लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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भारत की संस्कृति :- भारत की संस्कृति कई चीज़ों को मिला-जुलाकर बनती है जिसमें भारत का लम्बा इतिहास, विलक्षण भूगोल और सिन्धु घाटी की सभ्यता के दौरान बनी और आगे चलकर वैदिक युग में विकसित हुई, बौद्ध धर्म एवं स्वर्ण युग की शुरुआत और उसके अस्तगमन के साथ फली-फूली अपनी खुद की प्राचीन विरासत शामिल हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों के रिवाज़, परम्पराओं और विचारों का भी इसमें समावेश है। पिछली पाँच सहस्राब्दियों से अधिक समय से भारत के रीति-रिवाज़, भाषाएँ, प्रथाएँ और परंपराएँ इसके एक-दूसरे से परस्पर संबंधों में महान विविधताओं का एक अद्वितीय उदाहरण देती हैं। भारत कई धार्मिक प्रणालियों ,जैसे कि हिन्दू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म जैसे धर्मों का जनक है। इस मिश्रण से भारत में उत्पन्न हुए विभिन्न धर्म और परम्पराओं ने विश्व के अलग – अलग हिस्सों को भी काफ़ी प्रभावित किया है

भारतीय संस्कृति की महत्ता:- भारतीय संस्कृति विश्व के इतिहास में कई दृष्टियों से विशेष महत्त्व रखती है। यह संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से है। भारतीय संस्कृति कर्म प्रधान संस्कृति है। मोहनजोदड़ो की खुदाई के बाद से यह मिस्र, मेसोपोटेमिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं के समकालीन समझी जाने लगी है। प्राचीनता के साथ इसकी दूसरी विशेषता अमरता है। चीनी संस्कृति के अतिरिक्त पुरानी दुनिया की अन्य सभी – मेसोपोटेमिया की सुमेरियन, असीरियन, बेबीलोनियन और खाल्दी प्रभृति तथा मिस्र ईरान, यूनान और रोम की-संस्कृतियाँ काल के कराल गाल में समा चुकी हैं, कुछ ध्वंसावशेष ही उनकी गौरव-गाथा गाने के लिए बचे हैं; किन्तु भारतीय संस्कृति कई हज़ार वर्ष तक काल के क्रूर थपेड़ों को खाती हुई आज तक जीवित है। उसकी तीसरी विशेषता उसका जगद्गुरु होना है। उसे इस बात का श्रेय प्राप्त है कि उसने न केवल महाद्वीप-सरीखे भारतवर्ष को सभ्यता का पाठ पढ़ाया, अपितु भारत के बाहर बड़े हिस्से की जंगली जातियों को सभ्य बनाया, साइबेरिया के सिंहल (श्रीलंका) तक और मैडीगास्कर टापू, ईरान तथा अफगानिस्तान से प्रशांत महासागर के बोर्नियो, बाली के द्वीपों तक के विशाल भू-खण्डों पर अपनी अमिट प्रभाव छोड़ा। संस्कृति सर्वांगीणता, विशालता, उदारता और सहिष्णुता की दृष्टि से अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अग्रणी स्थान रखती है।

भारतीय संस्कृति अति पुरातन है। उससे कहीं पुरातन जितनी कि काल गणना इस पृथ्वी की या मनुष्य जीवन की आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा की जाती है। विश्व के अधिकाँश मानव विज्ञानी इस बात से सहमत है कि मनुष्य की सबसे प्राचीन वंशावली भारत की ही है। भारत पहले एक तैरता हुआ द्वीप था। जहाँ उन्नत सभ्यता वाले सुसंस्कृत लोगों का निवास था। आज जहाँ अमेरिका यू.एस.एस. है, वहीं पर प्राचीन काल में “होपी” नामक परम्परा प्रचलित थी, जो भारतीय परम्पराओं से मेल खाती है। सुप्रसिद्ध भूगर्भशास्त्री डा. जूलियाओ टैलों ने पिसाकों पेरु के निकट ऐसे चित्र-विचित्र रंग के वर्तनों की खोज की है, जिन्हें देखकर हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता का भान होता है। सूर्य देव की उपासना का विधान इसमें स्पष्ट रूप से अंकित है। लोग इसे अमेरिकन इण्डियन सिविलाइजेशन के नाम से भी पुकारते हैं। अमेरिकन इण्डियन की खोज का श्रेय क्रिस्टोफर कोलम्बस को दिया जाता है। उसने इस खोज के उपरान्त एकत्रित किये गये तथ्यों को प्रकाशित करते हुए कहा था कि भारतीय संस्कृति ही सबसे प्राचीन है। एस्किमो जाति को भी उनने इसी की उत्पत्ति माना है। कोलम्बस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “आल डिसकवर्ड अमेरिका” में यह सिद्ध किया है कि उससे पुरातन संस्कृति उत्तरी अटलाँटिस की है, जहाँ पर भारतीयता के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं।

