युद्ध और शांति के बीच जल – भाग दो

( प्रख्यात पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला )

सीरिया, दुष्काल के चंगुल में 

प्रस्तुति : अरुण तिवारी

20 से 25 अक्तूबर, 2015 को टर्की के अंकारा में संयुक्त राष्ट्र संघ का एक सम्मेलन था। यह सम्मेलन, रेगिस्तान भूमि के फैलते दायरे को नियंत्रित करने पर राय-मशविरे के लिए बुलाया गया था। चूंकि, अलवर, राजस्थान के ग्रामीणों के साथ मिलकर तरुण भारत संघ इस विषय में कुछ सफल कर पाया है; लिहाजा, मुझे वहां ’की नोट स्पीकर’ के तौर पर आमंत्रित किया गया था। मेरे भाषण के बाद सीरिया के एक वरिष्ठ अधिकारी मेरे पास आये और बोले – ”आपकी बात मेरे दिल के करीब है। किंतु आपने अपने भाषण में सीरिया का नाम नहीं लिया। मैं चाहता हूं कि आप मेरे देश आएं।”

मैं तो दुनिया की धरती और पानी देखने ही निकला था। मैं हां कर दी। 

दुनिया के नक्शे के हिसाब से सीरिया दुनिया के मध्य-पूर्व में स्थित है। सीरिया की एक सीमा पर लेबनान, पूर्व में इराक, पश्चिम में मध्यान्ह सागर, उत्तर में टर्की, दक्षिण में जाॅर्डन और दक्षिण-पूर्व में इज़राइल देश है। अब आप देखिए कि सीरिया की सभ्यता और खेती कितनी पुरानी है ! सीरिया, सदियों से कृषि प्रधान राष्ट्र रहा है। आज सीरिया, अपने ही… खासकर खेतिहर नागरिकों से खाली होता देश है। आज की बात करें तो सीरिया आज पश्चिमी एशिया में स्थित एक ऐसे देश के रूप में जाना जाता है, जो लंबे समय से गृह युद्ध में फंसा हुआ है। पिछले साढे़ चार सालों के सैन्य युद्ध में सीरिया के तकरीबन ढाई लाख लोग मारे जा चुके हैं। मुझे बताया गया कि एक करोड़ से ज्यादा लोग दर-बदर हो गये हैं। इस दर-बदर आबादी में से मात्र 10 प्रतिशत यानी करीब 10 लाख लोगों को ही यूरोप आदि देशों में सुरक्षित शरण मिल पाई है। मैने यह समझने की कोशिश की कि यह क्यों हुआ ? लोग उजड़े तो उजडे़ क्यों ?

सामान्य तौर पर बताया जाता है कि सीरिया में उपद्रव की शुरुआत मार्च, 2011 में एक लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन से हुई थी। सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर दागी गोलियों से हुईं मौतों को लेकर भड़के लोगों ने सीरिया के राष्ट्रपति के इस्तीफे की मांग को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन किया था। उसी प्रदर्शन को दबाने की कोशिशें, सीरिया को गृह युद्ध के हालात में घसीट लाई। मीडिया में तो यही प्रोजेक्ट किया गया कि सीरिया से लोगों के पलायन का मूल कारण, गृह युद्ध के हालात हैं। सीरिया के गृह युद्ध को आज शिया-सुन्नी मुद्दे रूप दे दिया गया है। लेकिन मैं आपको बताऊं कि सीरिया के नागरिकों के व्यापक विस्थापन की सबसे पहली और बुनियादी वजह यह नहीं है; बुनियादी वजह है – पानी की कमी। पानी की भयानक कमी की वजह से सीरिया के गांवों के लोग उजड़कर, सीरिया के नगरों में आये; दूसरे देशों में गये। सीरियां के गांवों में आए संकट ने नगरों में अफरा-तफरी मचा दी। इससे गृह युद्ध के हालात बने।

यही सच्चाई है। आप देखिए कि आज, सीरिया की करीब 70 प्रतिशत आबादी पीने के पानी की कमी से जूझ रही है। जब पीने को पानी ही पर्याप्त नहीं, तो खेती कहां से हो ? आज, सीरिया के करीब 20 लाख से ज्यादा लोग अपनी भूख का इंतज़ाम नहीं कर पा रहे हैं। लगभग इतने ही यानी सीरिया में करीब 20 लाख बच्चे ऐसे हैं, जो स्कूल से बाहर हैं। हर पांच में से चार आदमी, गरीब है। 15 अलग-अलग जगह विस्थापित लोगों में से चार लाख तो ऐसे हैं कि जो जीवन सुरक्षा के बुनियादी साधनों से महरूम हैं। यह सब क्यों हुआ ? पानी की कमी की वजह से ही तो। विस्थापन की असली वजह यह है।

आप समझ लें कि पलायन और विस्थापन.. दो अलग-अलग स्थितियां होती हैं। पलायन होता है कि आप कमाने अथवा किसी अन्य मकसद से अपने मूल स्थान से दूसरे स्थान पर चले ज़रूर जाते हैं, लेकिन आपका अपने मूल स्थान पर आना-जाना बना रहता है। विस्थापन – वह स्थिति है कि जब पूरा परिवार का परिवार ही अपनी जड़ों से उजड़ जाये। जड़ों के प्रति संवेदनहीनता भी कभी-कभी विस्थापन कराती है, किंतु विस्थापन अक्सर मज़बूरी में ही होता है अथवा जबरन किया गया अथवा कराया गया होता है। इसीलिए बांधों के निर्माण के कारण उजड़ने को विस्थापन कहते हैं, पलायन नहीं। सीरिया से विस्थापन हुआ।

प्र. – आपने जानने की कोशिश की कि सीरिया में पानी की भयानक कमी का क्या कारण है ?

उ. – हां, मैने जानने की कोशिश की। मुझे वहां इफरेटिस ( Euphrates) नदी को देखने को कहा गया। इफरेटिस को सीरिया में ‘ददाद’ कहते हैं। इफरेटिस – पश्चिम  एशिया की सबसे लंबी नदी है। मेसोपोटामिया सभ्यता से संबंद्ध होने के कारण, यह एक ऐतिहासिक महत्व की नदी भी है। मैने, इफरेटिस के टर्की स्थित स्त्रोत से यात्रा शुरु की। देखा कि टर्की ने इफरेटिस नदी पर अतातुर्क नाम का एक बहुत बड़ा बांध बनाया है। इस बांध ने इफरेटिस के पानी को पूरी तरह बांध रखा था। अतातुर्क बांध के आगे इफरेटिस नदी, एक तरह से खत्म ही दिखाई दी।

मुझे बताया गया कि सीरिया के बहुत बड़ी आबादी को अपनी खेती, मछली और रोजमर्रा की ज़रूरत के पानी के लिए, सदियों से इफरेटिस नदी का ही सहारा रहा है। मैने खेत देखे; लोगों से बातचीत की तो पता चला कि नदी क्या बंधी, नदी किनारे के सीरियाई भू-भाग की खेती भी उजड़ी और लोग भी। हज़ार-दो हज़ार नहीं, लाखों की आबादी उजड़ी। उजड़ने वाले बगदादी गये; लेबनान गये; फिर ग्रीस, ग्रीस से टर्की गये। टर्की से होते हुए जर्मनी, यू के, स्वीडन, नीदरलैण्ड, आॅस्ट्रिया, बेल्ज़ियम और यूरोप के देशों तक पहुंचे। अकेले जर्मनी में पहुंचे विस्थापितों की संख्या करीब साढे़ 12 लाख हैं, फ्रांस और यू के में पांच-पांच लाख। स्वीडन में चार लाख तो बेल्ज़ियम में ढाई लाख के करीब लोग आये हैं। आॅस्टिया में पहुंचने वालों की संख्या भी लाखों में है और यूरोप के 20 देशों में तो एक बहुत बड़ी आबादी पहुंची है। एक देश से उजड़कर बसने वालों की तादाद पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है।

गौर करने की बात है कि विस्थापित आबादी, सबसे ज्यादा यूरोप के नगरों में ही पहुंची है। इससे नगरों में बेचैनी बढ़ी है। मैने जब पता किया कि विस्थापितों के एक स्थान से दूसरे स्थान भटकने के क्या कारण हैं ? तो पता चला कि स्थानीय नागरिकों से तालमेल न बैठ पाना अथवा भूख का इंतज़ाम न हो पाना तो था ही; रिफ्यूजी का दर्जा मिलने में होने वाली देरी और मुश्किल भी इसका एक प्रमुख कारण था।

प्र. – क्या आपको किसी विस्थापित परिवार से मिलने का मौका मिला ?

उ. – दिक्कत तो जरूर हुई, लेकिन हालात को समझने के लिए पिछले कुछ समय से मैं खुद चार विस्थापित परिवारों को लगातार ट्रैक कर रहा हूं। खलील, अलाह, अहमद और अमीन। खलील और अमीन – फिलहाल, यू के डालटिंगटाॅन में हैं।अलाह और अहमद – यू के के टस्काॅन में हैं। इन चारों के परिवारों को तीन साल बाद रिफ्यूजी घोषित किया गया था।

खलील – सीरिया के बास्ते अही बियर कस्बे से आया है। खलील के विस्थापन से पूर्व, उसके कस्बे की आबादी एक लाख से ज्यादा थी; अब वहां 7000 ही बचे हैं। खलील के साथ-साथ इसके सात भाई और तीन बहनों को भी उजड़ना पड़ा। सारा परिवार बिखर गया। आइमान – जर्मनी में, कासिम, सलीम और सेमल – लेबनान में, जलाल – नार्वे में तो खलील और अमीन – यू के में हैं। 65 वर्ष की बहन इवा – सीरिया में पड़ी है। 54 साल की फातिमा और 44 साल की इमान तथा इनके परिवार लेबनान में हैं।

इस परिवार को सामने रखकर आप कल्पना कीजिए कि उजड़ने का दर्द कितना बड़ा और अपूर्णनीय हो सकता है। क्या कोई मदद… कितना ही बड़ा मुआवजा इस दर्द की भरपाई कर सकता है ? नहीं। पहली बार जब मैं खलील से मिला तो उसके परिवार के भटकने की कहानी सुनकर और उनके रहन-सहन के हालात देखकर मेरी खुद की आंखें नम हो गईं। खलील ने बताया कि अपने कस्बे से उजड़कर जब लेबनान पहुंचा तो कैसे वहां उसकी पत्नी इका, दो बेटे और एक बेटी.. सभी बीमार पड़ गये थे; कैसे उनका मरने जैसा हाल हो गया था। लोग, उससे और उसके परिवार से नफरत करते थे। इसलिए उसे लेबनान छोड़ना पड़ा।

2017 में रिफ्यूजी घोषित होने के बाद से खलील और उसका परिवार यू के डालटिंगटाॅन में है। पता चला कि सुसी और सेक नामक दम्पत्ति ने यहां इनकी बहुत सेवा की है। अब वह वहां सुमाखा काॅलेज में सब्जियां बेचने उगाने का काम करता है। चार दिन पहले मिला, तो गले मिलकर खुशी से नाचने लगा।

अहमद –  यामीन का बेटा है। यामीन, सीरिया की राजधानी का रहने वाला है।  अहमद , वहां से उजड़ने के बाद अब यू के डालटिंगटाॅन  में है। वहीं पर नौवीं कक्षा में पढ़ता है।  यामीन,  टस्काॅन में है।

अलाह – दोराह का रहने वाला है। अलाह को 2014 में ही घर छोड़ना पड़ा। पहले वह लेबनान गया; फिर करीब डेढ़ साल तुर्की  में रहा। मल्टी बेस अपरलैण्ड में रहने के बाद अलाह करीब पांच महीने तक डोम्सडोनिया में रहा। फिर फ्रांस के कैलेट शहर के जांगल में तीन रहने के बाद अब वह टस्काॅन में है।

मैं आपको किस-किसकी के उजाड़ की कहानी बताऊं ? उजड़ने वाले परिवारों से मिलिए तो एहसास होता है कि पानी, भगवान का दिया कितना महत्वपूर्ण उपहार है ! हमारी हवस और नासमझ करतूतों के कारण हमने पानी को उजाड़ और युद्ध का औजार बना दिया है। पानी, प्रकृति की अनोखी नियामत है। कोई इसे अपना निजी कैसे बता सकता है ? अन्याय होगा तो तनाव और अशांति होगी ही।

अब देखिए कि सीरिया और इराक के हक़ का पानी न देने वाले टर्की का क्या हाल है।

……. आगे की बातचीत श्रृंखला के भाग – तीन में जारी
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( इफरेटिस नदी पर कुछ अतिरिक्त जानकारी )

इफरेटिस नदी को ग्रीक सम्याता के समय की मूल पर्सियन भाषा में उफरातू  ( Ufratu)नाम से पुकारा जाता था। इसे, सुमेरी भाषा में बुरान्नुआ  ( Buranuna ) अक्काडी में पुरात्तु  ( Purattu) अरबी में अल-फुरत  ( Al Furat ) हैं। इफरेटिस नदी को टर्की में फिरात  ( Firat )था सीरिया  ( Euphrates)  पेरात  ( Perat ) से संबोधित किया जाता है। अरमीनियाई उच्चारण – येपरात ( Yeprat )  है।

इफरेटिस – पश्चिम टर्की से उत्पन्न होती है। वह इसके बाद सीरिया और इराक़ से गुजरती है। करीब 145 से 195 किलोमीटर लंबा शत्त अल अरब, इफरेटिस और टिगरिस नदी को पर्सियन गल्फ से मिलाता है। इफरेटिस नदी 3000 किलोमीटर की अपनी विशाल यात्रा में टर्की के 1230 किलोमीटर, सीरिया के 710 किलोमीटर और इराक़ के 1060 किलोमीटर लंबे भू-भाग से होकर गुजरती है। इफरेटिस का जलग्रहण कितना विशाल है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इसके बेसिन में टर्की, सीरिया और इराक़ के अलावा सउदी अरब, कुवैत और ईरान भी आते हैं। वर्षा और ग्लेशियर पर आधारित होने के कारण विशेषकर अप्रैल से मई के बीच इफरेटिस में पानी बढ़ जाता है। सजुर, बालिख और ख़बर – सीरिया की तीन ऐसी नदियां हैं, जो इफरेटिस में मिलती हैं। कारा सु और मूरत नामक नदियां भी इफरेटिस की सहायक धाराएं हैं।

