“हमारे जन्म का कारण क्या है?”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

हर कार्य का कारण हुआ करता है। इसी प्रकार हमारे जन्म का भी कारण अवश्य ही कोई है। इस पर विचार करते हैं। हमें
इस जन्म में मनुष्य जन्म मिला है। इस मनुष्य जन्म की विशेषता हमारा मानव शरीर है
जिसमें पांच ज्ञान और पांच कर्म इन्द्रियां हैं। इन इन्द्रियों से हम देखते, सुनते, बोलते, रस
का अनुभव करते तथा स्पर्श का अनुभव प्राप्त करते हैं तथा इन्द्रियों के नाना सुखों को
भोगते हैं। पांच कर्मेन्द्रियों से हम कर्म करते हैं। इन कर्मों को करने से ही हमें सुख व दुःख
की प्राप्ति होती है। यदि हम कर्म न करें तो हमारा जीवन रोगी होकर समाप्त हो सकता
है। कर्म करना हमारे लिये आवश्यक है। इन कर्मों का परिणाम हमारे इस जन्म में भी
सुख व दुःख के रूप में सामने आता है। ऐसा हमारे प्रतिदिन के जीवन में होता है, जिसका
हम अनुभव करते हैं। हम शिशु के रूप में उत्पन्न होते हैं और बढ़ते हुए किशोर व युवा
होते हैं। 12 वर्ष के बाद हमारे ज्ञान व समझ में तेजी से वृद्धि होती है और संसार की बातों को अच्छी तरह से समझने लगते हैं।
पुस्तक पढ़ने से हमें उस विषय का ज्ञान होता है। हम पुस्तक की बातों की सत्यता व असत्यता को भी जानने की क्षमता से युक्त
होने आरम्भ हो जाते हैं। ज्ञान व अनुभव बढ़ने से हमारी सोच व समझ में वृद्धि होती जाती है। युवावस्था हमारे शरीर के विकास
की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थिति होती है। इस स्थिति में हमारा ज्ञान व अनुभव परिपक्व होता है और हमें अपने हित व अहित तथा
कर्तव्य व अकर्तव्यों का भी पूरा ज्ञान होता है। यह अवस्था कुछ वर्षों तक स्थिर रहती है। मनुष्य जीवन का यह समय ही सबसे
अधिक महत्वपूर्ण एवं अपने लक्ष्यों की प्राप्ति करने का समय होता है। इस अवस्था में हम जो व जैसी साधना करते हैं उसको
प्राप्त कर लेते हैं व कर सकते हैं। इसके बाद हमारी वृद्धावस्था का आरम्भ होता है जिसमें हमारे शरीर की शक्तियों में न्यूनता
व क्षीणता आनी आरम्भ हो जाती है। लगभग 70-100 वर्ष के बीच आयु होने पर प्रायः सभी मनुष्यों की मृत्यु हो जाती है। इसके
कुछ अपवाद भी हो सकते हैं। यह हम सबका जीवनचक्र है।
युवा व प्रौढ़ अवस्था में हमने बाल्यकाल और वृद्धावस्था की दृष्टि से प्रायः सबसे अधिक शुभ व अशुभ कर्म किये होते
हैं। इन सब कर्मों का फल सुख व दुःख हम इस जीवन में नहीं भोग सकते। कुछ मनुष्य अपनी वृद्धावस्था में नाना प्रकार के शुभ
भी और अशुभ भी अनेक कर्म करते हैं। इन सबका फल इस जन्म में मिलना सम्भव नहीं होता। हमारे मनीषियों ने इस विषय
पर गम्भीर चिन्तन कर बताया है कि मनुष्य जो कर्म करता है वह मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं। एक क्रियमाण कर्म होते हैं
जिनका फल उसे कर्म करने के साथ-साथ या कुछ ही समय बाद मिल जाता है। कुछ कर्म संचित कर्म होते हैं जिनका फल इस
जन्म में कालान्तर में मिलता है। कुछ संचित कर्म ऐसे होते हैं जिनका फल इस जन्म में नहीं मिल पाता। एसे कर्मों ही हमारे
परजन्म व पुनर्जन्म का कारण बनते हैं। इन्हीं कर्मों को प्रारब्ध कहा जाता है।
सृष्टि की उत्पत्ति पर विचार करने और वेद तथा ऋषियों के ग्रन्थों के प्रमाणों से यह सृष्टि ईश्वर द्वारा बनाई हुई रचना
है। ईश्वर एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान तथा सभी प्राणियों के प्रत्येक कर्म की साक्षी
सत्ता है। ईश्वर हमारा न्यायाधीश भी है। ईश्वर के इस गुण को वेदों में अर्यमा नाम से व्यक्त किया गया है। वह ईश्वर हमारे कर्मों
का फल देने के लिये ही हमें नाना प्रकार के शरीर व भोग उपलब्ध कराता है। हमारे पूर्वजन्मों के अवशिष्ट व भोग से बचे हुए
कर्मों का भोग करने के लिये ही हमारा यह जन्म हुआ था। इस जन्म में हम पूर्वजन्मों के जितने कर्मों का भोग कर लेंगे वह हमारे
प्रारब्ध से निकल जायेंगे। शेष बचे कर्मों सहित इस जन्म के संचित कर्मों के आधार पर हमारा परजन्म का प्रारब्ध बनेगा। यह
प्रारब्ध ही हमारे भावी जन्म वा पुनर्जन्म का कारण होता है। यदि यह प्रारब्ध न होता तो हमारा जन्म भी न होता। प्रारब्ध
पूर्वजन्मों के उन कर्मों को कहते हैं जिनका भोग नहीं हुआ होता अथवा जिनका जीवात्मा को भोग करना होता है और परमात्मा

