लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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roman डॉ. मधुसूदन उवाच

 

*डॉ. डेवीड ग्रे -(१)”वैज्ञानिक विकास में भारत हाशिये पर की टिप्पणी नहीं है।”

*(२)”वैश्विक सभ्यता में भारत का महान योगदान नकारता इतिहास विकृत है।”

*(३)सर्वाधिक विकसित उपलब्धियों की सूची, भारतीय चमकते तारों की. आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, महावीर, भास्कर, माधव के योगदानों की।”

**(४)”पश्चिम विशेषकर भारत का ऋणी रहा है।

*प्रो. स्टर्लिंग किन्नी –(५) “हिंदू अंकों के बिना, विज्ञान विकास बिलकुल असंभव।

(६) “किसी रोमन संख्या का वर्ग-मूल निकाल कर दिखाएँ।”

*लेखक: (७) *अंको के बिना, संगणक भी, सारा व्यवहार ठप हो जाएगा।

 

अनुरोध: अनभिज्ञ पाठक,पूर्ण वृत्तांत सहित जानने के लिए, शेष आलेख कुछ धीरे धीरे आत्मसात करें। कुछ कठिन लग सकता है।

 

(एक)सारांश:

गत दो-तीन सदियों की पश्चिम की, असाधारण उन्नति का मूल अब प्रकाश में आ रहा है, कि, उस उन्नति के मूल में, हिन्दू अंकों का योगदान ही, कारण है।

इन अंकों का प्रवेश, पश्चिम में, अरबों द्वारा कराया होने के कारण, गलती से, उन्हें अरेबिक न्युमरल्स माना जाता रहा।

पर, वेदों में उल्लेख होने के कारण, और अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों से (गत २-३ दशकों में) इस भ्रांति का निराकरण होकर अब स्वीकार किया जाता है, कि तथाकथित ये अरेबिक अंक, वास्तव में हिन्दू-अंक ही थे। साथ में एक-दो विद्वान भी, मान रहें हैं, कि, हमारी गणित की अन्य शाखाएं भी इस उत्थान में मौलिक योगदान दे रही थी।

 

(दो) हिंदु अंको के आगमन पूर्व:

हिंदु अंको के आगमन पूर्व, रोमन अंकों का उपयोग हुआ करता था। निम्न तालिका में कुछ उदाहरण दिए हैं; जो अंकों को लिखने की पद्धति दर्शाते हैं। आप ने घडी में भी, ऐसे रोमन अंक I, II, III, IV, V, VI, VII, VIII, IX, XI, XII देखे होंगे। ये क्रमवार, १,२,३,४,५,६,७,८,९,१०, ११. १२ के लिए चिह्न होते हैं।

बडी संख्याएँ, निम्न रीति से दर्शायी जाती हैं।

3179 =MMMCLXXIX, 3180=MMMCLXXX

3181 =MMMCLXXXI, 3182=MMMCLXXXII

3183 =MMMCLXXXIII, 3184 =MMMCLXXXIV

3185 =MMMCLXXXV, 3186 =MMMCLXXXVI

3187 =MMMCLXXXVII, 3188 =MMMCLXXXVIII

3189 =MMMCLXXXIX, 3190 =MMMCXC

 

रोमन अंको की कठिनाई थी; उनका जोड, घटाना, गुणाकार, भागाकार इत्यादि, जैसी सामान्य प्रक्रियाएं कठिन और कुछ तो असंभव ही होती थी। फिर वर्गमूल, घनमूल और अनेक गणनाएँ तो असंभव ही थी।

जिन्हें सन्देह हो, उन्हें, निम्न रोमन संख्याओं का गुणाकार कर के, देखना चाहिए।

(MMMCLXXXVIII) x{ MMMCLXXXVI} =?

 

वास्तव में ये हैं (३१८८)x(३१८६)= १०१५६९६८

एक मित्र जो तर्क-कुतर्क देने में आगे रहते हैं। उन्हें जब मैंने ऐसा प्रश्न पूछा, तो कुछ समय तो रोमन न्युमरल देखने लगे। पर फिर विषय को छोडकर, नया ही तर्क देना प्रारंभ किया। कहने लगे, कि, यदि हम अंक ना देते, तो कोई और दे देता ! उस में कौनसा बडा तीर मार लिया?

