जल संरक्षण तय करेगा भारत का भविष्य

शिशिर बडकुल

पर्यावरण का संरक्षण हमारा अहम् दायित्व है , अथर्व वेद में लिखा है

‘ माता भूमि पुत्रोअहम पृथिव्यां ‘

पृथ्वी हमारी माता है और हम सब उसकी संतान हैं | प्रकृति ने हमें जीवनदायी सम्पदायें चक्र के रूप में दी हूई हैं |और हमारा कर्तव्य है कि उस चक्र को हम सदैव गतिमान बनाए रखें | हमारी संस्कृति ने हमें ये सिखाया है कि सदैव कृतञ रहना चाहिए । ईश्वर ने धरती पर सभी तरह के जीवनदान दिए हैं ताकि पृथ्वी पर प्रकृति का संतुलन बना रहे। ये सार्वभौमिक सत्य है कि हमारे पूर्वजों ने – संत मुनियों ने अध्यात्म के जरिए प्रकृति का विश्लेषण पूर्व में ही कर दिया था जिसे आगे जाकर विज्ञानी शब्द अविष्कार मिला , जैंसे मानव चक्र – खाद्य चक्र – आॅक्सीजन चक्र – जल चक्र हैं । अगर ये असंतुलित होते हैं तो वह दिन दूर नही रहता जब ये सम्पूर्ण धरा प्रलय के उदर में समाहित हो जाएगी ।

पिछले कुछ वर्षों से हम ये महसूस कर रहें हैं कि प्रकृति अपने ही बनाए मौसमों के समय अंतराल में फेर बदल कर रही है , और कारण कोई और नही बल्कि हम स्वयं हैं जिन्होंने आधुनिकता की दौड में अपने परिवेश के प्रकृतिकरण के साथ खिलवाड़ किया है और निरंतर दोहन से प्राकृतिक अपदाएं आ रही हैं , जिसे वैज्ञानिकों ने नाम दिया ‘ग्लोबल वार्मिंग ‘ । पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि देश के एक कोने में भारी बारिश से जनहानि हो रही है तो कहीं गर्मी और कहीं सूखे से लोग परेशान हैं । जरूरत है कि आज सम्पूर्ण मानव जाति प्रकृति से मैत्री भाव निभाए तो पतन की ओर अग्रसर धरती की गति को रोका जा सकता है ।

देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी की दूरदर्शिता उस योजना में समाहित थी जिसके माध्यम से वो कृषि प्रधान भारत की पहचान पुनः जीवत कर नया कीर्तिमान विश्व को देने तैयार थे , “नदी जोडों अभियान ” अगर अब तक धरातल पर होता तो देश बाढ और सूखे से निजात पा लेता । मध्य प्रदेश में आयोजित हुआ सिंहस्थ जिसका उदाहरण हैं जिसमे प्रदेश की जीवनदायिनी नदी नर्मदा को शिप्रा नदी में मिलाया जिस पर सफल महाकुंभ का आयोजन हुआ ।

अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिवर्ष 1700 घन मीटर से कम प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता के आधार पर पानी की कमी को परिभाषित किया जाता है, भारत में पूर्व से ही प्रति व्यक्ति ताजा जल की उपलब्धता कम है । आज भले ही जल संकट को कम महत्व दिया जा रहा है , पर आने वाले समय मे विश्व व्यापी झगडे की वजह जल संकट ही होगा । भारत के कई प्रांत दूसरे देशों से आने वाली नदियों पर निर्भर हैं भविष्य में अगर चीन की तरह कोई और देश बांधों को बढावा देता है तो देश का फिर एक राज्य सूखे से ग्रसित होगा तो क्यों न हम आज ही सतर्क हो जाएँ । भारत में सूखा और पर्यावरण तथा जलवायु में परिवर्तन के लिए निम्न जल स्तर और वनों की कटाई जैंसे दूसरे कारक अहम भूमिका में हैं । लगातार हो रही तस्करी से हिमालय क्षेत्र में वनों की कटाई सबसे ज्यादा है , जहाँ से भारत ही नही पूरे एशिया की बडी बडी कई नदियों का उद्गम होता है , वनों की कटाई से न सिर्फ पर्यावरण अस्थिर हो रहा है बल्कि सूखे और बाढ की आवृत्ति बढती है । हम जितना भूजल का दोहन कर रहें हैं उतना प्राकृतिक रूप से रीचार्ज न हो पाने के कारण भारत में जल स्तर भयावह रूप से गिर रहा है ।

स्वच्छ जल बहुत तरीकों से भारत ही नही पूरे विश्व के दूसरे देशों में लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा साथ ही स्वच्छ जल का अभाव एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। इस बड़ी समस्या को अकेले या कुछ समूह के लोग मिलकर नहीं सुलझा सकते हैं, ये ऐसी समस्या है जिसको वैश्विक स्तर पर लोगों के मिलकर प्रयास करने की जरुरत है क्योंकि हम जो जल उपयोग में लेते हैं उसे वापिस तो नही कर सकते पर हमारा नैतिक कर्तव्य है कि जल संरक्षण में अपनी भूमिका स्पष्ट करें , मानव प्रकृति तात्कालिक समाधान में ज्यादा विश्वास करती है जबकि हमें इसके विपरीत हमेशा के लिए इस समस्या से निवारण चाहिए है । तो जरूरी है कि खुद के साथ समाज को जाग्रत कर इस बारिश प्रण लें कि बारिश के पानी को गांव -गली-मोहल्ले -शहर में ही उचित संरक्षित करेंगें । और जरूरी है कि लगातार वृक्षारोपण करें क्योकिं मघ्य प्रदेश की नदियाँ हिमलाज नही हैं वो वृक्षो के जल स्राव से ही सरोबार होती हैं । देश की सेवा जरूwaterरी नही कि सेनाओं मे जाकर – पुलिस में भर्ती होकर या किसी सरकारी नौकरी में पहुंचकर हो सकती है एक अादर्श नागरिक बनकर भी हम देश सेवा कर सकते हैं ॥

” आओं खुद को संकल्पित करें

जल ही जीवन का भाव जाग्रत करें ” ॥

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