लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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जल सुरक्षा अधिकार विधेयक,

यह अधिनियम, व्यक्ति के गरिमामय जीवन जीने के लिए, प्रचुर मात्रा में गुणवत्तायुक्त पानी की सतत् पहुँच सुनिश्चित करने और पानी की सुरक्षा प्रदान करने एंव इससे जुड़े अन्य संदर्भो के आनुषंगिक-विषयों का उपबंध करने के लिये है।

भारत गणराज्य के पैसठवें वर्ष में संसद द्वारा इस प्रकार अधिनियमित होः

अध्याय I (एक – प्रारंम्भिक)

संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ

1. यह अधिनियम जल सुरक्षाा का अधिकार प्रदान करने के लिए है।

I इस अधिनियम को ‘जल सुरक्षा का अधिकार अधिनियम (2014) के नाम से जाना जायेगा।
II इसका अधिकार क्षेत्र सम्पूर्ण भारतवर्ष होगा।
III यह अधिनियम, जब तक की अन्यथा अपेक्षित न हो, संसद द्वारा पारित होने के उपरांत अस्तित्व में, एवं प्रभावी समझा जायेगा।

परिभाषाएँ

2. इस अधिनियम के अन्तर्गत, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न होः
1.’जलभृत’ का तात्पर्य, एक ऐसी भौगेालिक संरचना, बनावट अथवा कृत्रिम भूमिसंरचना है,जो जल से पूर्ण हो अथवा जिसमें जलधारण की क्षमता है।
2.’जलभृत हस्तक्षेप गतिविधि’ का तात्पर्य ऐसी गतिविधि से है, जो जलभृत के अन्दर पानी के प्रवेश से जुडी हो, अथवा जलभृत के अन्दर जल के साथ हस्तक्षेप या जलभृत के अन्दर जल के प्रवाह में बाधा डालने, अथवा एक जलभृत के निर्माण क्षेत्र से बाहर जल के खनन या परिवहन, अथवा पुनर्भरण करने, अथवा पुनर्भरण करने की प्रक्रिया में किसी जलभृत से जल का निस्तारण करने, अथवा खनन् या विनिर्माण, अथवा किसी जलभृत में प्रदूषण कारक से प्रदूषित करने से है।
3.’क्षेत्र सभा’ का तात्पर्य, स्थानीय निवासियों के एक औपचारिक या अनौपचारिक निकाय से है।
4.’जैविक अखंडता’ के अस्तित्त्व का तात्पर्य क्षेत्र के जीवों के एक संतुलित प्राकृतिक निवास के अनुरूप एक जाति संरचना, विविधता और कार्यात्मक संगठन और अनुकूल समुदायिक समर्थन बनाए रखने की क्षमता से है।
5.’जल संरचनाओं का संरक्षण’ का तात्पर्य पारिस्थितिकीय, जैविक और जलविज्ञान संबंधी अखंडता के संरक्षण से है।
6.’जल संरचनाओं का विनाश’ का तात्पर्य ऐसी गतिविधियों से है, जो पारिस्थितिकीय, जैविक और जलविज्ञान संबंधी अखंडता को विकृत अथवा विनष्ट करने से है।
7.’जलनिकास बेसिन या जल संग्रहण क्षेत्र’ का तात्पर्य ऐसे क्षेत्र से है, जहां सतह जल – वर्षा जल अथवा बर्फ पिघलने से सामान्यतः बेसिन के निकास पर एक बिन्दु में परिवर्तित होता हो, जहाँ जल किसी अन्य जल संरचना में मिलता हो; उदाहरणस्वरूप नदी, झील, जलाशय, आर्द्रभूमि, मुहाना, समुद्र या सागर आदि। जलनिकासी बेसिन प्रणाली में; धारा एंव नदियाँ जो जल को संचारित करती हैं तथा पहाड़ों और पहाडि़यों सहित भूमि सत, जिनसे जल निकास सम्पन्न होता है; दोनो सम्मिलित हैं।
8.’पारिस्थितिक अखंडता’ के अनुरक्षण का तात्पर्य जलसंरचना, प्रणाली के लिये ‘सामान्य’ अथवा ‘बेहतर’ स्वतः संशोधन और संगठित रहने की क्षमता को बनाये रखने से है।
