भृगु कौन थे, विष्णु आदित्य से भार्गवों का विग्रह क्यों था?

—विनय कुमार विनायक
भार्गवों का मूल पुरुष थे भृगु ऋषि,
दैत्य-दानवों का संगठन कर्ता, असुरों का याजक,
आदित्य-देव-आर्य संगठन का विरोधी!

भृगु का मूल निवास एशिया माइनर
स्थान था ‘गुरुद्वारम’’ संपत्ति गोर्डियम क्षेत्र है,
भृगु थे ईरानी अहुर माजदा वरुण पुत्र!

भृगु दैत्यराज हिरण्यकश्यप पुत्री दिव्या
और पुलोमा दानव कन्या पौलोमी के पति थे,
अदिति पुत्र विष्णु था उनका जमाता!

अदिति पुत्र आदित्य गण,दिति पुत्र दैत्य
दनु पुत्र दानव जन सभी थी कश्यप ऋषि संतति,
दायाद बांधव, सभी काश्यपसागर तटवर्ती!

भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र ईरान तक
दैत्य-दानव भाईयों के हिस्सेदारी में था, जबकि
भारत से पूर्वोत्तर हिमालय देवलोक था!

किन्तु देव नाखुश थे इस बंटवारे से क्योंकि
इलावर्त इलाका के हिरण्य खान का अधिपति था
हिरण्यकश्यप दैत्य-दानवों के वीर सेनापति!

बारह देवासुर संग्राम हुआ बंटवारा के मुद्दे पर
देव आदित्यों के नेता श्रीविष्णु की सेना मरती, क्षति होती, पर
दिव्या मृत असुरों को जीवित करती संजीवनी से!

अंततः विष्णु ने भृगु पत्नी दिव्या का बध करके
हिरण्यकश्यप को मार दिया नरसिंह बनकर,कुपित भृगु ने
विष्णु की छाती में भृगुलता उगा दी लात मारके!

तबसे देव आदित्य आर्यों का विग्रह रहा जारी
असुर और असुर याजक भृगु, शुक्र,और्व, त्रिसिरा, ऋचिक से,
आदित्य सूर्य पुत्र मनु ने छोड़ दिया दावेदारी!

सिंधु के इसपार अपने पुत्र, पुत्री,जमाता चन्द्रपुत्र
बुध को साथ लेकर आर्यावर्त बसाया सिंधु से गंगा यमुना के
मैदान में, उनके पुत्रों-दौहित्र ने आर्य उपाधि धरके!

मनु ने अयोध्या में पितृ स्मृति में सूर्य कुल गद्दी
और मनुपुत्री ईला ने श्वसुर चन्द्र के नाम से चन्द्र कुल गद्दी
प्रतिष्ठानपुर; इलावर्त; प्रयाग में स्थापित की थी!

मातृसत्तात्मक सृष्टि की विकृति और पतन को याद कर
पितृ सत्तात्मक सृष्टि का श्री गणेश किया था वैवस्वत मनु ने
इच्छवाकु सहित सभी पुत्रों और दौहित्र पुरुरवा से मिलके!

किन्तु असुर याजक भार्गवों से पीछा कहां छूटा
गुजरात के समुद्री कछार में आकर भृगुकक्ष/भड़ौच बसाया
भार्गव असुर याजकों ने आर्यों की पुरोहिताई हेतु!

सूर्य कुल का पुरोहित तो ब्रह्मर्षि वशिष्ठ बने थे,
चन्द्र कुल की पुरोहिताई भार्गव ऋचिक, जमदग्नि ने पाई थी
शुक्र ने देवयानी को पुरुरवा प्रपौत्र ययाति से व्याह के!

आगे चलकर ययाति प्रपौत्र हैहयवंशी सहस्त्रार्जुन ने
भार्गव जमदग्नि को पुरोहित पद से हटा दिया एक कड़ुवाहट से,
जब जमदग्नि ने उनकी वाक्दत्ता रेणुका दान में ली!

हैहय सहस्त्रार्जुन सूर्यवंशी हरिश्चंद्र का दौहित्र,
एक चक्रवर्ती सम्राट था, माहिष्मती साम्राज्य का बाहुबली,
इक्ष्वाकु राजपुत्री रेणुका उन्हें ब्याहना तय थी,

किन्तु अविवाहित अधेड़ भार्गव जमदग्नि ने
पुरोहिताई के बदले इक्ष्वाकु राजा से कन्या दान में मांग ली
धर्म संकट में राजा ने रेणुका को दान दे दी!

सहस्त्रार्जुन से राजा ने छोटी पुत्री व्याह दी,
किन्तु भार्गव जमदग्नि को रेणुका के चरित्र पर संदेह होता रहा,
उन्हें सदा लगता था रेणुका है अर्जुन स्नेही!

इस संदेह में पड़कर जमदग्नि ने पुत्र
परशुराम के हाथों रेणुका का मातृ वध कुकृति करवा डाला था,
ये भार्गवों की आसुरी वृति छुपाए नहीं छुपती!

इस घटना से क्षुब्ध सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि का
आश्रम जला डाला,,दान में दी गई गो यानि भूमि वापस ले ली
इसी गोहरण नाम पे परशुराम ने मौसा की हत्या की!

सहस्त्रार्जुन के वध पर परशुराम पिता जमदग्नि ने
कहा था “राम राम महाबाहोभवान पापम कारषीत अवधीन्नरदेवं
यत् सर्वदेवमय वृथा” भागवत पुराण का ये कथन!

ब्रह्मांड पुराण में श्रीकृष्ण विष्णु ने सहस्त्रार्जुन को कहा
“मम चक्रावतारो हि कार्तवीर्यो धरातले” और हैहयकुल को सभी
पुराणों ने “तेषां पंच कुलात्येव हैहयाना महात्मनां” कहा!

वस्तुत: भार्गव परशुराम का चरित्र पूर्णतः आसुरी है,
किन्तु भार्गवों के ब्राह्मणीकरण के बाद दुष्कर्मों के महिमा मंडन में
अनेक कुतर्क दिए गए परवर्ती पुराण संस्करणों में!

भृगुवंशी अभारतीय शक, मग, सा असुर याजक थे,
कश्यपगोत्री वर्णाश्रमी आर्य नही, सूर्य-चन्द्र मंडल के गोत्रपिता
कश्यप ने परशुराम को बहिष्कृत किया महेंद्रपर्वत पे!

वेद व्यास के परपितामह ऋषि वशिष्ठ थे
‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’/विश्व को आर्य बनाने के पक्षधर
जबकि भृगु मनुस्मृतिकार, आर्य विरोधी थे!

सभी भार्गवों में परशुराम चरित्र घोर कर्मा
आसुरी,स्वेच्छाचारी, कृतघ्न प्रवृत्तिधारी प्रतीत होता है,
गणेश का दांत तोड़ शिव से अस्त्र लिया था!

परशुराम एक मातृहंता, क्षत्रिय कुलघाती
शिव के प्रति कृतघ्न हस्ती थे, जिन्हें विष्णु अवतार
घोषित करना पुराणों का प्रक्षिप्त अंश है!

अवतार उसे कहते जो देश धर्म धरती,
मानव जाति हित में सत्कर्म करे क्षुद्र स्वार्थ से उठकर
परशुराम थे वर्ण विरोधी घोर जातिवादी!

जाति पूछकर शिक्षा देने की घृणित रीति
परशुराम से चली है,मनु स्मृति की सारी विकृतियां
भार्गवों की देन है देखें मनु स्मृति.अ.1/59.

मनुस्मृति कृति नहीं मानव पिता मनु की
मनु स्मृति अध्याय एक के उनसठवें श्लोक में
मनु ने घोषणा की इसे बाचेंगे भृगु ऋषि!
—विनय कुमार विनायक

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