सच्चाई को दृढता पूर्वक, अस्वीकार करने वाले, ऐसे ह्ठाग्रहियों को देखकर हँसी भी आती है, पर दुःख अधिक होता है, कि, हमारे ही बंधुओं की ऐसी बहुमति में हम, बदलाव कैसे लाएंगे? भारत का, दैवदुर्विपाक ही मानना पडेगा।

 

(तीन)इसमें कौन सी बडी बात है? ऐसा सोचनेवालों को अनुरोध करता हूँ। सोच कर बताइए कि, सारे संसार से हिंदु अंक हटा देने से क्या होगा?

अंग्रेज़ी में लिखे जानेवाले, 1.2.3.4 इत्यादि भी; जो, हिंदु अंकों की परम्परा से ही, उधार लिए गए हैं। साथ साथ इन्हीं अंकों का अनुकरण करने वाली, किसी भी लिपि में लिखे गए, अंकों को हटा दीजिए। आज सारा शिक्षित विश्व हिंदू अंकों का ही अनुकरण करता है। उनकी लिपि केवल अलग होती है।

तो सारे संसार में, सैद्धान्तिक रूप से, एकमेव (दूसरे कोई नहीं) हिन्दू अंक ही रूढ हो चुके हैं। जी, हाँ। आज पूरे संसार में गिनती के लिए केवल हिंदु अंकों का ही अनुकरण होता है। हरेक देश में, दस की संख्या, निर्देशित करने के लिए उनके एक के चिह्न के साथ शून्य का प्रयोग [१०] होता है।

अंकों के चिह्न उनके अपने होते हैं, पर प्रणाली हिंदू अंकों का अनुकरण ही होती है। उन सभी अंकों को हटा दीजिए, तो क्या होगा? सोचिए।

 

उत्तर: महाराज! सारे कोषागार, धनागार, वाणिज्य व्यापार, विश्व विद्यालय, शालाएँ, जनगणना, उस पर आधारित जनतंत्र, और संगणक (कंप्युटर) भी ………… सारा का सारा जीवन व्यवहार ठप हो जाएगा। नहीं? क्या आप कोई “मैं ना मानूं, नामक-हठ-योगी” संप्रदाय के सदस्य तो नहीं ना?

 

(चार) ऐसा योगदान है, हिन्दू अंकों का-

ऐसा योगदान है, हिन्दू अंकोंका-और हिन्दु गणित का। जिसका लाभ बिना अपवाद संसार की सारी शिष्ट भाषाएँ और सारे देश ले ही रहे हैं।आपकी खिचडी अंग्रेज़ी भी। और सारे विज्ञान का विशालकाय विकास भी जिन गणनाओं के कारण हुआ है, वे

सारी हिंदु अंकों के गणित पर ही आधार रखती है। यही पद्धति उस विकास का कारण है।

इन्हीं अंकोपर उच्च गणित आधारित है, संगणक की सबसे ऊपर वाली कुंजियाँ भी, आप का, बँक का हिसाब, लंदन के राजमहल की संख्या, वॉशिंग्टन का पीन कोड, झिपकोड, आपका मोबाईल नम्बर, जिन लोगों को भारत तुच्छ देश लगता है, उनकी जन्म तिथि भी केवल एक और एक ही प्रणाली पर निर्भर करती है।

हिमालय के शिखर पर जाकर शिवजी का शंख फूँक कर सारे विश्व को कहने का मन करता है, हाँ, उन उधारी शब्दों पर जीवित अंग्रेज़ी के गुलामों को भी कहूंगा । और चुनौति दूंगा, कि इतनी भारतीयता के प्रति घृणा है, तो कोई और प्रणाली उत्पन्न करें। हिंदू अंकों का, वैदिक अंको का, भारतीय अंकों का प्रयोग ना करें।

 

(पाँच) कुछ प्रामाणिक पश्चिमी विद्वान भी हैं।

उनमें से एक थे, निर्माण अभियांत्रिकी की उच्च शिक्षा की पाठ्य पुस्तक के विद्वान लेखक, प्रोफेसर स्टर्लिंग किन्नी । जो रेन्सलिएर पॉलीटेक्निक इन्स्टिट्यूट में निर्माण अभियान्त्रिकी के प्रोफेसर थे।

वे कहते हैं, अपनी पाठ्य पुस्तक के ७ वें पन्नेपर। कि,

उद्धरण ==> “एक महत्वपूर्ण शोध प्रकाश में आया, जो, अरबों ने,लाया होने से अरबी अंक के नामसे जाना जाता है। वह है, हमारे अंक(नम्बर) जो, अमजीर, भारत में, (६०० इ. स.)में प्रयोजे जाते थे। ये अंक अरबी गणितज्ञों ने अपनाकर, युरप में फैलाए।, इस लिए, पश्चिम, उन्हें (गलतीसे) एरॅबिक अंक मानता था। इन हिंदू अंको की, उपयुक्तता रोमन अंकों (जो पहले थे) की अपेक्षा अत्यधिक है। और इन अंकों के बिना, आधुनिक विज्ञान का विकास बिलकुल (?)असंभव लगता है।”

“The advantage of these Hindu numbers over both the Greek and Roman system is very great, and it is quite unlikely that modern science could exist without them” आगे कहते हैं, कि,संदेह हो, तो किसी रोमन में लिखी, संख्या का वर्ग-मूल निकाल कर दिखाएँ।”<===उद्धरण अंत

 

(पाँच) दूसरे विद्वान, डेविड ग्रे

वे, “भारत और वैज्ञानिक क्रांति में”– लिखते हैं :

डॉ. डेवीड ग्रे

उद्धरण===>”पश्चिम में गणित का अध्ययन लम्बे समय से कुछ सीमा तक राष्ट्र केंद्रित, पूर्वाग्रहों से प्रभावित रहा है, एक ऐसा पूर्वाग्रह जो प्रायः बड़बोले जातिवाद के रूप में नहीं पर (पश्चिम-रहित) भारत के और अन्य सभ्यताओं के वास्तविक योगदान को नकारने या मिटाने के प्रयास के रूप में परिलक्षित होता है।

पश्चिम अन्य सभ्यताओं का विशेषकर भारत का ऋणी रहा है। और यह ऋण ’’पश्चिमी’’ वैज्ञानिक परंपरा के प्राचीनतम काल – ग्रीक सम्यता के युग से प्रारंभ होकर आधुनिक काल के प्रारंभ, पुनरुत्थान काल तक अबाधित रहा है – जब यूरोप अपने अंध-युग से जाग रहा था।”

इसके बाद डा. ग्रे भारत में घटित गणित के सर्वाधिक महत्वपूर्ण विकसित उपलब्धियों की सूची बनाते हुए भारतीय गणित के चमकते तारों का, जैसे आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, महावीर, भास्कर और माधव के योगदानों का संक्षेप में वर्णन करते हैं।

यूरोप में वैज्ञानिक क्रांति के विकास में भारत का योगदान

अंत में वे बल पूर्वक कहते हैं -“यूरोप में वैज्ञानिक क्रांति के विकास में भारत का योगदान केवल हाशिये पर लिखी जाने वाली टिप्पणी नहीं है जिसे आसानी से और अतार्किक रीति से, यूरोप केंद्रित पूर्वाग्रह के आडम्बर में छिपा दिया गया है। ऐसा करना इतिहास को विकृत करना है और वैश्विक सभ्यता में भारत के महानतम योगदान को नकारना है।” <=== उद्धरण अंत

 

14 Responses to “पश्चिम की असाधारण उन्नति के मूल में हिन्दू अंक गणित ??”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    आ. ललित मिश्रा जी–नमस्कार एवं धन्यवाद।

    (१) प्रमाणों का भी अपना एक वर्गीकरण होता है।
    जब मुझे व्याख्यान तैयार करना होता है। तो श्रोता को मेरे तर्क मान्य हो, इस लिए उसकी मानसिकता का ध्यान मुझे रखना पडता है।
    (२)भाग्यवशात प्रोफ़ेसर स्टर्लिंग किनी, और (३)डॉ. डेविड ग्रे ये विद्वान आधुनिक और आज भी मान्य होने में कोई कठिनाई नहीं होंगी। स्टर्लिंग किन्नी रेन्सेलर इन्स्टिट्यूट में निर्माण अभियांतिकी के प्राध्यापक थे। जो मेरा भी विषय है।
    (४) और अंग्रेज़ी के अनेक प्रत्यय भी, काफी संस्कृत से मिलते जुलते है। यास्क के तीन सिद्धान्त भी उन्हें लागू किए जा सकते हैं।
    (५) मैं उन प्रमाणों के अंतर्गत प्रस्तुति करता हूँ, जिस से जहाँ मुझे प्रस्तुति करनी पडती है, उस अमरिका में, श्रोता मेरी प्रस्तुति से सहमत होने में कम कठिनाई अनुभव करता है।
    (६) वैयक्तिक रूप से मुझे संस्कृत सच्चे अर्थ में देववाणी प्रतीत होती है। मनुष्य ऐसी भाषा निर्माण नहीं कर सकता। ऐसा मेरा प्रारंभ में मत नहीं था– पर आज मेरे सीमित अध्ययन का निष्कर्श यही है।
    (७)आप से भिन्नता मात्र सर्वग्राह्य प्रमाणॊं की है। सिद्धान्त की नहीं।
    (८) आपके उद्धरण मुझे पता थे।
    (९) अनुरोध==> आप देवनागरी का प्रयोग कर के, प्रवक्ता के लिए आलेख बनाएं।
    आपका प्रवक्ता स्वागत ही करेगा, ऐसा मुझे विश्वास है।
    क्या, आप से ऐसी अपेक्षा कर सकता हूँ?
    शुभेच्छाएँ।
    डॉ. मधुसूदन

    Reply
  2. Lalit Mishra

    I have better and more concrete information with evidences to share with you all on how Europe adopted Vedic Numbers

    https://www.facebook.com/VedicScienceAndMaths?fref=nf

    Origin of Modern Decimal Counting System
    ===========================================================

    Do we know how we count numbers in English in multiple of Tens, what is the history behind it, perhaps, many of us don’t know how the system of tens originated and spread over world, how old this system is and who were the people who invented the system, hereinafter, we shall rediscover the forgotten history of Tens or in other words the decimals, Pls have a look of the decimals used in English –

    Twenty = Twen(Ty)
    Thirty = Thir(Ty)
    Forty = For(Ty)
    ——-
    ——-
    Ninety

    Did you notice, we follow a “ति/Ty” system, so where it does come from, Let me tell you, it comes from Rigveda, the earliest book of wisdom of “Bharata” and it is followed by all in the world, Pls look at Vedic Numbers in the Rigvedic System of counting –

    विंशति (Vimsha-Ti )
    त्रिंशति (Trimsha-Ti )
    चतुर्विंशति ( Chatvarimsha-Ti )
    ——–
    ——-
    नवति ( Nava-Ti )

    This is the Rigvedic “Ti” system that has become “Ty” system in English

    True history of mankind is fascinating, India has been the origin of many things that has made the world modern, unfortunately, we are facing a very frustrating situation in India wherein the Vedic people who invented the decimal number system and basics of mathematics such that addition, subtraction, multiplication, division and shared with all, are declared in academic syllabus as “illiterate” who didn’t know how to write and read, which is against the human psychiatry also.

    India’s academic historians may not recognize Vedic invention of decimal number system and basics of mathematics but it was recognized by Laplace (1749 – 1827), a great mathematician of France.

    He writes –


    The ingenious method of expressing every possible number using a set of ten symbols (each symbol having a place value and an absolute value) emerged in India. The idea seems so simple nowadays that its significance and profound importance is no longer appreciated. Its simplicity lies in the way it facilitated calculation and placed arithmetic foremost amongst useful inventions. the importance of this invention is more readily appreciated when one considers that it was beyond the two greatest men of Antiquity, Archimedes and Apollonius.

    Despite the hypocrisy and visible ignorance shown by some historians, I am hopeful that later or sooner, these historians shall correct their views and subsequently the correction shall happen in universities syllabus as well. Anyways, let’s continue our interesting discussion

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      Thanks, Mishra ji.
      Appreciate Your work, on the numbers.

      There are many Prtyayas in English of Sanskrit, origin.
      You may also like 5 Shabda Vrikshas done in Pravkta,
      and other articles on influence of Sanskrit on English, done in this Pravakta.
      DO WRITE ARTICLES FOR PRAVAKTA.
      That would be great service.

      Reply
  3. Lalit Mishra

    I have better and more concrete information with evidences to share with you all on how Europe adopted Vedic Numbers

    https://www.facebook.com/VedicScienceAndMaths?fref=nf

    Origin of Modern Decimal Counting System
    ===========================================================

    Do we know how we count numbers in English in multiple of Tens, what is the history behind it, perhaps, many of us don’t know how the system of tens originated and spread over world, how old this system is and who were the people who invented the system, hereinafter, we shall rediscover the forgotten history of Tens or in other words the decimals, Pls have a look of the decimals used in English –

    Twenty = Twen(Ty)
    Thirty = Thir(Ty)
    Forty = For(Ty)
    ——-
    ——-
    Ninety

    Did you notice, we follow a “ति/Ty” system, so where it does come from, Let me tell you, it comes from Rigveda, the earliest book of wisdom of “Bharata” and it is followed by all in the world, Pls look at Vedic Numbers in the Rigvedic System of counting –

    विंशति (Vimsha-Ti )
    त्रिंशति (Trimsha-Ti )
    चतुर्विंशति ( Chatvarimsha-Ti )
    ——–
    ——-
    नवति ( Nava-Ti )

    This is the Rigvedic “Ti” system that has become “Ty” system in English

    True history of mankind is fascinating, India has been the origin of many things that has made the world modern, unfortunately, we are facing a very frustrating situation in India wherein the Vedic people who invented the decimal number system and basics of mathematics such that addition, subtraction, multiplication, division and shared with all, are declared in academic syllabus as “illiterate” who didn’t know how to write and read, which is against the human psychiatry also.

    India’s academic historians may not recognize Vedic invention of decimal number system and basics of mathematics but it was recognized by Laplace (1749 – 1827), a great mathematician of France.

    He writes –


    The ingenious method of expressing every possible number using a set of ten symbols (each symbol having a place value and an absolute value) emerged in India. The idea seems so simple nowadays that its significance and profound importance is no longer appreciated. Its simplicity lies in the way it facilitated calculation and placed arithmetic foremost amongst useful inventions. the importance of this invention is more readily appreciated when one considers that it was beyond the two greatest men of Antiquity, Archimedes and Apollonius.

    Despite the hypocrisy and visible ignorance shown by some historians, I am hopeful that later or sooner, these historians shall correct their views and subsequently the correction shall happen in universities syllabus as well. Anyways, let’s continue our interesting discussion

    Reply
  4. Anil Gupta

    तीन दिन से ब्रोडबेंड कम नहीं कर रहा था.आज ठीक हुआ तो ये लेख पढने का सुअवसर मिला.हर बार आपका लेख पढ़कर गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है कि अपने भारत के उपकारों से और भारत कि विज्ञानं को देन से क्या पश्चिम के झूठे दंभ में रहने वाले देश कभी उऋण हो सकेंगे? और अभी भी बहुत कुछ है भारत के पास अपनी प्राच्य विद्या से बाँटने के लिए.लेकिन अब मुफ्त में नहीं देना चाहिए.अपनी बौधिक सम्पदा पर अपना स्वत्वाधिकार सुप्रमाणित करने के पश्चात ही ज्ञान देना उचित होगा अन्यथा उसी में से कुछ टुकड़े बटोर कर पश्चिम वाले कल हमसे ही उसकी रायल्टी मांगेंगे.
    अस्तु श्रद्धेय डॉ. मधुसुदन झवेरी जी को सुदूर अमेरिका में बैठकर भारत कि प्राच्यविद्या के विषय में इतने सुन्दर लेख लिखने और माँ भारती कि सेवा के लिए केवल साधुवाद देने से कम नहीं चलने वाला है. हमें भी इसी प्रकार हर विषय पर भारत के योगदान के बारे में प्रमाणिक जानकारी जुटाकर उसे प्रकाश में लाना चाहिए.

    Reply
  5. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन

    आदरणीय, ह्वाइस एअर मार्शल विश्वमोहन तिवारी जी, प्रिय मित्र विनायक शर्माजी एवं दुर्गाशंकर नागडा जी, एवं बहन रेखा सिंह जी—आप सभीने समय निकाल कर पढा और टिप्पणी भी दी। बहुत बहुत धन्यवाद।
    विश्वमोहन जी के प्रेरणादायी शब्द सदा मुझे अच्छा काम करने के लिए उत्तेजित ही करते हैं। विनायक शर्मा जी,आप के शब्दॊं से मुझे और ही कृतज्ञता की अनुभूति होती है।
    दुर्गा शन्कर जी से मैं कहना चाहता हूँ, कि, मेरा अभिगम, तर्क और ख्याति-प्राप्त विद्वानों के वचनों के, आधार पर विषय रखने का होता है। मान्यताएं व्यक्तिगत होती है। पर तर्क, और कुछ विद्वानों के उद्धरण, एवं इतिहास—जो सुज्ञ पाठक के समझमें आ जाए इन पर मैं बल देता हूँ। शेष मैं सामान्य तर्क पर प्रत्यक्ष प्रंमाणित करने का प्रयास करता हूँ। इसी लिए रोमन संख्याओं के उदाहरण दिए। और विषय को दार्शनिक कम, वैज्ञानिक अधिक बनाना चाहता हूँ। यह मेरा अभिगम सामन्यतया होता है। यह मेरा वयक्तिक विचार है, आपके विचारों से सहमति ही है।
    बहन रेखा जी भी सदा प्रोत्साहित करती है। बिंदूः-> केवल अंक और शून्य ही नहीं, पर हमारा समग्र गणित बीज गणित, रेखा गणित, बायनरी संख्याएं, इत्यादि इत्यादि सभी का योगदान हुआ है। इस लिए हिंदु अंक और हिन्दू गणित दोनों का महाकाय योगदान है।
    आप सभी हितेच्छुओं का ऋणी हूँ। मित्रता का आधार लेकर ही यह टिप्पणी लिखी है। सभीके प्रेमसे समृद्ध अनुभव करता हूँ। कृपा बनाए रखॆं। एक सप्ताह प्प्रवास पर रहूंगा। बहुत बहुत धन्यवाद।

    Reply
  6. Vishwa Mohan Tiwari

    इस लेख के पढ़ने के पहले भी अनेक पाठकों को यह बात कि विश्व को अंक भारत ने दिए हैं ज्ञात होगी किन्तु जिस प्रभावी शैली में मधुसूदन जी ने यह अभिव्यक्त किया उससे उसका वास्तविक महत्व समझ में इसा लेख के बाद समझ में आया होगा.- यहाँ मधुसूदन जी कि एक विशेषता है..
    और दुसरी विशेषता है उस महत्व को विश्व के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में डंके की चोट पर प्रस्तुत करना..
    और ए.बी.ए. पाठक का न केवल आत्मा सम्मान बढेगा वरन उसे प्रेरणा मिलेगी आगे बढ़ने की..
    धन्यवाद मधुसूदन जी
    विश्वमोहन तिवारी

    Reply
  7. महावीर शर्मा

    महावीर शर्मा

    बहुत ही ग्यान वर्धक है. क्या मैं अपने व्याख्यानो में इनका उपयोगकर सकता हूँ

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      Dr Madhusudan

      अवश्य.
      इसीमें आलेख की सफलता होगी.
      पुरखों ने कभी पेटंट नहीं लिया.
      हम कौन होते हैं, इस के अधिकारी ?

      Reply
  8. DS

    श्रीमान मधुसुदन जी ने बहुत ही अहम् विषय पर भारत वर्ष की विश्व को देन -गणित के अंको, के बारे में बताया तथा प्रवक्ता ने उसे दुनिया को बताने का प्रयास किया. उसके लिए दोनों को बहुत बहुत धन्यवाद. मधुसुदन जी ने फेसबुक तथा इंग्लिश में लिखा कमेंट क्यों नहीं छपा वह भी मुझे समझाया. धन्यवाद. कमेंट yah thaa. Since this is not working I am writing below the comment in English.

    Not only India gave the numerals to the world, she gave the most important thing ZERO, Shunya, Sifra, etc. You may call it anything. But how the universes (modern scientists only talk of one universe because their eyes and instrumentation can only see a part of this our universe) came from zero, or shunya, is the gift of India, or better still Bharatvarsh, to this globe. Imagine if you move a point around THE other fixed point (called center) it makes a circle, and now remove the perimeter of that circle and it becomes infinite. Also the zero is meaningless or nothing if it is put before any numeral (1 to 9) but it increases the value of that numeral manifold if it is put after that numeral or digit. Even the symbol of infinity (∞) is two zeros put together –one a completely close circle and other circle put with slightly open end hardly visible. As said in Upanishad two birds sitting on a tree one watching only and other jumping around and eating fruits with pleasures and pains. Bharatvarsh has not only given numerals and zero to the world she gave a lot more to the world including mathematics, life sciences, etc. The West did not know before early 1900 when Jagdish Chandra Basu –a Nobel Laureate who gave the world that vegetation and plants have life also. Whereas our ancient scriptures written thousands of years ago gave to the world four types of life –andaj, beejak, svaj, pindaj, -a gift of Bhararat to the World indeed.
    Those who are interested in knowing more about spirituality may check out http://www.ashramom.org/ashram/literature_publication.htm . Thanks again Pravakta and Madhusudan ji.

    Reply
  9. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन

    निर्माण अभियान्त्रिकी का मैं (पी. एच. डी.) (विशेषज्ञ परामर्शक )माना जाता हूँ। निम्न मैंने पढाया भी है। शब्दशः उद्धरण देख लें। लेखकने ६०० ए डी–दिया है, इसी लिए मैं ने उद्धृत किया। जानता हूँ, कि अंक बहुत बहुत पुराने हैं। उद्धरण अंग्रेज़ी में ही दिया, जिससे अनुवाद की गलती से बचा जाए। अमजीर कहाँ है? नहीं जानता। शायद अजमेर तो नहीं?
    —–सविनय–मधुसूदन
    ———————————————————————————————————-
    Indian Contributions:===>
    (1) From ‘Indeterminate Structural Analysis’–By Prof. Sterling Kinney.
    Publisher–> Addison Wesley
    Quotation –>from pg. #7–>
    ‘One tremendously important development of this period, however, which came about through the efforts of the Arabians, was the invention of our system of numbers, credited to a group of mathematicians of Amjir, India, about 600 A.D.
    This system was adopted by Arabian mathematicians and was subsequently transmitted through them to Europe and is therefore known to us as the system of “Arabic” numerals
    The advantage of these Hindu numbers over both the Greek and Roman system is very great, and it is quite unlikely that modern science could exist without them.
    (If in doubt, the reader should try to extract the square root of any number using Roman or Greek numerals.)’—- End of Quote

    Reply
  10. Durga Shanker

    यह वास्तव में महान है. sorry, भविष्य में हिंदी में ही लिखने का प्रयत्न करूंगा, लेकिन अभी भी मन में खेद है की हिंदी को लिखने के लिए भी इंग्लिश का प्रयोग करना पढ़ रहा है. (और फुल स्टॉप भी हिंदी का नहीं आ रहा है.) गाँवो में तो लोग इंग्लिश नहीं जानते की हिंदी को इंग्लिश में लिख पायें तथा उन्हें हिंदी में लिखने के लिए पहले इंग्लिश के अल्फाबेट सीखने पड़ेंगे. क्या यह नहीं हो सकता की इंग्लिश लिखने के लिए हिंदी के अल्फाबेट सिखा जाय ताकि इंग्लिश में लिखा जा सके ?

    Reply
  11. Rekha Singh

    धन्यबाद लेख के लिए |आपके लेख से बहुत विस्तार पूर्वक यह बात समझ मे आई |अठारह साल की उम्र से ही घर छूट गया तो पिता जी का सानिध्य बहुत कम रहा और जब मिले तो बहुत कम समय के लिए |उसमे भी दुनिया की तमाम विपरीत परिस्थतियो का सामना |माँ के साथ बचपन मे मनोज कुमार के द्वारा बनाई ” पूरब और पश्चिम ” देखी थी और वह उसका गाना “जब जीरो दिया मेरे भारत ने , मेरे भारत ने , मेरे भारत ने |दुनिया को तब गिनती आई |यदि देता न, दशमलव भारत तो, फिर चाँद पे जाना मुस्किल था |सभ्यता जहा पहले आई……….” यह पिक्चर मैने अपने बच्चो के साथ बैठकर कई बार देखी है| आजकल देश के लिए कौन सोच रहा है |भारत का सिनेमा उधोग तो भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियो से भरा पडा है जो सिर्फ नग्नता और हिंसा का प्रदर्सन करके विदेशी पैसॊ से विदेशो को अपनी संस्कृति ही बेच रहा है परन्तु कुछ लोग जरुर कुछ अच्छा का काम कर रहे है| मधु भाई इस एतिहासिक लेख के लिए धन्यबाद |अब मै अपने बच्चो के साथ इस विषय पर विस्तार से चर्चा कर सकती हूँ |

    Reply

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