9.’शोषण’ का तात्पर्य व्यक्तियों द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित प्रति व्यक्ति मानदंडों से अधिक जल का उपयोग किए जाने से है।
10.’रहवास’ का तात्पर्य किसी भी जनगणना गांव या जनगणना शहर से है।
11.’जलीय अखंडता’ का तात्पर्य संतुलित जल वैज्ञानिक, जलीय परिस्थितियों के तुलनात्मक रूप से स्थानिक मानदंड और स्थानीय प्राकृतिक विशेषताओं के अनुरूप बनाये रखने से हैं।
12.’मानसून’ का तात्पर्य वायुमंडलीय परिसंचरण में मौसमी परिवर्तनों से है, जो भूमि और समुद्र के असीमित गर्म होने से जुड़े हैं। इसके अन्तर्गत; जून में पहुंचने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून और सितंबर में पहुंचने वाले उत्तर-पूर्वी मानसून दोनों शामिल हैं।
13.’स्थानीय प्राधिकारी’ का तात्पर्य पंचायत, नगर निगम या नगर परिषद् (जिन नामों से जाना जाता हो) अथवा कैन्टूनमेन्ट बोर्ड अथवा अन्य निकाय से है, जिसे कानून के तहत् अथवा जिस अधिनियम के अन्तर्गत यह गठित हों; जल आपूर्ति करने की जिम्मेदारी दी गयी हो।
14.’अधिसूचना’ का तात्पर्य इस अधिनियम के तहत जारी एवं सरकारी राजपत्र में प्रकाशित किसी अधिसूचना से है।
15.’व्यक्ति’ का तात्पर्य संगठन या सरकार अथवा जैसा कानून के द्वारा निर्धारित हो; से है।
16.’संरक्षित’ का तात्पर्य इस अधिनियम का किसी भी प्रकार से भारतीय दंड संहिता की धाराओं 299, 304 अ, 308, 316-338 और अन्य प्रासंगिक धाराओं के उल्लंघन द्वारा संज्ञेय अपराध से है।
17.’वर्षा जल संचयन’ का तात्पर्य वर्षा जल के संग्रहण और भंडारण से है। जलस्रवण प्राकृतिक वर्षा जल संरक्षण प्रणाली है। इस तरह की प्रणाली से जिस पर दर जल एकत्र किया जा सकता है; वह प्रणाली के क्षेत्रफल, इसकी दक्षता और बारिश की तीव्रता पर निर्भर है (अर्थात् वार्षिक वर्षा (प्रतिवर्ष मिमी) X जलग्रहण क्षेत्र (वर्ग मीटर) X टपकन दक्षता (लीटर प्रतिवर्ष उपज)। नदियों प्रणालियो के संदर्भ में दक्षता 0 के निकट है।
18.’आरक्षित’ का तात्पर्य प्राकृतिक उद्देश्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी उद्देश्य के लिए अनुपलब्धता से है।
19.’नदी’ का तात्पर्य एक प्राकृतिक प्रणाली अथवा कृत्रिम रूप से पुनर्गठित प्राकृतिक प्रणाली एवं अन्य सहायक नदियां शाखा या अन्य धाराओं , किसी भी नाम से , वर्ष भर बहने वाली अथवा मौसमी नदी, किसी भी सतह या उपसतह धाराओं से है।
20.’नदी संरक्षण क्षेत्र’ का तात्पर्य मुख्य नदी या झील के दोनों तरफ 100 मीटर के भीतर सभी प्रकार के निजी भूमि तथा बाढ क्षेत्र; सहायक नदी या शाखा या अन्य जलाशय के दोनों ओर 10 मीटर के दायरे में शामिल भूमि से है।
21.’अनुसूची’ का तात्पर्य इस अधिनियम में संलग्न अनुसूची से है।
22.’सामाजिक अंकेक्षण’ का तात्पर्य क्षेत्र सभा द्वारा इस अधिनियम के दायरे के भीतर किसी भी कार्यक्रम के आयोजना बनाने औैर उन योजनाओं के क्रियान्वयन करने तथा उस क्षेत्र में अवस्थित समस्त जल संरचनाओं की स्थिति की निगरानी और मूल्यांकन करने की प्रक्रिया से है।
