जब ‘‘धूनीवाला रायट केस’’ 2 साल होशंगाबाद में रहकर जीते थे हरिहरानन्द छोटे दादाजी

                                                            आत्माराम यादव पीव   

            होशंगाबाद का नाम परमहंस स्वामी हरीहरानन्द छोटे दादा जी जिन्हे भक्त श्रीहरिहर भोले भगवान के नाम से जानते है के वर्ष 1936 से 1938 तक होशंगाबाद में धूनीरमा कर रहने के कारण जुड़ा । धूनीवाले श्रीदादा दरबार  खण्डवा के विरूद्ध षडंयत्र मे शामिल खंडवा के थाना प्रभारी भगवत प्रसाद लुम्बा द्वारा 21 पुलिस दलबल के साथ धूनीवाले दादाजी के आश्रम में हो रही आरति के समय संध्या 7 बजे के लगभग प्रवेश किया ओर आरती में शामिल 2-3 सौ निर्दोष भक्तों पर पर लाठीचार्ज एवं रायफल से बेदर्दी से मारपीट कर खून खराबा की घटना को अंजाम देने के 5-6 दिन बाद छोटे दादा की ओर से पुलिसवालों के खिलाफ श्रीमान नजरूद्दीन साहब की अदालत में दिनाक-13 मार्च 1936 को भारतीय दण्ड संहिता की धारा-395 डकैती, 148,327,332,333 और 342 के अंतर्गत मामला दर्ज कराया गया। जबकि इसके पूर्व ही थाना प्रभारी द्वारा इस अमानुषिक घटना को अंजाम देने के बाद छोटेदादाजी और अन्यों पर धारा-140,332 व 342 भादवि लगाकर 3-4 दिन थाने में बंद रखने पर खण्डवा शहर का माहौल गर्मा गया और दादाजी के अनुयायियों का आपा सरकार के विरूद्ध चरम पर पहुँच गया । इस घटना के कारण चार महिने तक जब खण्डवा अशांत रहा और कानून व्यवस्था की स्थिति अंग्रेजी हुकुमत के वश में नहीं रही तब खण्डवा शहर सहित आसपास के माहौल को शांत करने के लिये उच्च न्यायालय नागपुर ने 4 जुलाई 1936 को पुलिस द्वारा दायर यह मुकदमा खण्डवा से होशंगाबाद जिला कोर्ट में अन्तरित किया, जबकि पुलिसवालों पर दादाजी दरबार द्वारा डकैती सहित अन्य धाराओं का मामला खण्डवा में ही चला।

    कहा जाता है कि “धूनीवाला रायट केस” के नाम से विख्यात इस प्रकरण में अंग्रेजी हुकुमत के पांव उखाड दिये थे तब उन्होंने खण्डवा में शांति स्थापित करने के लिये स्वामी हरिहरानन्द जी छोटे दादा जी से निवेदन किया और उन्हें नागपुर उच्च न्यायालय से अपील कर खण्डवा के स्थान पर दूसरे शहर की कोर्ट में मामला चलाने की अनुमति के लिये कहा तब उन्होने दादाजी दरबार खण्डवा सहित पूरे क्षैत्र के लोगों में उठ रहे आक्रोश का ध्यान हटाने के लिये यह मामला दूसरे शहर की अदालत में चलाने की अर्जी दी तब होशंगाबाद के तत्कालीन मजिस्ट्रेट श्री राव साहब निर्गूण्डकर साहेब की अदालत में यह फौजदारी मुकदमा नम्बर 50 वर्ष 1936 में शुरू हुआ जिसे परमहंस स्वामी हरिहरानन्द जी छोटे दादाजी ने “साँच  को आंच”  नहीं बताकर अपने भक्तों को शात रहने के लिये कहा और खुद परिवार सहित होशंगाबाद आ गये तथा अदालत के निर्णय तक यहीं धूनीरमा कर निवास करते रहे। स्वामी हरिहरानन्द जी छोटेदादा जी होशंगाबाद में पण्डित जगन्नाथ मिश्र के बगीचे में (बसंत टाकीज के बगल में, बालागंज) ठहरे और प्रतिदिन धार्मिक क्रियाकाण्ड को निर्विघ्न जारी रखा जहां  सुबह शाम उनके अनुयायियों का मेला सा लगा रहता था। उच्च न्यायालय नागपुर से जब मामला होशंगाबाद कोर्ट अंतरित हुआ तब यह होशंगाबाद कोर्ट में धूनीवाला रायट केस को दो भागों में करके सुनवाई शुरू हुई। पहले भाग में मोटर गैरेज के सामने वाली घटना, जो सांयकाल पाँच –साढ़ेपाँच बजे घटी को शामिल किया तो दूसरे भाग में रात्रि के साढ़े सात बजे से आठ बजे तक के घटनाक्रम को जोड़ा जिसमें 60-70 आश्रमवासियों के द्वारा पुलिसपार्टी पर हमला किए जाने का अभियोगारोपण किया गया।