इफरेटिस के यात्रा भू-भाग में पहाड़ भी हैं, मरुस्थल भी, ओक के जंगल भी, चारागाह भी तो खेती की समृद्ध भूमि भी। आपको जानकर खुशी होगी कि इफरेटिस नदी में मछलियों की करीब 34 प्रजातियांें का खजाना रहता है।

इस नदी पर कई बांध-बैराज हैं – इराक के हिंदिया बांध, हादिथा बांध और रामादी बैराज। इराक अपनी कई नहरों और झीलों के लिए इफरेटिस से ही पानी लेता है। सीरिया का तबक़ा बांध 1973 में बनकर पूरा हुआ। इसके बाद इफरेटिस नदी पर क्रमशः बांथ बांध और तिशरिन नामक दो बांध तथा इसकी सहायक धाराओं और उपधाराओं पर तीन छोटे बांध बनाये। इफरेटिस पर टर्की का पहला बांध – केबन बांध 1974 में पूरा हुआ। दक्षिण-पश्चिम अंतोलिया परियोजना – टर्की द्वारा इफरेटिस और टिगरिस नदी बेसिन में करीब 22 बांध बनाकर, 19 जलविद्युत परियोजनाओें को चलाने और करीब 17 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सिंचित करने तथा पेयजल उपलब्ध कराने की योजना है। इस परियोजना के तहत् टर्की ने अतातुर्क नामक एक ऐसा बांध बनाया है, जो इफरेटिस में पीछे से आने वाले सारे पानी को रोकने की क्षमता रखता है। अतातुर्क बांध की ऊंचाई – 184 मीटर और लंबाई 1,820 मीटर बताई गई है।

अब देखिए कि इन बांध, बैराजों ने मिलकर क्या किया ? इफरेटिस के प्रवाह में 1970 में सीरिया और टर्की में बांध निर्माण का कार्य शुरु होने के बाद से नाटकीय परिवर्तन आया। 1990 से पहले हिट नामक स्थान पर अधिकतम प्रवाह मात्रा जहां 7,510 क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड थी, 1990 के बाद यह मात्र 2,514 क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड पाई गई; जबकि न्यूनतम प्रवाह मात्रा 55 क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड से घटने की बजाय, बढ़कर 58 क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड हुई है। गौर करने की बात है कि 1990 के बाद हिट नामक स्थान पर इफरेटिस के सामान्य प्रवाह में भी 356 क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड प्रति वर्ष की गिरावट दर्ज हुई है। इसी तरह बांध-बैराजों ने टिगरिस नदी के प्रवाह को भी दुष्प्रभावित किया।

विकिपीडिया पर दर्ज वर्ष 2016 का आंकड़ा यह है कि टर्की की दक्षिण-पश्चिम अंतोलिया परियोजना की वजह से 382 गांवों के दो लाख लोग विस्थापित हुए। सबसे अधिक करीब 55, 300 लोगांे का विस्थापन, अकेले अतातुर्क बांध की वजह से हुआ। असाद झील में आई बाढ़ के कारण करीब 4000 हज़ार परिवारों को जबरन हटाया गया। सर्वे बताता है कि विस्थापित लोगों में से अधिकांश को न तो पर्याप्त मुआवजा मिला और न ही कोई स्थाई ठिकाना।

टर्की ने वर्ष 1984 में सीरिया को यह घोषणा की थी कि वह सीरिया के लिए इफरेटिस नदी में कम से कम 500 क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड अथवा 16 क्युबिक किलोमीटर प्रति वर्ष की दर से पानी छोडे़गा। 1987 में दोनो देशों के बीच संधि भी हुई। 1987 में सीरिया और इराक के बीच भी संधि हुई। उसके अनुसार, सीरिया को टर्की द्वारा छोड़े कुल पानी 60 प्रतिशत इराक में जाने देना था। जल बंटवारे को लेकर 2008 में एक संयुक्त त्रिदेशीय समिति बनी। 03 सितम्बर, 2009 को तीनो देशों के बीच पुनः सहमति हुई। लेकिन टर्की ने मूल नदी जल बंटवारा संधि (1987) का उल्लंघन करते हुए 15 अप्रैल, 2014 के बाद से इफरेटिस नदी के प्रवाह में कटौती करनी शुरु की और अपनी दादागीरी जारी रखते हुए 16 मई, 2014 को सीरिया और इराक के हिस्से का पानी छोड़ना पूरी तरह बंद कर दिया। )
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