व्यभिचार

जीत करके देह किसी की, क्या तुमने जग को जीत लिया।
नग्न मानसिकता है तुम्हारी, जो मानवता को तुमने रिक्त किया।।
हो महान तुम सब भी, नारी नोच कर खाते हो।
तन को मार पशु भी खाए, तुमने नीच को मीत किया।।

दर्पण में कभी खुद को देखो, क्या कभी हंस भी पाओगे।
जिस नारी को खेल समझते, उसके बिन न जी पाओगे।।
कुंठित क्यों है मानव समाज, नारी देह पे टूटे बाज।
देख रहे जो गिद्ध के जैसे, खुद की मात क्या खाओगे।।

बना रहे अभिशाप जिसे तुम, उस नारी ने जन्म दिया।
कलंक लगे क्यों नारी जीवन, जिसने जीव को रंग दिया।।
मरे शरीर तो गम नहीं है, नारी आत्मा क्यूँ मार रहे।
जिसने सुख दुःख में बन संगिनी संग दिया।

डूबे भोग विलास में तुम, कुछ पुरुषों जरा विचार करो। बंद करो, अब बंद करो, अब खत्म ये अत्याचार करो। ्
माना कुसुम है कोमल सुंदर, पर नहीं नोच के फेका करते।
नारी में भी जान ज्ञान आत्मा, बंद सदा व्यभिचार करो। ्

सुमति श्रीवास्तव

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