लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन उवाच

  ॐ -संस्कृत न्यायालयीन भाषा,

ॐ -शासकीय आदेश संस्कृत में,

ॐ -क्रय-विक्रय पत्र संस्कृत में,

ॐ -मंदिरों का प्रबंधन संस्कृत में,

ॐ- सैंकडों शिलालेख, संस्कृत में,

कहाँ? जानने के लिए कृपया पढिए।

 

(१) ”कौन बनेगा करोडपति,”

कौन बनेगा करोडपति में, कल्पना कीजिए, कि अमिताभ बच्चन जी, आप को प्रश्न पूछते हैं, कि ”किस देश की राष्ट्र भाषा थी संस्कृत ?” तो क्या आप उस का उत्तर जानते हैं? सोच के बताइए, किस देश की राष्ट्र भाषा संस्कृत थीं? ३० सेकंड में ही बताना है।

नहीं जानते?

हार मान गए ना?

चलो, बच्चन जी, आपको एक संकेत भी देते हैं।

सियाम (थायलॅन्ड) के निकट, एक देश है, उस देश की राष्ट्र भाषा संस्कृत थीं।

तो, अब बताइए, कि, किस देश की राष्ट्र भाषा थी संस्कृत?

क्या कहा ’कंबोडिया” ?

उत्तर, सही है, आपका। {तालियाँ }

जी हाँ, कम्बोडिया की राष्ट्रभाषा संस्कृत थी।

{वैसे, बच्चन जी को अच्छी हिंदी के प्रयोग के लिए भी, प्रशंसित किया जाना चाहिए।} अस्तु।

 

(२) क्या पागल देश था यह कम्बोडिया?

क्या पागल था, कम्बोडिया! अरे!(अबे, नहीं कहूँगा) जीर्ण शीर्ण ऋग्वेद के पृष्ठ जैसे पोंगा पण्डितों, जिस देश का उस संस्कृत पर (Monopoly) एकाधिकार है, जिसकी वह धरोहर रूपी अधिकृत भाषा है, वह भारत, तो उसे ”मृत भाषा” घोषित करना चाहता है। उसीका एक ”महामूर्ख-शिरोमणि” राज्यपाल उसे बैल गाडी युग की भाषा मानता है। और यह ”मूर्ख” कंबोडिया, उस मरनेवाली भाषा को अपनी राष्ट्र भाषा मानता था? क्या मूर्ख था?

 

(३) कंबुज देश में संस्कृत

परंतु, संस्कृत कंबुज देश की ६ वीँ शती से लेकर १२ वीँ शती तक, राष्ट्र भाषा ही थी।

भारत को गुरु मानने वाले कंबोडिया को भारत ही भूल गया। वैसे भारत सभी (दक्षिणपूर्व) अग्निकोणीय आशिया के देशों को भूल-सा ही गया है। जब भारत ही अंग्रेज़ी भाषा का गुलाम है, तो किस मुंह से वह संस्कृत का आश्रय् लेकर, इन मित्र देशों से संबंध प्रस्थापित करें?

भारत वैसे तो, हिन्दोनेशिया, मलय, जावा, सुमात्रा, कम्बुज, ब्रह्मदेश, सियाम, श्रीलंका, जपान, तिब्बत, नेपाल, इत्यादि अनेक देशों से सहजता और निर्विघ्नता से, संबंध प्रस्थापित कर सकता था; इन देशों से अपनी समन्वयी संस्कृति और संस्कृत के आधार पर।यह बृहत्तर भारत था, जो सैंकडों वर्षों से भारत के संपर्क में था। भारत भी, इन देशों से संस्कृत के माध्यम से, और अपनी शोषण विहीन, विश्वबंधुत्व-वादी संस्कृति के माध्यम से सम्बंध रखते आ रहा था। स्वतंत्रता के बाद, फिर से उन संबंधों को उजागर करने की आवश्यकता थी। पर हमने कोई विशेष ध्यान इन देशों की ओर दिया हो, ऐसा दिखाई नहीं देता। राजनैतिक दूतावासों की बात नहीं कर रहा हूँ। संस्कृत के कंबुज देश पर के प्रभाव के विषय में, एक ”भक्तिन कौंतेया” नामक शोधकर्ता क्या कहते हैं, यह जानने योग्य होगा।