            परमहंस स्वामी हरीहरा छोटे दादा जी ने ‘‘धूनीवाला रायट केस’’ को ‘‘साँच को आंच नहीं’’ नाम दिया उसके विषय में जानने की जिज्ञासा सभी के मनों में होगी कि आखिर दादा दरबार पर यह मामला क्यों दर्ज हुआ? इससे पूर्व आप सभी को दादा दरबार के विषय में जानना होगा। दादाजी धूनीवाले मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक छोटे-से गाँव निमावर (साईखेडा) में एक पेड़ से प्रकट हुए थ| इसके बाद दादाजी महाराज ने साईखेडा में आकर अपनी अनेक लीलाएं की| यहाँ उन्होंने अपने हाथों से ही धूनी प्रज्ज्वलित की|जो कि आज भी नगर साईखेडा में दादाजी दरबार गढी में प्रज्ज्वलित है|इस धूनी के बारे में कहा जाता है कि दादाजी महाराज इस धूनी में चने आदि डालकर, उसे हीरे- मोती बना देते थे एवं कोई भी व्यक्ति उन्हें कितनी भी बेसकिमती चीज क्यों न देता हो वो उसे भी धूनी मैया में डाल देते थे|  छोटे दादा जी के विषय में कहा जाता है कि वे राजस्थान के डिडवाना गाँव में एक समृद्ध परिवार के सदस्य रहे है ओर उनका वास्तविक नाम भँवरलाल था जो बड़े दादाजी से मिलने आए। मुलाकात के बाद भँवरलाल ने अपने आप को धूनीवाले दादाजी के चरणों में समर्पित कर दिया। भँवरलाल शांत प्रवृत्ति के थे और दादाजी की सेवा में लगे रहते थे। दादाजी ने उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया और उनका नाम हरिहरानंद रखा तब से वे हरीहर भोले भगवान के नाम से भी विख्यात हुये।   

