसके पालनकर्ता प्रलयकर्ता, जीवात्मा के स्वरूप एवं इसके जन्म, मरण, बन्धन मोक्ष, पुनर्जन्म, अन्य योनियों में विचरण आदि अनेक बातों का सत्य सत्य ज्ञान होता है। वेदों का अध्ययन व अध्यापन न होने से वेद विलुप्त हुए थे। वेदों के विलुप्त होने का दुष्परिणाम यह हुआ कि संसार में अवैदिक अविद्या प्रधान मतों का प्रचलन हुआ जिससे मनुष्यों के सुखों का ह्रास तथा दुःखों की वृद्धि हुई। परमात्मा एक है और सभी जीव अनादि व अनन्त होने के साथ ईश्वर की सन्तानें हैं, यह ज्ञान व सन्देश मत-मतान्तरों व उनकी आंखों से ओझल हो गया। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना व विचार भी वेदों व ऋषियों की देन है। मध्यकाल में देश व विदेश में अनेक आचार्यों ने अपनी मान्यताओं को ईश्वर की मान्यतायें व सन्देश बताकर उनका प्रचार व प्रचलन किया। संसार में प्रचलित किसी मत में सत्यासत्य का निर्णय विचार करने का विधान व्यवस्था नहीं है। आज से सहस्रों वर्ष पूर्व जो मान्यतायें प्रचलित की गईं, उन्हीं को यथावत् माना जाता है जबकि संसार में सभी विषयों क्षेत्रों में ज्ञान की दृष्टि से अभूतपूर्व वृद्धि उन्नति हुई है। ऋषि दयानन्द जी ने धर्म व मत-मतान्तरों में ज्ञान, बुद्धि, तर्क, विचार, चिन्तन व सत्यासत्य के निर्धारण का सूत्रपात किया। उन्होंने अपनी व दूसरे मतों की सभी मान्यताओं की सत्य को निर्धारित करने के मापदण्डों के आधार पर विवेचना व समीक्षा की थी। इससे यह लाभ हुआ कि शुद्ध सत्य व इसके अनुकूल मान्यताओं का जगत में प्रकाश व प्रचार हुआ। उनके समय में प्रायः सभी मतों में ईश्वर के सत्यस्वरूप के विषय में आचार्यमण एक मत नहीं थे। महर्षि दयानन्द ने वेद और वेदानुकूल ग्रन्थों के आधार पर ईश्वर के सत्यस्वरूप, गुण, कर्म व स्वभाव का तर्क एवं युक्तिसंगत ज्ञान व सिद्धान्त हमें प्रदान किया। आज तक संसार के किसी मत का आचार्य वेदों के आधार पर निर्धारित ईश्वर, जीव व सृष्टि विषयक मान्यताओं में किसी त्रुटि व न्यूनता को प्रस्तुत नहीं कर पाया है। इस आधार पर यह भी सिद्ध हुआ कि महर्षि दयानन्द द्वारा प्रचारित मान्यतायें सत्य एवं इसके विपरीत व्यवहृत व प्रतिकूल मत-मतान्तरों की मान्यतायें सत्य नहीं है।