(४) ’कंबुज देश के, संस्कृत शिलालेख’

शोधकर्ता भक्तिन् कौन्तेया अपनी उपर्युक्त शीर्षक वाली, ऐतिहासिक रूपरेखा में संक्षेप में निम्न लिखते हैं। प्राचीन काल में कम्बोडिया को कंबुजदेश कहा जाता था।

९ वी से १३ वी शती तक अङ्कोर साम्राज्य पनपता रहा। राजधानी यशोधरपुर सम्राट यशोवर्मन नें बसायी थी । अङ्कोर राज्य उस समय आज के कंबोडिया, थायलॅण्ड, वियेतनाम, और लाओस सभी को आवृत्त करता हुआ विशाल राज्य था। संस्कृत से जुडी भव्य संस्कृति के प्रमाण इन अग्निकोणीय एशिया के देशों में आज भी प्रचुर मात्रा में विद्यमान है।

(५) कंबुज देशों में संस्कृत का महत्त्व।

आगे कहते हैं, कि, कंबुज देश भी स्वीकार करता है, कि, बिना संस्कृत, कंबुज देश की ’ख्मेर भाषा” विकसित नहीं हो सकती थी। {क्या भारत की कोई भी भाषा बिना संस्कृत विकसित हो सकती थी?}

वैसे ख्मेर और संस्कृत दो अलग भाषा परिवारों की भाषाएं हैं।

अपना शब्द भंडार बढाने के लिए ख्मेर भाषा ने असाधारण मात्रा में संस्कृत शब्दावली को अपनाया था। कंबुज शिलालेख इसकी पुष्टि करते हैं। वास्तव में, कंबुज देश का अङ्कोर कालीन इतिहास रचने में भी ये शिलालेख ही मूल स्रोत है।

कंबुज शिलालेख जो खोजे गए हैं, वे कंबुज, लाओस, थायलॅण्ड, वियेतनाम इत्यादि विस्तृत प्रदेशों में पाए गए हैं। कुछ ही शिला लेख पुरानी ख्मेर में, पर बहुसंख्य लेख संस्कृत भाषा में ही मिलते हैं।

(६) संस्कृत उस समय की

संस्कृत उस समय की, (दक्षिण-पूर्व)अग्निकोणीय देशों की सांस्कृतिक भाषा थी। (कंबुज)ख्मेर ने अपनी भाषा लिखने के लिए, भारतीय लिपि अपनायी थी। आधुनिक ख्मेर भारत से ही स्वीकार की हुयी लिपि में लिखी जाती है। वास्तव में ”ग्रंथ ब्राह्मी” ही आधुनिक ख्मेर की मातृ-लिपि है। कंबुज देश ने ’देवनागरी’ और ’पल्लव ग्रंथ लिपि’ के आधारपर अपनी लिपि बनाई है।

आज कल की कंबुज भाषा में ७० % शब्द सीधे संस्कृत से लिए गए हैं; कहते है कौंतेय ।

ख्मेर(कंबुज भाषा) ऑस्ट्रो-एशियाई परिवार की भाषा है, और संस्कृत भारोपीय परिवार की भाषा है। और चमत्कार देखिए, कि भक्तिन कौंतेया अपने लघु लेख में कहते हैं, कि ७० प्रतिशत संस्कृत के शब्द ख्मेर में पाए जाते हैं, पर, बहुत शब्दों के उच्चारण बदल चुके हैं। यह एक ऐसा अपवादात्मक उदाहरण है, जो संस्कृत के चमत्कार से कम नहीं। कंबुज ख्मेर भाषा अपने ऑस्ट्रो-एशियाई परिवार से नहीं, पर भारोपीय (भारत-युरोपीय) परिवार की भाषा संस्कृत से शब्द ग्रहण करती है।संस्कृत की उपयोगिता का इससे बडा प्रमाण और क्या हो सकता है? { भारत इस से कुछ सीखें।}