23.’राज्य सरकार’ का तात्पर्य एक संघीय राज्य क्षेत्र के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त प्रशासक से है।
24.’उप सतही जल’ या ‘भूजल’ का तात्पर्य मिट्टी और चट्टानों के रोमकूप में अवस्थित जल से है। इसके अन्तर्गत जलभृत के अन्दर जलवाही स्तर के नीचे बहने वाला जल भी शामिल है। कभी कभी यह उप-सतही जल और जलभृत में सतही जल के बीच अंतर बनाने के लिए उपयोगी है।
25.’भूतल जल’ या ‘सतही जल’ का तात्पर्य बारिश या ओले के रूप में गिरने के पश्चात् अथवा किसी अन्य रूप में; अथवा (जलमार्ग के अतिरिक्त) प्राकृतिक रूप से भूमिगत जल के सतह के ऊपर से बहने; अथवा एक बांध या जलाशय में; अथवा तूफान से बने अवसंरचना में एकत्रित भूमि के ऊपर बहने वाले जल से है।
26.’धारणीय दोहन’ का तात्पर्य निकासी दर का पुनर्भरण की दर से कम होना है और ऐसा करने में नदी के प्रवाह की दर में एक प्रतिशत से ज्यादा की कमी नहीं होती हो।
27.’जल संसाधन से जल लेने’ का तात्पर्य जल को पंप द्वारा या साइफन करके निकालना, रोकने, बाधा उत्पन्न करने (यह जलमार्ग हो अथवा नहीं) अथवा भूमि पर पानी का प्रवाह बदलने, अथवा जल संग्रहण के उद्देश्य से किसी जल संरचना में लिए बाधा उत्पन्न करने, अथवा जल प्रवाह को निर्देशित करने अथवा जल प्रवाह के मार्ग परिवर्तित करने, झील के पानी को निष्कासित करने, जल को कुएँ द्वारा प्राकृतिक दबाव में बहाव की अनुमति देने, जलमार्ग द्वारा एकत्रित पानी को पीने की अनुमति देने, प्राकृतिक अथवा कृत्रिम झील, बाँध अथवा जलाशय द्वारा पूर्ववर्ती पैरा में निर्दिष्ट किसी उद्देश्य हेतु अनुमति अथवा निर्दिष्ट होने से है।
28.’भूमिगत जल’ का तात्पर्य स्वभाविक रूप से जमीनी स्तर के नीचे बहने वाले जल या पंप द्वारा या मार्ग परिवर्तन द्वारा भूमिगत संग्रहण के उद्देश्य से जल के भंडारण से है।
29.’जल संरचना’ का तात्पर्य किसी भी झील, नदी, तालाब, नाला, धारा, टैंक, कुआँ अथवा सार्वजनिक या निजी स्वामित्व वाले मौसमी या बारहमासी जल के अन्य विशिष्ट जल संरचना और किनारो से है। जल संरचना में मानसून के जलग्रहण क्षेत्र, वर्षा जल के निषकासित और अवशोषित करने वाली सभी सहायक ऊपरी धाराएँ, अथवा उप सतह भी शामिल हैं।
30.’जल खण्ड’ का तात्पर्य नदी के किनारे जल निष्कासन के किसी भी बिंदु पर व्यास की चैड़ाई के बीस गुणा बराबर वृत्त द्वारा आच्छादित क्षेत्र होगा ।
31.’जल धारण क्षमता’ का तात्पर्य किसी स्थान पर निवास करने वाले क्षेत्र की अधिकतम आबादी को विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंड के अनुसार बिना किसी निर्भरता के जल की आपूर्ति से है।
32.’जलमार्ग’ का तात्पर्य नदी, खाडी या अन्य प्राकृतिक जलाशय (संशोधित अथवा नहीं) से निहित है, जिसमें जल प्रवाह स्थायी रूप से या समय समय पर होता है अथवा इसमें बांध या जलाशय; जो जलमार्ग में जल को एकत्रित करता है, अथवा झील जिसके माध्यम से जल प्रवाह होता है, अथवा एक प्रवाह जिसमें जल अथवा जलमार्ग को परिवर्तित किया जाता है; अथवा मुहाना जिससे होकर जल प्रवाहित होता है; शामिल है।
