हिंसा क्या है ?

भारत के स्वतन्त्रता सङ्ग्राम में विजय का श्रेय केवल एक ही नेता को नहीं दिया जा सकता । शत्रु की शक्ति क्षीण करने में महात्मा गान्धी जी ने जहाँ अधिक से अधिक बन्धुओं को आन्दोलन मे जोड़ने का योगदान दिया, वहीं सुभाष चन्द्र बोस आदि योद्धाओं ने डट कर शत्रु की विक्रान्ति को ध्वस्त किया । किसका सहयोग अधिक था और किसका अल्प, इस पर विचार करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है ।

सामान्यतया गान्धी जी जिस मार्ग पर चल रहे थे, उसे “अहिंसा” का मार्ग माना जाता रहा है, और सुभाष बाबू के मार्ग को हिंसा का मार्ग माना जाता है । यह मान्यता केवल भारत में ही नहीं, भारत के बाहर भी स्वीकृत की गई है । वस्तुतः अमेरिका देश में तो गान्धी जी के समान विचारधारा वाले नेता मार्टिन लूथर किङ्ग को “अहिंसा” के मार्ग पर चलते हुए वहाँ के काले वर्ण के लोगों को सामान्य नागरिक अधिकार प्राप्त कराने का श्रेय दिया जाता है ।

परन्तु जब विषय वर्तमान सन्दर्भ में हिंसा या अहिंसा में से एक मार्ग चुनने का आता है, तो जनों का एक मत नहीं बन पाता । जहाँ बाहरी शत्रु के आक्रमण से रक्षा के लिए युद्ध के लिए उद्यत सेना का होना अनिवार्य है, वहीं बात बात पर लोगों का युद्ध के लिए उतारु हो जाना कमनीय नहीं है । ऐसे में, हम कैसे निर्धारित करें, कि हमें समाज में कितना हिंसा और कितना अहिंसा का मार्ग प्रोत्साहित करना है ? इस निर्णय को लेने से पूर्व एक मूल प्रश्न पर चर्चा करना आवश्यक है, “हिंसा क्या है ?” इति । कुछ उदाहरण देकर अपने विचारों को स्पष्ट करता हूँ ।

१) दो माता-पिताओं का उदाहरण लेते हैं । एक बार दोनों के बच्चे किसी वस्तु के लिए बहुत जिद्द कर रहे थे । माता-पिता के समझाने पर, बच्चों ने उन्हें ही कुछ अपशब्द कहने आरम्भ कर दिए, परन्तु जिद्द करते रहे । पहले माता-पिता को बच्चे पर बहुत क्रोध आया, और उन्होंने बच्चे का बहुत तर्जन करते हुए (डाँटते हुए) उसके गालों पर दो-दो थप्पड़ मार दिए । दूसरे माता-पिता ने बच्चे का उद्दण्ड व्यवहार देख कर आपस में शान्ति से विचार किया । फिर, क्रोध न आते हुए भी, बच्चे का तर्जन किया और दो-दो थप्पड़ मार दिए ।

 

अब, आपके विचार में, क्या दोनों ही प्रसङ्गों में, माता-पिता के व्यवहार में हिंसा बताई जाएगी ?

 

२) गीता का उपदेश सुनने के बाद अर्जुन युद्ध करने के लिए सिद्ध हो गया । उसने शत्रु की विशाल सेना को परास्त करने के लिए बहुत से योद्धाओं का वध किया । क्या अर्जुन के व्यवहार को आप हिंसक कहेंगे? क्या आपके विचार में, गीता के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण ने हिंसा का उपदेश दिया था ? या फिर, मोह को दूर करके अपने कर्तव्य के निर्वाह का ?

लेखक के मत में, हिंसा मन की एक स्थिति है, न कि कोई कर्मविशेष । यदि मन में किसी के प्रति क्रोध, द्वेष, घृणा आदि है, और इनसे प्रेरित होकर व्यक्ति का व्यवहार होता है, तो वह हिंसक व्यवहार कहलाएगा । और, धर्मयुद्ध वह है, जिसमें पापियों को दण्ड देने की भावना मुख्य हो, न कि प्रतिकार लेने की । प्रतिकार की भावना होने से, और उपर्युक्त अवगुणों के होने से, मन विचलित हो उठता है । विचलित मन मनुष्य को विवेकहीन कर देता है । विवेक की लगाम के बिना ही बुद्धि भागने लगती है । निर्णय अनुचित लिए जाते हैं । और मनुष्य पापियों को दण्ड देने के स्थान पर, स्वयं ही पाप कर बैठता है । शास्त्र कहते हैं, कि धर्म की विजय होती है । जब धर्म की हानि होती है, तब भगवान् अवतार लेते हैं, धर्म के उत्थान के लिए । लेखक के मत में, प्रतिकार आदि भावनाओं से, धर्म की और भी अधिक हानि होती है । ध्यान दें, यहाँ विरोध युद्ध का नहीं किया जा रहा है, अपितु मन में नकारात्मक भाव लाने का किया जा रहा है । यदि हिंसा-अहिंसा की परिभाषा मन की स्थिति पर आधारित की जाए, तो हम यह निःसन्देह कह सकते हैं कि, समाज में केवल और केवल अहिंसा का ही प्रोत्साहन किया जाना चाहिए, और हिंसा का कदापि नहीं ।