सिद्धान्त:

संसार की सारी भाषाओं की शब्द विषयक समस्याओं का हल हमारी संस्कृत के पास है, तो फिर हम अंग्रेज़ी से भीख क्यों माँगे?

 

(७) कुछ शब्दों के उदाहरण:

कंबोजी भाषी शब्दों के कुछ उदाहरण देखने पर, उस भाषापर संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट हो जाएगा।

कंबोजी महीनों के नाम

चेत् (चैत्र), बिसाक् (वैशाख), जेस् (ज्येष्ठ),

आसाठ (आषाढ), स्राप् (श्रावण-सावन),

फ्यैत्रबोत् ( भाद्रपद,) गु. भादरवो, आसोज् (आश्विन), -गुजराती आसो.

कात्तिक्‌ (कार्तिक),गु. कार्तक, मिगसर् (मार्गशीर्ष), गुजराती मागसर,

बौह् (पौष), मेइ (माघ),गु. माह, फागुन( फाल्गुन),गु. फागण,

लिखने में तो संस्कृत या पालि रूप ही लिखे जाते हैं, पर उच्चारण सदा लिखित शब्द के अनुसार नहीं होता। कम्बोज में शक संवत्सर तथा बुद्ध संवत्सर दोनों का प्रयोग होता है।

 

(८) कुछ आधुनिक शब्दावली

धनागार (बँक), भासा (भाषा), टेलिफोन के लिए ’दूरसब्द’ (दूर शब्द), तार के लिए, ’दूरलेख’, टाईप-राइटर को, ’अंगुलिलेख’ तथा टायपिस्ट को ’अंगुलिलेखक’ कहते हैं।

सुन्दर, कार्यालय, मुख, मेघ, चन्द्र, मनुष्य, आकाश, माता पिता, भिक्षु आदि अनेक शब्द दैनिक प्रयोग में आते हैं। उच्चारण में अवश्य अंतर है। कई शब्द साधारण दैनिक जीवन में प्रयुक्त न होकर काव्य और साहित्य में प्रयुक्त होते हैं। ऐसी परम्परा भारतीय भाषाओं में भी मानी जाती है।शाला के लिए ’साला’, कॉलेज के लिए ’अनुविद्यालय’, विमेन्स कॉलेज के लिए ’अनुविद्यालय-नारी’, युनिवर्सीटी के लिए ’महाविद्यालय’, डिग्री या प्रमाण पत्र के लिए ’सञ्ञा-पत्र’, साइकिल के लिए ’द्विचक्रयान’, रिक्षा के लिए ’त्रिचक्रयान’ ऐसे उदाहरण दिए जा सकते हैं।

श्री विश्वेश्वरन जी के सौजन्य से निम्न सूची।

Swah-ghtham (स्वाःघथम ) स्वागतम, Loek (Men)लोक, Loek Sri (Woman) लोक श्री (महिला), Saa-boo (साबु) साबुन -यह शब्द हिंदी है। Psar (प्सार) बज़ार–हिंदी है, Skar (स्कर )-शक्कर हिंदी है। Country प्रदेस, नगर; Letter (of the alphabet)अक्सर, Character (of a person)चरित(चरित्र), Language-Bhaasaa भासा(भाषा),

Human being -मनुःस्,(मनुष्य), Word- सब्त (शब्द)

 

(९) राष्ट्र भाषा संस्कृत:

(क) वास्तव में संस्कृत ही न्यायालयीन भाषा थी, एक सहस्र वर्षों से भी अधिक समय तक, के लिए उसका चलन था।

(ख)सारे शासकीय आदेश संस्कृत में होते थे।

(ग)भूमि के या खेती के क्रय-विक्रय पत्र संस्कृत में ही होते थे।

(घ) मंदिरों का प्रबंधन भी संस्कृत में ही सुरक्षित रखा जाता था।

(ङ) प्रायः १२५० शिलालेख, उस में से, बहुसंख्य संस्कृत में लिखे पाए जाते हैं इस प्राचीन अङ्कोर साम्राज्य में।

 

(१०)१२५० में से दो शिला लेख उदाहरणार्थ प्रस्तुत।

श्रीमतां कम्बुजेन्द्राणामधीशोऽभूद्यशस्विनाम्।

श्रीयशोवर्म्मराजेन्द्रो महेन्द्रो मरुतामिव॥१०॥

श्री यशोवर्मन महाराजा हुए भव्य कंबुज देशके, जैसे इन्द्र महाराज हुए थे, मरुत देश के। Sri Yasovarman became the emperor of the glorious and famous kings of Kambuja, like Indra the emperor of Maruts.

—————————————-

श्रीकम्बुभूभृतो भान्ति विक्रमाक्रान्तविष्टपाः।

विषकण्टकजेतारो दोर्द्दण्डा इव चक्रिणः॥९॥

श्री. कंबु देश के राजा विश्व में अपने शौर्य और पराक्रम से चमकते हैं, और शत्रुओं को उखाड फेंकते है, जैसे विष्णु भगवान विषैले काँटो (जैसे शत्रुओं को)को उखाड फेंकते थे।The kings of Sri Kambu shine with the world having been won over by their prowess and enemies conquered like poisonous thorns by the arms of Vishnu.

 

(११) राजाओं की शुद्ध संस्कृत नामावली

Sarvabhauma=सार्वभौम

Jayavarman=जय वर्मन,

Indravarman=इंन्द्र वर्मन

Yasovarman=यशो वर्मन

Harshavarman=हर्ष वर्मन

Dharanindravarman=धरणींन्द्र वर्मन

Suryavarman=सूर्य वर्मन

Udayadityavarman =उदयादित्य वर्मन

 

(१२) डॉ. रघुवीर जो नेहरू जी के समकालीन थे, वे कहते हैं, उनकी पुस्तक India’s National Language में,

”छठी से बाहरवीं शताब्दी तक कम्बोज देश की राष्ट्र भाषा संस्कृत थी। यह तथ्य भारत वर्ष के एक एक बालक और बालिका को पता होना चाहिए। बारहवीं शताब्दी में भारतवर्ष स्वयं अपनी स्वतंत्रता खो बैठा और तभी से उसके विदेशी सम्पर्क बन्द हुए।” (संदर्भ ) पृष्ठ ९९, India’s National Language, Prof. Dr. Raghu Vira, Publisher –>International Academy Of Indian Culture

24 Responses to “क्या, संस्कृत राष्ट्र भाषा थी? किस देश की?”

  1. arish sahani

    How said i was raided educated in India but never taught about the real India it real past and truth about the indianhistory

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      सहानी जी नमस्कार।
      यदि हमें सही इतिहास पढाया जाता, तो हमारी मानसिकता कभीसे स्वतंत्र हो जाती।
      आप की टिप्पणी सही है।
      इसी प्रकार समय निकाल कर टिप्पणियाँ देते रहें।
      टिप्पणी देने के लिए धन्यवाद।

      Reply
  2. jai shanker tiwari

    खोजपूर्ण आलेख के प्रति बारंबार बधाई । कंबुज की राष्ट्रभाषा संस्कृत 6वीं सदी से 12 वीं सदी तक चकित करने वाला तथ्य है । आस्ट्रो एशियाटिक परिवार की भाषा ख्मेर संस्कृत से 70%शब्द ग्रहण करती है ,यह भारतीयों के लिए गौरवपूर्ण है । हमें अपनी विरासत ,भाषा ,जीवन मूल्य,संस्कृति आदि को समझने तथा परमुखापेक्षी होने से बचना होगा ।

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  3. RTyagi

    हृदयस्पर्शी लेख है… आपके शोध कार्य व परिश्रम को शत शत नमन..

