सत्संग क्या और इससे लाभ

मनमोहन कुमार आर्य

सत्संग एक प्रचलित शब्द है जिसका प्रायः सभी लोग बातचीत व परस्पर व्यवहार में प्रयोग करते है। आजकल किसी धार्मिक कथा आदि में जाने को ही सत्संग मान लिया जाता है। सत्संग का वास्तविक अर्थ क्या है, इस पर कम लोग ही ध्यान देते हैं। सत्संग दो शब्दों सत् और संग से मिलकर बना है। सत् का अर्थ सत्य है और संग का अर्थ जहां एक से अधिक लोग परस्पर मिलकर बैठे व सत्य ज्ञान से युक्त विचारों को सुनें। इस प्रकार से सत्य विचार व सत्य चर्चा जहां हो वहां उपस्थित होना व उस चर्चा को सुन कर अपने विवेक से उसे जानना, समझना और उसकी परीक्षा कर सत्य को ग्रहण करना सत्संग कहलाता है। यदि सत् शब्द पर और गहराई से विचार करें तो यह शब्द तीन सत्ताओं के लिए प्रयोग में लाया जाता है। एक है ईश्वर, दूसरा जीवात्मा और तीसरा प्रकृति। इन तीनों की चर्चा करना और इनके सत्यस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना भी सत्-संग कहलाता है। ईश्वर की चर्चा करते हैं तो हमें ज्ञात होना चाहिये कि ईश्वर किसे कहते हैं, उसका स्वरूप कैसा है, उसके गुण, कर्म व स्वभाव किस प्रकार के हैं, उसको जानना क्यों आवश्यक है, उसका ज्ञान प्राप्त करने पर हमें क्या लाभ होता है, उसकी प्राप्ति किस प्रकार की जा सकती है, उसको क्या किसी ने कभी प्राप्त किया है और यदि हम उसे प्राप्त कर लें तो हमें क्या क्या लाभ होंगे? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनका ज्ञान सत्यस्वरूप ईश्वर को जानने व उससे लाभ उठाने के लिए आवश्यक है। आजकल जो धार्मिक कथायें आदि होती हैं उन्हें सत्संग इसलिये नही कहा जा सकता क्योंकि वहां ईश्वर व जीवात्मा आदि का सत्य ज्ञान मिलने के स्थान पर अज्ञान, अविद्या, कुरीतियां, मिथ्याज्ञान, कुपरम्परायें आदि बताई जाती हैं। श्रोताओं को क्योंकि धर्म की पुस्तकें वेद व धर्मशास्त्र का ज्ञान नहीं होता इसलिए वह चालाक व चतुर तथाकथित धर्माचार्यों के जाल में फंस जाते हैं। यह लोग तो श्रोताओं व भक्तों से धन लेकर सुखी व भोग का जीवन व्यतीत करते हैं जबकि इनके अनुयायी अभावों से युक्त दुःखी जीवन व्यतीत करते हैं और उनका आध्यात्मिक विकास भी देखने को नहीं मिलता। अतः सत्संग के यथार्थ स्वरूप को समझ कर उसके अनुरूप ही हमें व्यवहार व उपासना आदि कार्य करने चाहियें।

 

