“ऋषि दयानन्द ने सभी सुखों का त्याग कर वेदप्रचार क्यों किया?”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

ऋषि दयानन्द ने 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की और इसके द्वारा
संगठित रूप से वेद प्रचार किया। 30 अक्टूबर, सन् 1883 को दीपावली के दिन उन्होंने अपने जीवन
की अन्तिम सांस ली थी। उनकी मृत्यु का कारण उनके पाचक व कुछ लोगों के षडयन्त्र द्वारा
उनको मृत्यु से पूर्व रात्रि के समय दुग्ध में विष दिया जाना था। यह विष उन्हें उनके जोधपुर प्रवास
में दिया गया था। जिस डॉ0 अलीमर्दान खां ने उनकी जोधपुर में चिकित्सा की थी, उसने भी उनके
उपचार में अनेक प्रकार की त्रुटियां की थी। ऋषि दयानन्द ने वेद प्रचार का जो कार्य किया था वह
संसार से अविद्या के अन्धकार को दूर कर अविद्या व ज्ञान का प्रकाश करने का कार्य था जिससे
लोगों के दुःख दूर होकर उनको जन्म-जन्मान्तर में सुखों की प्राप्ति होनी थी। उनके समकालीन
मत-मतान्तरों के आचार्यों ने उनकी सत्य व विवेक से युक्त मानव मात्र की हितकारी शिक्षाओं की
न केवल उपेक्षा की अपितु अपने अनुयायियों को भी ऋषि दयानन्द के विरुद्ध आक्रोषित व
आन्दोलित किया था। ऋषि दयानन्द सत्य के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित एवं अपूर्व आस्थावान् थे।
वह अपने प्राणों के मूल्य पर भी सत्य को छोड़ नहीं सकते थे। इसका कारण उनका योगाभ्यास द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार करना
और अपने प्रज्ञाचक्षु गुरु दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती, मथुरा की देश एवं मानवता की हितकारी शिक्षायें थी। ऋषि दयानन्द
ने मनुष्य की जो परिभाषा अपने लघु ग्रन्थ ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ में की है उसके अनुसार अन्यायकारियों का विरोध व
अप्रियाचरण आदि करना मनुष्य कहलाने वाले प्राणी का कर्तव्य है। वह लिखते हैं कि भले ही मनुष्य के प्राण चले जाये परन्तु
धर्मात्माओं की रक्षा और अन्यायकारियों के बल की हानि करना मनुष्य का अनिवार्य कर्तव्य है।
महर्षि दयानन्द ने अपने पितृग्रह में अपनी आयु के 13 वर्ष पूर्ण कर चौदहवें वर्ष के आरम्भ में शिवरात्रि का व्रत किया था।
रात्रि अपने ग्राम टंकारा, गुजरात में शिव-मन्दिर में जागरण करते हुए उन्होंने मन्दिर के चूहों को शिव की मूर्ति पर उछल-कूद व
क्रीड़ा करते हुए देखा था। भगवान शिव सर्वशक्तिमान माने जाते हैं। उनको चूहों को उछल-कूद करने देने व अपनी मूर्ति से दूर न
भगाने के कारण शिव की मूर्ति की पूजा के प्रति बालक दयानन्द का मूर्तिपूजा से मोह-भंग हो गया था। उनके पिता व ग्राम के
पण्डित उनके प्रश्नों के सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे पाये थे। कुछ काल बाद उनके घर में चाचा व एक बहिन की मृत्यु हो जाने के
कारण उनको मृत्यु का डर सताने लगा था। वह मृत्यु की ओषधि पर विचार करने लगे थे। इससे उन्हें वैराग्य हो गया था। वह सत्य
जानने, ईश्वर को पाने व मृत्यु की ओषधि की खोज में घर से भाग खड़े हुए थे। सन्यास लेकर उन्होंने साधु-संन्यासियों की संगति