    और एक बात …. कृतज्ञता कैसे बताई जाती है… यह कला भी आपसे सीखने योग्य है…
    जैसे :
    ——————
    (कितने कितने कंधोंपर, (कृतज्ञता सहित) खडा होता हूँ, ऊंचाई बढ जाती है।
    अनिल जी –बहुत बहुत धन्यवाद।)
    ————————
    धन्यवाद …
    रवि त्यागी

    Reply
    • G

      It is lot easier and justifiable to make primary education in mother tongue mandatory. First, let us pursue that which is within our reach.

      Reply
      • डॉ. मधुसूदन

        Dr Madhusudan

        इस आलेख में चर्चित बिन्दुओं के किस अंश से आप का यह वाक्य प्रत्यक्षतः जुडा हुआ है? कृपया उद्धरित करें।

        Reply
  4. डॉ. मधुसूदन

    Dr Madhusudan

    प्रिय शिवेन्द्र जी,
    नरेश भारतीय जी की, निम्न पंक्तियाँ कुछ बदल कर
    मेरी/आपकी भीनी भावना के लिए उचित प्रतिक्रिया लगती है|
    ==>
    ” जान ले बस इतना कि,
    हमें, पहुँचाना है
    भारतीयत्व का अमर सन्देश
    उन दिलों तक
    जो अभी धड़के नहीं हैं|”
    <==
    कभी तो, धड़क उठेगा|
    धन्यवाद|

    Reply
  5. शिवेंद्र मोहन सिंह

    मधुसूदन जी आज आपका लेख पढ़ के ह्रदय को बहुत आघात लगा, क्या कहें ह्रदय विदीर्ण हो रहा है। इतनी समृद्ध शाली परंपरा के होते हुए भी हम भाषाई भिखारी हो गए। स्वनाम धन्य राष्ट्र भारत आज कहाँ आ गया है? कितनी क्रूरता से इसको विखंडित किया गया है। भाषाई गुलामी आज वर्तमान मष्तिष्क को इतनी बुरी तरह से प्रदूषित कर चुकी है की कहीं कोई राह दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। क्या थे और क्या हो गए हैं हम आज। आज आपको बधाई या साधुवाद देने का दिल नहीं कर रहा है वरन अपनी अक्षमता पर रोना आ रहा है। जाने किन मानसिक गुलामों से नाता जुड़ा … जाना कहाँ था … और कहाँ आ गए आज। जिस राष्ट्र को सर्वोच्च होना चाहिए था वो उधार का संविधान लिए बैठा है। गर्व और शर्म का फर्क ही मिट गया है। आपकी काबिलियत और मेहनत को शत शत नमन। धन्यवाद।


    सादर,

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    • Rekha Singh

      हमारी इतनी समृद्ध शाली परम्परा , संस्कृति हमारी ही भूलों और विषमताओ के कारण हमारे ही देश मे असहाय हुई पड़ी है लेकिन अब उसके पुनः जाग्रत होने का समय आ गया है ।

      Reply
      • डॉ. मधुसूदन

        डॉ. मधुसूदन

        बहन सुश्री रेखा जी।

        हमारे नेतृत्व नें ही घोर गलतियाँ की। डॉ. रघुवीर और उनके ८० साथी विद्वानों ने उस समय के प्रधान मंत्री जी को एडी चोटी एक कर समझानेका बहुत प्रयास किया। साथ और ५ बडे बडे सांसद भी थक गए। {ये मैंने सुना हुआ है।} —-भाग हमारे। नेतृत्व की गलति जैसे पिता की गलति संतान को दुःखी करती है, वैसे सारे देश को भुगतनी पडती है। और क्या कहें?
        मधु भाई

