दोषी कौन: ठग या लालची लोग?

नोएडा का अनुभव मित्तल उस्तादों का उस्ताद निकला। इस 26 वर्षीय नौजवान ने अपनी एक कंपनी के जरिए लगभग 7 लाख लोगों को ठगा और उनसे 37 अरब रु. डकार गया। इस वक्त वह और उसके दो साथी जेल की हवा खा रहे हैं। मित्तल के पहले भी देश की कुछ नामी-गिरामी कंपनियों के मालिक जेल की हवा खा चुके हैं। इन तथाकथित सेठ लोगों के पैसों पर पलने वाले देश के बड़े-बड़े नेताओं के नाम भी उजागर हो चुके हैं। अभी मित्तल के बारे में इतना ही पता चला है कि जनता के इस पैसे से उसने कई संपत्तियां खड़ी कर ली हैं, मंहगी से मंहगी कारें खरीदी हैं और कुछ फिल्मी सितारों के साथ सोहबत की है। यह कैसे हो सकता है कि मित्तल की इस लूट से हमारे नेतागण अछूते रह जाएं। उनके नाम भी शीघ्र ही सामने आएंगे।

मित्तल की खूबी यह थी कि उसने ‘आनलाइन’ लूट मचाई। उसने लोगों से इंटरनेट पर 5750 रु. देकर उसकी कंपनी की सदस्यता लेने की सुविधा दी और बदले में यह दाना डाला कि जब वह यू ट्यूब पर कोई भी चीज दिखाए और आप उसे पसंद करें (टिक करें) तो वह हर टिक पर पांच रु. आपको देगा। आप 125 टिक लगाकर 625 रु. रोज कमा सकते हैं। लोग लालच में फंसते गए और उनकी संख्या 7 लाख तक हो गई। कुछ का कहना है कि उन्होंने जितने रुपए जमा करवाए, उससे ज्यादा उन्होंने कमा लिए। लेकिन धीरे-धीरे कुछ लोगों को पता चलने लगा कि उन्होंने जितने रुपए जमा करवाए थे, वे डूबतखाते में जा रहे हैं। उनसे कोई कमाई तो दूर की बात है, उनके मूलधन का ही कोई अता-पता नहीं है। साल भर में जमा पैसे के दुगुना होने की बात ठगी के अलावा कुछ नहीं है। इस युवा ठग की कंपनी में सौ कर्मचारी थे।

यहां प्रश्न यह है कि इस अपराध के लिए कौन जिम्मेदार है? वह ठग या ठगाने जाने वाले लोग? मैं ठग से भी ज्यादा ठगाए जाने वाले लोगों को जिम्मेदार मानता हूं। वे लालच में फंसे लोग हैं। वे हराम की कमाई खाना चाहते हैं। वे आंख मींचकर विश्वास कर लेते हैं। लालच में वे इस बुरी तरह से फंसे होते हैं कि वे अपनी अक्ल को ताक पर रख देते हैं। वे अपनी खून-पसीने की कमाई को भी दांव पर लगा देते हैं। उनके साथ मेरी सहानुभूति है लेकिन यह समझ में नहीं आता कि उस ठग के सौ कर्मचारियों में से क्या एक का भी अंतःकरण नहीं जागा? वे उस लूट में शामिल क्यों रहे? सरकार इस तरह की लूट-पाट पर कड़ा प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती और इन बड़े लुटरों को मौत की सजा क्यों नहीं दिलवाती?

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