यू.एस.एस.आर. एकेडेमी ऑफ साइंस की मूर्धन्य वैज्ञानिक डा. मारिया क्लीनोवा ने अटलाँटिक महासागर में 6620 फुट तक की गहराई के पत्थरों का बड़ी गहनता के साथ अध्ययन किया है। उनके अनुसार इस क्षेत्र में सबसे अधिक लगभग एब लाख भूकम्प प्रतिवर्ष आते रहे हैं, जिसके कारण उसके आस पास की सभ्यता का विनाश हुआ है। इसी तरह “द रिडल आँ दी पैसीफिक” अर्थात् प्रशान्त महासागर की पहेली नामक पुस्तक से सुप्रसिद्ध लेखक जे मैकलिन ब्राउन ने लिखा है कि भारतीय संस्कृति के ध्वंसावशेष प्रशान्त महासागर में भी देखने को मिले हैं।

चीन में हुई शिन नाम के एक बौद्ध भिक्षु ने पाँचवीं सर्दी में विश्व की अनेक संस्कृतियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं उनके तुलनात्मक अध्ययन में गहन अभिरुचि दिखाई। गहन अध्ययन के पश्चात् तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए उनने बताया कि मैक्सिको की कलाकृतियों को देखकर यही कहा जा सकता है कि यह बुद्ध का हृदय है। हिटलर से 2000 वर्ष पूर्व की कलाकृतियों में कमल और स्वस्तिक स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। न्यू इंग्लैण्ड ऐन्टीक्विटीज रिसर्च ऐसोसिएशन’ के अध्यक्ष राबर्ट स्टोन के अनुसार सबसे पुरानी सभ्यता एवं संस्कृति भारत की ही है। उनका कहना है कि मिश्र के विलक्षण पिरामिडों का निर्माण सम्भवतः कालूसा नामक भारतीय जाति ने ही किया। दक्षिण अफ्रीका के कलाहारी रेगिस्तान में प्रागैतिहासिक काल की एक मानवाकृति प्रतिमा मिली है जिसके एक हाथ में प्रज्वलित लाल मशाल और दूसरे में धनुष बाण हैं। ये भारतीय संस्कृति के ही प्रतीक चिन्ह हैं।

पुरातत्व वेत्ताओं का कहना है कि आज से 4500 वर्ष पूर्व की सिन्धुघाटी की सभ्यता में मोहन जोदड़ो और हड़प्पा के निवासियों को देखने से यह स्पष्ट पता चलता है कि भारत तथा सुमेरिया की प्राचीन संस्कृतियों में काफी समरूपता है।विश्व के अनेकों वैज्ञानिक नृतत्व विज्ञानी एवं पुरातत्ववेत्ता मानव जाति के इतिहास एवं प्राचीन संस्कृति का पता लगाने में अनुसंधानरत हैं। अफ्रीका के प्रख्यात वैज्ञानिक डा. लुईस लीकी ने तंजानियों में मिले ध्वंसावशेषों के परीक्षण के आधार पर बताया है कि मानव जाति का अस्तित्व आज से 20 लाख वर्ष पूर्व भी रहा होगा। अन्य वैज्ञानिकों ने भी इसकी जानकारी कार्बन अनुसंधान पद्धति के द्वारा प्राप्त की है और डा. लुईस के कथन को सही बताया है। इन भग्नावशेषों में भारतीय वास्तुकला की अमिट छाप देखने को मिलती है। पैकिंग के समीप चोऊ-कोऊ टेन नामक स्थान पर लगभग 7 लाख वर्ष पुराना जला हुआ मानव कंकाल मिला है जिसे देखकर यह कहा जा सकता है कि चीन में भी कभी दाह संस्कार की परम्पराएँ प्रचलित रही होंगी जो मूलतः भारतीय संस्कृति की देन है।