    दादा दरबार नरसिंहपुर जिले के ग्राम सांईखेड़ा में स्थित था जिसमें कई वर्षो तक परमहंस स्वामी केशवानंद बड़े दादाजी जी अपने अनुयायियों के साथ निवास कर भजन-पूजन करते थे जिन्हें कुछ उपद्रवी तत्वों ने परेशान कर रखा था जिससे बड़े दादाजी की साधना एवं आत्मावलोकन द्वारा मुक्ति की विधि और योग के लिये एकांत वातावरण में अशांति होने लगी थी। वर्ष 1929 के दिसंबर माह के आखिरी दिनों को बड़े दादाजी स्वामी केशवानंद नर्मदा जी का परिभ्रमण करते हुये खण्डवा आ गये जहां  मात्र एक सप्ताह के पश्चात 1930 को उनका महानिर्वाण हो गया तब उसी स्थान पर स्वामी हरिहरानंद जी छोटे दादा जी ने दादाजी दरबार स्थापित किया। धूनीवाले दादा दरबार की ख्याति देखते ही देखते भारत वर्ष में फैलने लगी और हजारों की सॅख्या में प्रतिदिन अनुयायियों का सैलाब उमडने लगा। दादा जी दरबार के पास ही उदासियों का अखाड़ा था जहां पुलिसवाले इनके सम्पर्क में रहकर दादाजी दरबार को हटाने के लिये दरबार को बदनाम करने का षड़यंत्र रचने लगे। चॅूंकि दादाजी का दरबार होने से दासियों की भी कीर्ति कम होने के साथ धन की आमद कम होने से उन्हें क्षति का आभास होने लगा था जिससे वे दादाजी दरबार के प्रति द्वेषभावना से भरे झगड़े को आमादा होने लगे। उदासी अखाड़े में अधिकतर पंजाबी लोग थे, तब उनके लिए यह एक अजब संयोग बना कि उसी समय एक पुलिस अधिकारी जो खुद पंजाबी था वह उनके साथ मिल गया और श्री दादाजी दरबार के खिलाफ षड़यंत्र रचने लगा। इसीबीच दादाजी दरबार में एक घटना हुई जिसमें खण्डवा नगर के एक लब्ध प्रतिष्ठित विदेशी संस्कृति और सभ्यता से लबरेज वकील का आना हुआ और वह दरबार के नियमों के विपरीत दादाजी की समाधि स्थल पर जूते-मोचे पहने प्रवेश कर गया जहां लोगों ने देखा तो उन्हें रोका और जूते-मौजे उतारकर आने की सीख दी। वकील साहब को जूते-मौजे उतारकर आने का कहना जैसे उनके स्वाभिमान पर हमला लगा और उन्होंने अपना आपा खोते हुये लोगों पर बिफर गये तथा बिना जूते-मौजे उतारे समाधि के दर्शन न किये जाने पर वे धमकी देने लगे कि इस दरबार में मेरा अपमान हुआ है मैं इसे उखाड़ कर फिकवा दूंगा। वकील साहब ने आनन फानन में वहाँ के आर्यसमाजी पण्डित रामचन्द्र शर्मा सहित अन्यों को खण्डवा के घन्टाघर में बुलाकर एक आमसभा रखी और दादा दरबार के विरोध में नवयुवकों की एक टीम तैयार की जिसमें बहती गंगा में हाथ धोते हुये उदासी अखाड़े के लोग भी शामिल हो गये कंपकपाती शीतलहर में नफरत की आग दहकने लगी जो दादाजी दरबार आश्रम को निगलने को तैयार थी जिसके लिये एक अंधभीड के विरोधी नारों से खण्डवा नगर की गलियों में घूमने लगी।

