लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under पर्यावरण.


– अखिलेश आर्येन्दु

वैज्ञानिकों के मुताबिक अगला युद्ध तेल, पूंजी या तानाशाही स्थापित करने को लेकर नहीं, बल्कि पानी को लेकर होगा। यह अनुमान काफी हद तक सच भी दिखाई पड़ने लगा है। पानी की कमी भारत जैसे विकासशाील देश में ही नहीं दिखाई पड़ रही है बल्कि उन विकसित देशों में भी हो गई है जो पानी के मामले में मालामाल थे। लेकिन दुनिया में पानी की वैसी बर्बादी और कहीं नहीं दिखती, जैसी भारत में है। दुनिया के ज्यादातर देशों में यह आम संस्कृति है कि जिस चीज की कमी हो उसकी किफायत बरती जाती है। लेकिन भारत में आजादी के बाद जैसे हर चीज में मनमानी शुरू हुई, वैसे पानी के मामले में भी हुई। इसका परिणाम यह हुआ कि देश का बहुत बड़ा इलाका आज पानी की कमी से जूझ रहा है। इसके अलावा पानी की कमी का एक बहुत बड़ी वजह बहुराष्ट्रीय केंपनियों के जरिए पानी को बिकाऊ बना देना भी है।

भारत वह देश रहा है जहाँ पानी, और प्रकृति की दूसरी चीजों को बेचना पाप या अपराध माना जाता रहा है। लेकिन आजादी के बाद विकास का जो मॉडल अपनाया गया उसमें वह हर चीज बिकाऊ के दायरे में ला दी गई जिससे आय हो सके। लेकिन 1993 में नरसिंहाराव सरकार ने विकास का एक ऐसे मॉडल को स्वीकार किया जो पूरी तरह विदेशी थी। भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के नाम पर देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों गिरवी रख दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इतनी तेजी से किया गया कि लाखों सालों का जैवीय संतुलन पंद्रह सालों में ही असंतुलित हो गया। इसका असर सबसे ज्यादा आम आदमी पर पड़ा। मतलब गांवों में किसान और शहरों में गरीब पानी के लिए तरसने लगा। शहर ही नहीं, कस्बों में और कहीं-कहीं गांवों तक, बोतलबंद पानी घड़ल्ले से बिकने लगा। इतना ही नहीं, पानी का कारोबार इतनी तेजी से बढ़ा कि रातोंरात हजारों कारोबारी इसके धंधे में आ गए। पानी से बड़ा मुनाफे वाला व्यवसाय दूसरा कोई नहीं है। पानी हमारी संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। इस वजह से यह भारतीय जनजीवन के लिए बाजार की वस्तु नहीं हो सकता है। लेकिन इस धारणा और मान्यता को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने यह कह कर नकार दिया कि जिस तरह से धरती की हर वस्तु बाजार की वस्तु हो सकती है, वैसे पानी भी। इतनी भी बात होती तब भी गनीमत थी। इसके अलावा उन्होंने यह कहना प्रारंभ किया कि पानी की ठंई से हमारी प्यास नहीं बुझ सकती, बल्कि कोल्ड ड्रिंक्स इसके लिए जरूरी है। उन्होंने पानी का अकूत दोहन कोल्ड ड्रिंक्स बनाने से लेकर दूसरे तमाम बाजारू उत्पादनों के लिए भी करना शुरू किया। इस वजह से पिछले पंद्रह सालों में पाताल के पानी का स्तर 3 से लेकर 100 फिट तक देश के विभिन्न इलाकों का कम हो गया। बहुराष्ट्रीय कम्ंपनियों के इस अकूत दोहन को डब्ल्यूटीओ ने यह कह कर जायज ठहराया कि पानी लोगों को मुफ्त में मिलने की वजह से वे इसका ठीक से इस्तेमाल नहीं करते हैं। मतलब इसे बाजारू बनाना हर तरह से जायज है। देखा जाए तो यह ऐसा तर्क है कि किसी वस्तु का दुरुपयोग रोकने के लिए कार्य प्रणाली या तरीका दुरुस्त न कर उसे महंगा बना दिया जाना तर्कसंगत माना जाए।

आजादी के बाद और डब्ल्यूटीओ का सदस्य बनने के बाद भारत में धनी वर्ग और धनी होता गया और गरीब और गरीब। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें इस सच्चाई को मानने के लिए तैयार नही हैं। यह हकीकत भी वे नहीं मान रहीं हैं कि समाज में गैरबराबरी, बेरोजगारी, अराजकता और शोषण तेजी के साथ बढ़ा है। पानी के मामले में भी यही हुआ है। देश के जिन इलाकों में पानी की अत्यधिक किल्लत है वहां का गरीब तबके की हालत और भी बद्तर हो गई। इस वर्ग को कभी पानी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी।

लेकिन भूमंडलीकरण के बाद पानी भी इसे खरीदना पड़ रहा है। पानी बेचने में इस वक्त 20 कंपनियां लगी हुई हैं। कोकांकोला का किल्ले, नेस्ले, पेप्सी का एक्वाफिना और शराब बेचने वाली कंपनी किंगफिशर का बोतलबंद पानी जैसी तमाम कंपनियां धड़ल्ले के साथ पानी बेच रही हैं। इनका पानी प्रति बोतल 12 रुपए से लेकर 15 रुपए में बिक रहा है। यही

भाव गांवों में दूध का है। कहीं-कहीं तो पानी दूध से भी महंगा है। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में रोजाना 50 करोड़ रुपए से ज्यादा ‘मिनरल वाटर’ की बिक्री होती है। सालाना यदि इसका हिसाब लगाएं तो इसका हिसाब 18 हजार करोड़ का बैठता है। मतलब हर साल बहुराष्ट्रीय कंपनियां केवल पानी बेच कर इतनी बड़ी रकम अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में भेज देती हैं। सोचा जा सकता है कि जिस तरह से पानी का संकट बढ़ रहा है। आने वाले वक्त में ये कंपनियां पानी के जरिए भारत का पैसा अपने गृह देश भेजेंगी। कोल्ड ड्रिंक्स और दूसरे उत्पादों के जरिए जो पानी ये कंपनियां बेचती हैं, वह अलग ही है। मतलब देश का ‘पानी’ बेचने का ठेका केंद्र सरकार ने विदेशियों को सौंपा हुआ है। इससे देश का ‘पानी’ बिकने से कैसे सुरक्षित रह पाएगा, एक बहुत बड़ी चिंता की बात है।

गांवों में जो किल्लत पानी को लेकर है सो है ही, शहरों में भी है। शहरों में अपनी सुविधानुसार समाज का हर तबका पानी बर्बाद करने में लगा हुआ है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बंगलौर जैसे मेट्रो शहरों में ही नहीं, छोटे शहरों में रहने वाले लोग भी पानी की बर्बादी करते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली भारत का ऐसा बड़ा शहर है जहां पानी की बर्बादी सबसे अधिक होती है। यहां रोजाना हर आदमी 200 लीटर पानी का इस्तेमाल करता है। लेकिन इसका आधा यानी 100 लीटर पानी यूं ही बहा दिया जाता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि पानी की बर्बादी किस तरह से बढ़ती जा रही है। सरकार इस बर्बादी को रोकने की कोशिश करने की बात तो करती है, लेकिन हकीकत यह है कि सरकारी कार्यालयों में भी पानी की दिल खोल कर बर्बादी की जाती है। आम आदमी जो बर्बादी करता है, वह तो है ही। यानी पानी का ‘पानी’ उतारने के लिए समाज का हर वर्ग मुस्तैदी के साथ लगा हुआ है। लेकिन सोचने की बात यह है कि पानी का ‘पानी’ आज हम भले ही उतार कर खुश हो लें, आने वाले वक्त में पानी भी हमारा पानी उतारेगा, इससे कोई दंकार नहीं कर सकता है। इसलिए अभी से यदि हम पानी की किफायत पर जोर देना शुरू कर दें तो आने वाले वक्त में पानी की बढ़ती समस्या से कुछ हद तक बच सकते हैं। दरअसल, पानी की समस्या से रूबरू होने के बावजूद हम अपने तईं किफायत बतरने में आगे नहीं आते, बल्कि दूसरों से पानी की किफायत करने की आशा रखते हैं। इस वजह से पानी की बर्बादी से हम नहीं बच पा रहे हैं। दूसरी बात, प्रकृति प्रदत्त जितनी भी प्राणप्रदायक चीजें हैं उनके प्रति हम सीमा से अधिक लापरवाही बरतते हैं। इसलिए हवा, पानी, मिट्टी और जंगली वनस्पतियां, सभी लगातार प्रदूषित और संकुचित होते जा रहे हैं। जब तक हमारी दृष्टि प्रकृति प्रदत्त इन सम्पदाओं के प्रति स्वस्थ नहीं होगी तब तक इनकी बर्बादी को रोका नहीं जा सकता है।

* लेखक ‘संस्कारम्’ के पूर्व संपादक और समाजकर्मी है।

One Response to “पानी का ‘पानी’ उतारने में किसे आती है शर्म”

  1. sunil patel

    अखिलेश जी ने बिलकुल सही बात कही है. वाकई शर्म है की इस देश में पानी दूध से भी महंगा बिकता है. एक समय गली गली में प्याऊ हुआ करती थी जो की अब दुर्लभ हो गई है.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *