मनुष्य जीवन की उन्नति किन कर्तव्यों के पालन से होती है?

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

परमात्मा ने हमें मनुष्य बनाया है। मनुष्य का अर्थ होता है कि मनन करने वाला प्राणी। मनन
पर विचार करें तो इसका अर्थ सोच विचार कर काम करने वाला होता है। सोच विचार का अर्थ
अपने हित व अहित सहित दूसरों को किसी प्रकार की बाधा पहुंचायें अपने लिये आवश्यक
सुविधाओं को जुटाना भी कह सकते हैं। हमारे विद्वान अध्ययन-अध्यापन करते हैं और
विद्यार्थियों को अध्ययन कराते हैं। उन्हें विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों से शिक्षा शुल्क के
नाम से जो दक्षिणा प्राप्त हो जाती है उससे उनका जीवन निर्वाह होता है। विद्यार्थी भी ऐसे
निर्लोभी व विद्या के धनी तथा विद्यार्थियों के हित की कामना करने वाले अपने गुरुओं का
हृदय से सम्मान करते हैं। इसी प्रकार किसान अपने खेतों में अन्न आदि पदार्थों को उत्पन्न
करता है व अपनी आवश्यकता का अन्न रखकर शेष अन्न को देश व समाज के लोगों को
प्रदान कर देता है जिससे उनका निर्वाह होता है। इस अन्न दान के बदले में अन्न के प्राप्तकर्ता
लोग किसान को कुछ धन दक्षिणा व पारिश्रमिक एवं अन्न उत्पादन में हुए उसके किये हुए
व्यय के प्रतिदान के रुप में प्रदान करते हैं। इस प्रकार से मनुष्यों का जीवन सृष्टि के आरम्भ

से चलता आ रहा है।
अपने जीवन का निर्वाह करते हुए मनुष्य को कुछ आवश्यक नित्य कर्मों व कर्तव्यों का पालन भी करना होता है जिस
पर हम विचार कर निर्णय ले सकते हैं। इस कार्य में सहायता के लिये हम अपने ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन कर भी
मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। चिन्तन व विचार करने पर हम पाते हैं कि हमें अर्थात् हमारी आत्मा को यह मानव शरीर किससे
प्राप्त हुआ है? इसका उत्तर मिलता है कि हमें यह शरीर व जीवन माता-पिता एवं संसार के रचयिता परमात्मा से प्राप्त हुआ है।
अतः हमारा एक कर्तव्य यह निर्धारित होता है कि हम परमात्मा और अपने जीवित माता-पिता के प्रति श्रद्धा भाव रखकर
उनकी प्रातः सायं सेवा व उनकी प्रसन्नता के लिये धर्मानुकूल कार्यों एवं व्यवहारों को करें। परमात्मा के प्रति हमारे जो कर्तव्य
हैं, उन्हें हम माता-पिता के समान उनकी शारीरिक सेवा, अन्न व वस्त्र प्रदान करना, धन प्रदान करना, उनके निवास एवं
चिकित्सा आदि की व्यवस्था आदि के रूप में नहीं कर सकते। इसके लिये हमें ईश्वर का ज्ञान प्राप्त कर उसकी उपासना करनी
होती है। उपासना में स्तुति व प्रार्थना सम्मिलित होती हैं। हम ईश्वर के गुणों को जानकर उनके कथन व ध्यान से ईश्वर की
स्तुति व प्रार्थना करें तो इससे ईश्वर के ऋणों के प्रति हम कृतज्ञता का भाव रखने से कृतघ्ना के दोष व पाप से बचते हैं। ऋषियों
ने इसके लिये प्रातः व सायं सन्ध्या का विधान किया है। ऋषि दयानन्द ने सन्ध्या की विधि भी हमें प्रदान की है। हमें उस विधि
का अध्ययन कर उसके अनुसार प्रातः व सायं ईश्वर का ध्यान करते हुए उसकी स्तुति, प्रार्धना व उपासना को करना है।
सन्ध्या करने के साथ हमें ऋषियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय भी करना है। स्वाध्याय में वेद सहित ऋषियों के सभी ग्रन्थों को
सम्मिलित किया जा सकता है परन्तु सन्ध्या में सबसे अधिक सहायक महर्षि पतंजलि का योगदर्शन होता है एवं यह ग्रन्थ
सन्ध्या में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यदि हम योगदर्शन के अनुसार सन्ध्या करेंगे तो हमें सन्ध्या करने में अत्यधिक
सहायता मिलेगी। योग के आठ अंग हैं जिन्हें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के नाम से
जाना जाता है। प्रथम दो स्थानों पर यम और नियम हैं। यम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को कहते हैं।
नियम पांच हैं और इनके नाम हैं शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। इन यम व नियमों का पालन करने
सहित योग अन्य 6 अंगों का पालन करने पर सन्ध्या सफल होती है। सन्ध्या के अन्तर्गत स्वाध्याय का अत्यधिक महत्व है।

