अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग मुलाकात के क्या हैं मायने

राकेश कुमार आर्या

6 अगस्त 1945 की वह घटना है जब जापानी समय के अनुसार प्रात: के 8:15 हुए थे, तभी हिरोशिमा शहर के केंद्र से 580 मीटर की दूरी पर परमाणु बम का विस्फोट हुआ। शहर का 80 प्रतिशत भाग इस विस्फोट की चपेट में तुरंत आ गया था और लोगों का जीवन वैसे ही समाप्त हो गया था जैसे गर्म तवे पर पडऩे वाली पानी की बूंद तुरंत ही समाप्त हो जाती है। यही स्थिति दो दिन बाद नागासाकी की हुई थी। संसार की आत्मा आज तक उस घटना की स्मृति मात्र से कांप उठती है, पर मनुष्य है कि एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हथियारों की होड़ में लगा रहता है।
उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम को लेकर विश्व शंकित था कि यह व्यक्ति कभी भी कुछ भी कर सकता है उधर अमेरिका में नए राष्ट्रपति ट्रम्प ने जब सत्ता संभाली थी तो उनके बड़बोलेपन को लेकर भी लोगों को आशंका थी कि वह भी असंतुलित भाषा का प्रयोग करके स्थिति को बिगाड़ सकते हैं। यह सुखद संयोग है और विश्व के लिए अच्छा समाचार भी कि यह दोनों नेता अपने मूल स्वभाव के विपरीत जाकर सिंगापुर के एक दीप पर मिले हैं और अपनी 65 वर्ष पुरानी शत्रुता को त्याग कर विश्व शांति का संकल्प लेकर आगे बढऩे को सहमत हुए हैं। सचमुच सारे विश्व की मीडिया में इस महान भेंट को लेकर परस्पर विरोधी बातें की जा रही थीं और संभावना व्यक्त की जा रही थी कि यह वार्ता टूट जाएगी, पर यह वार्ता एक परिणाम तक पहुंची और दोनों नेताओं ने ही विश्व शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को व्यक्त किया, जिससे संपूर्ण मानवता ने चैन की सांस ली है।
वास्तव में संसार के अधिकांश लोगों को यह पता नहीं है कि उनके अस्तित्व को मिटाने के लिए मानव ने कितने परमाणु बमों का जखीरा खड़ा कर लिया है। यदि इस प्रश्न के उत्तर पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि संसार इस समय तथाकथित परमाणु शक्ति संपन्न देशों के शासनाध्यक्षों के रहमोकरम पर जी रहा है। यदि किसी का थोड़ा सा भी दिमाग खराब हो गया तो यह हंसती-खेलती मानव सभ्यता थोड़ी सी देर में ही ‘स्वाहा’ हो जाएगी। उत्तर कोरिया के तानाशाह 34 वर्षीय किम जोंग उन की सनक भरी गतिविधियों को देखकर विश्व के चिंतनशील लोगों को बार-बार डर लग रहा था कि यह व्यक्ति कभी भी विश्व को तीसरे विश्वयुद्ध में झोंक सकता है। ऐसा नहीं है कि अकेला उत्तर कोरिया ही परमाणु बम रखता है और वह ही विश्वयुद्ध की धमकी देकर लोगों को डराता धमकाता है, अपितु अन्य देशों की स्थिति भी ऐसी ही है।
‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के अनुसार 1949 में पहली बार परमाणु परीक्षण करने वाले रूस के पास 8000 परमाणु हथियार थे, अमेरिका के पास इनकी संख्या 7300 थी, फ्रांस के पास 300 और 1964 में पहली बार परमाणु परीक्षण करने वाले चीन के पास परमाणु हथियारों की संख्या 250 थी, ब्रिटेन ने 1952 में पहला परमाणु परीक्षण किया और वह भी 2015 तक 225 परमाणु बम रखने वाला देश बन गया। इतना ही नहीं संसार के एकमात्र आतंकी देश पाकिस्तान के पास भी 100 से 120 तक परमाणु हथियार हैं जबकि भारत के पास इनकी संख्या 90 से 110 मानी जाती है, यद्यपि भारत में पहला परमाणु परीक्षण 1974 में किया गया था पर फिर भी उसने परमाणु हथियार निर्माण के मामले में गंभीरता दिखाई है और चीन व पाकिस्तान से सीमा विवाद के होते हुए भी विश्व को यह विश्वास दिलाया है कि वह अपनी ओर से किसी के ऊपर परमाणु आक्रमण नहीं करेगा। 1973 में भारत से 1 वर्ष पूर्व परमाणु हथियारों की होड़ में कूदने वाले इजराइल के पास भी 2015 तक 80 परमाणु हथियार थे। 2006 में कई प्रकार के प्रतिबंधों के होने के उपरांत भी उत्तर कोरिया ने परमाणु परीक्षण किया। इस समय विश्व के पास लगभग 16300 परमाणु हथियार हैं, यद्यपि विश्व के चिंतनशील और गंभीर विवेकशील लोग इन हथियारों को नष्ट कर विश्व शांति के लिए चीख-पुकार कर रहे हैं, परंतु उनकी चीख-पुकार का कोई प्रभाव परमाणु शक्ति संपन्न देशों पर नहीं पड़ रहा है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि जिन देशों ने स्वयं को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाकर विश्व को शांति का सबसे अधिक भरोसा दिलाया है वही विश्व के कुल परमाणु हथियारों का 98 प्रतिशत स्वयं रखते हैं, इतने बड़े जखीरे से यह विश्व को सैकड़ों बार समाप्त कर सकते हैं। इनका अधिकांश चिंतन इस बात पर केंद्रित रहता है कि अपने परमाणु जखीरे को दिखाकर छोटे देशों का भयादोहन कैसे किया जाए? इनकी वाणी में विश्व शांति होती है और इनके अंतर्मन में विश्व विनाश की लीलाएं रची जाती हैं। इनमें रूस, अमेरिका, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। ये देश किसी दुर्बल राष्ट्र को अपने शिकंजे में कसने के लिए बस इतना ही करते हैं कि उसे एक बार अपने जखीरे के सामने से निकाल देते हैं और उसके पश्चात वह देश इन्हें सवारी देने के लिए तैयार हो जाता है। अपनी इन्हीं डरावनी चालों के शिकंजे में अमेरिका ने लगभग सारे विश्व को लिया हुआ है। उसने अपने डॉलर की कीमत सारे संसार के देशों की मुद्रा से कई गुना अधिक की हुई है और इसी के आधार पर वह संसार की ‘चांदी’ को लूट रहा है, यदि आप अमेरिका के डॉलर के पीछे बैठे परमाणु भय को निकाल दें तो डॉलर भारत के रुपया से कई गुना सस्ता हो जाएगा। अपनी दादागिरी को बनाए रखने के लिए अमेरिका संसार के देशों की सरकारों को गिराने व बनवाने की क्षमता रखता है। इसके पीछे भी उसका परमाणु भय ही है। वह डॉलर कमाता है और डॉलर बहाकर ही दूसरे देशों में अपने गुप्तचरों का जाल बिछाता है, फिर वहां के अधिकारियों को, नेताओं को और प्रभावशाली लोगों को खरीदता है और अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेता है। इस सारे जंजाल से हर कोई शासनाध्यक्ष मुक्त नहीं हो पाता।
कुल मिलाकर सारे संसार में उपद्रव और उन्माद का परिवेश वही देश सृजित करते हैं, जो परमाणु शक्ति संपन्न हैं और वही नोबेल के शांति पुरस्कार के दावेदार बनते हैं। असुरक्षा का माहौल भी यह परमाणु शक्ति संपन्न देश ही अपने कुकृत्यों से सृजित करते हैं और यही उसे बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उठाते हैं। सचमुच राज बड़े गहरे हैं और काले कारनामों के दाग भी बड़े गहरे हैं। फिर भी हमें सकारात्मक सोच बनाकर ही चलना चाहिए। हमें सिंगापुर से निकली आशा की किरण का स्वागत करना चाहिए और अपेक्षा करनी चाहिए कि उत्तर कोरिया का अमेरिका किसी प्रकार का भयादोहन नहीं करेगा और उसके राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा करते हुए विश्व को सकारात्मक ऊर्जा से भरने का सराहनीय काम करेगा।
यदि हम अभी सावधान नहीं हुए तो हमें मानवता के विनाश की अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। वैसे भी जब रक्षक अर्थात सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्य ही भक्षक बन जाएं या जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो समझो कि विनाश निकट है। ध्यान रखने की बात है कि यदि भारत और पाकिस्तान के बीच आज परमाणु युद्ध हो जाए तो एक बम से ही एक ही बार में 30 लाख से सवा करोड़ तक लोग मारे जा सकते हैं। घायल होने वाले लोगों की संख्या भी लाखों में होगी और जो बीमारी फैलेगी वह अलग से। इस प्रकार के हमले से निकटवर्ती इलाकों में तापमान 30 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। जब हमारी स्थिति 50 डिग्री सेल्सियस के तापमान को भी सहन करने की नहीं रही है, तब 30 करोड़ डिग्री सेल्सियस का तापमान हमारे लिए कितना घातक हो सकता है? यह कल्पना भी नहीं की जा सकती। रेडियोधर्मिता के जलापूर्ति व्यवस्था में मिलने और हवा में होने के कारण विस्फोट से हजारों मील दूरी की आबादी भी सुरक्षित नहीं रहेगी। इसका अभिप्राय है कि यदि भारत पाकिस्तान पर परमाणु बम गिराए और उस समय पश्चिमी हवा चल रही हो तो उस हवा के कारण भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार तक भी यह महामारी फैल सकती है। अत: पाकिस्तान पर परमाणु बम गिरा कर भारत भी सुरक्षित नहीं रहेगा। ऐसी परिस्थितियों के बीच किम ट्रंप वार्ता से सचमुच अच्छे संकेत मिले हैं। हम चाहेंगे कि दोनों नेता अपने वचन के प्रति सत्यनिष्ठ होकर मानवता की रक्षा करें और विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त करने की दिशा में ठोस कार्य करें। सारे परमाणु जखीरे को धीरे-धीरे समाप्त कर विश्व को खुली सांस लेने के लिए बड़ा काम करें। नोबेल पुरस्कार की कमेटी शांति पुरस्कार देने में किसी पूर्वाग्रह का शिकार हो सकती है पर विश्वात्मा परमात्मा नहीं हो सकता। वह सच्चे प्रयासों के लिए सच्चा पुरस्कार देता है और व्यक्ति को ‘भू रत्न’ बनाकर उसकी विशिष्ट पहचान बनाता है। अच्छा हो कि ट्रंप नोबेल का शांति पुरस्कार पाने के स्थान पर विश्वात्मा का ‘भू रत्न’ पाने के प्रयास करें सारा विश्व उनके साथ है।

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