               वेद विषयक ऋषि दयानन्द के योगदान पर जब विचार करते हैं तो अनेक तथ्य हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं। ऋषि दयानन्द के समय काशी विद्या की नगरी थी। देश के सनातन धर्म के शीर्ष विद्वान व पण्डित काशी में बड़ी संख्या में रहते थे। उनकी मान्यता थी कि वेदों को भस्मासुर पाताल लोक में ले गया है। वेद भारत में उपलब्ध नहीं हैं। इन पण्डितों को यह भी पता नहीं था कि अमेरिका को पाताल कहते हैं और वहां मनुष्य आ व जा सकते हैं। ऋषि दयानन्द ने सन् 1863 में मथुरा में स्वामी विरजानन्द सरस्वती से अध्ययन पूरा कर वेदों को प्राप्त किया था। उन्हें चार वेद किस व्यक्ति व स्थान से प्राप्त हुए थे इसका उल्लेख उनके जीवन साहित्य में नहीं मिलता परन्तु इसके बाद हरिद्वार में जो कुम्भ का मेला हुआ, उसमें उनके पास चारों वेद उपलब्ध थे जिनका उल्लेख पं0 लेखराम लिखित ऋषि दयानन्द के अनुसंधानपूर्ण वृहद जीवन चरित में मिलता है। इन चारों वेदों की हरिद्वार में ऋषि दयानन्द के पास उपस्थिति और उसका देहरादून के दादूपन्थी मत के अनुयायी आचार्य स्वामी महानन्द जी द्वारा दर्शन करना और उस पर स्वामी दयानन्द जी से वार्तालाप करने का उल्लेख जीवन चरित में उपलब्ध होता है। अनुमान है कि महर्षि दयानन्द को यह चार वेद राजस्थान के भरतपुर वा करौली स्थानों में से कहीं से प्राप्त हुए होंगे। इसका आधार यह है कि महर्षि दयानन्द मथुरा में अध्ययन करने के बाद और हरिद्वार के कुम्भ में पहुंचने से पूर्व इन दो प्रमुख स्थानों पर पर्याप्त अवधि तक रहे थे। यद्यपि इस बीच वह ग्वालियर और जयपुर भी गये थे परन्तु ग्वालियर तथा जयपुर स्थानों पर उनका प्रवास अत्यल्पकाल का था।

               महर्षि दयानन्द ने जो कहा उसे प्रमाणों व तर्क आदि के द्वारा सत्य सिद्ध भी किया है। अनेक प्रमाणों से उन्होंने बताया कि वेदों का आविर्भाव सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सच्चिदानन्द एवं सृष्टिकर्ता से हुआ है। ईश्वर चेतनस्वरूप, अनादि, नित्य, अविनाशी, अमर व अनन्त होने से ज्ञानस्वरूप व सर्वज्ञ सत्ता है। जिस प्रकार हम चेतन जीवात्मा हैं और हमें स्वाभाविक व नैमित्तिक ज्ञान है, इसी प्रकार से ईश्वर का समस्त ज्ञान स्वाभाविक है। ईश्वर का ज्ञान नित्य ज्ञान कहा जाता है। वह न्यून व अधिक नहीं होता। सदा सर्वदा एक समान रहता है। ईश्वर का ज्ञान उसे अनादिकाल से है और हमेशा रहेगा। उसी ज्ञान को मनुष्यों के लिये आवश्यकतानुसार वह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के द्वारा सृष्टि के आरम्भ में वेदसंवत्सर के प्रचलन के समय चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को प्रदान करता है। शतपथ ब्राह्मण अत्यन्त प्राचीन वा सृष्टि के आरम्भ में ऋषियों द्वारा रचित ग्रन्थ है जिसमें इस तथ्य का उल्लेख मिलता है। वेदों का ज्ञान सृष्टिक्रम के सर्वथानुकूल है। इसकी सभी बातें तर्क संगत एवं मनुष्य जीवन की उन्नति में साधक हैं। इसमें किसी धर्म वा मत विशेष अथवा सम्प्रदाय आदि का उल्लेख नहीं है अपितु वेदों के आधार पर धर्म का अर्थ उन गुणों व सदाचारों से है जिन्हें मनुष्य को धारण करने चाहिये।

