लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनमोहन कुमार आर्य

भारतमाता के वीरसपूत अमर व अजेय वीर सावरकर का नाम लेकर भारतीय आर्य हिन्दू गौरव का अनुभव करते हैं। देश की आजादी के लिए उन्होंने जो कार्य व बलिदान किया है, वह स्वर्णाक्षरों में अंकित है। सावरकर जी स्वतन्त्रता के अग्रणीय योद्धा व समाज सुधारक सहित एक सफल लेखक व इतिहासकार भी थे। उन्होंने सन् 1857 की प्रथम आजादी की लड़ाई वा क्रान्ति पर जो ग्रन्थ ‘प्रथम स्वातन्त्र्य का इतिहास’ लिखा है, वह उन्हें एक सफल इतिहासज्ञ सिद्ध करता है। प्रत्येक भारतीय को उनका वह ग्रन्थ तो अवश्य ही पढ़ना चाहिये। पाठक इसे पढ़कर तत्कालीन परिस्थितियों से अवगत होने के साथ अनेक ऐतिहासिक तथ्यों से भी परिचित हो सकते हैं। ऐसा इतिहास अन्यत्र दुर्लभ है। यह भी बता दें कि प्रकाशन से पूर्व ही इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। इतिहास में शायद ही ऐसी कोई घटना होगी कि पुस्तक का प्रकाशन हुआ ही नहीं और वह प्रतिबन्धित कर दी गई। यह भी बता दें कि सावरकर जी का आजदी की लड़ाई में भूमिका के लिए उन्हें दो जन्मों का कारावास दिया गया था। वह कालापानी अर्थात् केन्द्रीय सेलुलर जेल, पोर्टब्लेयर में रहे और वहां उन्हें एक मानव कोल्हू में पशु की भांति जोतकर तेल निकलवाया जाता था। हमने पोर्टब्लेयर जाकर इन सभी दृश्यों का साक्षात्कार किया है। उस कमरे में भी गये जहां वह वर्षों तक रहे। हम उनके बलिदान व देशभक्ति को नमन करते हैं। सावरकर जी ने एक नाटक लिखा है जिसका नाम है ‘प्रतिशोध’। पानीपत की प्रथम लड़ाई में मराठों की पराजय के प्रतिशोध की कथा है इस नाटक की पृष्ठ भूमि है। इसमें अनेक ऐतिहासिक तथ्यों को भी प्रस्तुत किया गया है जिससे आज की युवापीढ़ी व विद्वान अपरिचित हैं। पानीपत की युद्धभूमि में मराठों की विजय के अवसर से पूर्व का एक ऐसा ही प्रकरण हम प्रतिशोध ग्रन्थ से प्रस्तुत कर रहे हैं। पुस्तक का प्राक्कथन श्री विक्रमसिंह, एम.ए. ने लिखा है। पूरा प्राक्कथन पढ़ने योग्य है परन्तु हम उनके कुछ महत्वपूर्ण शब्द यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं ‘‘प्रतिशोध” का मूल कथानक मरहटों की उत्तरविजय पर आधारित है, परन्तु उसके साथ ही विदेश से वापस आये वीरवर यशवन्तराव के माध्यम से लेखक ने सिन्धुबन्दी एवं रोटीबन्दी जैसी भ्रामक कल्पनाओं को निर्मूल सिद्ध किया है, साथ ही सादुल्लाखान द्वारा बलपूर्वक अपहृत प्रथम पत्नी सुनीति का सम्मान स्वीकार करने का आदर्श प्रस्तुत कर, शुद्धि आन्दोलन का महत्व भी प्रतिपादित किया है। वैसे ही कोंडण्णा और घोंडण्णा (फलित ज्योतिषियों) के रूप में समाज में होने वाले स्वार्थी, भीरू तथा नीच तत्वों को चित्रित कर, उनके पापों का कठोर प्रायश्चित्त भी दर्शाया है।’

अंग्रेज वकील मराठा सरदार यशवंतराव जी को कहते हैं ‘हाः हाः हाः। यशवंटराव! वह मरहटों की तलवार मुसलमानों को बटाव (बताओ)। उनसे वे डरेंगे। पर हम ब्रिटिश-हम उश्शे डरता नाय, टुम हिन्डु-टुमारे आपस में फूट। टुम सब के गुलाम मुस्लिमों के भी स्लेव? पर ब्रिटेन कभी भी किशी का स्लेव हुआ नाय-आज भी नाय।’

