अग्निपरीक्षा का सत्य क्या है?

अग्निपरीक्षा रामायण के उन प्रसंगों में से एक है, जहां कथा-नायक राम के चरित्र पर भी प्रश्न खड़े हो जाते हैं. अग्निपरीक्षा को लेकर मेरी समझ में लोगों के बीच तीन प्रकार के मत हैं. पहला मत है कि अग्निपरीक्षा का उद्देश्य पूर्व में अग्निदेव को सौंपी गयी सीता को वापस लेना मात्र था. इस मत का आधार तुलसी कृत श्रीरामचरितमानस है.

दूसरा मत है कि अग्निपरीक्षा राम के लोकोपवाद के भय से उपजा हुआ कृत्य थी. इस मत का आधार वाल्मीकि कृत रामायण है. इस मत के आधार पर राम की आलोचना होती है और उन्हें स्त्री-विरोधी तक ठहरा दिया जाता है.

तीसरा मत है कि अग्निपरीक्षा जैसा कुछ हुआ ही नहीं था या हुआ भी था तो उसका असली रूप व अर्थ हम लोग समझ नहीं पाते. इस मत का आधार लोगों की अपनी मान्यताएं और उन मान्यताओं द्वारा निरुपित कुछ तर्क हैं.

बात पहले मत की करें तो तुलसी बाबा भक्त कवि थे, अतः उन्होंने इस प्रसंग में वाल्मीकि के रामायण की बजाय भुशुण्डी रामायण के अनुकरण को उचित समझा. इस रामायण में राम सीता की अग्निपरीक्षा को नरलीला के रूप में परिभाषित करते हैं, तुलसी बाबा ने उसे थोड़ा और नाटकीय रूप दे दिया.

बाबा की कला कहें या उनपर सरस्वती का आशीर्वाद कि उनका लिखा ही आज मूल प्रसंग से अधिक लोक आस्था के लिए प्रिय बन चुका है. अधिक क्या, इसपर यही कह सकते हैं कि बाबा पाठकों की नब्ज बाखूबी समझते थे. हालांकि तुलसी बाबा रचित ये मत राम के प्रति लोक आस्था को सुरक्षित अवश्य करता है, परन्तु इस आधार पर अग्निपरीक्षा के प्रश्नों से उन्हें पूर्णतः मुक्त नहीं किया जा सकता.

अब दूसरे मत पर आते हैं, तो ऐसा है कि वाल्मीकि जी विशुद्ध इतिहासकार थे. उनमें भक्ति का तत्व नहीं था, ऐसा नहीं कह सकते, परन्तु उनकी कथा में इतिहासकार की दृष्टि प्रधान रही. जो जैसे घटा, उन्होंने वो वैसे ही रच दिया. अग्निपरीक्षा के प्रसंग में वाल्मीकि ने राम का जो रूप रचा है, वो भक्तिभाव लेकर आदिकाव्य पढ़ने वालों को विचलित कर सकता है.

वाल्मीकि रामायण में राम अग्निपरीक्षा को लेकर अत्यंत कठोर नजर आते हैं और अग्निदेव द्वारा सीता की शुद्धि का विश्वास दिलाए जाने के बाद स्पष्ट कहते हैं कि मैं सीता को शुद्ध मानता था, मगर लोकोपवाद के भय से ये परीक्षा ली है. राम की जो छवि हमारे मानस में स्थापित है, वाल्मीकि की ये कथा निश्चित ही उसे क्षति पहुंचाती है. परन्तु हमें इसे स्वीकार करना चाहिए तभी अपने नायक को सही ढंग से समझ और स्थापित कर पाएंगे.

तीसरे मत की बात करें तो सबसे पहले हमें यह दिमाग से निकाल देना होगा कि अग्निपरीक्षा नहीं हुई थी, क्योंकि वाल्मीकि से लेकर भुशुण्डी और फिर तुलसी रामायण तक कहीं भी इस प्रसंग को छोड़ा नहीं गया है. अगर इसकी सत्यता में तनिक भी संदेह होता तो तुलसी बाबा सीता-परित्याग प्रसंग की तरह ही इसे भी छोड़ देते. परन्तु उन्होंने इसे मानस में स्थान दिया यही प्रमाण है कि अग्निपरीक्षा हुई थी. अतः इसके ‘न होने’ का तर्क देकर बहस करने का प्रयास व्यर्थ है.

लेकिन इसी मत का जो दूसरा हिस्सा है कि तब अग्निपरीक्षा का जो रूप रहा होगा उसे हम समझ नहीं पाते, इसपर विचार अवश्य किया जा सकता है, क्योंकि यह सिद्ध बात है कि भारतीय पौराणिक कथाएँ अपने में गहन रूपकों का समावेश किए हुए हैं जिन्हें खोले बिना उनका असल रूप समझा नहीं जा सकता. संभव है कि अग्निपरीक्षा में भी कोई रूपक निहित रहा हो. आखिर रामायण है तो महाकाव्य ही न.

दूसरी चीज कि समय के अंतराल में शब्दों का अर्थ-संकोच और अर्थ-विस्तार भी होता रहता है. फिर रामायण को गुजरे तो वर्तमान मान्यता के अनुसार दस हजार साल के लगभग हो गए. वाल्मीकि के रामायण का रचनाकाल भी हजारों साल पूर्व का है. इतने समय में शब्दों के अर्थ अगर बदल गए हों, तो आश्चर्य नहीं किया जा सकता.

यूँ भी तब जो कुछ संस्कृत में कहा-लिखा गया, आज वो हम हिंदी में समझते हैं. इस अनुवाद प्रक्रिया में भी शब्दों का भिन्न अर्थ ग्रहण किए जाने से इनकार नहीं किया जा सकता. तो बात ये है कि अग्निपरीक्षा सत्य है, मगर वो क्या है, इसे लेकर एकदम से आश्वस्त होने की स्थिति में हम अभी नहीं पहुँच सके हैं.

अतः आप राम को उनके चरित्र के इन विरोधाभासों के साथ जिस प्रकार स्वीकार करते आए हैं, वैसे ही करते जाइए. कुछ नहीं तो यही मान लीजिये कि किसी भी मानवी कथा-नायक की नियति ही यही है कि वो कुछ अपूर्ण रहे, क्योंकि मानव-जगत से जुड़ने के लिए उसका मानवों की तरह अपूर्ण होना भी आवश्यक है. मुझे मेरे राम जितने तुलसी की ईश्वरीय प्रतिष्ठा के साथ भाते हैं, उतने ही अपनी इस तत्कालीन मानवोचित अपूर्णता के साथ भी प्रिय हैं,.

और अंत में, यह भी देख लीजिये कि राम की अग्निपरीक्षा की मांग पर हमारी माता सीता की प्रतिक्रिया क्या थी. अगर रामायण आपके लिए भी जीवन-संदेश है, तो अग्निपरीक्षा के प्रसंग में आपके नायक राम नहीं, सीता होनी चाहिए.

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