               वेदों में मनुष्य को मनुष्य बनने को कहा गया है। मनुष्य और पशु में एक अन्तर यही है कि पशु ज्ञान प्राप्त कर उसके अनुसार आचरण नहीं कर सकते जबकि मनुष्य के पास बुद्धि होने के कारण वह आचार्यों से वेदों का अध्ययन कर ज्ञानी हो सकते हैं और वेदों के ज्ञान के अनुरूप आचरण कर सकते हैं। महाभारत काल तक देश में ऋषियों की परम्परा रही है। महर्षि दयानन्द उसी परम्परा के अन्तिम ऋषि कहे जा सकते हैं। इन सब ऋषियों का जीवन सर्वथा वेदानुकूल था। एसे व्यक्ति व्याक्तियों के जीवन को ही धार्मिक व्यक्ति धार्मिक जीवन कहा जाता है। मांसाहारी व हिंसा का व्यवहार करने वाला मनुष्य कदापि धार्मिक नहीं हो सकता। यह शिक्षा वेदों का अध्ययन करने से मिलती है। वेदों का ज्ञान  ईश्वर के द्वारा चार ऋषियों की आत्माओं में स्थापित होने के बाद वह इस ज्ञान को ब्रह्माजी को देते हैं। इसके बाद ब्रह्मा जी से लोगों को वेदों का अध्ययन-अध्यापन कराने की परम्परा का सूत्रपात होता है। आरम्भ में वेदों का अध्ययन व अध्यापन श्रुति परम्परा अर्थात् बोल व सुनकर होता था। इस कारण वेदों का नाम श्रुति भी पड़ा है। वेदों में ज्ञान, कर्म व उपासना यह तीन विद्यायें मुख्य होने से वेदों को त्रिविद्याओं के ग्रन्थ भी कहा जाता है। ऋग्वेद ज्ञान प्रधान, यजुर्वेद कर्म प्रधान, सामवेद उपासना प्रधान तथा अथर्ववेद में विज्ञान की प्रधानता है। ऋषि दयानन्द ने वेदों के यथार्थ आशय को बताने के लिये चारों वेदों के संस्कृत व हिन्दी भाष्य का आरम्भ भी किया था। कार्य बहुत बड़ा था और यदि उनका जीवन काल सात आठ वर्ष और होता तो वेदों का सम्पूर्ण भाष्य पूर्ण होकर उपलब्ध हो सकता था। 30 अक्टूबर सन् 1883 को ऋषि दयानन्द का उनके विरोधी षड्यन्त्रकारियों ने विष देकर वध कर डाला। ऋषि दयानन्द इस समय तक यजुर्वेद का सम्पूर्ण भाष्य संस्कृत व हिन्दी में कर चुके थे। ऋग्वेद का भाष्य चल रहा था। 10 मण्डलों वाले ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भाष्य पूर्णता की ओर था। मन्त्रों की संख्या की दृष्टि से ऋषि दयानन्द लगभग आधे भाग का भाष्य कर चुके थे। मृत्यु के कारण कार्य रूक गया। इसके बाद ऋषि दयानन्द के अनुयायियों ने उनके अवशिष्ट कार्य को पूरा किया। अनेक विद्वानों ने वेदों के भाष्य किये। अंग्रेजी में भी वेदों का अनुवाद व टीका उपलब्ध है। अन्य कुछ भाषाओं में भी ऋषि के अनुयायियों ने अनुवाद का कार्य किया है। ऋषि दयानन्द के ही अनेक अनुयायियों ने वेदों पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं। अधिकांश हिन्दी भाषा में होने के कारण साधारण हिन्दी का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी वेदों के रहस्यों से पूर्ण परिचित व विज्ञ हो सकता है।

               ऋषि दयानन्द ने अपने गहन व गम्भीर वैदुष्य से वेदों को सब सत्य विद्याओं का पुस्तक घोषित किया है। उन्होंने संसार के सभी मनुष्यों को वेदों का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना परम धर्म बताया है। वेदों का अध्ययन करने से ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति का यथार्थ ज्ञान होता है। जीवात्मा के स्वरूप पर भी विस्तार से प्रकाश पड़ता है और उसके गुण, कर्म, स्वभाव सहित उसका उद्देश्य, लक्ष्य, उपासना की विधि, उपासना से लाभ, पापों वा बुरे कर्मों से नीच योनियों में गमन, पापों से दुःखों की प्राप्ति और सद्कर्मो से सुख व उन्नति, ईश्वरोपासना, योग-समाधि, यज्ञ, माता-पिता व वृद्धों की सेवा से बन्धनों का टूटना व मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है। वेदों सहित ऋषियों द्वारा रचित दर्शन एवं उपनिषद साहित्य भी मनुष्यों के लिये अति उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है। वेदों का अध्ययन कर लेने पर मत-मतान्तरों के ग्रन्थों से कुछ अभिप्राय नहीं रह जाता। मनुष्य का चरम लक्ष्य मोक्ष वेदाध्ययन व वेदानुसार आचरण से प्राप्त हो जाता है। हम सभी पाठकों को वेदाध्ययन का परामर्श देंगे जिससे उनका यह जन्म व परजन्म सुधरेगा। यह भी निवेदन कर दें कि वेदाध्ययन की तरह सत्यार्थप्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आ अध्ययन भी मनुष्यों के लिए अति उपयोगी है। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

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