इसका उत्तर मराठा सरदार यशवंतराव जी ने जो दिया उसमें अनेक ऐतिहासिक तथ्यों का उद्घाटन हुआ है। वह मुसलमान बादशाह के समाने अंग्रेज वकील को कहते हैं–ब्रिटेन आज किसी का गुलाम नहीं है तो महाराष्ट्र भी तो किसी का गुलाम नहीं है। पर ब्रिटेन कभी भी किसी का गुलाम हुआ नहीं, यह घमण्ड कम से कम मेरे सम्मुख तो ना करो। रोमन लोगों ने ब्रिटेन को अपना गुलाम बनाया था कि नहीं? वह रोमन सेना, जब ब्रिटेन छोड़कर जाने लगी, तब स्कौच लोगों के डर के कारण ‘ना जाओ, हमें छोड़कर ना जाओ, नहीं तो We shall find ourselves between the devil and deep see.’ कह कर रोमन लोगों के पांव किस डरपोक गुलाम ने पकड़े थे? ब्रिटेन ने ही ना। सेक्सन्स ने किसे जीता? ब्रिटेन को। डचों ने किसे गुलाम बनाया। ब्रिटेन को। नार्मनों ने किस पर चढ़ाई की? ब्रिटेन पर। नार्मन लोग जिसे बुरी से बुरी गाली देना चाहते थे, उसे ‘यग्लिशमन’ अर्थात् गुलाम कहते थे–वे दिन अंग्रेज लोगों को भी भूलना नहीं चाहिए। साहब मैं आपका देश देख आया हूं। (यशवंतराव जी इंग्लैण्ड सहित अनेक यूरोप के देशों का भ्रमण कर आये थे। ब्राह्मणों ने समुद्र पार जाने और वहां के लोगों के हाथ का भोजन करने के कारण उन्हें हिन्दू धर्म से पतित करने का षडयन्त्र किया परन्तु वह सफल नहीं हुए। यशवन्तराव सच्चे देश भक्त थे। (वीर सावरकर जी ने पण्डितों को उनसे जो संवाद कहलवायें हैं वह तर्क व युक्तियां वहीं हैं जो ऋषि दयानन्द व आर्यसमाज की होती हैं। -लेखक)। यशवन्तराव जी अंग्रेज वकील को आगे कहते हैं कि आप के घर की स्थिति मैं अच्छी तरह से जानता हूं। आज हमारे विशाल हिन्दुस्तान के हिन्दू लोग जातीयता, प्रान्तीयता के कारण असंगठित हुए हैं, पर तुम्हारे उस जरा से इंग्लैंड़ के भी टुकड़े जिन सात राज्यों में हुए थे, उस Heptarchy–का स्मरण करो। और यह भी ध्यान में रखो कि, ऐसी असंगठित हुई हिन्दुस्तान की यह दुर्बलता भी कम से कम आज तो राज्यशक्ति में तुम से सबल है। जिसे इतनी खाज हो वह हिन्दुपति मरहटे के रास्ते में आ के देखे।

इसके उत्तर में अंग्रेज वकील ने कहा कि वेल यशवंटराव, मरहटों की बाजू हिन्दुस्तान में आज यडि शमर्ठ (समर्थ) होगा भी टो भी कल वह वैशा ही रहेगा क्या? इस पर यशवंतराव जी ने कहा कि रहेगा भी और नहीं भी रहेगा। प्रत्येक उदय का अन्त अस्त में होता है, प्रत्येक अस्त का अन्त उदय में होता है। Heptarchy-को जिसने देखा, वह इंग्लैड़ जैसे एक राष्ट्र हुआ, वैसे आज की रोटीबन्दी (मुसलमान, ईसाई व अन्यों के हाथ का भोजन न करना इससे उनका हिन्दुओं का धर्म चला जाता है) से, समुद्रबन्दी से (समुद्र पार जाने से भी हिन्दुओं का धर्म चला जाता है, इस अनुचित सिद्धान्त से) जातिबन्दी (जन्मना जातिवाद से हिन्दुओं में परस्पर जो फूट है, उससे) जकड़ा हुआ यह हिन्दु-राष्ट्र उन बेड़ियों को तोड़ कर कल एक अत्यंत प्रबल ऐसा एक राष्ट्र हो भी सकता है। आज अटक तक चढ़ जाकर जैसे उसने मुसलमानों के आक्रमण से महाराष्ट्र की रक्षा की, वैसे ही समुद्रबन्दी की रोटी-बन्दी की बेड़ियां तोड़ कर लन्दन में जाकर कल वे हिन्दुस्तान भी बचा सकेंगे। साहब, इंग्लैंड से आप हिन्दुस्तान में आते हैं, यह यदि सम्भव है तो बम्बई से हमारा इंग्लैंड जाना भला असम्भव कैसे होगा?

उपर्युक्त पंक्तियों में अंग्रेजों के इतिहास पर प्रकाश डाला गया है जिसे वह छुपाने का प्रयास करते हैं और हम व हमारे लोग उन्हें जानते नहीं है। हिन्दु समाज की कमियों को विधर्मी खूब रेखांकित करते हैं परन्तु वह अपनी कमजोरियां व बुराईयां नहीं देखते हैं। हिन्दुओं को महर्षि दयानन्द जी की वैदिक मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में अपना सुधार करना चाहिये और अन्य मतों को भी वेदानुकूल सत्य ईश्वरीय सिद्धान्तों को स्वीकार करना चाहिये। ओ३म् शम्।

 

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