आम बजट में आम आदमी के लिये क्या है ?

इक़बाल हिंदुस्तानी

budget 2015किसानों के बाद मीडियम क्लास भी ठगा से महसूस कर रहा है।

   भारतीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी के हिसाब से देखा जाये तो सर्विस सैक्टर से 57 प्रतिशत योगदान के साथ 27 प्रतिशत रोज़गार आता है। मैन्युफैक्चरिंग का सकल घरेलू उत्पाद में 18-4 प्रतिशत का योगदान है जबकि रोज़गार में उसका हिस्सा 24-3 प्रतिशत है। सबसे हैरत की बात यह है कि जीडीपी में मात्र 14-4 प्रतिशत का योगदान देने वाला कृषि क्षेत्र रोज़गार में सबसे अधिक यानी 49 प्रतिशत का योगदान करता है फिर भी हमारी सरकार का सारा जोर कृषि पर न होकर उद्योग पर रहता है।

   जिस तरह से शुगर के मरीज़ को वह डाक्टर अच्छा लगता है जो उसको दवा बंद कर परहेज़ न कर खूब मीठा खाने की छूट देता है और वह क़साई नज़र आता है जो सख़्त लहजे में यह चेतावनी देता है कि अगर आपने मीठे से तौबा नहीं की या दवा टाइम पर नहीं खाई तो आपको अस्पताल में भर्ती करके इंसुलिन देनी पड़ सकती है उसी तरह से अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के लिये मोदी सरकार ने जो पहला आम बजट पेश किया है उसमें लोकलुभावन तो कुछ है ही नहीं साथ ही आम आदमी के साथ साथ जिस तरह से मीडियम क्लास को कड़वी डोज़ आयकर स्लैब में बदलाव न करके दी गयी है उससे यह लगता है अब भूमि अधिग्रहण कानून से तिलमिलाये किसान के बाद आम आदमी और मीडियम क्लास भी उससे ख़फ़ा होना शुरू हो गया है।

   सेवा कर 12-36 प्रतिशत से बढ़ाकर 14 फीसदी करने से जहां रोज़मर्राह की सभी ज़रूरतें महंगी होंगी वहीं हर साल महंगाई बढ़ने और नये खर्च जुड़ने के बाद भी आयकर की सीमा में कोई बढ़ोत्तरी न करना मीडियम क्लास ख़ासतौर पर नौकरीपेशा वर्ग को काफी चुभ रहा है। रेल बजट में हालांकि रेल किराया पहले ही बढ़ा दिये जाने और इंटरनेशनल मार्केट में डीज़ल सस्ता होने के बावजूद उसे कम न कर माल भाड़ा बढ़ाने का असर भी सीधे आम आदमी पर महंगाई के तौर पर पड़ना तय है। उधर आम बजट आते ही पेट्रोल और डीज़ल के दाम में तीन रूपये से अधिक की बढ़त भी आम आदमी की कमर तोड़ेगी। मोदी सरकार बनने में जिस तरह से विपक्ष ने यह प्रचार किया था कि कारपोरेट सैक्टर बीजेपी को चुनाव जिताने में पैसा पानी की तरह बहा रहा है अब भूमि अधिग्रहण कानून को किसान विरोधी साबित करने में भी यह आरोप काम आ रहा है।

   पहले यूपीए सरकार ने जिस तरह स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन के नाम पर किसानों की ज़मीन की लूट मचाई थी वैसे ही किसान अब भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन को लेकर उबल रहा है। कैग की रिपोर्ट ही सेज की हकीकत की पोल खोल रही है। 2007 से 2013 तक कुल 45635 हेक्टेयर ज़मीन किसानों से सेज़ के नाम पर छीनी गयी थीं जबकि इस भूमि को सेज़ की जिन 576 परियोजनाओं के नाम पर लिया गया था उनमें से सेज़ के लिये 392 ही रजिस्टर्ड हुयीं। इसके बाद इनमें से मात्र 170 पर ही काम शुरू हो सका जबकि सरकार ने इन पर हर तरह के टैक्स की छूट के साथ ही 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने का इंतज़ाम भी किया था।

   अब सवाल उठता है कि बाकी ज़मीन का क्या हुआ तो वही हुआ जिसकी किसानों को आशंका थी यानी बिना उपयोग के ज़मीन पांच साल बाद भी खाली पड़ी रही और अब उस ज़मीन का बड़ा हिस्सा डवलपर ने औने पौने में कब्ज़ा लिया जिस पर शॉपिंग माल पांच सितारा अस्पताल होटल और महंगे आवास बनाकर बिल्डर नौकरशाह और नेता चांदी काट रहे हैं। जिन किसानों की बहुफसली ज़मीन विकास के नाम पर जबरन ली गयी थी उनमें से अधिकांश को समय पर मुआवज़ा नहीं मिला जिससे या तो वे खेतीहर मज़दूर बन गये या आत्महत्या करने को मजबूर हैं। अब भूमि अधिग्रहण कानून में किसान के अदालत जाने का रास्ता भी बंद कर दिया गया है जिससे उसको यह आशंका और भी सता रही है कि सरकार की नीयत में खोट है। उधर कारपोरेट टैक्स 30 से घटाकर 25 प्रतिशत करने से इस प्रचार को पर लग गये हैं।

   वैल्थ टैक्स ख़त्म करना और प्रोपर्टी टैक्स की सीमा 30 लाख से बढ़ाकर एक करोड़ करना भी अमीरों के पक्ष में जा रहा है। हालांकि जीएसटी को अगले साल से लागू करने की तैयारी और ^गार* को दो साल टाल देने से भी अप्रत्यक्ष रूप से उद्योगपतियों को ही लाभ होगा लेकिन इस का लाभ पूरे देश को ही मिलेगा यह भी सच है। मिडिल क्लास की मोदी सरकार से जो विकास की उम्मीद थी उसको लेकर इस बजट से कहीं उत्साह नज़र नहीं आ रहा है। सरकारी ख़रीद को भ्र्र्र्र्र्रष्टाचार से मुक्त करने के लिये ज़रूर कुछ प्रयास इस बजट में किये गये हैं लेकिन देश के हर सरकारी कार्यालय में व्याप्त भ्र्रष्टाचार को दूर करने के लिये दिल्ली में भाजपा की केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के हाथों करारी हार के बाद भी कोई विशेष प्रयास नहीं किये गये हैं।

   काले धन को लेकर देश में गर्म होते माहौल को ठंडा करने के लिये विदेशी सम्पत्ति छिपाने वाले को 10 साल की कैद और टैक्स चुराने वाले पर 300 प्रतिशत जुर्माना लगाना सरकार की इस बारे में चिंता दिखाता है। साथ ही एक लाख से ज्यादा की ख़रीद और बिक्री पर पैन ज़रूरी और 20 हज़ार से अधिक के नक़द लेनदेन पर रोक का सरकार का इरादा देश में बढ़ते काले धन के जाल को काटने का एक नया औज़ार माना जा सकता है। 150 देशों के पर्यटकों को वीज़ा ऑन एराइवल का सरकार का इरादा पर्यटन से देश को दूरगामी लाभ पहुंचाना माना जायेगा। पूरे विश्व में सराही गयी मनरेगा योजना पर मंडरा रहे आशंकाओं के बादल छांटते हुए इसके लिये 34699 करोड़ का प्रावधान करना और अतिरिक्त धन उपलब्ध होने पर और पांच हज़ार करोड़ देने का इरादा मोदी सरकार की राजनीति से उूपर उठकर काम करने की बदलती सोच की तरफ इशारा करता है।

   ऐसे ही बिहार और बंगाल को जर्जर आर्थिक हालत से निकालने के लिये अतिरिक्त सहायता देना भले ही वहां जल्दी ही होने वाले चुनाव से जोड़कर देखा जाये लेकिन यह एक सकारात्मक पहलू ही माना जाना चाहिये। कश्मीर और आंध्रा को आईआईएम और असम पंजाब हिमाचल कश्मीर और तमिलनाडु को एम्स की शाख़ाये देना एक अच्छी पहल ही है। इसके साथ अटल पेंशन योजना] पीएम बीमा योजना और ज्योति ईपीएफ योजना को गरीबों की भलाई का ही इरादा लगता है और 6 करोड़ शौचालय एवं 2022 तक हर परिवार को घर व परिवार के एक सदस्य को रोज़गार मोदी सरकार की दूरगामी ही सही नेकनीयत ही है।

सोचा था कि जाकर के उससे फ़रियाद करेंगे

लेकिन वो भी उनकाचाहने वाला निकला।।

1 thought on “आम बजट में आम आदमी के लिये क्या है ?

  1. रोटी महंगी , सब्जी महँगी, तेल महंगा सस्ता केवल वादा
    बस हम तो केवल इनको जाने , पर मार गया तेरा वादा
    कौन से अच्छे दिन?किसके अच्छे दिन?
    छोड़ो अच्छे दिन का अब ये राग पुराना ,
    नयी कहानी लिखेंगे अब जब वोट मांगने आना
    जेटलीजी फरमा रहे हैं मिडिल क्लास खुद अपना ख्याल रखे , शायद वे भूल गए हैं कि इस क्लास के कन्धों पर चढ़ कर आप वहां पहुंचे हैं। ठीक है अभी चार साल बाकी हैं , तब तक तो खुद ख्याल रखना होगा ही ,फिर क्या होगा तब जनता देख लेगी अब जनता बहुत समझदार हो गयी है क्योंकि राजनीतिज्ञों ने बनने को मजबूर कर दिया है

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