33.’जलतट’ का तात्पर्य’ किसी भी नदी का किनारा, उसके साथ अवस्थित भूमि, किसी भूमि के समानान्तर और निर्धारित अंतर्देशीय दूरी, नदी के सबसे ऊँचे किनारे, किसी झील के किनारे अवस्थित किसी भूमि के साथ और इसके समानान्तर रेखा के अनुरूप, और निर्धारित अंतर्देशीय दूरी और झील के तट अथवा किसी मुहाने के किनारे, मुहाने के किनारे अवस्थित किसी भूमि के साथ और इसके समानान्तर रेखा के अनुरूप, और निर्धारित अंतर्देशीय दूरी और मुहाने पर माध्य ऊँचाई पर जल के चिन्ह अथवा राज्य के जलतट वाली किसी भूमि और तट के माध्य ऊँचाई पर और इसके समानान्तर रेखा के अनुरूप, और निर्धारित अंतर्देशीय दूरी और तटीय जल की माध्य ऊँचाई जहाँ प्रस्तावित दूरी 40मीटर या कम है, से है। दो अथवा अधिक वर्गों में पडने वाली भूमि सम्बन्धित पैराग्राफ के अनुरूप जलतट कहलायेगी और इसके अन्तर्गत सभी प्रकार की आर्द्रभूमि एवँ नदी संरक्षण प्रक्ष्¨त्र चाहे वो प्रस्तावित दूरी के भीतर या बाहर हों, शामिल होगी।
34.’जल दुर्लभता’ का तात्पर्य; क्षेत्र में उपभोग की माॅग को पूरा करने के आवश्यक पर्याप्त जल संसाधनो का अभाव है।
35.’जल सुरक्षा’ का तात्पर्य सभी जल संरचनाओं के निरन्तर अस्तित्व और प्रवाह का संरक्षण है; जिससे भविष्य की पीढियों के लिये बिना किसी समझौते के पानी का उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
36.’जल दबाव’ का तात्पर्य एक निश्चित अवधि में जल की मांग का; जल की उपल्ब्धता से अधिक होना अथवा खराब गुणवत्ता के कारण इसका उपयोग सीमित होने से है।
37.’जलस्रोत’ का तात्पर्य सम्पूर्ण या किसी भाग में सभी नदियों, झीलो, अथवा मुहानों अथवा इसके किसी हिस्से अथवा एक या एक से अधिक स्थान जिसमें प्राकृतिक रूप से सतह के ऊपर या भूमिगत जल से है; जिसमें राज्य के तटीय जल शामिल हैं।
38.’कुएॅं’ का तात्पर्य भूमिगत पानी प्राप्त करने के प्रयोजन से की गई जमीन की खुदाई या किसी अन्य उद्देश्य के लिए की जमीन की खुदाई से भूमिगत जल तक पहुॅच या किसी प्राकृतिक रूप से खुली हुई जमीन से भूमिगत जल की प्राप्ति तक पहुॅच से है।
39.’आर्द्रभूमि’ का तात्पर्य ऐसी भूमि से है; जो (प्राकृतिक या कृत्रिम प्रक्रिया के माध्यम से) स्थायी अथवा अस्थायी रूप से जलप्लावित है ; इसके अन्र्तगत- समय पर पानी के साथ बाढ की भूमि जहां स्थिर या बहता जल और ताजे से खारा जल तक सभी शामिल है; और जहाँ जलप्लावन (स्थायी रूप से या समय – समय पर ) बायोटा या पारिस्थितिकीय प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है; और आर्द्रभूमि के रूप में नामित अन्य क्षेत्र शामिल है, किन्तु इसमें जल की व्यवस्था के लिए एक व्यक्ति द्वारा पूरी तरह से अथवा प्रमुख रूप से प्राथमिक उत्पादन अथवा मानव उपभोग के लिये जल अथवा मुहाने या समुद्र का कोई भी हिस्से शामिल नहीं हैं।
अध्याय II(द्वितीय) जल सुरक्षा के प्रावधान