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  6. डॉ. मधुसूदन

    madhusudan

    PRAVAS SE UTTAR.
    sushri Shakuntala ji, Dr. T. K. Roy, Dr. Pratibha Saccesana, Shri Sanjay Binnani ji, Anil Gupta ji —-aap sabhika DHANYAVAD karata hun. Pravas par hun–Hindi font nahin khulata, kshama karen.

    SANJAY JI —ek sevak hi hun. Prem bhav sahi hai. aadar man sakata hun. ISASE ADHIK KUCHH NAHIN HUN. Galati kar sakata hun—-yadi karun to dikhate rahen.

    Dr. T K Roy abhi japan aur cambodia ho kar aae hain, Unake anubhav par aalekh ka prayas karunga.

    Reply
  7. Sanjay Binnani

    हे मधुसूदन!
    जम्बूद्वीप के आर्यावर्त अन्तर्गत भरत-खन्ड पर गहराये घने प्रदूषण को दूर करने की दिशा मे आपकी लेखनी – सुदर्शन स्वरूप सिद्ध होगी.
    नमन!
    नमन !
    नमन !!

    संजय

    Reply
  8. शकुन्तला बहादुर

    शकुन्तला बहादुर

    कम्बोडिया की राष्ट्रभाषा देववाणी संस्कृत थी – इस संबंध में अत्यन्त परिश्रमसाध्य शोधपरक लेख सच्चे अर्थों में
    भारतीयों की आँखें खोलने वाला ज्ञानवर्धक आलेख है । सम्बन्धित प्रमाणों से पाठक का विस्मित हो जाना तो
    स्वाभाविक ही है । ये दु:खद विडम्बना है कि हम अपनी मणि को काँच समझकर तिरस्कृत करते हैं,उसकी उपेक्षा करते हैं और काँच को मणि समझकर अपनाते और मिथ्या गौरव का अनुभव करते हैं । काश हम भारतीयों की अस्मिता जाग जाती और हम संस्कृत तथा उससे जन्मी हिन्दी को अपना कर स्वयं को गौरवान्वित समझने लगते।
    जन-जागृति के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित डा. मधुसूदन जी के सतत प्रयास सराहनीय हैं ।

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  9. Anil Gupta

    आदरणीय मधुसुदन जी, आपने स्नेहपूर्वक जो अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध करायी है उसके लिए अनुग्रहित हूँ.

    Reply
  10. Anil Gupta

    मैं अभिभूत हूँ इस बात पर की अभियांत्रिकी के प्राध्यापक होने के बावजूद विभिन्न भाषाओँ के सम्बन्ध में इतने खोजपूर्ण तथ्य उपलब्ध कराना लिसी आश्चर्य से कम नहीं है. कभी तमिल , कभी जापानी तो अब कम्बुज के विषय में इस जानकारी से हमें अपना ज्ञान वर्धन का अवसर मिला है. पूर्व में तमिल और संस्कृत की समानता विषयक लेखमाला पूर्ण हो गयी है क्या?डॉ.मधुसुदन जी के सभी लेख संग्रहणीय हैं.अस्तु साधुवाद.