            विरोध की आँधी का वह दिन 27 फरवरी 1936 को तय किया गया ओर शाम को पाँच बजे इस षड्यंत्र को क्रियान्वयन हेतु चुना गया।  उस दिन  वकील साहब के मन में सुलग रही प्रतिशोध की आग लगी को चिंगारी देने के लिए उनकी अगुआई में लोगों का हुजुम दादाजी दरबार को तहस-नहस करने के इरादे लिये आगे बढ़ रहा था। स्थानीय पुलिस थाने से एक इन्सपेक्टर दुर्गाप्रसाद अवस्थी, एक एसआई, हेड कास्टेबिल इफेतखार अहमद और सिपाही रहमत खान और रामसेवक ने हुजूम को रोककर उनका बदला लेने का विश्वास वकील साहब को दिलाकर सीधे बिना सूचना दिये दादाजी दरबार आश्रम में प्रवेश किया ओर जांच करने का कहकर बदसलूकी पर उतर आए। उक्त पुलिसटीम मोटर गैरिज के पास पहुंची और बंद गैरिज को खुलवाया तब ड्रायवर दौलतराम कुछ काम में व्यस्त था उसे बुलवाकर मोटर ड्रायवर का लायसेंस दिखाने को कहा। ड्रायवर ने कहा कि लायसेंस स्वामी हरिहर भोले भगवान छोटे दादाजी के पास है तो पुलिस नाराज हो गयी। वे लायसेंस देखे बिना हंगामा करके लौट गये और पुलिस थाने पहुँचकर सिपाही रामसेवक ने पुलिस थाने में शाम 7 बजे झूठी रिपोर्ट लिखवाई कि हमें हरिहर धूनीवाले छोटे दादा ने मारा और इस्पेक्टर अवस्थी और हेडकास्टेबल अहमद खान को पकड़कर आश्रम में बंदी बना लिया है। असल में यह वकील साहब के रचाये गये षड़यंत्र का हिस्सा था जिसमें पुलिस भी दादाजी दरबार आश्रम के खिलाफ थी। जैसे ही रामसेवक ने शिकायत की उसके तुरन्त बाद सुनियोजित तरीके से थाना प्रभारी भगवत स्वरूप लुंबा अपने 21 सिपाहियों के बल को जो पहले से पुलिस लारी में बैठा था उसमें से एक 11 सिपाईयों की टीम सब इन्सपेक्टर पटेल के साथ पुलिस वाहन में दादा दरबार में भेज दी जो हाथों में रायफल, लाठियों थामे थी जबकि थाना प्रभारी लुंबा के पास भरा हुआ पिस्तौल था। सशस्त्र पुलिस बल के साथ डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अथवा उनके द्वारा चयनित कोई विशेष मजिस्ट्रेट भेजने के नियम को पालन किये बिना यह पुलिस दल बिना मजिस्ट्रेट के दादाजी दरबार मे प्रवेश कर गया। जिस समय पुलिस दल-बल के साथ श्रीदादा जी दरबार में प्रवेश किये थी उस समय शाम के साढ़े सात बजे का समय रहा था और यह समय संध्याकालीन आरति का था जिसमें दो-तीन सौ भक्तगण जिसमें बच्चे,बूढ़े,युवा और महिलायें झूमते हुये आरति में तल्लीन थे।

            आरति में स्वामी हरीहरानंद छोटे दादाजी महाराज के अलावा खण्डवा के कई प्रतिष्ठित नागरिक एवं हस्तियाँ शामिल थी जिनमें रियासत के रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर श्री बाबाजी, सेवानिवृत्त असिस्टेट इन्सपेक्टर  आफ स्कूल्स श्री हरिशंकर शुक्ल, उत्तरपद्रेश के एक सम्पन्न जमींदार पृथ्वीनाथ जी टण्डन जो आरति की अग्रपंक्ति में झूम रहे थे कि अचानक पुलिस ने दलबल के साथ आरति कर रहे भक्तों पर लाठियों और रायफलों से हमला बोल दिया। देखते ही देखते आरति के स्थान पर रोने-चीत्कारने की आवाजें गूंजने लगी और दादाजी दरबार का दृश्य भयावना हो गया जहां पुलिस की लाठियों-रायफलों के हमले से भक्तों के शरीर से खून के फब्बारे छुटने के साथ वे बेहोश होकर गिरने लगे। कोई दरबार से भागना चाहे तो वह पुलिस कि चाकचोबंध व्यवस्था के कारण भाग नहीं सका ओर वही पिटाई झेलने को विवश थे । थाना प्रभारी श्री लुंबा ने  छोटे दादाजी को लक्ष्य बनाकर उनपर अपनी पिस्तौल से 2 गोली चलाई गयी लेकिन आश्चर्यजनक यह देखने को मिला कि गोलिया उनके सिर को छूकर चली गयी और वे बडे दादाजी की समाधि पर ध्यानस्थ मुद्रा में अपना सिर टिकाये खड़े रहे। उनके सिर से खून बह रहा था,  श्री लुंबा के द्वारा उनके सिर पर दो फायर के बाद उन्होंने समझा कि अब वे मर गये है इसलिये उन्होंने दो गोली के बाद और गोली नहीं चलायी जबकि यह ईश्वर की कृपा थी कि छोटे दादाजी का इन गोलियों से कुछ न बिगड़ा।  इससे आश्रम का बहुत नुकसान हुआ, बड़े दादाजी का समाधि का फर्श खून से लबालब हो गया, आश्रम का 32 हजार रूपये का सामान भी लूट लिया गया और यह सब अमानवीय घटना को अंजाम देने के बाद थाना प्रभारी लुंबा जी ने जिला मजिस्ट्रेट डी.आर.रत्नम को सूचना दी और डीएसपी राजपालसिंह नगर में नहीं होने से दो दिन बाद लौठे। इस घटना को अंजाम देने के बाद पुलिस ने आश्रम पर पहरा बैठा दिया तथा इससे 3-4 दिन तक आरति पूजन सब बंद रहा। छोटे दादाजी को पुलिस अपने साथ ले गयी और 27,28,29फरवरी तक बंद रखा और 1 अप्रेल को उन्हें छोड़ा गया तब दादाजी दरबार की साफ-सफाई कराने के बाद दुबारा आरति-पूजन चालू हुआ।

