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    Homeसाहित्‍यकविताहमें इंसानियत की वाजिब सूरतेहाल चाहिए

    हमें इंसानियत की वाजिब सूरतेहाल चाहिए

    —विनय कुमार विनायक
    हमें ना दोजख, ना जन्नत बेमिसाल चाहिए,
    हमें तो चैन-सुकून का भारत विशाल चाहिए!

    हमें ना किल्लत चाहिए, ना जिल्लत चाहिए,
    हमें अपने देश के लोगों में मिल्लत चाहिए!

    हमें ना मालामाल चाहिए, ना फटेहाल चाहिए,
    हमें सब कोई अपने देश में खुशहाल चाहिए!

    हमें ना गंजेड़ी-भंगेड़ी, ना कोई मताल चाहिए,
    हमें टी.वी.स्क्रीन पे सच्चरित्र मिसाल चाहिए!

    हमें ना उन्मादी,ना ही सियासी दलाल चाहिए,
    हमें नेताओं में मानवीय करुणा बहाल चाहिए!

    हमें ज्ञात है उनकी मंशा, चाल-चलन व नीयत,
    हमें तो इंसानियत की वाजिब सूरतेहाल चाहिए!

    बंद करो ईमान, धरम, मजहब की चोचलेबाजी,
    हमें विदेशी रंग-रोगन नहीं, देशी गुलाल चाहिए!

    संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य है भारत,
    हमें ना पसंद कोई विदेशी चाल,ना ढाल चाहिए!

    कभी आक्रांता, कभी व्यापारी बनके तुम आए हो
    गुलाम बनाने, अब बेगम भी ना नक्काल चाहिए!

    प्यार करना यहां कभी जुर्म ना था, पर प्रेम करके
    फरेब से धर्म बदलने पे नकेल तो तत्काल चाहिए!

    सिलसिला ये पुराना, पंछी परकटा घर लौटता कहां,
    शिकारी पक्ष से बुने जाल जो, उनसे संभाल चाहिए!

    हस्ती मिटती नहीं हमारी, हमारी कौम है जिंदादिल,
    लाश की ढेर पे उगे देशों से हमें ना सबाल चाहिए!

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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