साधारण तर्क से यह कहा जा सकता है, कि उपर्युक्त कहना (मोह से मुक्त होकर युद्ध करना) जितना सरल है, उतना करना नहीं । मैं यह मानता हूँ । परन्तु, भारतीय होने के कारण, हमें यह सूत्र ज्ञात तो है । बाहर किसी को तो इसका आभास भी नहीं है । इसलिए हम इसका प्रयत्न तो कर ही सकते हैं । प्रतिकार की भावना, बाहर वालों के और हमारे उच्च आदर्शों में अन्तर क्षीण कर देती है । फिर अन्तर केवल नाम का ही रह जाता है ।

हमें समाज को क्षमा, सहनशीलता आदि गुणों से युक्त कराने के साथ साथ युद्ध करने योग्य बलशाली बनाना होगा । योद्धा का यदि मन विचलित हो जाए, तो बल क्षीण हो जाता है । प्रतिकार से बल का प्रदर्शन नहीं होता, अपितु त्याग के अभ्यास से बल का अर्जन होता है । क्षमा, सहनशीलता, त्याग आदि के साथ साथ बाहु-बल के होने से भारत का गौरव रहा है । केवल क्षमा आदि से गौरव नहीं मिलता, परन्तु केवल बाहु-बल से भी देश का गौरव नहीं बढ़ सकता । क्यूँकि उससे देश की प्रजा अहङ्कारी बनती है और छोटी छोटी बातों पर युद्ध के लिए उतारू हो जाती है । फिर समाज का विभाजन हिन्दू-मुसलमान आदि के आधार पर ही सीमित नहीं हो जाता । अपितु भिन्न-भिन्न आधार पर गणों की रचना हो जाती है । भाई-भाई में युद्ध, व सन्तान द्वारा पिता की हानि की जाती है । जनसामान्य स्वार्थी बनता है । विवेक खो बैठता है । केवल अल्प-लाभ के लिए चिरकाल तक व्याप्त अपनी ही हानि कर बैठता है । ऐसे समाज में धर्म का पतन ही पतन होता है । ऐसा समाज धर्मोत्थान के लिए युद्ध कर ही नहीं सकता ।

अतः लेखक के मत में, हिंसा को युद्ध करने की योग्यता से भिन्न मानते हुए, धर्म की रक्षा के लिए क्या क्या आवश्यक है, इस पर चिन्तन करना चाहिए । युद्ध करने की योग्यता व सिद्धता उसका केवल एक भाग ही है । जो अनिवार्य है परन्तु पर्याप्त नहीं ।

 

1 thought on “हिंसा क्या है ?

  1. हम भारतीयों को हिंसा और अहिंसा के जाल में ऐसा फंसा दिया की हम अकर्मण्य हो गये. यहाँ तक की हम सब न तो साहसिक यात्री बन पाए. पराधीन भारत में सुरम्य पर्वतीय स्थलों की खोज भी अंग्रेेज यात्रियों ने की. वरुण देवता का अपमान न हो और समुद्री जीवों की हत्या न हो इसलिए हम अच्छे नाविक न बन पाए. अंग्रेजों और मुस्लिम शासकों ने हम पर जो अत्याचार किये उसका प्रतिरोध हम नहीं कर सके. अहिंसावाद,मूर्तिवाद,और बहुदेवतावाद हमे कमजोर कर गया. और यह अहिंसा कालांतर में हमें कायर कर गयी. आज बंगलादेश,पाकिस्तान में हिन्दुओं का प्रतिशत कितना है और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति क्या है?यह किसी से छिपा नहीं है. छदम धर्म निरपेक्षतावादी भी इस हकीकत को जानते हैं. हमें अहिंसा पर तो विचार करना ही होगा.

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