2

को भोग कराना होता है। सिद्धान्त है कि ‘‘अवश्यमेव ही भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्”। इस आधार पर हमारे जन्म का रहस्य
सुस्पष्ट हो जाता है। पूर्वजन्म के कर्म वा प्रारब्ध के अतिरिक्त हमारे इस जन्म का कोई कारण नहीं है और इस जन्म में मृत्यु
होने पर बचे हुए कर्मों का भोग करने के लिये हमारा पुनर्जन्म होना भी तर्क व युक्तिसंगत है। यदि ऐसा नहीं होगा तो सृष्टि के
सबसे बड़े न्यायाधीश, जो संसार के बड़े से बड़े न्यायाधीशों का भी न्यायाधीश और उनके कर्मों का भी न्याय करता है, उस पर
आरोप आयेगा कि उसने जीवों के कर्मों का भोग प्रदान नहीं किया। अतः इससे संसार में विद्यमान ईश्वर द्वारा संचालित कर्म-
फल व्यवस्था का भी ज्ञान होता है।
जन्म का कारण कर्म हैं, यह स्पष्ट होने पर एक शंका हो सकती है कि इस सृष्टि का आरम्भ कब से है? विचार करने
और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह सृष्टि अनादि सिद्ध होती है। इस सृष्टि का कभी आरम्भ नहीं हुआ है अपितु यह सदा
से, अनादि काल से, उत्पन्न होती व इसकी प्रलय होती आ रही है। इस सिद्धान्त को ‘सृष्टि प्रवाह से अनादि है’ सिद्धान्त कहा
जाता है। इसका कारण यह है कि ईश्वर, जीव व प्रकृति यह तीन सत्तायें अनादि सत्तायें हैं। इनका न तो आदि है और न कभी अन्त
होना है। अन्त उसी सत्ता का होता है जिसका आदि होता व जन्म होता है। जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी अवश्यम्भावी
होती है और जिसका जन्म नहीं होता, उसकी मृत्यु भी नहीं होती। गीता में कहा गया है ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु धु्रवं जन्म
मृतस्य च’ अर्थात् जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु होनी अटल है और जिसकी मृत्यु होगी उसका जन्म होना भी अटल व ध्रुव
सत्य है। इसी सिद्धान्त के अनुरूप सृष्टि के प्रवाह से अनादि का सिद्धान्त है। जीवात्मायें अनादि सत्तायें हैं। इन जीवात्माओं
का अनादि काल से सचित कर्म व प्रारब्ध चले आ रहे हैं। इसी कारण से ईश्वर को सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय करनी पड़ती
है। ऐसा ही हमेशा होता रहेगा क्योकि ईश्वर, जीव तथा प्रकृति का अस्तित्व शाश्वत, सनातन, अनादि व नित्य है।
कर्म व प्रारब्ध को जानकर मनुष्य को दुःखों से बचने के लिये अपने कर्मों को वेदानुकूल व वेदसम्मत बनाना चाहिये।
वेद निषिद्ध कोई कर्म नहीं करना चाहिये और वेद प्रतिपादित किसी कर्म का त्याग भी नहीं करना चाहिये। कुछ कर्म सबके
लिये आवश्यक एवं अनिवार्य हैं जिन्हें सभी मनुष्यों को करना चाहिये। इन कर्मों को नित्यकर्म व महायज्ञ कहते हैं। इनमें
शारीरिक शुद्धि, व्यायाम व प्रायाणाम आदि तो गौण रूप से सम्मिलित ही हैं परन्तु पांच प्रमुख कर्तव्य व महायज्ञ सन्ध्या,
देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ एवं बलिवैश्वदेव यज्ञ हैं। इनकी व्याख्या ऋषि दयानन्द जी की पुस्तक पंचमहायज्ञ
विधि तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों में दी गई है। इसे इन ग्रन्थों में देखा जा सकता है। संक्षेप में इतना बता सकते हैं कि ईश्वर
के गुण, कर्म व स्वभाव को जानकर उसकी योग व ध्यान की विधि से जो उपासना की जाती है उसे सन्ध्या कहते हैं। सन्ध्या में
स्वाध्याय करना भी सम्मिलित है। वायु व जल की शुद्धि सहित शरीर को निरोग रखने और हमारे निमित्त से दूषित हुई वायु व
जल आदि की शुद्धि के लिये अग्निहोत्र देव यज्ञ किया जाता है।
माता-पिता आदि की तन-मन-धन से सेवा, उपकार, उनका सम्मान, उनके लिये आवास, भोजन, वस्त्र एवं चिकित्सा
आदि की व्यवस्था करना तथा अपने व्यवहार से उन्हें पूर्ण सन्तुष्ट रखना पितृ यज्ञ है। समाज में जो हमसे अधिक विद्वान हैं
अथवा वेदों के विद्वान, उसके प्रचारक व गुरुकुल के शिक्षक व समाज सुधार के काम करने वाले समाज सुधारक हैं, उनकी सेवा
व उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना अर्थात् दान आदि करना, हमारा कर्तव्य है। ऐसा करने से अतिथिपूजा होती है।
बलिवैश्वदेव यज्ञ में हम पशु, पक्षियों आदि को चारा, अन्न व उनके भोजन के पदार्थों को उन्हें उपलब्ध कराते हैं, उनके प्रति
अहिंसा एवं दया का भाव रखते हैं तथा दूसरे हिंसक मनुष्यों व पशुओं से उन्हें बचाते है। ऐसे कार्यों को बलिवैश्वदेव यज्ञ के
अन्तर्गत माना जाता है। बलिवैश्वदेव यज्ञ का करना इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि यह सम्भव है कि हमारा अगला जन्म किसी
मनुष्येतर पशु आदि योनि में हो। यदि समाज में यह यज्ञ किया जाता होगा तो हमें भी कालान्तर में इसका लाभ मिलेगा। धर्म
की एक परिभाषा भी यही है कि हम दूसरों से जिस व्यवहार की अपेक्षा करते हैं वही व्यवहार हमें उनके प्रति भी करना चाहिये।
अतः बलिवैश्वदेव यज्ञ से कालान्तर में हमें ही लाभ होगा, इसलिये इस सामाजिक कार्य को भी सबको एकमत होकर एक रीति व

3

विधि से करना चाहिये। यह पंचमहाकर्तव्य कहलाते हैं। हमारे अन्य सभी कर्म भी देश व समाज सहित प्राणीमात्र के हित से जुड़े
होने चाहिये। इससे हमें इस जन्म व परजन्म दोनों में लाभ होगा।
हमारे इस जन्म का कारण हमारे पूर्व जन्म के कर्म हैं और हमारे पुनर्जन्म का कारण हमारे इस जन्म के कर्म होंगे। यह
युक्ति एवं तर्कसंगत तथा शास्त्रों से अनुमोदित सिद्धान्त है। हमें इसे मानना भी है और इसका प्रचार कर इसे सर्वमान्य बनाना
है जिससे सभी मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य वा लक्ष्य धर्म, अर्थ, कार्म व मोक्ष को प्राप्त हो सकें। सांख्यदर्शन में मनुष्य के
दुःखों सहित कर्म एवं जन्म की विस्तार से चर्चा है। उसका अध्ययन करना उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

Leave a Reply

%d bloggers like this: