जब गौमाता की रक्षा के लिये नामधारी सिख फाॅसी पर झूले

लेख-आत्माराम यादव पीव

देश का इतिहास अद्वितीय घटनाओं से भरा है। बात 172 साल पुरानी सन् 1849 की है। तब अमृतसर  24 मार्च 1849 को अंग्रेजी हुकुम में शामिल हुआ था। इसके पूर्व पंजाब में कौन्सिल आफॅ रीजेन्सी का शासन था ओर 24 मार्च 1847 ई. को कौन्सिल के रेजिडेन्ट सर जाॅन लारेंस ने अमृतसर में एक आदेश के तहत गोवध प्रतिबन्धित करने के आदेश जारी किये थे और उक्त आदेश ताम्रपत्र पर खुदवाकर दरबार साहब के प्रवेशद्वार पर टॅगवा दिया गया। लेकिन यह आदेश पारित किये दो वर्ष पश्चात 24 मार्च 1849 को अग्रेजों ने पंजाब को अंग्रेजी हुकुमत में शामिल कर लिया और ईस्टइण्डिया कमेटी के वायसराय ने 2 अप्रेल 1849को गोहत्या कानून पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया और 5 मई 1849 को यह लिखित आदेश पंजाब प्रान्त में जारी कर दिया कि प्रत्येक शहर के बाहर गोहत्या कर उसका माॅस बेचने वाले एक निश्चित स्थान से जानवरों का वध कर माॅस का कारोबार कर सकेंगे। नये वायसराय के बदले गये आदेश से हिन्दूओं और सिखों के दिलों पर चोट पहुॅचने के साथ उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया था। उक्त नये आदेश के बाद अमृतसर जैसे पवित्र नगर में हिन्दू और मुसलमानों में तनाव बढ़ गया और आपसी प्रेम वैमनस्यता में तब्दील हो गया।
 गोहत्या बन्द करने के लिये समूचे सिखों के साथ हिन्दू कौम भी इस नगर की गली-गली में जुलूस निकाल कर गौमाता की जय, गौमाता को हम दरबारसाहब की नगरी में कटने नहीं देंगे जैसे गगनभेदी नारों के साथ सड़कों पर थी। हजारों की सॅख्या में हिन्दू-सिखों के साथ घर की महिलायें, बुजुग एवं बच्चे आन्दोलन कर रहे थे कि यहाॅ से कसाईखाना हटाया जाये और गौवध पूर्णतया प्रतिबन्धित किया जाये। लेकिन अमृतसर के कमिश्नर मिस्टर डव्ल्यू  डेविस पर इसका असर नहीं पड़ रहा था और वह चाहता था कि यहाॅ से कसाईखाना न हटे और गाय का माॅस से होने वाली आय उन्हें मिलती रहे इसलिये वे कसाईखाने का       विरोध करने वाले हिन्दुओं और सिखों के विरोध में खड़े हो गये। कमिश्नर डेविस अनेक बार शहर के अनेक स्थानों पर अपने प्रशासनिक अधिकारियों से भीड़ जुटवाते और कसाईखाना चालू रखने के पक्ष में भाषण देते जिससे सिख और हिन्दू उनका जमकर विरोध करते। आखिरकार अंग्रेजी सरकार की नुमाईन्दे कमिश्नर डेविस पर कम्पनी सरकार का दबाव बना तो उन्होंने हिन्दूओं और मुसलवानों के बीच इस बात को लेकर होने वाले दंगों को देखते हुये कसाईखाना चालू रखने के नाम पर जनता से बहुमत कराने का नाटक किया और घोर विरोध के बाबजूद कसाईखाना चालू रखा। 
1849 से अमृतसर में कसाईखाने का विरोध शुरू हुआ और सरकार ने हिन्दूओं और सिखों के इस आन्दोलन को कुचला लेकिन जितना कुलचने का प्रयास किया गया उतना ही आन्दोलन उग्र होता गया। ऐसे ही 21 साल गुजर गये और हिन्दू सिखों की भावनाओं को अंग्रेजी हुकुमत के अधिकारीगण कुचलते गये। सिखों के द्वारा इन 21 सालों में कानूनी और शान्तिमय प्रयास को अंग्रेजों द्वारा अपनी कुदृष्टि से व्यथ किये जाने पर तथा हिन्दुओं-सिखों और मुस्लिमों के बीच बूचडखाना बन्द न कर गायों की हत्याओं को लेकर कई बार दंगा कराये जाने से ़त्रस्त व दुखी कुछ सिख युवक जो श्री सतगुरू रामसिंहजी के कुछ कुके जो नामधारी सिख कहलाते है के द्वारा गुरू की नगरी में गोहत्या करने के कलंक और कत्लखाना समाप्त करने के लिये अपने प्राणों का बलिदान करने का प्रण लिया। इतिहास में वह तारीख 15 जून 1871 दर्ज है जब अंधेरी रात में 11 बजे इन सिख युवकों ने कसाईखानों में धावा बोलकर वहाॅ कत्ल होने बॅधी सैकड़ों गायों को मुक्त कराने में बाधक बने कसाईयों को कत्ल किया और गायों को कत्लखाने से छुड़ाकर जगल की ओर छोड़ आये। 
कत्लखाने में कसाईयों के कत्ल की खबर आग की तरह पूरे अमृतसर में फैल गयी। कमिश्नर ने इसे अपनी तोहीन समझा और पुलिस को लताड़ा तब अमृतसर पुलिस ने शहर के प्रतिष्ठित परिवारों के हिन्दुओं और निहंगसिंह को सन्देह के आधार पर पकड लायी और उनपर बहुत अत्याचार किया तथा उन सभी निरपराधों से 15 जून की रात को कसाईयों का कत्ल किये जाने का अपराध कबूलवाकर अदालत में पेश किया जहाॅ अदालत ने सभी को कुबुलनामे के आधार पर मृत्युदण्ड देने की बजाय आजीवन काले पानी की सजा सुनाई। 

जिस समय सुनाई गयी थी उसी दिन श्री भैणी साहब श्रीसतगुरू रामसिंह जी के सत्संग भवन में सत्संग चल रहा था। उस सत्संग में वे सभी नामधारी सिख मौजूद थे जो अमृतसर में कसाईयां की हत्या करके आये थे। श्री सतगुरूजी को यह पता चल गया था कि कसाईयों के हत्यारे वे ही युवक है तो गुरू ने उन्हें आज्ञा दी कि जाओ पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार कर निर्दोषों को मुक्त कराओं। साथ ही युवकों को सीख दी कि भय अथवा प्रलोभन के कारण अपने मित्रों के साथ विश्वासघात ठीक नहीं ,सत्य को स्वीकारों और अपने कत्व्र्यर्मा का पालन करें।
अगले दिन ही 7 नामधारी सिख सतगुरू की आज्ञा से अमृतसर पुलिस थाने पहुॅचे और अपना अपराध स्वीकार किया। पुलिस ने बाबा बिहलासिंह नारली, जिला लाहौर, बाबा हाकिमसिंह पटवारी, मौजा मूड़े जिला अमृतसर, बाबा फतहसिंह अमृतसर, बाबा लहणसिंह अमृतसर, लालसिंह सिपाही, बुलाकासिंह लहनासिंह, लहनासिंह वल्द मुसददासिंह,अडबंगसिंह मेहरसिंह,और झंडासिंह पर मेजर डव्ल्यू जी, डेविस, सेशन जज और कमिश्नर अमृतसर की अदालत में प्रकरण चला। 28,29 एवं 30 अगस्त 1871 को लगातर तीन दिन सुनवाई हुई और चैथे दिन 31 अगस्त को फैसला सुनाया गया जिसमें चार लोगों को फाॅसी हुई और तीन लोगों को काले पानी की सजा सुनाई व तीन लोग फरार घोषित किये गये थे। जिन्हें फाॅसी दी गयी वे बाबा लहणासिंह, बाबा फतहसिंह, बाबा हाकमसिंह पटवारी, बाबा बिहलासिंह नारली जिला लाहौर थे तथा लहणासिंह वल्दा मुसददांिसह,बुलाकासिंह , लालसिंह सिपाही को काले पानी की सजा दी गयी तथा अडबंगसिंह,मेहरसिंह और झडासिंह फरार घोषित किये गये।जिन लोगों को पहले संदेह के आधार पर पड़क कर पुलिस ने आरोपी बनाया था वे आरोपीगणों के द्वारा कसाईयों की हत्याकी पूरी घटना सुनाने व हथियार बरामद कराये जाने के बाद रिहा कर दिया गया।
मेजर डव्ल्यू जी, डेविस, सेशन जज और कमिश्नर अमृतसर की अदालत ने फौजदारी दफा 398 के अनुार फैसला सुनाया जिसे तसदीक के लिये लाहौर चीफकोर्ट में भेजा गया जिसकी तसदीक जस्टिस जे.कैम्पबेलने ने 9 सितम्बर 1871को की और जस्टिस सी.आर.लिंडसेने ने 11 सितम्बर 1871 को की जिसके चार दिन बार ही कूका दल के ये चार सिक्खों ने गौरक्षा के लिये हॅसते-हॅसते गौमाता की जय, सतश्री अकाल, की जयजयकार करते हुये फाॅसी को गले लगाकर प्राणोत्सर्ग किया वहीं तीन अन्य काले पानी की सजा के लिये अंडमान टापू में भेज दिये गये गये। भारतवर्ष जैसी देवभूमि पर गौमाता की रक्षा के लिये अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले ये कूका दल के सिक्ख हमारे लिये प्रेरणास्त्रोत बनना चाहिये। आश्चर्य होता है अंग्रेजी सरकार के सामने बूचड़खाने बन्द करने के लिये गौमाता की रक्षा की खातिर जिन्होंने बलिदान दिया उस देश में आज भी रोजाना लाखों गायों को कत्ल किया जा रहा है। सरकारें गौहत्या के कत्लखाने बंद करने की बजाय गौमांस को बढ़ावा देने में होने वाली आमदनी को देख रही है और खुद को हिन्दू कहने वाले या कृष्ण के वंशज यादव सहित सारे लोग गौहत्या के मामले में तमाशबीन बने है। अच्छा हो कि गौमाता की रक्षा के लिये प्राणोत्सर्गकरने वाले इन सिक्खों से आज की पीढ़ी शिक्षा ले और उनके शरीर में बहने वाला खून में उबाल आये ताकि धर्म की रक्षार्थ और आने वाली पीढ़ी के उज्जवल भविष्य व स्वास्थ्य को बचाने के लिये ही सही, गौरक्षा की जा सके।

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