            यह घटना कोई मामूली नहीं थी। देश के कई हिस्सों में यह खबर फैल गयी थी कि धूनी वाले दादाजी दरबार में निरपराधों पर पुलिस की बर्बरता ने एक धार्मिक संस्था को बेबजह परेशान किया है। खण्डवा दरबार में पुलिस के इस बर्बरतापूर्ण काण्ड की चर्चा 2 मार्च 1936 को सी.पी.लेजिस्लेटिव कौसिल में काशीप्रसाद पाण्डे जी ने उठाते हुये काम रोको प्रस्ताव लाते हुये कटु शब्दों में निंदा की। पूरे मामले का विवेचन करते हुये राव सहाब फुले और हिफाजत अली आदि सदस्यों ने पुलिस विभाग को आडे़ हाथों लेते हुये कटोर निंदा ही नही की अपितु पुलिस को भाड़े का टटटू तक कहा। सबने एक सुर में दादाजी दरबार जैसी निरपराध संस्था में आरती-पूजा कार्य के चलते पुलिस द्वारा अचानक लाठी-बंदूक से हमला करना शर्मनाक बताया तथा कहा कि पुलिस जनता की रक्षक है और पुलिस विभाग शासन का महत्वपूर्ण अंग है उनके द्वारा यह घटना करना बहुत ही खेदजनक है। इस पर तत्कालीन गृह सदस्य राघवेन्द्र राव ने सदन को विश्वास दिलाया कि जो भी पुलिसवाला आरोपी होगा उसे छोड़ा नहीं जायेगा तथा दादाजी दरबार के साथ न्याय होगा तथा पुलिस ने जो मामला कायम किया है उसे सरकार वापिस ले लेगी, इस प्रस्ताव के पास होने के बाद भी यह मामले चलाये गये। खण्डवा धूनीवाले दादाजी दरबार के इन मामलों की सुनवाई के दरम्यान पूरे खण्डवा शहर में तनाव का माहौल बन जाया करता और हर व्यक्ति की दौड़ कोर्ट की ओर होती जिससे शहर का माहौल बिगड़ने लगा तत्पश्चात परमहंस स्वामी हरिहरानन्द छोटे दादाजी से ही गुहार करने पर उन्होंने खण्डवा में शांति स्थापित की अपील मानते हुये नागपुर उच्च न्यायालय से अपील कर यह मामला दूसरे जिले में सुनवाई के लिये मांग की और परिस्थितियों की गंभीरता को समझते हुये उच्च न्यायालय नागपूर ने होशंगाबाद जिला कोर्ट को मामला अंतरित किया जिसपर छोटे स्वामी हरिहरानंद दादाजी जुलाई 1936 से प्रकरण के निराकरण वर्ष 1938 तक होशंगाबाद में ही निवासरत रहे।