कर ज्ञान प्राप्ति की व उनसे योगाभ्यास सीखा था। उन्हें योग का क्रियात्मक अभ्यास कराने वाले दो योग्य गुरु भी प्राप्त हुए थे
जिनसे योग सीख कर वह योग में निष्णात हुए। योग विद्या में कृतकार्य होने के बाद भी इतर ईश्वर, आत्मा व परमात्मा विषयक
परा व अपरा विद्या प्राप्ति की इच्छा उनमे शेष थी। यह इच्छा मथुरा में संस्कृत पाठशाला के आचार्य स्वामी विरजानन्द सरस्वती
के आचार्यत्व में वर्ष 1860-1863 के मध्य लगभग 3 वर्ष तक संस्कृत के आर्ष ग्रन्थों के अध्ययन से पूरी हुई थी।
मथुरा में गुरु विरजानन्द की शिक्षा पूरी होकर गुरु दक्षिणा के अवसर गुरु व शिष्य के बीच संवाद हुआ। इस संवाद ने
स्वामी दयानन्द को जीवन का लक्ष्य प्रदान किया जो कि संसार से अविद्या को दूर कर विद्या का प्रचार करना था। ऋषि दयानन्द
ने अपने गुरु को जो वचन दिये थे उसे उन्होंने प्राणपण से पूरा किया। उन्होंने अपने जीवन के सभी भौतिक सुखों का त्याग कर
दिया। वह जीवन का एक-एक पल मनुष्य जाति, देश व समाज के कल्याण में व्यतीत करने लगे। उन्होंने वेदों को प्राप्त कर उनका
अनुशीलन एवं परीक्षा की। वेदों का गम्भीर अध्ययन करने के बाद उनके जो विचार निश्चित हुए, वह हमें सत्यार्थप्रकाश एवं
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित उनके वेदभाष्य आदि समस्त ग्रन्थों में पढ़ने को मिलते हैं। ईश्वर ने मनुष्य जाति का एक उद्देश्य

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वेद अर्थात् सत्य ज्ञान के प्रचार प्रसार का भी निश्चित किया हुआ है। ऋषि दयानन्द ने इस आर्यसमाज के नियमों में प्रस्तुत करते
हुए लिखा है कि ‘मनुष्य को सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। अविद्या का नाश तथा
विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।।’
मनुष्य ज्ञानी होकर जो सुख लाभ प्राप्त करता है, वह उसे अपने आचार्यों व अध्ययन आदि पुरुषार्थ से प्राप्त होता है।
उसका कर्तव्य है कि वह भी समाज के सभी लोगों को जो वेदों के सत्यज्ञान का अमृतपान कराये। ऋषि दयानन्द ने अपने इस
कर्तव्य को जानकर ऐसा ही किया। इसी से देश के लोग लाभान्वित होकर विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़े हैं। देश को अविद्या के
अन्धकार से निकालकर उसे ज्ञान व विज्ञान से आप्लावित एवं सराबोर करने का पुरुषार्थ ऋषि दयानन्द जी ने किया था। उनका
प्रयास अभी लक्ष्य को प्राप्त नहीं हुआ है। ऋषि दयानन्द पोषित एवं प्रचारित लक्ष्य ‘सुखी मनुष्य जीवन एवं मोक्ष प्राप्ति’ क्योंकि
सर्वतोमहान है, अतः इसे प्राप्त करने में युगों लग सकते हैं। इसकी सफलता देश के लोगों के द्वारा वैदिक विचारधारा को अपनाने
पर ही हो सकती है। यही कारण था कि ऋषि दयानन्द ने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अपने सर्व सुखों का त्याग कर दिया था और
आजीवन देश, समाज व संसार से अविद्या व अन्धविश्वासों को दूर करने के लक्ष्य पर आगे बढ़ते रहे। वेदों का प्रचार करते हुए
उन्होंने एक महान कार्य यह भी किया था कि उन्होंने संसार के सभी प्रमुख मतों की अविद्या को भी हमारे सामने रखा जिससे कि
हम इन मतों के चक्रव्यूह, चक्रवात व भंवर में न फंसे। हम यह समझते हैं कि जो लोग आर्यसमाज व वैदिक धर्म के अनुयायी हैं वह
वेदेतर अविद्यायुक्त मतों के भंवर जाल से बचे हुए हैं। वह निराकार व सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना व उपासना सहित
उसका अपनी आत्मा में ध्यान व खोज करते हैं। वह वायु व जल की शुद्धि के प्रमुख साधन अग्निहोत्र यज्ञ का अनुष्ठान भी करते
हैं। इससे वह स्वयं भी लाभान्वित होते हैं और संसार को भी लाभान्वित करते हैं। वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी अग्निहोत्र से रोग
निवारण होता है, यह सुखों के प्रसार में सहायक होने सहित ज्ञान-विज्ञान की वृद्धि में सहायक तथा सत्य मत व धर्म की स्थापना
में भी सहयोगी है। इन सब कार्यों का श्रेय ऋषि दयानन्द जी को है। यदि ऋषि दयानन्द अपना जीवन ईश्वर की खोज एवं मृत्यु पर
विजय प्राप्त करने के लक्ष्य में न लगाते तो देश व समाज उनके द्वारा किये गये कार्यों से लाभान्वित न होते। ऋषि दयानन्द के
जीवन पर दृष्टि डालने से यह ज्ञात होता है कि उन्होंने संसार में ईश्वर के वैदिक स्वरूप को स्थापित करने तथा वेदों को सर्वोपरि
स्थान पर प्रतिष्ठित करने के लिये अपने जीवन का एक-एक पल समर्पित किया था। हमें ऐसा अनुमान होता है कि इतिहास में उन
जैसा ईश्वर और देशभक्त ऋषि शायद उनसे पूर्व न तो हुआ है और न भविष्य में कभी होगा।
ऋषि दयानन्द का सारा जीवन सद्ज्ञान अर्जित करने और सद्ज्ञान के आदि श्रोत ईश्वरीय ज्ञान वेदों के प्रचार व प्रसार में
व्यतीत हुआ था। उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी भौतिक सुख का विचार तक भी नहीं किया था। वह हर क्षण अपने जीवन को
तलवार की तेज धार पर रखकर निर्भिकतापूर्वक वेद प्रचार तथा देशोत्थान का काम कर रहे थे। उनके कार्यों से सभी पौराणिक एवं
इतर मतावलम्बी तो उनसे उद्विग्न थे ही, अंग्रेज भी अन्दर से अत्यन्त खिन्न, दुःखी व कु्रद्ध थे। ऋषि दयानन्द जो कार्य कर
रहे थे वह सब मतों व शासकों की इच्छाओं व आंकाक्षाओं के विरुद्ध था। इसका जो परिणाम हो सकता था, वही हुआ। किसी गहरे
षडयन्त्र के अन्तर्गत विष देकर उनकी जीवन लीला को समाप्त कर दिया गया। अपने 58-59 वर्ष के अल्प जीवन में वह इतना
काम कर गये हैं कि उससे उनके लक्ष्यों की प्राप्ति के कार्य को न केवल जारी रखा जा सकता है अपितु उसे पूरा भी किया जा सकता
है। इसके लिये ऋषि दयानन्द की योग्यता वाले त्यागी व तपस्वी वैदिक विद्वानों की आवश्यकता है जिनका वर्तमान में समाज व
देश में निरा अभाव है। उनके जैसा व्यक्तित्व इस पृथिवी पर पुनः उत्पन्न होगा, इसमें सन्देह होता है। हम ईश्वर से ही प्रार्थना
करते हैं कि हमारे देश व आर्यसमाज को ऋषि दयानन्द के समान ईश्वरभक्त एवं वेदभक्त विद्वान जिनमें उन जैसी योग्यता एवं
वेद प्रचार की भावना हो, प्रदान करें जिससे वेद अपने यथार्थ गौरव को पुनः प्राप्त कर सकें और सारे विश्व से अविद्या का नाश
होकर वेदों का प्रचार व व्यवहार विश्व के जन-जन में देखने को मिले। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001

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फोनः09412985121

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