सत्संग के लिए एक अच्छा साधन स्वाध्याय है। स्वाध्याय सद्ग्रन्थों का ही किया जाता है। सद् ग्रन्थों में सबसे उच्च स्थान पर ईश्वरीय ज्ञान वेद प्रतिष्ठित है। वेद की भाषा संस्कृत है जो ईश्वर की अपनी भाषा है। ईश्वर ने अपनी श्रेष्ठ भाषा संस्कृत ही मनुष्य को सृष्टि के आरम्भ काल में वेदज्ञान के साथ प्रदान की थी। वेदज्ञान के विषय में ऋषि दयानन्द की घोषणा है कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है और इसका पढ़ना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सब मनुष्यों वा श्रेष्ठ पुरूष आर्यों का परम धर्म है। संसार की कोई भी धर्म पुस्तक ऐसी नहीं है जिसमें वेदों के समान उच्च कोटि का ज्ञान हो जिससे मनुष्य की आत्मा भ्रान्तियों व शंकाओं से मुक्त हो सके जैसी वेदाध्ययन से होती है। महर्षि दयानन्द की कृपा से वेदों का हिन्दी में भाष्य उपलब्ध है जिसे हिन्दी जानने वाला कोई भी मनुष्य पढ़ व जान सकता है। वेदों का जो भी मनुष्य अध्ययन व पाठ करते हैं उनकी अविद्या व दुगुर्ण दूर हो जाते हैं, उन्हें ईश्वर के सत्य स्वरूप सहित अपने कर्तव्यों का ज्ञान भी हो जाता है। वेद मन्त्रों के उच्चारण व उनका ज्ञान होने से यह भी एक प्रकार की ईश्वर की स्तुति व उपासना होती है। वेदों का स्वाध्याय व अध्ययन भी एक प्रकार से ईश्वर के सत्य स्वरूप की स्तुति व उसकी उपासना है जिससे अध्येता की अविद्या व अज्ञान का नाश होता है और मनुष्य राक्षसी प्रवृत्तियों काम, क्रोध, दुराचार, अज्ञान, लोभ, अन्याय व अत्याचार आदि से छूट कर देवत्व को प्राप्त होता है। इसी कारण से वेद संसार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण व मनुष्यों के लाभकारी पुस्तक हैं और वेदाध्ययन संसार में श्रेष्ठ सत्संग कहलाता है क्योंकि इसी से ईश्वर का ज्ञान व प्राप्ति होती है।

 

वेदाध्ययन से पूर्व यदि हम ऋषि दयानन्दकृत सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन कर लें तो इससे भी अविद्या दूर होती है। अविद्या दूर होने के साथ मनुष्य इस ग्रन्थ का अध्ययन कर विद्या से युक्त अर्थात् विद्वान बन जाता है। विद्वान मनुष्य ही देवता कहलाता है। इसके लिए यह आवश्यक होता है कि विद्वान मनुष्य अविद्या व अज्ञान का कोई कार्य न करे और अपने आचरण को वेदानुसार ही करे। वेद, सत्यार्थप्रकाश और ऋषिकृत ग्रन्थों के स्वाध्याय व अध्ययन ही सही अर्थों में सत्संग होता है। अतः संसार के सभी रहस्यों व ईश्वर, जीव व प्रकृति संबंधी सभी प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करने के लिये मनुष्यों को वेद और सत्यार्थप्रकाश सहित ऋषिकृत ग्रन्थों, दर्शन व उपनिषद आदि शास्त्रों का अध्ययन अवश्य करना चाहिये।

 

