वक्त की जरूरत है इस्लामी मदरसों का आधुनिकीकरण

आशीष रावत

हाल ही में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम समाज में प्रचलित तीन तलाक पर 6 महीने की रोक लगा दी है मगर कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं का एक वर्ग इसे मानने के लिए तैयार नहीं है। मुस्लिम विद्वानों का तर्क है कि शरई कानूनों में किसी तरह का संशोधन नहीं हो सकता। 1400 वर्ष पहले इस्लाम में जो शरई कानून बनाए गए थे वो परिवर्तनशील नहीं हैं। भारतीय संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों में सभी देशवासियों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश दिया गया है मगर मुसलमानों के एक वर्ग के विरोध के कारण किसी भी न्यायालय या सरकार में हिम्मत नहीं है कि वह देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए। हर राजनीतिक दल को इस बात का डर है कि यदि उसने शरई कानूनों के कोई भी परिवर्तन किया तो मुस्लिम मतदाता उनके हाथ से निकल जाएंगे।

 

यही स्थिति इस्लामी मदरसों की भी है। आज भी उनमें जिस पाठ्यक्रम को पढ़ाया जा रहा है वह 1400 वर्ष पुराना है। उसमें किसी तरह का परिवर्तन करने के लिए उलेमा तैयार नहीं हंै। इस पाठ्यक्रम में न तो अंग्रेजी शामिल है और न ही इसमें गणित या विज्ञान के लिए जगह है। आज के युग में जबकि शिक्षा क्षेत्र में जबर्दस्त प्रतियोगिता चल रही है। अरबी, फारसी और इस्लामी धर्म की शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं। यही कारण है कि शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम छात्र एवं छात्राएं निरंतर पिछड़ रहे हैं।

 

1 अगस्त, 2016 को लोकसभा में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले सात वर्षों में मदरसों या इस्लामी शैक्षिक संस्थानों के आधुनिकीकरण के लिए केन्द्र सरकार ने एक हजार करोड़ से अधिक खर्च किया है। सरकार ने मदरसों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए वर्ष 2009-10 में शुरु की गई योजना (ैच्फम्ड) के खर्च में करीब पांच गुना वृद्धि 46 करोड़ रुपए से 294 करोड़ रुपए की है। खर्च पिछले एक वर्ष के दौरान वर्ष 2015-16 से लगभग दोगुना हुआ है। यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो यह खर्च 108 करोड़ रुपए से बढ़कर 294 करोड़ रुपए हुआ है। उत्तर प्रदेश के मदरसों को सबसे अधिक धन प्राप्त हुआ। पिछले सात वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश के 48,000 से अधिक मदरसों को वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है जो कि सभी राज्यों में सबसे अधिक है। इस संबंध में दूसरा और तीसरा स्थान मध्य प्रदेश और केरल का है। हालांकि, उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2015-16 में समर्थित मदरसों की संख्या में 62 फीसदी की वृद्धि हुई है (9217 से 14,974) जबकि इस संबंध में बिहार में 13 गुना वृद्धि (80 से 1,127) दर्ज की गई है।  मदरसों के छात्र मुख्यरूप से मुस्लिम होते हैं, जिनकी भारत के अल्पसंख्यकों के बीच साक्षरता में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई है।

 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर अरशद आलम ने 25 जुलाई, 2015 को अंग्रेजी के समाचारपत्र ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखा है, “1993 के बाद से, मदरसे आधुनिकीकरण नीति, मुख्यरूप से आजाद मदरसों के लिए डिजाइन किया गया है। इसके पीछे मुख्य मकसद पुस्तकों और अतिरिक्त शिक्षकों के लिए राज्य अनुदान के एवज में उन्हें आधुनिक विषयों को पढ़ाने के लिए तैयार करना था।” आलम आगे लिखते हैं, “लेकिन नीति में मदरसों को सजातीय के रूप में देखा गया, इसलिए अनुदान भी राज्य वित्त पोशित मदरसों द्वारा एकाधिकार किया गया। इसके अलावा आजाद मदरसों को दिया गया अधिकतम अनुदान अंशकालिक अप्रशिक्षित शिक्षकों को नियुक्त करने के लिए इस्तेमाल किया गया जो इन संस्थानों में गुणवत्ता की शिक्षा शुरू करने के उद्देश्य को निष्फल करता है। और इन सबसे आगे, मदरसा जो देवबंदी और अहले हदीस से संबद्ध हैं, इस तरह की पहल में भाग लेने से साफ इनकार किया है।” दारुल उलूम देवबंद ने मुल्क भर में फैले अपने तीन हजार मदरसों को जदीद बनाने (आधुनिकीकरण) के लिए किसी भी तरह की सरकारी मदद लेने से मना कर दिया है। दारुल उलूम ने मदरसों में सरकारी नजरिए से जदीद (आधुनिकीकरण) तालीम दिए जाने का भी एहतिजाज किया है। दारुल उलूम के पब्लिक रिलेशन आॅफिसर मौलाना अशरफ उस्मानी ने कहा कि मदरसों में हुकूमती मुदाखिलत की मुखालिफत कोई नई बात नहीं है। उन्होंने कहा “हमें मदरसों को सरकारी इदारा (संस्था) नहीं बनाना है। हमारा तजुर्बा है कि जितने मदरसे सरकारी मदद लेते आए हैं वो खत्म हो गए हैं।” उस्मानी कहते हैं, “हम कौम से चन्दा लेकर काम चलाते हैं। जो हमारी दीनी जरूरत है, उसमें किसी तरह की सरकारी मदद की जरूरत नहीं पड़ती है।” जदीद तालीम के बारे में मौलाना उस्मानी ने कहा, “मदरसे एक खास सिलेबस पर चलते हैं। उसके साथ आज कम्प्यूटर, साइंस, अंग्रेजी और हिन्दी सभी सब्जेक्ट को पढ़ाया जा रहा है। लखनऊ के दारुल उलूम नदवा में शानदार कम्प्यूटर लैब है।” मौलाना उस्मानी के मुताबिक, “हुकूमत की नजर में आधुनिकीकरण का मतलब मदरसों को इंजीनियरिंग कॉलेज या विश्वविद्यालय बनाना है ताकि मदरसों पर हुकूमत काबू कर सके।” मौलाना सलमान मदनी ने भी दारुल उलूम देवबंद के फैसलों की हिमायत की। उन्होंने कहा कि “मदरसों में इस्लामी कानून पढ़ाया जाता है। अगर यहां इंजीनियरिंग पढ़ाई जाएगी तो वो गलत होगा।”

 

सच्चर कमेटी हो या रंगनाथ मिश्रा आयोग सभी ने आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में मुसलमान के पिछड़ेपन का उल्लेख किया है। उन्होंने इस बात का विश्लेषण करने का कोई प्रयास नहीं किया कि मुसलमान छात्र शिक्षा के क्षेत्र में क्यों पिछड़ रहे हैं? इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी इन दोनों कमेटियों ने पूरी तरह से नजरअंदाज किया है। लोअर मिडिल क्लास में बच्चों को शिक्षा देने के बारे में मुसलमान और हिन्दुओं के दृष्टिकोण में भारी अंतर है। हिन्दू माता-पिता अपना पेट काटकर भी अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में शिक्षा दिलवाने का प्रयास करते हैं जबकि मुसलमानों का जोर बच्चों को हुनुर सिखाने एवं मदरसों में शिक्षा दिलवाने पर होता है। देश में इस्लामी मदरसों के विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। क्योंकि देश के एक दर्जन राज्यों में इस्लामी मदरसों को रजिस्टर करवाना अनिवार्य नहीं है। केवल सात राज्य ऐसे हैं जिनमें मदरसों को रजिस्टर करवाना अनिवार्य बनाया गया है। देश में इस्लामी मदरसों की संख्या बारह से पन्द्रह लाख के बीच बताई जाती है और इनमें डेढ़ करोड़ के लगभग बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह शिक्षा आमतौर इस्लामी धर्म, अरबी और फारसी भाशा तक सीमित है। इनका पाठ्यक्रम 1400 वर्ष पुराना है जो कि वर्तमान युग की आवश्यकताओं के कतई अनुरूप नहीं है। इस संदर्भ में यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि इन इस्लामी मदरसों में शिक्षा निःशुल्क है। इसके अतिरिक्त अधिकांश मदरसों में छात्र-छात्राओं को मुसलमानों के घरों से भी भोजन मुफ्त उपलब्ध कराया जाता है। इन मदरसों में शिक्षा आमतौर पर मदरसों के इमाम देते हैं। देश में 74 इस्लामी विश्वविद्यालय हैं। इनमें से 37 प्राइवेट हैं। शेष इस्लामी विश्वविद्यालयों को संचालन मुसलमानों के द्वारा किया जाता है। उत्तरी भारत में उच्च इस्लामिक शिक्षा के ग्यारह केन्द्र हैं इनमें से सबसे प्रमुख दारूल उलूम देवबंद और लखनऊ स्थिति दारूल उलूम नदवा हैं।

 

इस्लामी मदरसे शुरू से ही विवादों में घिरे रहे हैं। सरकारी गुप्तचर एजेंसियों का कहना है कि इन मदरसों में कट्टरवाद और आतंकवाद की शिक्षा दी जाती है। पाकिस्तान सरकार ने पाकिस्तानी मदरसों की स्थिति की समीक्षा करने के लिए जो चैधरी आयोग गठित किया था उसने इन इस्लामी मदरसों को तालिबानी तैयार करने वाली फैक्ट्रियों की संज्ञा दी थी। हालांकि मुसलमानों के नेता इन आरोपों से इनकार करते हैं। सरकारी सूत्र इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि विदेशी सूत्रों से भारत में स्थिति इस्लामी मदरसों को हर वर्ष दस हजार करोड़ रुपए की सहायता शिक्षा एवं इस्लाम के प्रसार के लिए प्राप्त हो रही है। ऐसी स्थिति में क्या यह जरूरी नहीं है कि इस्लामी मदरसों में आधुनिक पाठ्यक्रम लागू किया जाए ताकि मुस्लिम बच्चे भी देश के अन्य बच्चों के साथ-साथ उन्नति और विकास की दौड़ में आगे बढ़ सकें?

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