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हमें जितना समय मिले, आर्ष ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिये इससे हमारे ज्ञान में वृद्धि होगी और इससे ईश्वर में ध्यान
स्थिर करने में हमें लाभ प्राप्त होगा। सन्ध्या विषयक अन्य बातों का ज्ञान हमें स्वाध्याय करने से प्राप्त हो जाता है।
हमारे जीवन के लिये अन्न सहित शुद्ध वायु एवं जल का अत्यधिक महत्व है। अतः हमें सभी व्यवहारों को करते हुए
यह ध्यान रखना चाहिये कि हमारे आवश्यक कृत्यों से अल्प मात्रा में ही वायु एवं जल प्रदुषित हों। वायु व जल की शुद्धि के
लिए भी हमें विचार करने के साथ इसकी शुद्धि के कार्यों, जिनमें अग्निहोत्र यज्ञ का अत्यधिक महत्व है, उसका अनुष्ठान
ऋषियों की आज्ञा के अनुसार प्रातः सूर्योदय के समय और सायं सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिये। यज्ञ करने से वायु का दुर्गन्ध
दूर होकर उसमें सुगन्ध का प्रसार होता है और सामग्री के रूप में जो गोघृत, शक्कर, केशर, कस्तूरी, ओषधियां में सोमलता,
गुग्गल आदि उसमें आहुति के रूप में डाले जाते हैं, उससे उत्पन्न धूम्र से मनुष्य का स्वास्थ्य विकृत नहीं होता और अनेक
शारीरिक विकार यथा साध्य एवं असाध्य रोग भी दूर हो हैं। यज्ञ करने से आध्यात्मिक साधना व यज्ञ में बोले जाने वाले मन्त्रों
से ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना का लाभ भी प्राप्त होता है। यज्ञ से अनेकानेक लाभ होते हैं। वायु, जल की शुद्धि सहित अन्न,
ओषधियों व वनस्पतियों की भी शुद्धि होती है। मनुष्य का शरीर स्वस्थ व निरोग रहता है। अतः यज्ञ करना भी सभी मनुष्यों
का आवश्यक कर्तव्य है। मनुष्य के अन्य कर्तव्यों में माता-पिता-आचार्यों व अतिथियों सहित वृद्धो एवं रोगियों आदि की सेवा
करना भी मनुष्य का कर्तव्य होता है। हमें यथाशक्ति अपने सभी कर्तव्यों का पालन उत्तमता से करना चाहिये जिससे हमारे इन
माता-पिता आदि समस्त जीवित देवों को किसी प्रकार का कष्ट व असुविधा न हो। विद्वान अतिथियों के प्रति भी हमारे हृदय
में आदर व सम्मान का भाव होना चाहिये। ऐसे अतिथि यदि हमें प्राप्त हों तो उनकी अपने माता-पिता व आचार्यों के समान ही
सेवा करनी चाहिये। हमें यह स्मरण रखना चाहिये कि हम जो भी सेवा कार्य करते हैं, वह हमारे श्रेष्ठ कर्म होते हैं। हमें परमात्मा
उन कर्मों के लिये सुख व लम्बी आयु सहित निरोग व स्वस्थ जीवन के रूप में फल देते हैं। अतः इन सभी शुभ कर्म करने में
हममें से किसी को कदापि प्रमाद नहीं करना चाहिये।
इन सबके साथ परमात्मा ने यह सृष्टि हमारे लिये तथा सृष्टि को सन्तुलित रखने व चलाने के लिए नाना प्रकार के
पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि प्राणियों के लिए बनाई हैं। सभी मनुष्य एवं अन्य प्राणी सृष्टि में अपने अपने कर्मों का भोग कर रहे
हैं। हमें उनके जीवन मे विरोधी नहीं अपितु सहयोगी की भूमिका निभानी है। हम गाय, बकरी, घोड़े आदि पशुओं का पालन करें।
इनको चारा व अन्न आदि का भोजन देकर सुख पहुंचायें। हो सकता है कि अगले जन्म में हमें भी पशु या पक्षी की इन्हीं
योनियों में से किसी एक में जाना पड़े। तब जो अपेक्षा हम मनुष्यों से करेंगे, उस व्यवहार के अनुरूप ही हमारा व्यवहार इस
जन्म में इतर योनियों के प्रति होना चाहिये। हमें अतीव हिंसक पशुओं के अतिरिक्त शाकाहारी व उपयोगी पशुओं की न तो
हत्या करनी चाहिये, न मांसाहार करना चाहिये, न ही दूसरों को मांसाहार करने देना चाहिये और न किसी को किसी पशु की
हत्या का घृणित कार्य करने देना चाहिये। पशु हत्या एवं मांसाहार मनुष्योचित कार्य नहीं है अपितु यह अमनुष्योचित निन्दित
कार्य हैं। यह पाप होता है जिसका फल परमात्मा जन्म-जन्मान्तरों में दुःख के रूप में देते हैं। अतः हमें पशुओं आदि सभी
प्राणियों के प्रति वेदों की गई प्रेरणा के अनुरूप मित्रता की दृष्टि व भाव रखना चाहिये और उन्हें अपने कर्म फल भोगने में
उनका विरोधी न होकर सहयोगी होना चाहिये।
हमारा आचार व विचार तथा व्यवहार वा आचरण वेदानुकूल होने चाहियें। इसे जानने के लिये हमें ऋषि दयानन्द
सरस्वती जी के सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याविभिविनय एवं जीवनचरित्र आदि ग्रन्थों का
नियमित स्वाध्याय करना चाहिये और उनमें निहित सत्शिक्षाओं से प्रेरणा ग्रहण कर उसे अपने आचरण का अनिवार्य अंग
बनाना चाहिये।ऐसा जीवन व्यतीत करने से हमारा जीवन सफल होगा और हमें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सिद्ध होंगे। इसी के
साथ हम इस संक्षित चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-23
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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