            होशंगाबाद के इतिहास में 14 अप्रेल 1938 वह तारीख थी जिस दिन “धूनीवाला रायट केस” का फैसला होना था और कोर्ट परिसर ही नहीं अपितु पूरे नगर के लोगों का जमावड़ा था। होशंगाबाद कि हर गली मोहल्ले में  पुलिस व्यवस्था चाक चैबन्द थी और भय भी था कि कहीं विपरीत परिस्थिति में शहर में उमड़ आये जनसमूह को कैसे संभाला जायेगा। पुलिस ने यह पीड़ा छोटे दादाजी को बताई उन्होंने कोर्ट का रूख करने से पहले अपने अनुयायियों को आश्वस्त किया कि “साँच को आंच नही” इसलिये जीत हमारी होगी, आप सभी हर हाल में शहर में शांति बनाये रख न्यायालय के फैसले का इंतजार करें। कोर्ट में वकीलों ,पत्रकारों, पुलिस के हुजूम के साथ जनसमूह एक-एक गतिविधि पर नजर रखे हुये था। सुबह ग्यारह बजे स्पेशल मजिस्ट्रेट राव साहेब निर्गुण्डकर द्वारा फैसला सुनाया गया कि दादाजी दरबार में आश्रमवासियों पर जानबूझकर पूर्व नियोजित योजना के अनुसार अमानुषिक आक्रमण किया गया है और पुलिस द्वारा बनाये गये मुजरिमों में किसी के भी द्वारा तीन जुर्मो में से दफा-140,332 व 342 भारतीय दण्ड विधान का मुकदमा,जिनके कारण चलाया गया है, एक भी जुर्म नहीं किया है इसलिये मैं उन सबको इन जुर्मो से निर्दोष सिद्ध करता हॅू और आज्ञा देता हॅू कि वे स्वतंत्र कर दिये जाये। गवाही में जो बातें निश्चित पायी गयी है उनमें घटना दिवस की सब घटनाओं के लिये जिम्मेदार सबइंस्पेक्टर लुंबा है और ज्ञात पड़ता है कि सब इंस्पेक्टर अवस्थी ने उनके कहे अनुसार घटना को अंजाम दिया है। इसमें सन्देह नहीं कि आश्रमवासियों और आरती के समय उपस्थित अन्य लोगों पर जानबूझकर किये गये पाशविक हमलें के लिये केवल सबइंस्पेक्टर लुंबा ही उत्तरदायी है। यह फैसला आते ही सभी ने छोटे दादाजी की जयकार के नारे लगाते हुये खुशी जाहिर की कि पहले ही दादाजी कह चुके थे कि साँच को आंच नहीं आखिरकार दादाजी की बात पर जज साहब ने भी मुहर लगा दी।

   इस फैसले के बाद दादाजी दरबार की कीर्ति में चार चान्द लग गये वही सरकार ने दोषी पाने जाने पर लुंबा  और अवस्थी की सेवायें समाप्त कर दी जबकि लुंबा ने अपील की जिसपर उनकी पिछली सेवाओं को ध्यानमें रखते हुये उनकी एक वर्ष की सालाना वेतन वृद्धि रोक दी गयी। चूंकि इस घटना के बाद भले ही छोटे दादाजी  प्रकरण में जीत गये हो लेकिन उनका मन वीतरागता की चर्मोत्कृष्टता पर पहुँच  गया और बदनामी से आहत हो वे श्री धूनीवाले दादाजी के आश्रमप्रमुख से भी मुक्ति चाहते थे। उच्चकोटि परमविभूति स्वामी हरिहरानंद छोटे दादाजी अदालत के फैसले के चार साल बाद फरवरी 1942 को प्रयागराज इलाहबाद में कुम्भ प्रवास पर गये जहां  फाल्गुन बदी 4 संवत 1998 को 18 फरवरी 1942 को दादाजी दरबार खण्डवा के समस्त दायित्वों से मुक्त होते हुये समाधि ले ली। दादा परिवार ने उनके पार्थिव शरीर को 19 फरवरी 1942 फाल्गुनवदी 5 वीं को खण्डवा में पूज्य बड़े दादा जी की समाधि के दक्षिणभाग में समाधिस्थ किया, इस प्रकार छोटे दादाजी का होशंगाबाद में पण्डित कुंजबिहारी मिश्र उर्फ गुटरूभैया के बगीचे से गहरा लगाव होने से वहाँ  ठहरना, उक्त बगीचे को अपने विराट व्यक्तित्व एवं पुण्यता से स्वमेव तीर्थ बनाना एक गौरवमयी घटना है जो सदियों तक छोटे दादाजी के कारण एक पवित्र तीर्थ के रूप में अपना पृथक स्थान बनाये हुये है।

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