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      मधुसूदन

      अनिल जी।
      शुद्ध हिंदी के एक प्रखर, एक-निष्ठ भक्त, जिन्होंने आजीवन शुद्ध हिन्दी के पुरस्कार में अपना योगदान दिया है, जो बी. बी. सी. वालों को भी ललकार ने में पीछे नहीं हठते,उन्हें(बी. बी. सी.को) शुद्ध हिंदी की, शब्द सूची भेज कर सहायता भी करते हैं। ऐसे श्री. मोहन जी गुप्ता ने, कॅनडा से मुझे कंबुज शिलालेखों की जानकारी भेजी। मैं ने जब वे शिला लेख देखें, तो अचरज, गौरव, और साथ में हमारी अपनी परम श्रेष्ठ देववाणी की उपेक्षा पर लज्जा का अनुभव हुआ।
      निम्न का, स्थूल रूप से अर्थ करें —>
      संस्कृत अत्युच्च आध्यात्मिक,
      हिंदी-सर्वोपरि राष्ट्रीय,
      और अंग्रेज़ी तामसिक भाषा है।
      (१)तमस, भ्रष्टाचार बढाना है, अंग्रेज़ी का समर्थन करें।
      (२)राष्ट्रीयता बढाना है हिंदी का,
      (३) और महाराज आध्यात्मिकता जो भारत की अपनी अतुलनीय पहचान है, उस में पदार्पण भी करना है, तो संस्कृत या संस्कृत निष्ठ हिन्दी के बिना किसीजंतु को कोई पर्याय प्राप्त नहीं।
      इसी लिए केवल संस्कृत/(निष्ठ हिंदी) द्वारा शिक्षित ही “विश्वबंधुत्ववादी” है।
      अंग्रेज़ी शिक्षित तामसिक, बलात्कारी, भष्टाचारी-धर्मान्तरण के पोषक है।
      और हिन्दी के पुरस्कर्ता शुद्ध राष्ट्रवादी है।
      और देखते देखते आलेख बन गया।
      कितने कितने कंधोंपर, (कृतज्ञता सहित) खडा होता हूँ, ऊंचाई बढ जाती है।
      अनिल जी –बहुत बहुत धन्यवाद।

      Reply
      • शेखर

        नमस्ते,

        आपने कहा
        “और अंग्रेज़ी तामसिक भाषा है।
        (१)तमस, भ्रष्टाचार बढाना है, अंग्रेज़ी का समर्थन करें।” तथा
        ” अंग्रेज़ी शिक्षित तामसिक, बलात्कारी, भष्टाचारी-धर्मान्तरण के पोषक है।”

        क्या आप इस पर शतप्रतिशत विश्वास रखते है? क्या आप इस विषय में विस्तार से विवेचन करेंगे?

        धन्यवाद

        Reply
        • डॉ. मधुसूदन

          Dr Madhusudan

          स्थूल रूपसे ऐसा ही है। निश्चित।
          भाषा के इतने पहलु है, कि, किस पर लिखें, और किस पर ना लिखें?
          इसी प्रश्न पर सोच कर साधारण पाठक को साथ लेकर आगे कैसे बढना, यह विचार सदा मस्तिष्क में मंडराते रहता है।
          धन्यवाद।

          Reply
        • ken

          How English can be Taamsik to Dr.professor who resides in USA and earns his livelihood by teaching technical subjects in English?

          Those who know English encourage others not to learn it. Why?
          Didn’t the old Sanskrit pundits did the same things to the masses?

          Reply
          • डॉ. मधुसूदन

            मधुसूदन

            “स्थूल रूपसे” और अनुभव से, कहा है।
            बिना अंग्रेजी जाने, यदि मैं अंग्रेजी पर लिखता, तो कौन मेरी सुनता?

  11. डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना

    प्रतिभा सक्सेना

    यह भी एक मान्यता है कि कंबोडिया को महर्षि अगस्त ने बसाया था.सारे पूर्वी द्वीप समूह पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव बहुत मुखर है .लेकिन जिसे अपनी अस्मिता का न भान हो न उसे बचाने की चिन्ता, ऐसे स्वाभिमानहीन लोग जो हमेशा दूसरों के दरवाजें खटखटाते हों,उनसे माँग कर ही उपकृत होते हों,.उन्हें कैसे आत्म-बोध कराया जाय !

    Reply

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