अभिलेख एवँ अंकेक्षण

3. प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी
•इस अधिनियम के अन्र्तगत दी गई अनुसूची एक में विनिर्दिष्ट जलभृतों के विधिवत् सूचीबद्ध और इस प्रकार के प्रारूप में अनुक्रमित अभिलेख बनायगें; जिससे जल सुरक्षा के अधिकार को प्रोत्साहन मिले; तथा यह सुनिश्चित करेंगे कि इस तरह के अभिलेख व सभी सूचनाएॅ एक उचित समय के भीतर, विभिन्न प्रणालियों द्वारा कम्प्यूटरीकृत कर, एक नेटवर्क के माध्यम से पूरे देश में उपयोगी हो सके।
•इस अधिनियम के लागू होने से एक सौ बीस दिनों के अंदर उनके क्षेत्राधिकार में आने वाले सभी जल संरचनाओं, पहाडि़यों और पठारों के नक्शे प्रकाशित करें; और इस अधिनियम के अन्तर्गत उन्हें सुरक्षित व संरक्षित करना घोषित करे।
•इस अधिनियम के अन्तर्गत सूचीबद्ध सभी जल संरचनाओं को अपनी वेबसाइट पर डालेंगे तथा उस क्षेत्र के सभी समाचारपत्रों, रेडियो, टी.वी. चैनलों को प्रेस विज्ञप्ति जारी करेंगे; और इस अधिनियम के अन्र्तगत किसी स्थायी संरचनाओं में हुई चूक या आयोग द्वारा दिये गये सुरक्षित और संरक्षित उपायों को भी घोषित किया जायेगा। इस अधिनियम के अन्र्तगत जारी प्रेस विज्ञप्ति को अनिवार्य रूप से प्रकाशित और प्रसारित करना होगा। एक पृष्ठ की प्रेस विज्ञप्ति के विज्ञापन तथा दो मिनट के ऑडियो / वीडियो विज्ञापन पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कोनिशुल्क प्रकाशित व प्रसारित करना होगा, ऐसा करने में विफल रहना दण्डणीय अपराध माना जायेगा।
•इस अधिनियम के लागू होने से एक सौ बीस दिनों के भीतर जिला प्रशासन को संसाधनों के आवंटन करने होंगे तथा जल निकायों के किसी भी अतिक्रमण और उल्लंघन या प्रदूषण से मुक्त करने के लिए कार्य योजना उपलब्ध कराने होगें जो अधिकतम तीन वर्ष से अधिक की नही होगी।
•प्रत्येक वर्ष के दिसम्बर माह से पहले सभी जल संरचनाओं और सीमाओं का सामाजिक अंकेक्षण कराकर प्रकाशित करना होगा।
• नियंत्रक महालेखा परीक्षक द्वारा प्रति वर्ष 31 मार्च के पहले, सभी जल संरचनाओं की स्थिति का प्रतिवेदन प्रकाषित करना होगा।
•किसी बस्ती की क्षमता से अधिक पानी बाहर ले जाने पर उसका विकास अवरूद्ध होता हो या प्रदूषण को रोकने और उपचार की प्रक्रिया या पौध विकास के प्राकृतिक क्षमता में कमी आती हो, और बस्तियों के सभी विकास अवरुद्ध होते हो, तो इस दशा में इस अधिनियम की आवष्यक क्रियान्वयन करने तक जल सुरक्षा सुनिष्चित किया जाएगा।
कानून बनाने पर प्रतिबंध