सत्संग वह होता है जहां वेदों का विद्वान वक्ता के रूप में है। वह विद्वान लोभ रहित हो, श्रोताओं से किसी प्रकार से धन का इच्छा व लोभ न करता हो, बातें बना कर धन या सहायता की याचना न करे अपितु अपने श्रोता व श्रद्धालु का ईश्वर व आत्मा विषयक ज्ञान देने में तत्पर हो। वह अपने श्रोता व भक्त को ईश्वर व आत्मा का ज्ञान कराकर उसे उपासना सिखाये जिससे श्रोता व भक्त ईश्वर की सही विधि से उपासना कर आत्म साक्षात्कार व ईश्वर साक्षात्कार के लक्ष्य को प्राप्त कर ले। ईश्वर व आत्मा सत्य हैं अतः इन दोनों का मिलना ही सत्संग व योग कहलाता है। स्वाध्याय करते हुए भी अध्ययनकर्ता ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव से एक सीमा तक एकाकार हो जाता हैं। उसे ईश्वर के स्वरूप व अपनी आत्मा के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। ईश्वर व आत्मा का स्वरूप जान लेने पर ईश्वर की भक्ति व उपासना स्वतः करने का मन होता है। इसके लिए वेद मन्त्रों का अर्थ ज्ञान सहित उच्चारण, वेदाधारित आध्यात्म विद्या के ग्रन्थों का अध्ययन भी सत्संग व उपासना में ही सम्मिलित होता है। सत्संग व उपासना दोनों का उद्देश्य व लक्ष्य समान है। दोनों के द्वारा हम ईश्वर व आत्मा की चर्चा व चिन्तन करते हुए ईश्वर से एकाकार होने का प्रयत्न करते हैं। ईश्वर व आत्मा दोनों का पृथक अस्तित्व व सत्ता है। दोनों मिलकर कभी एक नहीं होते परन्तु उपासना से दोनों में समीपता व निकटता स्थापित हो जाती है और जीवात्मा को ईश्वर के आनन्द का अनुभव व आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। सत्संग वस्तुतः वैदिक विधि से उपासना करने का ही नाम है। इसलिये कि उपासना में ही आत्मा व ईश्वर का मेल होता है। आत्मा को ईश्वर से मिलाने का उपासना के अतिरिक्त अन्य कोई उत्तम साधन नहीं है।

 

सत्संग से लाभ क्या होते हैं? सत्संग अर्थात् ईश्वर के संग से जीवात्मा व मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। इससे आत्मा के दुगुर्ण, दुर्व्यसन और दुःख दूर होते हैं। आत्मा का ज्ञान निरन्तर बढ़ता जाता है। ईश्वर के सान्निध्य में रहने से दुःख दूर तो होते ही हैं, आनन्दस्वरूप ईश्वर के सान्निध्य में आनन्द की अनुभूति होती है। यदि ऐसा न होता तो ऋषि दयानन्द और अन्य वैदिक विद्वान उपासना पर सबसे अधिक बल न देते। उपासना से मनुष्य को ईश्वर से सत्प्रेरणायें भी प्राप्त होती हैं जिनके मूल में परोपकार व दूसरों की सेवा व सहायता की भावना होती हैं। इन प्रेरणाओं के अनुरूप कर्म व आचरण करने से मनुष्य शुभ कर्मों का संचय करता है जिससे उसे इस जीवन व पर जन्म में सुख व उन्नति प्राप्त होती है। परजन्म में उन्नति का अर्थ है कि हम वर्तमान मनुष्य जीवन में जिस स्थिति में हैं, परजन्म में भी हमें मनुष्य जन्म मिलेगा और वर्तमान से अधिक सुख की स्थिति प्राप्त होगी। सत्संग व उपासना इन दोनों से मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है। ज्ञानियों व सदाचारियों की संगति प्राप्त होती है। इससे भी मनुष्य को आशातीत लाभ होते हैं। सत्संगी व उपासना करने वाला मनुष्य सन्ध्या, देवयज्ञ अग्निहोत्र सहित पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ और बलिवैश्वदेवयज्ञ भी करता है। यह सब उसे लोक में यश प्राप्त करने के साथ स्वावलम्बी व सुखी बनाते हैं। सत्संग से लाभ ही लाभ है। दुर्व्यसनों से मुक्ति मिलना भी कम बड़ा लाभ नहीं है। अतः मनुष्य को अपने विवेक से ज्ञानियों की संगति सहित स्वाध्याय एवं ईश्वरोपासना में अपना अधिक से अधिक समय व्यतीत कर जीवन को सन्मार्ग पर चलाना चाहिये। यथार्थ सत्संग मनुष्य को मोक्ष द्वार पर ले जाकर मोक्ष प्राप्त भी करा सकता है। मोक्ष प्राप्ति ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है। अतः मुमुक्षुओं को सत्संग अवश्य करना चाहिये।

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