मिश्र के गुम्बजों में भारतीय संस्कृति के परिचायक शिल्प कला के उत्कृष्ट नमूने अभी भी जीर्ण शीर्ण स्थिति में देखे जो सकते हैं। देखने पर ये चित्र भूल भुलैया जैसे प्रतीत होते हैं। पर यदि उनका गहराई से अवलोकन किया जाय तो मरणोत्तर जीवन की वास्तविकता को प्रकट करते हुए नजर आते हैं। डैन्डेरा मिश्र से प्राप्त कलाकृतियाँ भी ऐसी हैं, जो हजारों वर्ष प्राचीन हैं, उनमें अन्य चित्राँकनों के अतिरिक्त राशि चक्र एवं ग्रह नक्षत्रों की पूरी जानकारी भी अंकित है। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार इस प्रकार की कलाकृतियों को देखकर यही कहा जा सकता है कि इनके निर्माणकर्ता भारतीय ही रहे होंगे। नृवंश विज्ञानियों के अनुसार इजराइल की 10 विलुप्त मानव प्रजातियों में भारत की भी एक जाति सम्मिलित है जिसका सम्बन्ध मुख्यतया वास्तु एवं शिल्प कला से था। इससे पता चलता है कि भारतीय संस्कृत का विस्तार सारे विश्व में भा।

जापानी भाषा में सूर्य देवता के लिए “तैओवा” शब्द का प्रयोग किया गया है। उत्तरी कैलीफोर्निया में रहने वाले होपी जाति के भारतीय सूर्य को “शैपास” कहकर पुकारते हैं। सूर्य पूजा का क्रम कभी विश्व के लगभग सभी देशों में चलता था। जिस प्रकार भारत में कोर्णाक का सूर्य मन्दिर अपनी गरिमा बनाये हुए हैं, ठीक उसी तरह संसार के अन्य देशों में भी इन्हें पृथक पृथक नाम से सम्बोधित किया जाता है। टर्की में कनक यू.एस.एस.आर में काणरव्य, आयरलैंड में कार्ना, पुर्तगाल में कार्नाक्साइड के नाम से इन सूर्य मन्दिरों को लोग जानते हैं। ग्रीक संस्कृति में सूर्य और चन्द्रमा को पुरुष वाचक देवता न मानकर देवी मानते हैं और इस प्रकार सूर्य देवी को ऐलीओस तथा चन्द्र देवी को “सैलीन” के नाम से जाना जाता है। प्राचीन काल में इसी की पूजा का विधि विधान चला आ रहा है। एन्ड्रौस में भगवान के कच्छप अवतार का मन्दिर लोगों की श्रद्धा का केन्द्र बना है। इसकी खोज वैज्ञानिकों ने 1968 में की है। यह बहुत ही प्राचीन बताया जाता है। यहाँ पर जी के भीतर बना माया मन्दिर भी इसी तरह का है।

पिछले दिनों सोवियत रूप में एक प्राचीन ‘श्री’ यंत्र मिला है, जिस पर अंकित साँकेतिक ताँत्रिक विद्या को वैज्ञानिकों ने सुलभ लिया है। मास्को विश्वविद्यालय के मूर्धन्य वैज्ञानिक प्रो. कुलाशेव ने एक गणितीय फार्मला इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर में डाला तो उसकी जो प्रतिलिपि तैयार हुई वह भारतीय तंत्र विद्या के ‘श्री यंत्रम’ की थी। प्रो. कुलाशेव का कहना है कि भारतीय गणित विद्या तीन हजार वर्ष पूर्व भी आज से कहीं अधिक समुन्नत थी ओर इसका प्रचार प्रसार विश्व के सभी भागों में था।

“धेनुमार्ग” में अपभ्रंश बने डेनमार्क से लेकर “अर्जुन टीला” के अर्जेन्टीना बनने एवं भारत की चिरपुरातन परम्पराओं के विश्व के कोने कोने में भिन्न-भिन्न रूपों में पाये जाने से स्पष्ट है कि कभी भारतीय संस्कृति का प्रसार सारे विश्व में था। अब तो वह सिकुड़कर बृहत्तर भारत भी नहीं, और भी छोटी परिधि में आबद्ध हो गया। हमारा गौरवमय अतीत हमें ही पुनः लौटाना होगा। पश्चिमोन्तुख होने से तो उस अस्मिता को ओर हानि पहुँचती है। प्रसिद्ध भविष्य विज्ञानी नास्त्रेदमस ने आज से चार शताब्दियों पूर्व भारत से ही सतयुग की वापसी का संकेत दे दिया था।

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