4. किसी अन्य विधि में; किसी बात के तत्समय प्रवृत्त होते हुए भी, कोई राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी, किसी भी कानून या आदेश का निर्देशन नही करेगाः
•किसी भी जल संरचना या उसके किसी हिस्से को जब्त कर सुरक्ष्ति रखा जा सकेगा।
•जल संरचना के प्राकृतिक रूप से कार्य के अलावा, किसी भी जल संरचना या उसके किसी भाग को अन्य किसी भी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नही किया जा सकता।
•किसी भी जल संरचना और तट या उसके किसी भी अंश या पट्टे को किसी भी निजी व्यक्ति के लिए या किसी भी प्राधिकरण, निगम, एजेंसी या किसी अन्य संगठन को नही सौंपा जा सकता।
•किसी भी जल संरचना या जलतट या उसके किसी अंश में स्वाभाविक रूप से उसके किसी भी वनस्पति को; किसी भी उद्देश्य के लिए, साफ नहीं किया जा सकता।
•किसी भी जल संरचना या तट या किसी भी अंश का उपयोग किसी भी खनन, भराव, निर्माण या संबद्ध गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता।

अध्याय III (तृतीय) जल निकाय के गतिविधियो पर प्रतिबन्ध

निषिद्ध गतिविधियां

5. कोई भी व्यक्ति, किसी भी जल संरचना अथवा जलतट या उसके किसी अंश में स्थायी अथवा अस्थायी तौर पर दीवार, बाड़ा, अवरोध़, प्रवाह प्रणालीें, इमारत, शालिका का निर्माण नही कर सकता।

6. कोई भी व्यक्ति, किसी भी जल संरचना अथवा जलतट या उसके किसी अंश में किसी भी प्रकार का नली, तार या किसी भी अन्य प्रकार का निर्माण कार्य नही कर सकता।

7. कोई भी व्यक्ति, किसी भी जल संरचना अथवा जलतट या उसके किसी अंश में किसी भी प्रकार का कोई उद्योग आरम्भ नही कर सकता।

8. कोई भी व्यक्ति, किसी भी जल संरचना अथवा जलतट या उसके किसी अंश में खेती, खदान का कार्य, अथवा किसी भी प्रकार का भंडारण, अपशिष्ट डालने, अथवा सड़कों के रूप में प्रयोग नही कर सकता।

9. कोई भी व्यक्ति, किसी भी जल संरचना अथवा जलतट या उसके किसी अंश में आवासीय या कोई अपषिष्ठ पदार्थ, सीवेज, दूषित जल, जिससे जल संरचनाएॅ दूषित होता हो; आदि नही डाल सकता अथवा ऐसा करने में सहायक नहीं हो सकता।

10. कोई भी व्यक्ति, कोई भी ऐसी गतिविधि नहीं कर सकता, जो जल संरचनाओं अथवा जलतट या उसके किसी अंश को नुकसान पहुॅचाता हो अथवा उसके विनाष का कारण बनता हो, अथवा प्राकृतिक प्रवाह को बदलने अथवा उसके जैविक, पारिस्थितिकीय या जलविज्ञानिकी अखंडता के लिये खतरा उत्पन्न करता हो।

11. कोई भी व्यक्ति, ऐसी कोई भी ग्तिविधि नही कर सकता जिसका परिणाम ‘जलभृत हस्तक्षेप गतिविधि‘ से जुड़ता हो या ऐसा होने का अन्देशा हो।

12. कोई भी व्यक्ति, किसी जल संरचना के शोषण करने या शोषण करने में सहायक कारक नही बन सकता।
13. कोई व्यक्ति जल खण्ड के अपने हिस्से से अधिक जल नही ले सकता है।

अनुमति क्रियाएँ

14. यदि सुरक्षित और संरक्षित क्षेत्र की संपत्ति किसी मानव बस्ती के निकट अथवा संलग्न है, तो उसे तार के बाड़ या वनस्पति बागान के साथ मलबा के टीले और उसके द्वारा सीमांकन किया जा सकता है।

15. वर्षा जल को खुली धाराओं के द्वारा जल संरचनाओं या जलमुख में, किसी भी पाइप का उपयोग किये वगैर बिना किसी प्रदूषण के साथ जारी किया जा सकता है।

16. नदियों में उपलब्ध जल का दोहन किया जा सकत है; बशर्ते यह इसके लिये निहित खुली धारा द्वारा नदी की चैडाई के दस गुना और लम्बाई के दसवें हिस्से के बराबर परिधि से किया जा रहा हो। साथ ही ऐसी किसी फसल द्वारा सतत दोहन न हो रहा हो, और जल खण्ड में किसी के भी द्वारा ऐसे दोहन से जल तक पहुँच बाधित न होती हो।

17. तदनुरूप मौसम में अधिसूचना द्वारा कुछ समय के लिये मछली पकडने की अनुमति दी जा सकतीहै।

18. जहाॅ जलमुख पर विद्यमान में कोई पेड़ नही हो, वहाॅ जल संरचनाओं के संरक्षण गतिविधियों और स्वदेशी पेड़ के साथ वनीकरण करने की अनुमति दी जा सकती है।
अध्याय IV (चतुर्थ) प्रशासन और दंड

नदी ब्लॉकों का स्वशासन
19. एक जल संगठन के लिये; ऐसे सभी हितधारकों द्वारा नदी पंचायत या क्षेत्र सभा का गठन किया जा सकता है; जिनके जीवन और आजीविका नदी के प्राकृतिक अस्तित्व निम्न प्रकार से प्रभावित होते हों :
•वे नदी खण्ड में रहते हों ,
•ये जल संगठन में मछली पालन का काम करते हों ,
•वे वर्षा जल संग्रहण के लिए नदी पर निर्भर हों ।
20. ऐसे सभी लोगों को ग्राम सभा के समान नदी के अधिकारों की रक्षा और इस अधिनियमय के निहितार्थ के अन्तर्गत जल सुरक्षा करने के लिए एक पंचायत का गठन कर सकते हैं।

21. पंचायत को जल संरचनाओं के जैविक, पारिस्थितिकीय और जलविज्ञानिक अखंडता सुनिश्चित करने के लिए सभी शक्तियां प्राप्त होंगी। पंचायत के सभी जल संरचनाओं की अखंडता को सुनिश्चित के समस्त प्रस्ताव स्थानीय प्राधिकरण पर बाध्यकारी होगा। पंचायत में इस अधिनियम के तहत अनुज्ञप्त मात्रा से अधिक जल दोहन नहीं कर सकता बशर्ते किः
•पंचायत निम्न में से एक पर त्रैमासिक भौतिक अंकेक्षण करेगाः
•पानी की स्वतंत्र और प्राकृतिक प्रवाह,
•जल संरचनाओं और जलतट पर अतिक्रमण का अभाव,
•नदियों में किसी भी प्रवाह के माध्यम से प्रदूषण का अभाव,
•जल संरचनाओं के उपयोग के साथ उपयोगकर्ताओं की सूची,
•जल खण्ड से जल निकासी की दर,
•जल संरचनाओं से जल, वनस्पति या जीव निकासी पर प्रतिबंध; यदि कोई हो,
•ये अंकेक्षण रिपोर्ट प्रतिवर्ष दिसम्बर से पूर्व अपनी वेवसाईट पर स्थानीय प्राधिकरण द्वारा ‘जल संरचनाओं की दशा‘ के रूप में प्रकाशित किया जाएगा।
अपराध होने का संज्ञेय

22. सभी निषिद्ध गतिविधियाँ; भारतीय दंड संहिता के तहत् संज्ञेय अपराध हैं , और अधिनियम को भंग करने वालो पर सजा के तहत अधिकतम जुर्माना व दस साल का दंड या दोनो तथा जल संरचनाओं की बहाली के लिये पूर्ण भुगतान की वसूली करने, प्रत्येक प्रतिबद्ध अपराध पर मिश्रित सजा, क्षेत्र में जल निकायों के मानचित्रण कर उस क्षेत्र के प्रत्येक भाग के शोषण पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर क्षेत्र-सभा, स्थानीय अधिकारियों, और स्थानीय पुलिस, तथा स्थानीय निकाय अपनी वेबसाईट पर ऐसी सभी रिपोर्ट प्रकाशित करेगा।

23. इस कानून के तहत अपने दायित्वों को पूरा न करना स्थानीय अधिकारियों की विफलता समझा जाएगा तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 166-169 के तहत अपराध के रूप में दर्ज किया जाएगा।
अनुसूची – एक

जल संरचनाओं का अभिलेख

स्थानीय निकाय का नामः रिकार्ड का दिनांकः

क.सं./ जल निकाय का नाम और विवरण/बाये किनारे का सर्वे नं. / दाहिने किनारे का सर्वे नं./जल निकाय का सतही क्षेत्र / बायें किनारे पर जलाभिमुख क्षेत्र / दायें किनारे पर जलाभिमुख क्षेत्र
उद्देश्य और कारणों के कथन

एक अधिकार; परिभाषित और सशक्त करता है कि कोई व्यक्ति दूसरो की अनुमति के बिना निर्दिष्ट गतिविधियां कर सकता है । यह दूसरों पर ऐसा न करने के लिये; नैतिक और कानूनी अवरोध उत्पन्न करता है।

एक व्यक्ति द्वारा अपने अधिकारों का प्रयोग दूसरों के अधिकारों को कम नहीं करता। यह केवल दूसरों पर हस्तक्षेप न करने का दायित्व आरोपित करता है। एक अधिकार बलपूर्वक किसी के द्वारा जीवन का समय, गरिमा, स्वतंत्रता, संसाधन, धन या संपत्ति हड़पने का प्रयास में लगे लोगों से संरक्षण है।

एक अधिकार; दूसरों के कार्यों से आभासित और प्रर्वतित नहीं किया जा सकता है। एक अधिकार; दूसरों की अनुमति के बिना काम करने की शक्ति देती हैं।

एक अधिनियम; संचालन से संबंधित एक सही दिशा में तत्काल और पूर्ण पहुँच उपलब्ध कराता है। इस तरह के उपयोग से दूसरों के अधिकार को खतरे में नही डाला जा सकता, विशेष रूप से, उन लोगों के जो उपस्थित नही है; वर्तमान में अपना प्रतिनिधित्व नही कर सकते; अन्य स्थानों पर है अथवा अधिकार प्राप्त करने में सक्षम नही है,जैसे भविष्य की पीढियाॅं।

भारत को जिन जल संरचनाओं पर गर्व था वह अत्यन्त तीव्रता से बर्बाद और समाप्त हो रहे हैं; जो जल अधिकार और जल सुरक्षा के लिये खतरा बन गया है। इसलिए अत्यन्त्य आवश्यक है कि, न सिर्फ आज के अधिकारो की रक्षा, बल्कि अगली पीढ़ियों को ध्यान में रख कर जल संरचनाओं की सुरक्षा हेतु तुरन्त आवश्यक कार्यवाही जरूरी है।

अतैव, यह जल सुरक्षा अधिनियम, (2014) को अधिकार के रूप प्रदान करने का प्रस्ताव है, तद्नुसार विशेषाधिकार के स्थान पर एक सही और सशक्त अधिकार प्राप्त हो सके।

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